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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:योगिभक्ति - श्लोक 22

From जैनकोष



जियभय जियउवसग्गे जियइंदियपरीसहे जियकसाए।

जियरायदोसमोहे जियसुह दु:खे णमंसामि।।22।।

जितभय योगियों का अभिवंदन- इन योगीश्वरों ने भय को जीत डाला है। श्मशान भूमि में रहकर योगी तपश्चरण करते हैं। कहीं मुर्दा जल रहा है, कहीं खोपड़ी पड़ी हुई है, जहां से ये लौकिक जन निकले तो यहां भूत रहा करते हैं ऐसी शंका रखकर भय किया करते हैं, ऐसे भयानक स्थान, ऐसे जंगलों के स्थान कि जहां शेर चीता आदिक हिंसक जानवरों की बहुलता है, जैसे जंगल में पथिक लोग चलते हुए भय खायें, शस्त्र आदिक ले करके यहां से निकलें ऐसे भय के स्थानों में भी ये योगीश्वर नि:शंक होकर ठहरते हैं। ऐसे भयों के जीत लेने का कारण क्या हुआ कि उन्होंने अमर एक ज्ञानस्वरूप की ही रुचि की और उसे उपयोग के समक्ष रखकर यह अनुभव करते कि इसे तो कोई छू भी नहीं सकता, मार भी नहीं सकता। यह तो कहीं नष्ट नहीं हो सकता। यह तो यही है। भले ही यह पर शरीर वियुक्त हो जाय पर यह मैं सदा इस ही में रहता हूं, इसका कहीं वियोग संभव नहीं है। लोग जो मरने से घबड़ाते है वे मरण का भय नहीं करते किंतु मोह जो बना हुआ है। उस मोह के कारण उनके डर बन गया है- हाय यह लाखों का धन कमाया यह सब यों ही छूटा जाता है। परिवारजनों से भी प्रेम बढ़ाते रहे जिनसे बड़ा प्रेम पाते रहे। इस प्रेम के आदान-प्रदान के कारण मोह दृढ़ हो गया था। सो अब वह मरने वाला पुरुष दु:ख मानता है कि हाय मेरा कुटुंब भी मुझसे छूटा जा रहा है। तो शरीर की भी ममता जग गयी है, इस तरह मोह की वृत्ति के कारण मरने वाले को क्लेश हो रहा है। जब वस्तुत्व पर दृष्टि पहुंचे, मैं तो यह हूं, जिसका बाहर कुछ है ही नहीं, जिसको दुनिया के लोग समझते ही नहीं। यह मैं अपने में ही रहता हूं अनादिकाल से, अपने ही स्वरूप में रहता आया हूं और अब सदा अपने स्वरूप में ही रहूंगा, ऐसे जो एक अपना ज्ञायकस्वरूप है बस इसके दर्शन की ऐसी महिमा है कि उन्हें न मरने का भय है, न भूत प्रेतों का भय है, न शेर चीतादि जानवरों का भय है। कितना दृढ़ भेदविज्ञान हैं इन योगियों का?

जितभय योगियों के दो उदाहरण- सुकुमाल मुनि का सुकुमाल शरीर जिसे गीदड़ी ने दो तीन दिन तक भक्षण किया, पैरों से लेकर जंघा तक चीर डाला, किंतु वे मुनि एक परमज्ञानज्योतिरूप के दर्शन करते हुए प्रसन्न थे, उनको विषाद न था और कदाचित् ज्ञात भी होता हो कि यह शरीर खाया जा रहा है तो भेदविज्ञान के प्रताप से इस ढंग का ज्ञान हो रहा था कि जैसे बाहर में किसी अन्य वस्तु पर कोई आक्रमण होता है। ऐसा दृढ़तम भेदविज्ञान जिन योगियों के होता है उनको भय काहे का? सुकौशल मुनि किशोर अवस्था का ही था, जवानी भी पूरी न आ सकी और विरक्त होकर ऐसे समय विरक्त होकर कि उसकी स्त्री के गर्भ था, तो मंत्रियों ने समझाया कि बच्चा हो जाने दो, उसको उत्तराधिकारी बन जाने दो तब तुम निर्ग्रंथ होना। लेकिन वे न माने और यह कह दिया कि जो गर्भ में संतान है उसको हमने अभी से राजतिलक कर दिया। अब राज्य का संभालना मंत्रियों का काम है। तो अब मंत्रीगण राज्यभार संभाले और जो संतान गर्भ में हैं उसको मैंने राजतिलक किया, ऐसा कहकर एक अपना पिंड बचाकर सुकौशल मुनि जंगल चले गए। जंगल में तपश्चरण कर रहे थे, वहां सुकौशल की मां आर्तध्यान से व्याघ्री हुई थी। जब देखा तो मिथ्यात्व के कारण उल्टा ही उसने स्मरण किया कि इसके ही कारण मेरी यह दुर्गति हुई है। बच्चा निर्ग्रंथ हो गया था तो मोह में उस पर क्रोध आ जाने के कारण क्रोध में आकर व्याघ्री हुई थी सो सुकौशल की छाती में पंजा मारा, इतने पर भी सुकौशल रंच भी विचलित नहीं हुए। उसका क्या कारण था, सर्वपदार्थों से भिन्न ज्ञानमात्र अपने आपको अनुभव किए जा रहे थे। यह अनुभव जिन्होंने पाया उनका जीवन धन्य है। जीवन क्या धन्य है उनका परिणमन धन्य है, उनकी निजी दुनिया धन्य है। जिन्होंने ऐसे ज्ञानस्वरूप में अपने उपयोग का योग किया है तो ये योगीश्वर जितभय होते हैं।

