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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 116

From जैनकोष



क्षितिगतमिव बटबीजं पात्रगतं दानमल्पमपि काले ।

फलति च्छायाविभवं बहुफलमिष्टं शरीरभृताम् ।। 116 ।।

पात्रगत अल्प भी दान की महाफलदायकता―ऐसे योग्य भूमि में बड़ का छोटा बीज डाला गया तो वह भी थोड़े काल के बाद छायावान वृक्ष जैसा रूप रख लेता है और उसमें बहुत फल लगने लगते हैं, ऐसे ही पात्र में दिया हुआ दान आहार, शास्त्र, औषधि, अभय की सेवा थोड़ी भी भक्ति पूर्वक हो तो भी समय पर बहुत महान् फल को देने वाली होती है । भेदविज्ञान जगेगा, शांति संतोष होगा धर्म कार्यों में अंत: स्वरूप में उसकी रुचि बनेगी । कभी वह आत्ममग्न होकर शुक्ल ध्यान के प्रसाद से मोक्ष पा लेगा । देखिये पात्रदान की महिमा । यदि कोई श्रावक पुरुष सम्यक्त्व रहित है और भी पात्रदान करता हैं तो उत्तम भोगभूमि में उत्पन्न होता है जहाँ तीन पल्य की आयु, जिसमें असंख्याते वर्ष आ जाते है बड़ा ऊंचा अद्भुत शरीर समचतुरस्रसंस्थन तथा शरीर का आकार अत्यंत सुडौल और शरीर सुंदर होता है । महत्त्व बल और पराक्रम से युक्त है । वे भोगभूमि के मनुष्य स्त्री जैसे जुगला जुगली से उत्पन्न होते हैं । 3 दिन बाद छोटे बेर बराबर उनका आहार है । अधिक आहार होना यह बड़े पुरुषों की निशानी नहीं होती । तीर्थंकर कितना आहार लेते है? और सारा ही आहार उनका खून, रक्त, मांस, बन जाता है । उनके मल भी नहीं होता । और बड़े-बड़े लोग जो हुए उनका आहार बहुत थोड़ा है और बल विशेष होता है । अगर अधिक आहार होने से महत्ता मानी जाय तब तो हाथी, झोंटा आदिक कितने ही पशु ऐसे है जो कि बहुत आहार लेते है । यह निशानी है पुण्यात्माजनों की उत्तम भोगभूमि में तीन दिन में अल्पाहार होता है । जहाँ 10 प्रकार के कल्पवृक्ष है, जिनमें नाना भोगसामग्री उनकी मिला करती हैं । जहाँ इतना विकास है कि रातदिन का भेद नहीं है । ये सूर्य चंद्रमा इस क्षेत्र में भी नहीं दिखते थे भोग भूमि के काल में । जब तीसरे काल का अंत आया तो ये चंद्र सूर्य दिखने लगे तो लोगों को डर भी हो गया कि यह क्या बला आ गई । ऊपर से कहीं गिर न जायें सो वे बड़े कुलकरों से उसकी समस्या हल करने गए । तो कुलकरों ने उन्हें धैर्य बंधाया कि भाई अब भोगभूमि मिटने वाली है । कुछ ही दिन शेष रहे हैं तो अब ये सूर्यचंद्र दिखेंगे । भाई डरो मत, ये ज्योतिषी देवों के विमान हैं, यों उन्हें समझाया गया । जिस भूमि के क्षेत्र में शीतल मंद पवन हमेशा चलता रहता है । वहाँ ठंड गर्मी की ऋतु का कष्ट नहीं होता, वहाँ पत्थर कांटा, कीचड़ आदि नहीं होते स्फटिक मणि की तरह भूमि है । जंमपर्यंत उनके रोग नहीं, शोक नहीं, बुढ़ापा नहीं, कष्ट नहीं, वहां कोई सेवक नहीं, स्वामी नहीं ।

