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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 13

From जैनकोष



स्वभावतोऽशुचौ काये रत्नत्रयपवित्रिते ।

निर्जुगुप्सागुणप्रीतिर्मता निर्विचिकित्सिता ।।13।।

सम्यग्दृष्टि का आंतरिक और बाह्य निर्विचिकित्सित अंग―सम्यग्दृष्टि जीव का अंतरंग कैसा होता है और बाहर में प्रवृत्ति कैसी होती है उन अंगों का वर्णन चल रहा है । इस श्लोक में निर्विचिकित्सा अंग बताया जा रहा है । निर्विचिकित्सा का अर्थ है ग्लानि न करना चित्त को मलिन न बनाना । अंतरंग स्वरूप को देखकर प्रसन्न रहना । यह शरीर प्रकृत्या अपवित्र है । हम आपके शरीर में नीचे से ऊपर तक क्या बसा है? हड्डी, मांस, मज्जा, नसाजाल, चामरोम आदिक ये सब तो इस शरीर में पड़े हैं, कुछ सारभूत बात है क्या? तो यह शरीर से अपवित्र है, किंतु इस शरीर में रहने वाला कोई भव्य जीव यदि रत्नत्रय से पवित्र है जिसे आत्मा का श्रद्धान सही है ज्ञान सही है और अपने में ही रमने का जिसका पुरुषार्थ चल रहा है उस मुनि के शरीर में देखो तो लोग मंगलपना मानते हैं । कहते कि यह पवित्र है । रत्नत्रय के संयोग से पवित्रता कही जा रही है । ऐसे उस मुनि आदि के शरीर में कोई रोग हो जाय उसकी सेवा करें तो सेवा करने में ग्लानि न रखना, चित्त को मलिन न रखना सो निर्विचिकित्सा अंग है । जिसने सम्यक्त्व पाया वह दूसरे सम्यग्दृष्टि सम्यग्ज्ञानी संयमी जीवों को देखकर प्रसन्न रहता है । रास्ते में जा रहा हो पैदल या किसी प्रकार और जिस जगह जाता है उसी जगह का जाने वाला और मिल जाय तो कितना प्रसन्न होते हैं आप? एक से दो, दो से चार हो गए । तो ऐसे ही जो सम्यग्दृष्टि पुरुष है उसका निर्णय है कि मोक्ष में जाना और मोक्ष में जाने का प्रयत्न करने वाले साधुजन दिख जायें तो उसे कितना हर्ष होता है और जिसके प्रति हर्ष होता है, उसकी सेवा करने में ग्लानि का परिणाम न बनना । माता पिता को अपना बच्चा प्रिय है तो बच्चे की सेवा करने में चाहे वह बच्चा शौच कर दे, मूत्र कर दे तो भी उस बच्चे के प्रति म्लान परिणाम नहीं करते । ऐसे ही साधुसंत जनों की सेवा करने में कोई व्याधिवशकय हो जाय, दस्त होने लगे कैसी ही स्थिति हो उससे ज्ञानी जीव मलिनता का परिणाम नहीं लाता । अब उसके अंतरंग से परखिये कितने ही पूर्व के बंधे कर्म हैं उनका उदय आता है तो किस भव का पाप का उदय आया और कैसी ही स्थिति हो जाय तो कोई उपसर्ग हो क्षुधा आदिक वेदना हो, दरिद्रता हो कुछ भी स्थिति आये उस स्थिति को कर्म की दशा जानकर ज्ञानी जीव अपने परिणाम में म्लानपना नहीं लाता । खेद हो या उस पर कुछ ग्लानि बने । ज्ञाता दृष्टा रहता है । यह है सम्यग्दृष्टि का निर्विचिकित्सा अंग ।