भयविजयी ज्ञान- भय उन्हें होता है जिन्हें शरीर में व्यामोह होता है, किंतु जो अपने चैतन्यस्वरूप को इस शरीर से निराला निरख रहे हैं

उन्हें किसी चीज का भय नहीं होता। उन्हें मरण का भी भय नहीं होता। वे तो समझते हैं कि यह मैं स्वयं परलोकस्वरूप हूं, परलोक की उन्हें यों चिंता नहीं कि वर्तमान में वे अच्छी करनी कर रहे हैं, एक शुद्ध ज्ञानवृत्ति से रह रहे हैं। वे क्यों कल्पना करें? जिसमें भव ही नहीं, जिसका स्वरूप जन्ममरण नहीं, ऐसे भवरहित, जन्ममरणरहित निजज्ञायक प्रभु की आराधना करें, यह बात कहां जमती है? जहां एक अपने आपके स्वरूप का ही अनुभव किया जा रहा है। इन योगीश्वरों को शरीर की वेदना का भय नहीं है। शरीर तो शरीर ही है, शरीर में फोड़ा फुंसी हों, उष्णता आये, किसी प्रकार का बिगाड़ हो तो वह परपरिणमनरूप ही परिणमन है, वे शरीर की ही अवस्थायें हैं। जो पुरुष शरीर का जितना लगाव रखता है वह उतनी ही वेदना का अनुभव करता है। जिसका शरीर से लगाव नहीं है वह शरीर की वेदना का अनुभव नहीं करता। इन योगिराजों के मरण का भय नहीं। वे जानते हैं कि मैं चैतन्यस्वरूप हूं। यह चैतन्य, यह सहजसत्त्व यह सहजज्योति बस यही तो मैं हूं, यही प्राण है, इसका कहीं वियोग ही नहीं हो सकता। जो मैं अपने स्वरूपसत्त्व से हूं उसका कहां वियोग? किसी भी पदार्थ के स्वरूप का कभी वियोग नहीं होता और जो पदार्थ के स्वरूप में नहीं है वह चीज चिपक जाय या ऐसा परभाव इसमें प्रतीत हो जाय तो भी वह इसका है कहाँ? जो मेरा है वह कभी जाता नहीं बाहर। जो मेरा नहीं है वह कभी मेरे में आता नहीं है, ऐसी दृढ़ता भेदविज्ञान में जिससे उनको मरण का भय कहाँ से आयेगा? अन्य अन्य भय भी- जैसे मेरा कोई रक्षक ही नहीं, बहुत से लोग विरोधी हो रहे हैं, कोई मेरी बात का कहने वाला ही नहीं, मेरे पास ऐसा कोई सुरक्षित स्थान ही नहीं, कहीं कोई घटना न हम पर घट जाये, ऐसी कल्पनायें क्या जगायेगा जिसने अपने सहज ज्ञानस्वरूप में अपने को अनुभवने की ठानी है। दूसरी बात नहीं चाहता, अन्य बातों को, विकल्पों को अत्यंत असार समझता है, ऐसा पुरुष किसी भी प्रकार के भय से भयभीत नहीं होता। ये योगिराज भय पर विजय पाने वाले हैं।