ज्ञानी दातारों को विशेष सद्गति का लाभ―भोगभूमि में सब अपने-अपने भोग में आराम में और यथोचित धर्मकार्यों में लीन रहा करते हैं । पात्रों की सेवा करने वालों का ऐसे क्षेत्र में जन्म होता है, तो यह तो बात कही अज्ञानीजनों की, पर जो ज्ञानी सम्यग्दृष्टि पुरुष हैं उनका जन्म अच्छे देवों में होता है । सो वहाँ भोगभूमि से भी अधिक सुख का प्रसंग मिलता है, पर जो सम्यग्दृष्टि है वह उस सुख के प्रसंग में मस्त नहीं रहता, आसक्त नहीं रहता, उससे विरक्त ही रहता है । पुण्य का फल जानकर उसका ज्ञाताद्रष्टा ही रहता है, ऐसा होता ही है, होना ही पड़ता है । इन बाह्य पदार्थों से मेरा क्या संबंध है? मेरा इनके प्रसंगों से कुछ हित नहीं है, ऐसा जानकर ज्ञानी जीव तो उनसे भी विरक्त रहा करते है । जैसे एक बात सोचिये कि जो बड़े-बड़े आचार्य हो गए कुंदकुंदाचार्य, समंतभद्राचार्य, जिनकी बड़ी विरक्ति थी, उनका देहांत हो गया तो आप एक अनुमान कर सकते हैं कि उनका जन्म किस गति में हुआ होगा । ऐसे पवित्र पुरुषों का जन्म स्वर्ग में होता है । वहाँ देवियों का प्रसंग भी है मगर वे उस प्रसंग में आसक्त नहीं होते ।

वैयावृत्य शिक्षाव्रत के पालक श्रावकों का सुसमय―विनयसहित गुणानुराग पूर्वक व्रती यति महापुरुषों को आहार औषधि शास्त्र अभयदान करना बहुत ऊँचे फल का परिणाम कराने वाला है। जो सम्यग्दृष्टि मनुष्य है, जिसने पहले देवायु का बंध किया अथवा नहीं किया, मरण समय करता है बंध, वह देवगति में ही उत्पन्न होता है । जिस जीव ने पहले देवायु का बंध किया अथवा नहीं किया, मरण ,समय करता है बंध, वह देवगति में ही उत्पन्न होता है । जिस जीव ने पहले मनुष्यायु का बंध किया वह सम्यग्दृष्टि मनुष्य भोगभूमि मनुष्यों में उत्पन्न होता है । कोई मिथ्यादृष्टि ही मनुष्य हो, मिथ्यात्व में ही मरण करे, पर दान किया हो, दान में बुद्धि हो तो वह भी मरकर भोगभूमि में मनुष्य होता है, और वह भोगभूमिया मनुष्य मरण करके यदि सम्यग्दृष्टि हो तो पहले दो स्वर्गों में उत्पन्न होता है, मिथ्यादृष्टि हो तो भवनवासी व्यंतर ज्योतिषी देवों में उत्पन्न होता है ।

भोगभूमि में कल्पवृक्षों से मनोवांछित उपभोगसाधनों का लाभ―भोगभूमि में दस प्रकार के कल्पवृक्ष होते हैं, जिन कल्पवृक्षों से मनमाना भोगोपभोग का साधन प्राप्त होता है । तूर्यांग जाति के कल्पवृक्ष से नाना प्रकार के बांसुरी मृदंग इत्यादि अनेक वादित्र प्राप्त होते हैं । पात्रांग जाति के कल्पवृक्ष से रत्नसुवर्णमय अनेक प्रकार के आनंदकारी कलश दर्पण झारी आदिक बर्तन प्राप्त होते हैं । भूषणांग जाति के कल्पवृक्ष से अनेक आभूषण हार, मुकुट, कुंडल, मुद्रिका आदि प्राप्त होते है । वहाँ दस्तकारी या काम ये कुछ कष्ट नहीं होते । केवल भोगों को भोगो, बस यह ही जीवनभर रहता है । ज्ञानी जीव तो ऐसे भोगों को भी नहीं चाहता । मगर बतला रहे हैं कि मिथ्यादृष्टि भी हो तो वह भी दान के प्रताप से ऐसे भोग के साधनों में उत्पन्न होता है । पात्रांग जाति के कल्पवृक्षों से नाना प्रकार के जीव ने योग्य शीतल सुगंधित चीजें प्राप्त होती हैं । आहारांग जाति के कल्पवृक्ष अनेक जाति के आहार को लिए होते हैं । यद्यपि भोगभूमि में उत्तम भोगभूमि में तीन दिन में, मध्य भोगभूमि में दो दिन में और जघन्य भोगभूमि में एक दिन में भूख की वेदना होती है, सो भी बेर प्रमाण, आंवला प्रमाण उनका भोजन होता है, पर वह ऐसा शक्तिवर्द्धक गरिष्ट भोजन होता है जैसे कि यहाँ भी कुछ जड़ी बूटियां औषधियां होती हैं कि थोड़ी सी भी खा लेवे तो एक दो दिन भूख न लगे ऐसा गरिष्ट और बलवान वहाँ आहार होता है । पुष्पांग जाति के कल्पवृक्ष नाना प्रकार के पुण्य प्रदान करते है । ज्योति रंग जाति के कल्पवृक्षों में इतनी कांति होती, प्रकाश होता कि वहाँ दीपक की आवश्यकता नहीं होती । सूर्य चंद्रमा भी नजर नहीं आते, इतनी तेज कांति वहां के ज्योति रंग कल्पवृक्षों में होती है । गृहांग जाति के कल्पवृक्षों से दो चार खंड की तो बात क्या, 84 खंड तक के प्रासाद जो कि रत्नकर चित्रित हैं वे वहाँ हाजिर रहते हैं । वस्त्रांग जाति के कल्पवृक्षों से नाना प्रकार के वांछित वस्त्र प्राप्त होते हैं । दीपांग जाति के कल्पवृक्ष दीपमाला की शोभा का विस्तार करते हैं ।

