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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 131

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जन्मजरामयमरणै: शौकैर्दु:खैर्भयैश्च परिमुक्तम् ।

निर्वाणं शुद्धसुखं नि:श्रेयसमिष्यते नित्यं ।।131।।

अपने जीवन में व्रत पालन करने वाला और अंत समय में सल्लेखना धारण करने वाला पुरुष अनेक अभ्युदयों को प्राप्त कर मोक्ष को प्राप्त करता है पूर्व छंद में यह बात कही गई थी, उसी के संबंध में यहाँ यह बतला रहे हैं कि वह नि:श्रेयस मायने निर्वाण किस प्रकार का है । उसको विशेष लक्षण पूर्वक बतला रहे हैं । नि:श्रेयस का सीधा अर्थ है इष्ट कल्याण मय, जिसमें अपना पूर्ण कल्याण बसा हो उसे कहते है निश्रेयस । तो पूर्ण कल्याण निर्वाण में ही है, इस कारण नि:श्रेयस का अर्थ निर्वाण कहा जाता । वह निर्वाण नि:श्रेयस है, इष्ट है, पूर्णकल्याणमय है । इस निर्वाण में अब जन्म लेना न रहा । सबसे कठिन विपत्ति है जन्म धारण करना, जिस विपत्ति की ओर प्राय: जीवों की दृष्टि नहीं हैकि यही तो दु:ख है । जन्म हुआ तो जीवन रहा, जन्म का दुःख जीवन का दुःख । फिर मरण होगा वह दुःख, फिर इतने से छुट्टी नहीं मिलती, फिर जन्म होगा, वही का वही क्लेश, इस कारण जन्म ही सर्व क्लेश है। अब सिद्ध प्रभु जन्म से रहित हैं, जन्म होता ही नहीं है, अरहंत भगवान भी जन्म से रहित हैं। भले ही अरहंत प्रभु का पंडितपंडितमरण होता है जिसे निर्वाण कहते है, पर उसके बाद जन्म नहीं होता । सिद्ध जन्म से रहित हैं और आगे जन्म होने का कोई सवाल ही नहीं है । जन्म नहीं हुआ करता । जीव तो स्वयं स्वतंत्र परिपूर्ण सत् है, बस नए शरीर में जीव का पहुंचना म् जन्म कहा करते हैं । सो यह बड़ी विडंबना है जीव की कि ऐसा परमात्मस्वरूप होकर भी जन्म लेकर यह नाना विडंबनाओं रूप बन जाता है । संसार के कैसे-कैसे जीव, उनकी कैसी-कैसी अवस्थाएँ ये सब विडंबनाएँ इस जन्म के कारण है । सो जन्म से रहित स्थिति ही निर्वाण है, अन्यथा निर्वाण का कुछ अर्थ नहीं । कुछ लोग बैकुंठ की कल्पना करते हैं कि यह जीव तपश्चरण करके कर्मों से छूट जाता है, बहुत समय तक छूटा रहता है, उसके बाद संसार में ही आना पड़ता है । फिर से कर्म लग जाते हैं, जन्म हो जाता है । पर ऐसे जन्म की जहाँ शंका है उसे निर्वाण कैसे कहा जा सकता? अथवा नाम धर दें निर्वाण का लेकिन नि:श्रेयस तो न रहा, परम कल्याण रूप न रहा । यह तो और मुसीबत रही, किसी से कहा जाए कि हम तुम को करोड़पति बना देंगे 10-5 वर्ष बाद में जो तुम्हारा निज का घर है, जो कुछ तुम्हारे पास दंड कमंडल है वह सब भी छीन लिया जाएगा । तो ऐसा धनी होने की कोई इच्छा करता है क्योंकि हां-हां बना दो, 10-5 वर्ष धनिक बनकर देख ही लेंगे, पीछे भिखारी बन लेंगे ऐसा कोई नहीं चाहता: । तो ऐसा बैकुंठ कि जहाँ अनगिनते वर्षों तक रहे, पर उसे जन्म लेना पड़े तो वह नि:श्रेयस नहीं कहला सकता । नि:श्रेयस जन्म से रहित हुआ करता है ।