जितोपसर्ग योगियों का अभिवंदन- योगिराज जितोपसर्ग हैं। कैसे भी उपसर्ग आयें उनको ये योगिराज अपने आत्मबल से सहज ही जीत लेते हैं। कोई गाली दे रहा है, अपमान कर रहा है अथवा मारपीट रहा है तो भी वे उस पर द्वेष की भावना नहीं लाते। यदि किसी दुष्ट ने, अपने कषाय के अनुकूल बर्तने में शांति मानने वाले ने दुर्वचन भी कह दिये तो वचन तो भाषावर्गणा के परिणमन हैं और वचनों की उत्पत्ति जिस विधि से हुई है वह है पुद्गल, पुद्गल का संयोग व वियोग। जीभ चली, ओंठ चले, शरीर के अनेक अंगों का जो संयोग वियोग होता है वह है इन वचनों का उत्पादस्रोत। आत्मा तो एक ज्ञानमूर्ति है। इस प्रसंग में जीव ने यदि कुछ किया तो अपना ज्ञान किया, विकल्प किया, इच्छा की, रागद्वेष अधिक से अधिक हो गया, पर जिस वस्तु का जो परिणमन होता है उसका फल उस ही वस्तु में हुआ करता है। निश्चयदृष्टि से देखिये- प्रत्येक जीव जो भी भाव, क्रोध का भाव करता है तो उस क्रोध का फल दूसरा नहीं भोगता, खुद को ही भोगना पड़ता है। लेकिन मोह बना कैसे है? ऐसे कि देखो इसने मेरे बिगाड़ के लिए कैसा काम किया? कोई दूसरा बिगाड़ने के लिए कुछ कर ही नहीं सकता। आत्मा भावभर बनाता है। जब विकल्पमात्र बना सकता है तो उन विकल्पों के उत्पन्न होने से जो उनके तुरंत क्षोभ आया वही तो उसका प्रयोजन बना। फल तो उसी ने पाया है। जो जैसा भाव सोचता है वह उस भाव का तुरंत ही फल प्राप्त कर लेता है। जिस समय जो भाव किया उस भाव में जो सुख दु:ख अथवा आनंद समाये हैं वे उसे तुरंत प्राप्त हो जाते हैं। तो जिन योगीश्वरों ने वस्तुस्वरूप समझा है और जिनके उपयोग में वस्तुस्वरूप स्पष्ट रहा करता है वह अपमान भरे शब्दों को सुनकर या सम्मान न हो सके- ऐसी उपेक्षा भरी चेष्टा को निरखकर रंचमात्र भी मन में विषाद नहीं लाते। कोई मारपीट का भी उपसर्ग करे तो पुद्गल पुद्गल का संयोग हो रहा है। लाठी और शरीर का जो संबंध होता है वही तो पिटाई कहलाती है। उसमें भी उन योगियों के दृढ़ता की बुद्धि रहती है और प्रकाश रहता है कि जो होता है सो होने दो। हम यदि विकल्प करें उस परिस्थिति को हटाने का, किसी भी प्रकार का हम विकल्प करें, अपने आपके स्वरूप से चिगें तो इससे मेरे जन्ममरण की परंपरा बढ़ जायगी। एक भव छूटता है तो छूटने दो। यदि उस काल में विकल्प किया तो मैं अपना संसार बढ़ा लूँगा और संसार ही अनर्थ है, एक अमूल्य निधि को प्राप्त किए रहने के लिए उनमें इतना बड़ा बल बना हुआ है कि यदि कोई निर्बल भी उपसर्ग करे तो उसमें भी विचलित नहीं होते। ऐसे ये योगिराज उपसर्ग के विजयी हैं।

जितेंद्रिय योगियों का अभिवंदन- ये योगी जितेंद्रिय हैं। इन्होंने इंद्रिय को जीत लिया है। इंद्रियों को कैसे जीता? इंद्रिय से उपेक्षा करके। कहीं इंद्रिय से भिड़ना नहीं, पकड़ना नहीं, किंतु इन इंद्रियों से उपेक्षा करने का नाम जितेंद्रियपना है। इंद्रिय जब उपभोग कहलाता है तो उस उपभोग के समय में तीन साधनों का संपर्क रहता है- द्रव्येंद्रिय, भावेंद्रिय और विषयभूत पदार्थ। स्पर्श, रस वाले ये विषयभूत पुद्गल पदार्थ ये तो आश्रय में रहते हैं- जैसे खाया, सूँघा, छुवा तो ये पुद्गल ही तो सारभूत हुए और यह विषय किया जा रहा है द्रव्येंद्रिय के साधनों से। आंखों से देखा, हाथ से छुवा, जिह्वा से चखा तो द्रव्येंद्रिय का साधन जुटाया और अनुभव किया जा रहा है भावेंद्रिय के द्वारा। इस द्रव्येंद्रिय के निमित्त से स्पर्श, रस, गंध, वर्ण वाले पदार्थों का जो ज्ञान किया जा रहा यह तो क्षायोपशमिक ज्ञान है। यह इंद्रियावरण के क्षयोपशम से उत्पन्न होता है भावेंद्रिय। तो पदार्थों के उपभोग के प्रसंग में तीन साधनों से काम पड़ता है। यदि इंद्रियविषयों का विजय करना है तो इन साधनों से उपेक्षा करनी पड़ेगी। विषय विजय का यह मूलमंत्र है। इन तीन साधनों की उपेक्षा का उपाय यह है कि इसका जो स्वरूप है उसके विपरीत अपने स्वरूप की भावना लगे। जिससे उपेक्षा करना है उससे उल्टा बनकर ही उपेक्षा की जा सकती है। तो देख लीजिए इंद्रिय के विषयभूत पदार्थ भोजन आदिक जो भोगने में आ रहे हैं ये पदार्थ पदार्थ हैं, पिंड हैं, संग हैं, परिग्रह हैं, कुछ चीज जैसी लगती है। लेकिन यह आत्मा नि:संग है, इसमें कुछ पिंड नहीं नजर आता, कुछ संग नहीं नजर आता। आकाशवत् निर्लेप नि:संग हैं तो इन संगों से, परिग्रहों से, विषयों से उपेक्षा करनी है तो अपने को नि:संग अनुभव करना चाहिये। मैं इन बाह्यपदार्थों से रहित केवल ज्ञानप्रकाशमात्र एक नि:संग चैतन्यस्वरूप हूं- यह तो हुई विषयों से उपेक्षा।