भोगभूमिज मानवों की प्रगति का कारण पूर्वकृत पात्रवैयावृत्य―भोगभूमि में जुगला जुगली उत्पन्न होते स्त्रीपुरुष और उनके उत्पन्न होते ही माता पिता को जहुंबाई आते ही उनके प्राण नष्ट होते हैं । । माता पिता न बच्चों को देख पाते हैं, न बच्चे माता पिता को देख पाते हैं, यह भी एक पुण्य की बात है । अगर देख लेते और बाद में मरते तो दुःख होता । वे पुत्र पुत्री उत्पन्न हुए बाद 7 दिन तो अपना अंगूठा चाटकर ही तृप्त होते हैं । उनके अंगूठे में अमृत है, तब ही यहाँ भी देखा जाता कि कोई बच्चा उत्पन्न होता है तो वह अपने अंगूठे को चाटता है छोटे में । छोटे बच्चे के पैर का अंगूठा भी मुख में चला जाता है । तो उनके सभी अंगों में अमृत भरा है । याने धर्म का, पुण्य का प्रताप देखिये―यहां तो कहो कमा कमाकर मरें फिर भी चीज न प्राप्त हो और पुण्य का ऐसा अतिशय है कि अपने आप ऐसा ऋद्धि वैभव प्राप्त होता है । उसके बाद वह 7 दिन तक औंधा सूधा पलटता रहता है, 7 दिन अस्थिर गमन करता है और 7 दिन में पूर्ण जवान हो जाता है, फिर 7 दिन में सम्यग्दर्शन ग्रहण करना, चतुराई कला आ जाना ये सब बातें आ जाती हैं । 49 दिन पूरे होने पर अनेक प्रकार की पृथक् विक्रिया, अपृथक् विक्रिया सहित महल, वन विहार करते हुए नाना क्रीड़ा तरंगों में वह सुख भोगता रहता है। भोगभूमिया जीव मरकर देवगति में ही उत्पन्न होते हैं यह सब किसका प्रताप है? त्यागी व्रती मुनियों को उत्तम पात्र, मध्यम मात्र, जघन्य पात्र इनको भक्तिपूर्वक आहार दान, शास्त्रदान, औषधिदान, अभयदान देने का फल है । जिस व्यक्ति को धर्म में बुद्धि नहीं है उसका जीवन अंधकार में है । भले ही पूर्व पुण्य का उदय है सो इस भव में मौज कर लें पर आगे दुर्गति ही समझिये । मनुष्य का मित्र धर्म है और वह धर्म भी केवल मन धर्म नहीं, किंतु जिसका तत्त्वज्ञान से संबंध है उस धर्म का फल है कि जिसका यह भव भी शांतिमेंव्यतीत होता है और अगला भव भी शांति में व्यतीत होता है । दान देने के अतिरिक्त उनके सत्कार के वचन बोलना, उनका यथायोग्य आदर करना, पूजा प्रशंसा के वचन बोलना, देखते ही उठकर खड़ा होना, उन्हें उच्च मानना ये भी दान के अंग कहलाते हैं । तो इस प्रकार वैयावृत्य नाम के शिक्षाव्रत में दान का यह स्वरूप बताया गया है ।


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