सहजात्मस्वरूप होने पर भी अज्ञान में व्याकुलता की चेष्टायें―दूसरे जीवों को भी जब यह ज्ञानी देखता है तो मूल में परखकर लेता कि यह है सहजात्मस्वरूप अर्थात् सहज आत्मस्वरूप । जो प्रभु का स्वरूप है सो सब जीवों का स्वरूप है । एक दरवाजे पर मकड़ा बैठा था, आज की बात है, तो देखा तो वह कुछ चलने लगा । मालूम होता कि उसके आंखें भी होती और कान भी होते । आवाज होने पर वह भागता भी था, तो उसे देखकर हमारे मुख से अचानक ही ये शब्द निकले―अहो सहज परमात्मस्वरूप । इस मकड़े के आत्मा का स्वरूप भी वैसा ही पवित्र है जैसा कि अन्य सब आत्मावों का । और उसकी भी पर्याय देखकर कि ऐसी पर्यायें इस जीव ने हम आपने कितनी बार पायी हैं । क्या जीवन हैं कीड़ों का, मकोड़ों का, मकड़ियों का । ऐसी पर्याय जब पायी गई । आज एक मनुष्य पर्याय में हैं तो भी हर भवों की तरह रागद्वेष मोह में आसक्त हो रहे । एक बड़ी चिड़िया थी हम इसी आंगन में बैठे थे, तो वह चिड़िया बार-बार मेरे सिंर पर से निकले, एकदम निकट से चोंच तो नहीं लगाया, पर 5-7 बार निकली वह चिड़िया । मैंने सोचा किं बात क्या है, मैंने इसका कोई अपराध तो किया नहीं; पर ऐसी गुस्सा भरी दिख रही थी जैसा कि मानो मैंने उसका कोई बिगाड़ किया हो । थोड़ी देर में मैंने सोचा कि शायद इसका बच्चा गुम गया है जो मेरी पिछी में बच्चे का भ्रम करके आ रही हो फिर मैंने ज्यों ही नीचे की ओर देखा तो क्या देखा कि उस चिड़िया का एक छोटा बच्चा नीचे चल रहा धीरे-धरि । और उस बच्चे के ही कारण वह चिड़िया बड़ी बेचैन होकर मेरे पास से बार आती जाती थी । तो देखिये चिड़ियों को भी अपने बच्चों पर कितना तीव्र मोह होता है । दम आपको तो उनके बच्चों पर कुछ प्यार नहीं होता पर वे अपने बच्चों को अपना सर्वस्व जैसा समझते । तो ऐसे ही समझलो कि यह जीव जब जिस भव में जाता है उस भव में जिन जिनका संयोग होता है उनसे यह अधिक आसक्ति मोहकर लेता है । फल यह होता है कि भव-भव में यह ही गल्ती करता है और जन्म लेता है, मरण करता है ।

केवल सहजात्मस्वरूप निरखने में मोक्षमार्ग के सर्व पौरुषों की सुगमता―अपने स्वरूप को देखिये―यह विशुद्ध चैतन्यस्वरूप जाननहार है, उसमें कष्ट का काम नहीं । कष्ट तो कर्म फिल्म का अक्स है, वह भिन्न चीज है । मैं तो भगवान की तरह हूँ । अच्छा यह ही बताओ कि जन्मे बड़े हुए, विवाह किये, बच्चे हुए, चिंता की, मरण किया, फिर जन्मे, तो वही-वही करते रहना अच्छा लगता है क्या? यदि संसार संकटों से छूटने की इच्छा है तो फिर उसका उपाय क्यों न बना लीजिए? क्या है इसका उपाय? इसका उपाय यह है कि जैसे मोक्ष में केवल आत्म- ज्योति रहती है ऐसे ही मुझ में केवल आत्मज्योति अब भी है । वहाँ सर्व बाह्य संग से रहित दशा है और यहाँ ये शरीर तथा कर्म साथ में लगे हैं । तो यहाँ पर अपनी केवल आत्मज्योति का ज्ञान बनायें और उसको ही आत्मस्वरूप मानें । तो उपाय है मोक्ष के मार्ग का । सो किसी भी भव में यह काम करने की इच्छा नही हुई । आज इस मनुष्य भव में आये और यहाँ भी उस प्रकार की इच्छा न हुई तो फिर कब काम सुधरेगा? तो अपने सहज आत्मस्वरूप को निरखिये और यह भी परखिये कि जितना सुधा तृषा इष्ट वियोग अनिष्ट संयोग, रहा व्याधि अपमान आदिक जो-जो भी कष्ट आते हैं वे कष्ट कर्म के विपाक हैं मेरे स्वरूप नहीं हैं । इसलिए कष्टों में भी चित्त की न गिराना, मन को मलिन न करना यह कला होती है सम्यग्दृष्टि जीव की । वह दो बातें तकता है । एक तो यह कि जो दुःख हम पर आया है वह दुःख न कुछ है, इससे भी कई गुने दुःख हुआ करते जीवों पर । मानो जिसके दरिद्रता है, रोज-रोज के खाने का कोई प्रबंध नहीं हैं । शरीर से भी लाचार है, अंधा है तिस पर भी रोगी हो, कोढ़ी हो, सब लोग उसको दुतकारते हैं, जरा उसका दुःख तो देखो । उसके मुकाबले तो यहाँ कुछ कष्ट नहीं । ज्ञानी जीव एक तो यों निरखता है इसलिए अपने पर आये हुए कष्टों से उद्विग्न नहीं रहता है । दूसरी बात यह कि तानी जीव अपने आत्मा में अपने शुद्ध चैतन्यस्वरूप को देखता है । मैं तो यह पवित्र आत्मस्वरूप हूँ, इस कारण उसे कर्म की दशाओं में अधीरता नहीं आती, दूसरे दुःखी गरीब शरीर के अत्यंत रोगी पशु पक्षी मनुष्यों को निरखकर भी ज्ञानी यह जानता है कि इनका आत्मा तो मूल में पवित्र है, चैतन्यस्वरूप है, पर सब कर्म की लीला है । अपने को भी यों ही निरखना कि मैं अंतरंग में पवित्र हूँ, केवल चैतन्यमात्र हूँ । अब जो अनेक बातें आती हैं । ऐसा जानने वाला सम्यग्दृष्टि ज्ञानी पुरुष अपने मन की खेद खिन्न नहीं रखता और साधर्मी जनों की सेवा करने में ग्लानि नहीं करता ।

