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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 144

From जैनकोष



सेवाकृषिवाणिज्यप्रमुखादारंभतो व्युपारमति ।

प्राणातिपातहेतोर्योऽसावारंभविनिवृत: ।।144।।

अर्थ―जो सेवा, खेती, व्यापार आदि आरंभों से, जो जीव हिंसा के कारण हैं, विरक्त होता है―उन्हें त्याग देता है वह आरंभ विरत नामक प्रतिमाधारी श्रावक है ।

स्वपर प्राणविघात के कारणभूत होने से धनार्जन के आरंभों का त्याग―जो सेवा, खेती, व्यापार आदिक आरंभों से निवृत्त होता है वह आरंभ त्यागी श्रावक कहलाता है । इस आरंभ को क्यों त्यागता है? तो यह प्राणिवध के कारणभूत है । कितना ही बचाव हो आजीविका के उपायों में फिर भी कुछ न कुछ प्राणिवध संभव है । कोई सोचे कि नौकरी है या अन्य कुछ है जिसमें प्राणिबध का कार्य संभव नहीं है वह आरंभ करे तो इसमें भी खुद का राग बढ़ता है, तो खुद में घात चल रहा है―अब यह अपना भी वध नहीं सह सकता दूसरे का वध भी नहीं सह सकता, इसलिए दयालु होकर अपनी रक्षा के लिए प्राणियों की रक्षा के लिए यह समस्त आरंभ का त्याग कर देता है । घर में रह रहा है परिग्रह भी पास रखे हुए है । केवल एक नई आजीविका अर्थार्जन नहीं कर रहा, पर जो पहले से संचित है उसे तो रखे हुए है, उसमें अपना गुजारा कर रहा है, तो यह बचता हुआ अब दूसरे का मुंह न ताकेगा । यह खुद आहार बना सकता है और कोई व्रती साधु संत मिलें तो उनको आहारदान करा सकता है । यहाँ तो प्राणिबध के कारणभूत उन षट् कर्मों से निवृत्त हुआ है जो आजीविका के साधन हैं । यह आरंभ त्यागी आरंभ छोड़ते समय अपने घर के बड़े पुत्रादिक को बुलाकर अपना विचार बताता है और उस ही समय थोड़ा सबको विभाग करता है इनको इतना धन दिया, इनको इतना दिया, खुद के लिए, इतना रख लिया और बाकी जो थोड़ा कुछ रखा है उसी अल्प धन से दु:खियों का, भूखों का उपकार करता है, अपनी भी उदर पूर्ति करता है ।

आरंभ त्यागी आवक का प्रगतिशील आशय―आरंभ त्यागी श्रावक को यह भय नहीं है कि जो मैंने थोड़ा सा अपनी उदर पूर्ति के लिए रखा है, यदि यह निपट जायगा तो क्या करेंगे? उसका एक ही निर्णय है कि अगर यह भी निपट जायतो आगे मैं प्रतिमा क्षेत्र में बढ़ूंगा, धर्मसाधना में बढ़ूंगा । चिंता उनको होती है जो धर्म में बढ़ने की उमंग नहीं रखते और अपने देह पर दृष्टि अधिक धरते । यह आरंभ त्यागी जो कुछ थोड़ा अपने लिए रखा है उससे शरीर का साधन बनाया है । औषधि, भोजन, वस्त्र आदिक का साधन बनाया है । साधर्मीजनों के दु:खों के दूर करने का साधन बनाया है वह अपने आरंभ का उपयोग पापारंभ में नहीं करता । जो कुछ धन रखे है उसको यदि कोई चोर चुरा ले या कोई हर लेती वह क्लेश नहीं मानता और उसे उत्पन्न करने की चेष्टा नहीं करता कि यदि मेरे ये 10 हजार रुपये लुट गए है तो फिर से मैं कमाऊ । ऐसा भाव नहीं रखता, किंतु इन प्रसन्नता का अनुभव करता कि जो अवसर मुझे चाहिये था वह सहज ही मिल गया । वह आगे की प्रतिमावों में बढ़ता है और अपने को धन्य मानता कि जो कुछ मैने रखा था उसमें मैं रागी हो रहा था, वह भी छूट गया, ऐसा वह परिग्रह के छूटने में आनंद का अनुभव करता है और परिग्रह त्याग प्रतिमा धारण करता है और यदि इस तरह से परिग्रह न लुटे तो खुद भी परिग्रह का त्याग कर के आगे बढ़ता है ।


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  • रत्नकरंड श्रावकाचार
  • प्रवचन
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