अब द्रव्येंद्रिय से इन आँख, कान आदिक इंद्रियों से उपेक्षा करनी है तो इंद्रिय का स्वरूप देखो, ये इंद्रियाँ जड़ हैं, पुद्गल हैं। मैं पुद्गल का स्वामी नहीं, पुद्गल का स्वामी पुद्गल है। मैं जड़ नहीं। मैं एक चैतन्यस्वरूप हूं, तो जड़ पौद्गालिक इन द्रव्येंद्रियों से विपरीत मैं चेतन हूं और चेतन का स्वामी हूं। यों अपने को चैतन्यमात्र निरखकर द्रव्येंद्रिय से उपेक्षा की जाती है। अब करना है भावेंद्रिय से उपेक्षा। जो इन पदार्थों के उपभोग के प्रसंग में ज्ञान उलझा रहता है, उपयोग फँसा रहता है उस ज्ञान से उपेक्षा करनी है। यह ज्ञान कहलाता है खंडखंड ज्ञान। जिस विषय को हम उपभोग रहे हैं, उस विषय में हमारा ज्ञान जो उलझ रहा है वह ज्ञान का एक टुकड़ा बन गया, ज्ञान तो अखंड है। जाने तो समस्त लोक को जाने। यह अखंडात्मक ज्ञान विषयभोगों के प्रसंग में टुकड़े टुकड़े रुप बन रहा है। पर यह खंडज्ञान मैं नहीं हूं। मैं हूं अखंडस्वरूप। तो यों अखंडस्वरूप निजआत्मा पर दृष्टि करे तो इन खंडज्ञानों की उपेक्षा हो जायगी। तो यों इन विषयपदार्थों से और शरीर के आँख, कान आदिक इंद्रियों से तथा विकल्पात्मक, खंडात्मक ज्ञानों से उपेक्षा जहां बनी रहती है और अखंड ज्ञानप्रकाशमात्र अपने आपको अनुभवने की रुचि और वृत्ति रहती है ऐसे योगीश्वर वास्तविक मायने में नि:शंक होते हैं।

भोगविरक्ति की आवश्यकता- भैया ! भोग भोग में लगे रहने से पूरा तो न पड़ेगा। जीवन है, कुछ बल पाया है, कुछ बुद्धि पायी है तो ये मोहीजीव इन सबका उपभोग विषयों के भोगने में कर रहे हैं, पर ये विषयों के भोग प्रसंग इस आत्मा का जीवन नहीं निकाल सकते। तो आत्मा अविनाशी है। जैसी करनी करता है उसके अनुरूप ही यह अपनी पर्याय पाता है, परिणति पाता है। उसका गुजारा भोगों से नहीं हो सकता। भोग तो कभी छूटेंगे ही। चाहे इन भोगों को हम अपनी स्वच्छ बुद्धि से छोड़ दें या ये भोग मेरे मरण पर स्वयं छूट जायें या मेरी जीवित अवस्था में भी ये भोग स्वयं नष्ट हो जायेंगे। हर प्रकार से इन विषयभोगों का वियोग होगा ही। तब फिर ये बुद्धिमानी क्यों न कर ली जाती कि ज्ञान जगाकर इन विषयभोगों को स्वयं ही अपनी विशुद्ध ज्ञानकला के उपयोग से छोड़ दिये जायें। ये योगीश्वर समस्त भोगों से, शरीर से, संसार से विरक्त होकर ये अपने आपके चैतन्यस्वरूप का अनुभवन किया करते हैं। इस कारण ये वास्तविक जितेंद्रिय हैं।