उद्दायन राजा के निर्विचिकित्सत अंग के पालन की ख्याति―निर्विचिकित्सत अंग की एक कथा प्रसिद्ध है । स्वर्गों में यह चर्चा चल रही थी कि इस समय उद्दायन राजा साधुजनों का बड़ा भक्त है, सम्यग्दृष्टि है, ज्ञानी है, तो यह चर्चा जब स्वर्गों में सुनी देवों ने, वहाँ भी प्रवचन सभा चलती है, और उसमें मुख्य वक्ता इंद्र होता है इसलिए उसको बृहस्पति भी कहते है, और बाकी सब लोग सुनते है, क्योंकि धर्म की बात कुछ न सुने तो वह जीवन बड़ा ऊबासा जीवन होता है । वे देव लोग विषयों में रमते हैं, नाना प्रकार के सुख भोगते हैं, और यही-यही करे तो वे प्रसन्न नहीं रह सकते, सुखी नहीं रह सकते तो उनके भी घंटों धर्म चर्चायें चलती रहती हैं । तो एक देव के मन में आया कि मैं उद्दायन राजा की परीक्षा करूं सो वह आया मुनि भेष बनाकर चर्या के समय पहुंचा, उद्दायन राजा ने उनको पड़गाहा । आहार दिया । मुनि तो थे नहीं, देव का रूप था आहार लिया और कय कर दिया, तो वह राजा उद्दायन और उसकी पत्नी अपने कर्मों को धिक्कारती हुई कि मेरा कैसा अशुभ कर्म है कि आज महाराज को आहार देने का मौका मिला और उनको पचा नहीं कय हो गया, बड़ी तकलीफ है, सो वे कय वगैरह साफ करने लगे, उनका शरीर पोंछने लगे रंच भी ग्लानि नहीं की । तब उन्होंने रूप प्रकट करके कहा कि हमने जैसा सुना था कि आप बड़े धर्मात्माजनों के प्रेमी हैं ज्ञानी है सो वह चीज हमने आज पाया । हम देव हैं, हम को क्षमा करो । मुझे स्व परीक्षा भर करना था । तो जो ज्ञानी पुरुष है वह ग्लानि नहीं करता । अशुचि पदार्थ भी दिखे तो जान लिया साधारण रूप से कि यह अशुचि चीज है पर अन्य लोगों की भांति नाक भौंह नहीं सिकोड़ता । मात्र उसका ज्ञाता भर रहता है । तो इसकी दृष्टि में कि शरीर तो अपवित्र ही है सबका मगर वह मनुष्य पवित्र है । जिसका आत्मा रत्नत्रय से युक्त है, उसमें उसकी प्रीति जगती है और किसी प्रकार की ग्लानि नहीं होती । कभी कोई कर्म का तीव्र उदय आये और उसका खोटा फल मिले, जिसमें कष्ट माना जाय जो वहाँ यह सोचता है कि जो मैंने कर्म किया सो वे भोगने में आ रहे है । सो यह तो भला हो रहा है कि वे खोटे कर्म मुझ से अब निकल रहे हैं । ज्ञाता जीव किसी भी स्थिति में ग्लान-म्लान नहीं बनता । यह सम्यग्दृष्टि की पहिचान चल रही है । अब सम्यग्दृष्टि की चौथी पहिचान है अमूढ़दृष्टि उसका वर्णन करते है ।


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