नि:श्रेयस की जरापरिमुक्तता―नि:श्रेयस में जरा का क्या काम । जरा का अर्थ है बुढ़ापा, और धातु से अर्थ निकलता है जीर्ण शीर्ण हालत बनना । जहाँ शरीर ही नहीं है वहाँ जरा का क्या प्रश्न? जरा तो अरहंत अवस्था में भी नहीं हुई । कोई मुनिराज बूढ़े हों और उनको केवलज्ञान हो जाए तो केवलज्ञान होने पर फिर वे बूढ़े न रहेंगे, उनकी हड्डी पसली निकली हुई न रहेंगी । उस पवित्रता का यह प्रताप है कि वह शरीर मनोज्ञ दर्शनीय हो जाएगा अन्यथा अरहंत भगवान मिलें और उनके हड्डी पसली निकल हों तो यह कुछ अटपटासा लगता है कि ऐसे प्रभु में भक्ति विशेष कहां से बनेगी? जैसे मुनियों के प्रति भक्ति है वही सीमा में रहेगी । ऐसा होता ही नहीं है, 12वें गुण स्थान में जो मुनिराज हैं वहाँ शुरु सेही शरीर की निर्दोषता होने लगती है, निगोद जीवों का जन्म रुकने लगता है, कम होने लगता है, और 12वें गुणस्थान के अंत में इस शरीर में कोई निगोद जीव नहीं रहते और उसके साथ-साथ धातु उपधातु में मलिनता न रहे यह भी साथ चल रहा है । तो अरहंत होने के प्रारंभ में उनका शरीर स्फटिक मणि की तरह कांतिमान और छायारहित हो जाता है । सिद्ध भगवान जरा से रहित हैं ।

नि:श्रेयस की आमयपरिमुक्तता―प्रभु के रोग नहीं होता । रोग तो अरहंत प्रभु के भी नहीं है जहां कि शरीर है । फिर सिद्ध भगवान के तो शरीर ही नहीं है, रोग कहां से आए? रोगादिक होने का कारण कर्म का उदय है । और कर्म का उदय जब आता है जब बंधे, और ऐसा कर्म तब बंधा जब इसके भाव खराब हुए । तो जो आत्मा अपने भाव खराब करता है उसके ही रोग होता है । भले ही आज पुण्य के उदय में भाव भी खोटे किए जा रहे तो भी रोगादिक नहीं सता रहे, अन्य अभ्युदय भी चल रहे पर वे चलेंगे उतने ही दिन तक जितने दिन तक पूर्वबद्ध कर्म साथ दे रहे । अंत में हालत वही होगी जो आज भाव खोटे किए जा रहे हैं । हमारा सब कुछ हमारे भावों पर निर्भर है, कोई बात कुछ समय बाद बनेगी, पर जो भी मेरी सृष्टि होती है वह सब मेरे भावों के अनुसार होता है इसलिए कह लीजिए कि यह आत्मा ईश्वर है, अपनी सृष्टि बनाने में यह स्वतंत्र है । जीवन में भाव गंदे न होना चाहिए । चाहे कुछ धन वैभव कम हो जाए अन्य कुछ भी स्थिति हो जाए, मगर भावों में निर्मलता ही रहना चाहिए । भावों में बिगाड़ न आना चाहिए । तो जहां वीतराग निर्विकल्प समाधि का परिणाम रहा मुनिजनों का, इसही समाधिभाव में अपने सारे क्षण लगाएँ जिसके प्रताप से अरहंत अवस्था पायी और अंत में सिद्ध अवस्था पायी तो यह शुद्धोपयोग परिणाम का फल है । सिद्ध प्रभु आमय से रहित हैं।