जितपरीषहता का जयवाद- इन योगीश्वरों ने परीषहों पर विजय प्राप्त किया है। मोही लोग, कायर लोग न भी परीषह आयें तो भी शरीर के आरामों से कुछ कमी समझकर अपने ऊपर उपसर्ग का अनुभव करते हैं। कहते हैं कि अरे हम पर तो बड़ा कष्ट है? अरे क्या कष्ट है? ज्ञानी पुरुषों की वृत्ति तो देखो कि जिन पर भयंकर परीषह भी आ पड़े। महीने-महीने भर के उपवासे, आहार के लिए निकले, अंतराय हो गया, ऐसे कठिन परीषह जिन पर आयें उन पर भी ये योगीश्वर विजय प्राप्त कर लेते हैं। चक्रवर्ती की पुत्री अनंगशरा तीन हजार वर्ष तक जंगल में अकेले रही, कोई हरने वाला हर कर ले गया, किसी ने उसका पीछा किया तो वह डर के मारे जंगल में छोड़ गया, पर उस अनंगशरा ने परीषह पर विजय प्राप्त की, धैर्य धारण किया, तपश्चरण में रत रही। शरीर पर वस्त्र भी न थे, किसी तरह से बलकलों से तन ढांककर अथवा यों ही सारा जीवन व्यतीत किया तो जंगल में तीन हजार वर्ष तक रहना यह कितना बड़ा परीषह है? पर ज्ञान जगा, आत्मा को निरखकर संतुष्ट रही, परीषहों पर विजय प्राप्त किया। तो हम भी जरा-जरासी बातों में घबड़ायें नहीं, जरा-जरासी वेदनाओं में घबड़ायें नहीं। जितपरीषह योगियों के योग की उपासना करें। समस्त प्रकार के परीषहों पर, उपसर्गों पर, इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने वाले योगीश्वरों को मैं वंदन करता हूं।

जितकषाय योगियों का अभिवंदन- पुरुषों में महापुरुष वे ही कहलाते हैं जिन्होंने अपने अलौकिक निरापद ज्ञानस्वरूप में रमने का ध्येय बनाया है, जो विषयों में रमा करते हैं वे तो तुच्छ संसारी प्राणी हैं, अज्ञान से ग्रस्त हैं, जिसमें कुछ सार नहीं, अत्यंत भिन्न पदार्थ और जिस राग में कुछ सार भी नहीं, जो दु:ख उत्पन्न करने के लिए आया है, आत्मा के स्वभाव से विपरीत है, मायारूप है। ऐसे राग में अथवा परविषयों में मोह करना, राग करना, आकर्षण होना, ये तो सब तुच्छ काम हैं। जिस जीव के सम्यग्ज्ञान का उदय होता है, जिसने अपने आत्मा का गौरव परखा है ऐसे स्वविभव के जानने वाले योगीश्वरों को विषयों में रंच भी रुचि नहीं होती और कषायों में रंच भी लगाव नहीं होता। कषायें उत्पन्न होती हैं अपने पदानुसार, लेकिन उन कषायों से निवृत्त रहना, ऐसा विशुद्ध ज्ञान जागृत रखना कि ये कषायें मैं नहीं हूं, ये मायारूप हैं, मेरे में मेरे को बरबाद करने को उठी हैं। ऐसा जानकर उनसे लगाव न रखना, उनसे हटकर अपने ज्ञानस्वरूप की ओर ही आना यह ही जिनका पुरुषार्थ बना रहता है, ऐसे पुरुष ही महापुरुष कहलाते हैं। ये योगीश्वर जितकषाय होते हैं। इन कषायों को जीत लिया है, देखिये किसी पर विजय पाने का सभ्यतापूर्ण उपाय यह है कि उससे उपेक्षा कर दी जाय। कषाय भाव को जीतने का और क्या अर्थ है? कर्मों का उदय होता है उस काल में उसके निमित्त में ये कषायें उत्पन्न होती हैं आत्मा में, तो यह निमित्तनैमित्तिक प्रसंग की बात है। आत्मा भी इस योग्य है अभी और कषायों का उदय निमित्त भी चल रहा है तो ये कषायभाव उस योग्यता के माफिक उत्पन्न होते हैं। अब वहाँ क्या करें? उन कषायों को कैसे पकड़कर हटायें, कोई पिंडरूप तो हैं नहीं और पिंडरूप भी हों तो अमूर्त आत्मा उसे पकड़ सकता नहीं। तो कषायों को कैसे निवारा जाय? जैसे जहां लोक में कोई ऊधमी बालक है तो उसको हाथ पकड़कर लोग अलग हटा देते हैं उस प्रकार से हटाने योग्य ये कषायभाव नहीं हैं। इन कषायों पर विजय पाना यही है अपने स्वरूप की सुध लेकर उन कषायों से उपेक्षा कर लेना। बस यही कषायों पर विजय पा लेने की बात है। जिस पुरुष के ऐसे सम्यग्ज्ञान का उदय हुआ है उसको यदि यह कहा जाय कि उसे इतना प्रकाश मिला है कि हजारों लाखों सूर्यों से भी अधिक है तो यह कहा जा सकता है कि यह प्रकाश अलौकिक है। तो ये योगीश्वर उस ही ज्ञानप्रकाश में रहकर अपने विशुद्ध आनंद से तृप्त रहकर कषायों से उपेक्षा कर डालते हैं। कोई अद्भूत आनंद मिले तो कषाय करने से उत्पन्न हुए कल्पित सुख की उपेक्षा की जा सकती है। तो योग्य आत्मीय विशुद्ध सुगम स्वाधीन सहज आनंद हुआ है उसके बल से ये कषायों से उपेक्षा किया करते हैं ऐसे जितकषाय योगीश्वरों को हमारा नमस्कार हो।