नि:श्रेयस की मरणपरिमुक्तता―सिद्ध भगवान मरण से रहित हैं । जो अवस्था पायी है सिद्ध प्रभु ने वह धर्मादिक द्रव्यों की तरह शुद्ध अवस्था है । जैसे आकाश अपने आप में विशुद्ध है उसमें कोई लेप नहीं, विकार नहीं, ऐसे ही सिद्ध प्रभु में कोई लेप नहीं विकार नहीं । केवल एक विज्ञानघन यह आत्मा है जिसकी निरंतर विशुद्ध ज्ञान परिणतियां चल रही हैं । यहां तो किसी भी वस्तु को जानने चलते हैं तो रागद्वेष इष्ट अनिष्ट भाव उसके साथ जुट जाते हैं । कैसा ही उपवास भी किया हो, वहाँ जरा भी इच्छा नहीं है खाने की और न खाएगा, दृढ़ विचार है, पर जहाँ खुशबू आ रही है, मिठाइयां बन रही हैं, उस बीच से निकल जाए तो उसका रंच भी भाव नहीं है कि मैं खाऊँ, न शुद्ध खाने का है, अशुद्ध की बात तो दूर रही पर वहाँ से निकलने पर मन में कुछ न कुछ बात तो आती ही कि अच्छी मिठाई बन रही, बड़ा सुगंध है यों कुछ न कुछ कल्पना जग ही जाती है । और इसीलिए श्रावकों को बताया है कि आश्रयभूत कारणों से वे बिल्कुल अलग रहें । कोई सोचे कि मेरे तो अखंड ब्रह्मचर्य व्रत है और अभ्यास तथा सामर्थ्य भी हमारा अच्छा हो गया, अब हम को क्या? कहीं भी विचरे? किसी के भी बीच में रहें, किसी से भी अधिक बोलचाल बनाएँ, मेरे को क्या दोष? तो चरणानुयोग ऐसी आज्ञा नहीं देता । वह आश्रयभूत कारणों का परिहार कर दूर रहने की आज्ञा देता है और उन कारणों से दूर रहकर अपने आप में फिर ज्ञानस्वरूप की साधना बनाइए । तो ऐसे ही ऊंचे तपश्चरण के प्रभाव से अरहंत होकर सिद्ध अवस्था पायी है तो वह बिल्कुल आकाश की तरह विशुद्ध अपने ज्ञान की वर्तना में ही बना रहता है ।

सिद्ध भगवंतों के विकृति के लेश की भी अत्यंत असंभवता―भैया ! यहां तो इस बात पर आश्चर्य होता कि कैसे ज्ञान शुद्ध बन जाता और निर्विकार ज्ञातादृष्टा रह जाता? वहाँ इस बात पर आश्चर्य होगा कि सिद्ध प्रभु के ज्ञान में रंच भी तरंग नहीं आती । यहाँ तो इतनी तरंगों का, विकल्पों का ढेर लगा रखा है वहाँ इसकी रेखा तक भी नहीं है । आश्चर्य की क्या बात? जब कोई एक द्रव्य अकेला ही रह गया तो अब उस एकाकी द्रव्य में विकल्प की रंच भी गुंजाइश नहीं । हां केवल परमाणु द्रव्य है सो वह अकेला रह जाएगा तो भी उसका अन्य परमाणुवों से बंध हो सकता, स्कंध बन सकता, आप यह तर्कणा करेंगे कि ऐसा क्यों हुआ । जब अकेला ही परमाणु रह गया तो जैसे जीव जब अकेला ही रह जाता है, इसके साथ कर्म शरीर का संबंध नहीं है तो वह तो कभी अशुद्ध नहीं होता । यह परमाणु क्यों अशुद्ध हो जाता? तो उसका कारण यह है किं परमाणु में अशुद्धता होने का कारण है परमाणु के ही स्निग्ध रुक्ष गुण का परिणमन । दूसरे पदार्थ की उपाधि हो संबंध हो तब वह विकार करेगा ऐसा परमाणु में नहीं है, किंतु परमाणु में अपने आपकी ओर से ही चिकनापन और रुखेपन की डिग्रियां खूब बढ़ी हुई रहती हैं । तो जब बँध के योग्य स्निग्ध रुक्ष गुण की डिग्रियां हो जाएँ तो वह बंध जाता हैं, किंतु जीव में रागद्वेष आने की खुद में कला नहीं है कि अपने आपके ही परिणमन से ये रागद्वेष कर रहे उपाधि की क्या आवश्यकता है? उपाधि के होने पर ही उस प्रकार का कर्मविपाक होने पर ही रागद्वेष जगता है और परमाणु में ऐसा नहीं है कि दूसरे परमाणु को कोई संपर्क, लगाव बने कुछ बने तो उसमें स्निग्ध रुक्ष गुण की डिग्रियों के परिणमन हों । परमाणु में स्निग्ध और रुक्ष गुण स्वयं है, शक्ति है और उसका निरंतर परिणमन है । कभी भी ऐसा न होगा कि किसी परमाणु में स्निग्ध अथवा रुक्ष गुण रहा ही नहीं, और रहता है तो अर्थ पर्याय चलने के कारण उसकी डिग्रियां भी चलती हैं, बंध हो जाता है । पर रागद्वेष नाम की बात जीव के स्वभाव में है ही नहीं, औपाधिक थी । उपाधि के दूर होते ही रागद्वेष दूर होते हैं, अब उसको यह कभी जब रागद्वेष न जग सकेंगे तो उपाधि मिलने का भी अवसर न आएगा । जब उपाधि नहीं है तो रागद्वेष नहीं है ऐसे शुद्ध आत्मा हैं वे सिद्ध प्रभु । उसमें मरण की संभावना ही क्या है? सिद्ध प्रभु मरण से परिमुक्त है।