जितरागद्वेषमोह योगियों का अभिवंदन- ये प्रभु योगीश्वर रागद्वेषमोह के विजयी हैं। जो बात कषाय में समझी गई है, कषायों से निवृत्त होने के लिए, वही बात रागद्वेषमोह में भी लगाना चाहिये। राग और द्वेष ये कषायें ही तो हैं। कषायों के दो भेद हो गए हैं, कोई कषाय रागरूप है, कोई कषाय द्वेषरूप है और मोह जो है वह इन दोनों धारावों के मूल में भरा हुआ एक विष सागर है। जैसे किसी बाँध में रुका हुआ कोई बड़ा तालाब है इसमें अगर बाँध बीच में न टूट कर अगल बगल टूट जाय तो बीच के स्तंभ की अटक होने के कारण इसमें दोनों ओर दो धारायें बह निकलती हैं इसी प्रकार इस जीव का मोहभाव, अज्ञानभाव ये विषवत् हैं जिनका कि ये प्राणी आदर करते हैं, इस मोहभाव से राग और द्वेष की दो धारायें बह निकलती हैं। जीव का वास्तविक आंतरिक बसा हुआ शत्रु तो मोह ही है। कहावत में कहते हैं कि यह तो आस्तीन का साँप है। अपनी ही बांह में सुखपूर्वक रहने वाला साँप अपने को ही काट लेता है, ऐसे ही अपने स्वक्षेत्र में, अपने ही प्रदेश में उगने वाला यह मोहभाव इस आत्मा को ही बरबाद कर देता है। अथवा जैसे छेवले आदिक पेड़ों में उन्हीं में से लाख पैदा होती है और वह लाख बढ़कर छेवले के पेड़ को सुखा देती है ऐसे ही यह मोह मुझसे ही पैदा हुआ और मुझको ही यह सुखा डालता है। तो यह मोह उस अज्ञानभाव के भींत की आड़ के कारण दो धाराओं में बह गया है। एक धारा राग की और एक द्वेष की। देखो तभी तो यह जीव राग और द्वेष के विकल्प बनाकर कितना दु:खी हो रहा है? है कुछ नहीं इसका इस पर खेद वह अज्ञानीनहीं कर पाता है। खेद होता है ज्ञानियों को। सभी ज्ञानियों की बात कह रहे हैं। जो करुणावान योगीश्वर हैं वे अज्ञानियों के दु:ख पर खेद करते हैं। देखो तो कैसा गजब है कि दु:खी तो हो रहे हैं अज्ञानी मोही जीव और उसका खेद मान रहे ये ज्ञानी जीव कि देखो ये संसार के प्राणी जरासा ही तो इनकी दृष्टि का फेर है। कोई बड़ा अंतर नहीं। स्वमुखता और विमुखता मात्र ही तो अंतर है। ये बहिर्मुख होकर कैसा दु:खी हो रहे हैं। वस्तुत: ज्ञानी उनके दु:ख से दु:खी नहीं हैं किंतु ज्ञानी पुरुषों ने अज्ञानियों की यह मूर्खता निरखकर अपने में करुणा भाव जगाकर अपने ही भावों से दु:ख माना है, लेकिन विषयों की दृष्टि से कहा जा रहा है और कहीं अज्ञानियों के दु:ख का खेद ज्ञानी मानते हैं इसका यह अर्थ नहीं है कि अज्ञानियों का बोझ कुछ कम हो गया है क्योंकि अज्ञानियों के दु:ख में कुछ दु:ख ज्ञानियों ने भी माना है। अज्ञानी तो उतना ही पूरा दु:खी हैं जितना कि अज्ञान बसा हुआ है। तो यह मोह महान् अंधकार है और अज्ञान है। इन सब रागद्वेष मोह भावों पर जिन योगियों ने विजय प्राप्त किया है उन्हें प्रणाम हो।

मोह का अनिष्ट साम्राज्य- इस जगत पर बहुत बड़ा साम्राज्य छाया हुआ है। यह किस किस जीव को किस रूप में बरबाद करने के लिए आ उठ खड़ा हुआ है। पशु पक्षियों का मोह उनके किस्म का है। वे भी अंडों में बच्चों में मोह करने की आदत बनायें हुए हैं। मनुष्यों के बच्चों का मोह और किस्म का है यदि किसी बच्चे को उसकी मां गोदी से उतार दे तो वह अपना अनादर समझकर दु:खी होता है। तो ये पशु पक्षी बच्चे आदि सभी इस मोह के द्वारा सताये हुए हैं। कुछ समझदार पुरुष होते हैं, कुछ कलायें सीख लें तो अब उनको नामवरी का यश कीर्ति का मोह हो जाता है। अरे तेरे में नाम है किसका? तू तो निर्नाम है। ॐ निर्नाम शुद्धं चिदस्मि। अनुभव करो कि मैं नामरहित शुद्ध चैतन्य हूं, इसमें अगर झूठ बात मालूम पड़े तो न मानो और अगर सच्चाई मालूम हो तो अपने भले के लिए मान लेना चाहिये। मेरा कुछ नाम है क्या? नाम धरो, क्या नाम धरते? जो भी नाम धरोगे उसका, वही नाम है सबका। जब सबका वही एक नाम हो जाता है तब फिर नाम की बात तो नहीं रही। मान लो सभी मनुष्यों का नाम खचेडूमल रख दिया जाय तो कौनसा खचेडूमल चाहेगा कि मेरा नाम इन पत्थरों पर खुदाया जाय? अरे उस नाम में तो सभी का नाम आ गया। तो आत्मा का जो भी नाम रखा जाय वह तो सबका नाम है। नाम के मायने वाचक शब्द। इस नाम शब्द से जो भी वाचक शब्द है वह किसका वाचक है? वह सबका वाचक है। फिर मैं तो नहीं आया। यह मैं नामरहित हो गया, इसका निर्णय कर लीजिए। सभी अनर्थों की जड इस नाम का लगाव है तभी कुछ दार्शनिकों ने आस्रव का मूल कारण नाम बताया है। तो मैं नामरहित शुद्ध चैतन्य हूं। एक वह ज्ञान प्रकाश अथवा सामान्य प्रतिभासमात्र जिसमें हमारा उपयोग लगने पर प्रतिभास प्रतिभास में जुड़ गया। अब वहाँ कोई विकल्प नहीं रहा, ऐसा जब निर्विकल्प अनुभव होता है उस समय तो यह वास्तविक रीति से जानता है और फिर उस स्थिति से हटकर विकल्पों में आता है, जब यह परख करते हैं कि और मेरा तो वह स्वरूप है ऐसे इस निर्नाम शुद्ध चैतन्यस्वरूप में सुध न होने से यह अज्ञानी जीव यत्र तत्र अपना उपयोग दे रहा है, अपना सर्वस्व समर्पण कर रहा है।

संसारी जीवों का एक विकल्प ही व्यापार- अज्ञान में जो रुचा उसी के आगे दीन बन जाना, कायर बन जाना, उसके राग में बरबाद कर लेना। मोहियों का यही एक मात्र रोजगार चल रहा है। कोई कहे कि अमुक का खूब रोजगार है और इस दूसरे भाई का कम रोजगार है, औरों का तो बिल्कुल थोड़ा रोजगार है। अरे सबका एक सा रोजगार चल रहा है, चाहे लखपति हो, चाहे करोड़पति हो, चाहे गरीब हो, देहाती हो, शहरी हो, सभी का रोजगार एक किस्म का चल रहा है। दूसरा रोजगार है ही नहीं। जैसे किसी गाँव में एक ही किस्म का रोजगार चल सकता है, जहां मान लो कोयला या अभरक निकलती है और कुछ बात ही नहीं तो वहां एक ही तरह का रोजगार है। तो ऐसे ही इस संसार में एक ही किस्म का रोजगार चल रहा है, सबको देख लिया भीतर में और कोई दूसरारोजगार जानते ही नहीं, यह ही रोजगार चल रहा कि परपदार्थों का आश्रय करना, पर में उपयोग देना, उनमें कल्पनायें बनाना, भली बुरी बातें सोचना, अनेक प्रकार के विकल्प बनाना, बस यही रोजगार इन संसारी जीवों का चल रहा है। जैसे लोग कहते हैं कि यह साहब कपड़े का रोजगार करते हैं, यह सर्राफे का रोजगार करते हैं, यह अमुक रोजगार करते हैं, पर वे सब तो एक विकल्पों का ही रोजगार कर रहे हैं। दूसरी किस्म का रोजगार संसार में रखा ही नहीं है। पर इन सब रोजगारों में इस आत्मा को टोटा ही पड़ता है, नफे की बात वहाँ नहीं समझ में आती। तो फिर शंका कर सकते हो कि जिस रोजगार में नफे का नाम नहीं, टोटा ही टोटा पड़ता है तो वह रोजगार तो चल ही नहीं सकता। जहाँ पूरी पूँजी मिट गई फिर रोजगार कौन करेगा? प्रभु के निकट बैठकर यह प्रभु ही तो रोजगार कर रहा है अपने को भूलकर, इसलिए कहां पूँजी की कमी नहीं आती। यहाँ टोटा पड़ता जा रहा, विकल्प चलते जा रहे, पर विकल्प चल चलकर यह विकल्पों का खजाना खाली नहीं हो पाता क्योंकि ये विकल्प बेसुध बेहोश मूर्छित लोग ही तो व्यापार कर रहे हैं, टोटा सहते जाते और रोजगार में लगे रहते। इतना भी न सोचा जाता कि इस रोजगार में जब क्लेश ही क्लेश हैं तो इसको बदलकर देखो दूसरा रोजगार करें। जब राग में, द्वेष में, मोह में, विकल्प में किसी प्रकार की शांति नहीं प्राप्त हुई तो इस रोजगार को छोड़कर अब जरा सम्यग्ज्ञान का निर्विकल्प होने का ऐसा कुछ रोजगार देखें, पर अज्ञानियों को यह बात मन में नहीं आती। जब तक मोह भाव है तब तक शुद्ध पथ तो मिल ही नहीं सकता।