सिद्ध भगवंत की शोक और दुःख से परिमुक्तता―सिद्ध भगवंत के शोक का कुछ काम नहीं, वे सब शोक से मुक्त हो गए और दुःखों से मुक्त हो गए । शोक और दु:ख ये दोनों ही अनिष्ट हैं फिर भी इनमें अंतर है किसी के दुःख हो और शोक न हो ऐसी ज्ञान की स्थिति बन सकती है और किसी के शोक हो और दुःख न हो यह भी स्थिति बन सकती है स्थूल रूप से । बारीकी से तो जहाँ दुःख है कोई शोक थोड़ा बहुत होगा । जिसके शोक हैं उसके कोई दु:ख होगा । मगर घटना लो, एक तत्त्वज्ञानी मुनिराज जिनके शारीरिक दुःख आया है, कुष्ट हो गया है, शस्त्रवेदना आ गई, कितनी ही वेदनाएँ आ गयी, दु:ख हो गया, मगर उनको शोक रंच नहीं है और एक कोई धनी आदमी जिसके करोड़ों का वैभव है, शरीर भी स्वस्थ है, अच्छा उसे पथ्य मिलता है, डॉक्टर भी है, उसे दुःख भी नहीं है, मगर भीतर शोक कितना बसाए है । कहीं राजा नाराज न हो जाए, कोई ऐसा कानून न बना दे, यह धन मेरा यों ही न पड़ा रह जाए यों कितनी ही तरह की शंकाओं में वह पड़ा हुआ है । दुःख तो उसे कुछ नहीं है । तो शोक और दुःख में थोड़ा अंतर है । इसलिए चिंता और विषाद ये अलग-अलग दोष बताए गए हैं । सिद्ध प्रभु में न किसी प्रकार का शोक है और न कोई दुःख है । वह तो एकाकी अपने चैतन्य रस से परिपूर्ण हैं, वहाँ विकल्प ही कुछ नहीं उठते, तो ऐसे शोक और दुःख से परिमुक्त जो निर्वाण है वही वास्तव में नि:श्रेयस है । निर्वाण में भय का भी काम नहीं है । जो भय से परिमुक्त दशा है, वही वास्तव में नि:श्रेयस कहा जाता है । भला अमूर्त आत्मा कर्म और शरीर से अत्यंत पृथक् और अपने में विशुद्ध ज्ञान की परिणतियों में गाते रहने वाला है अमूर्त आत्मा में भय की गुंजाइश किस ओर से है? जैसे कितना ही बड़ा तेज पटाका फोड़े, बम फोड़े तो क्या आकाश में भय आ जाएगा? नहीं । आकाश में भय नहीं आता, वह अविचल रहता है, ऐसे ही वह अमूर्त आत्मा निलेंप आत्मा किसी भी परिस्थिति में याने बाहरी पदार्थ कुछ भी परिणमते रहें लेकिन यहाँ भय का काम नहीं है । तो वे सिद्ध प्रभु भय से रहित हैं । भय नाम की एक संज्ञा है, उस भय संज्ञा की दृष्टि से भय की संज्ञा 8वें गुण स्थान तक कही गई है । 8वें गुण स्थान के बाद भय किसी भी दृष्टि से संभव नहीं है । जब यहाँ 9वें गुणस्थान वाले और ऊपर के गुणस्थान वाले मुनिराज जो शरीर सहित हैं धातु उपधातु वाले हैं, जिनके शरीर में रोग भी संभव है उन तक के भी भय का रंच नाम नहीं है । फिर क्षीण मोह हुए बाद भयं की क्या कल्पनाएँ । अरहंत के क्या भय, सिद्ध प्रभु के क्या भय? यह अमूर्त शुद्ध ज्ञाताद्रष्टा रहने वाला सिद्ध प्रभु समस्त भयों से परिमुक्त है । निर्वाण में ऐसी निर्भयता, निर्विकारता निष्कंपता अविचलता रहती है । देखो यह है अपना असली