ज्ञानीयोगियों के वैराग्य का एक मोटा कारण- इन योगीश्वरों ने मोह पर विजय तो पहिले ही कर लिया था। अब योग धारण करने के बाद भी जो रागद्वेष शेष रह गए थे, अथवा जो भी रह गए उन पर अब ये विजय कर रहे हैं, उन सबको जीत रहे हैं, उनकी उपेक्षा कर रहे हैं। किसी पुरुष को फांसी का हुक्म दे दिया जाय तो फिर उसे कुछ भी नहीं रुचता। कोई मिष्ठान्न की अच्छी थाली भी उसके सामने रख दे तो भी उसे वह मिष्ठान्न नहीं रुचता, और भी अनेक प्रकार की भोग संबंधी चीजें उसके सामने हाजिर की जायें तो भी उसे नहीं रुचतीं, क्योंकि वह तो जानता है कि मेरे तो प्राण जाने वाले हैं, इसी प्रकार जिन योगीश्वरों को जन्ममरण का भय लगा हुआ है वे योगीश्वर संसार के किसी भी विषय प्रसंग में अपनी रुचि नहीं रखते। सम्यग्ज्ञान के बल से ये योगीश्वर रागद्वेषमोह को जीत लेते हैं ऐसे वीतराग वीतद्वेष, वीतमोह योगियों को मेरा नमस्कार हो।

जितसुखदु:ख योगियों का अभिवंदन- ये योगी सुख दु:ख के विजयी हैं, ये न सुख में लगाव रखते हैं और न दु:ख में। दोनों को औपाधिक समझ रहे हैं। ये सुख दु:ख क्या हैं? कर्मोदय का निमित्त पाकर रागद्वेषादिक का मिश्रण होकर एक आनंद गुण का विकार हुआ है सुख अथवा दु:ख। यह मेरा स्वरूप नहीं है। ज्ञानी योगी इन सुखों में लगाव नहीं रखते। एक क्षण की भी बेहोशी 70 कोड़ाकीड़ी सागर तक के मोहनीय कर्म का बंध करा देती है। इतना ऐब भरा है इस मोह में, इस बेसुधी में और फिर जो निरंतर यह बेसुधी ही बनाये रहते हैं उन्हें तो संसार सुभट कहा गया है। पर जिन योगीश्वरों ने भी भय किया उन परतत्त्वों से भी ये संसारी जीव भय नहीं करते, बल्कि उनमें ही रमा करते हैं। सुख दु:ख एक कल्पना भरा भाव है। कल्पनायें करके अभी दु:ख को ही बदलकर सुखरूप भी किया जा सकता है। कल्पनायें करके ही दु:ख को सुखरूप में ढाल सकते है। इनका आधार कल्पनायें हैं। कोई इष्टवियोग हो गया तो खुश होता है चलो एक बंधन से तो मेरा निकलना हुआ, अब मैं स्वतंत्र हो गया, अपने आत्मा के स्वरूप की आराधना करूँगा और इस संसार के संकटों से दूर होने का उपाय बना लूँगा और कोई इष्टवियोग में अत्यंत क्लेश मानता है। दु:ख उसने कल्पनाओं से ही तो किया, कोई विषयों में सुख मानता है, उसे बड़ी मौज है, सब प्रकार के साधन मिले हुए हैं, खाने पीने का बहुत सुंदर इंतजाम है, वह इन विषयों से सुख मानता है। तो ये सब काल्पनिक चीजें हैं। आत्मा तो इन कल्पनाओं से परे अमूर्त विशुद्ध अखंड ज्ञानस्वरूप है और उसका आनंद भी अविचल अखंड स्वाधीन है, ऐसा समझने वाले योगीश्वरों ने सुख दु:ख पर विजय प्राप्त किया है, ऐसे सुख दु:ख के विजयी योगीश्वरों को मेरा नमस्कार हो।


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