धाम जहाँ पहुंचने पर इस जीव को शांति रहेगी, वह उत्कृष्ट अवस्था, यही है सिद्ध पद । हम अरहंत सिद्ध नाम तो जपें और अरहंत सिद्ध होने की भावना चित्त में न लाएँ तो उस नाम जपने का अर्थ कितना सा रहा? ये अरहंत सिद्ध ये ही परिपूर्ण आनंदमय है, । यह ही उत्कृष्ट दशा है, ऐसा ही हम को होना चाहिए । सिद्ध हुए बाद ही नि:श्रेयस कहा जा सकता है कि परमकल्याण इससे प्राप्त हुआ । यह श्रमण शुद्ध आत्मीय आनंद से भरपूर है । जहाँ केवल आत्म उपाधि का और विभाव का लेप नहीं, ऐसा निरंजन वह केवल अमूर्त आत्मा निरंतर शुद्ध ज्ञानरूप परिणम रहा है । जहाँ विकल्प तरंग रंग कुछ भी संभव नहीं है उस स्थिति में ही अनंत आनंद है, और वह आनंद क्या है? क्या केवल कहने मात्र के लिए है कि कोई दुःख न रहे यही आनंद है? क्या दुख के अभाव रूप ही आनंद कहलाता है? वहाँ के आनंद को कौन समझ रहा है यहां? सो बात यह हैकि हम आप लोगों को कैसे समझाया जाय कि प्रभु के अनंत आनंद हैं? वह समझाया जा सकता है निराकुल शब्द कहकर । क्योंकि आकुलताओं और दुःखं का हम आपको खूब परिचय बना हुआ है, और जानते हैं कि ये बड़ी कठिन वेदनाएँ हैं । और जब यह समझाया कि ये आकुलताएँ वहाँ रंच भी नहीं रहती हैं तो समझ में आता हैकि हां बहुत अच्छी स्थिति में है अरहंत और सिद्ध, मगर इतना नहीं है कि उनके कष्ट नहीं है, आकुलता नहीं हैं सो ही बात हो, वे तो हैं ही पूर्ण, मगर परम आह्लाद रूप परिणमन निरंतर बना हुआ है । अब वह परम आह्लाद कैसा है, वह आह्लाद पाए बिना स्पष्ट रूप से समझ में नहीं आ सकता । अनुमान किया जाता है प्रमाण से समझा जाता है मगर परम आह्लाद सिद्ध भगवंत का, प्रभु का क्या है, इसके बताने के लिए कोष में कोई शब्द नहीं है । सही ढंग से तो हम आप एक रोज के खाने में आने वाली मिठाइयों का स्वाद भी दूसरे को नहीं बता सकते, पर वहाँ इलाज है दूसरे को समझाने का कि रसगुल्ले का कैसा स्वाद होता है? तो बहुत देर तक दिमाग लड़ाने से क्या फायदा? एक रसगुल्ला उसके मुख में खिला दीजिए, बस वह कह उठेगा कि हा हम समझ गए कि ऐसा मीठा होता है । तो सिद्ध प्रभु के जो आनंद हैं उस आनंद को जो अनुभव करता वह बोल नहीं सकता जो बोलता है उसको आनंद का पता नहीं है । तो प्रभु के आनंद की महिमा कौन कह सकता है? हम आपका जीवन तब ही सफल है जब सांसारिक विषयों से अपना उपयोग हटाएँ और इसकी धुन बनायें कि मुझे तो सब लेपों से रहित होकर अरहंत सिद्ध की तरह निर्दोष केवल अकेला रहना है दूसरा और कोई प्रोग्राम नहीं है । यही भावना इस जीवन में बनाइए और बढ़ाइये वह इस जीवन की एक अलौकिक देन होगी, अन्यथा जैसे अनेक जन्म पाए इसी तरह यह जन्म भी बेकार चला जाएगा ।


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