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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 148

From जैनकोष



पापमरातिधर्मों बंधुर्जीवस्यचेति निश्चिन्वन् ।

समयं यदि जानीते श्रेयो ज्ञाताध्रुवं भवति ।।114।।

अर्थ―पाप जीव का शत्रु है व धर्म बंधु । ऐसा निश्चय करने वाला आगम को जानता है―आगम के अनुसार प्रवृत्ति करता है तो वह निश्चय ही अपने श्रेय (कल्याण) का ज्ञाता है ।

जीव का बैरी पाप―इस जीव का बैरी तो पाप है और बंधु धर्म है, ऐसा निश्चय करता हुआ जो ज्ञानी समय को जानता है मायने आत्मा को जान रहा है वह अपना कल्याण अवश्य करेगा, ऐसा निश्चित है । इस अधिकार में 11 प्रतिमावों का वर्णन किया गया है । 11 प्रतिमाओं को अंगीकार कराकर एक बड़ी दृढ़ता से अपने आप में लीनता पाने के लिए यहाँ कुछ प्रेरणा दी जा रही है । जिससे आत्मा को कष्ट पहुंचे, वही तो अनिष्ट है और कष्ट पहुंचाने का जो साधन हो वही हमारा बैरी है । तो कष्ट है आकुलता । उस आकुलता का साधन है पाप । कोई मनुष्य यदि जीवन में यहीं पाप कर रहा है तो थोड़ी देर को पाप करते समय वह मोहवश मौज मान रहा है, वही थोड़ी देर बाद कष्ट का अनुभव करने लगता है । फिर पाप का बंध हुआ, उसके उदय काल में तो ऐसे अनिवारित रूप से कष्ट करीब आयेंगे कि जिनका कोई उपाय भी न बन सकेगा । तो जीव का बैरी है तो पाप है । लोभवश लोग पाप करते, मानवश पाप करते, लोभ और मान ये दो ही खास मूल चीजें हैं, पाप के कारण में । क्रोध जिसको आता है तो मान या लोभ के कारण आता है, नहीं तो व्यर्थ गुस्सा करने की किसको पड़ी है । कोई मान में फर्क दिखे तो गुस्सा आने लगता । लोभ में जो इष्ट समझा उसमें विध आये तो क्रोध करता है और मान और लोभ के ही कारण मायाचार करता है । करीब-करीब ऐसा समझा जा सकता है कुछ स्पष्ट समझने के लिए कि आकुलता की जड़ तो है मान और लोभ उसके फल में बनता है क्रोध और माया । यद्यपि चारों कषाय भिन्न-भिन्न स्वरूप में हैं और उनके साधन कर्मोदय भी भिन्न-भिन्न है, किंतु अपने को प्रयोग रूप करने के लिए ऐसा जंचता है कि जड़ है समस्त अनर्थ की तो मान और लोभ है । ये मान और लोभ पाप तब तक दूर नहीं हो सकते जब तक अपने आपके बारे में यह प्रतीति न बने कि मैं तो समस्त विकारों से रहित केवल ज्ञातादृष्टा स्वभाव वाला हूँ । यह प्रतीति होते ही कि मैं ज्ञातादृष्टा स्वभाव मात्र हूँ और ऐसा ही रहने में मेरा कल्याण है, यह ही अपने आप पर न्याय है । ऐसी प्रतीति होते ही मान और लोभ का भंग हो जाता है ।

जीव के शत्रुभूत पापों में मिथ्यात्व व क्रोध का निर्देशन―जीव का शत्रु है पाप । उन पापों में मुख्य पाप तो है मिथ्यात्व जो संसार परिभ्रमण कराने का मूल है । जो मैं नहीं हूँ उसे मान लेना कि यह मैं हूँ, जो मेरा नहीं है उसे मान लेना कि यह मेरा है, यह आशय तत्काल भी महान संकट पैदा करता है । और इस आशय में रहकर जो बंध होता है वह कर्मबंध अनेक भवों में जन्ममरण कराने का कारण बनता है । तो यहाँ यह निश्चय करना कि जीव का शत्रु है तो पाप है । और उन पापों का सिरताज है तो मोह हैं, मिथ्यात्व है । फिर दूसरा पाप समझिये क्रोध । गुस्सा आती है तो जीव का उपयोग किस ओर लगता है? क्या आत्मा की दृष्टि रखते हुए कभी गुस्सा आ सकता? जब भी गुस्सा आता है, जिसके भी गुस्सा आता है उसके उपयोग में कोई बाह्य विषयभूत पदार्थ रहते हैं । तो जो बाहर-बाहर डोल रहा है उसके ही तो यह पाप चलता है । घमंड इस जीव पर ऐसा आवरण छाया है कि यह अपने स्वरूप को न पाकर जो पर्याय मिली है उस पर्याय में अहंबुद्धि रखता है, मान का कारण पर्याय में अहंबुद्धि है । जिन त्यागी साधुवों को भी बेतुकी क्रोध आता रहता है उसका कारण पर्यायबुद्धि ही हो सकता है । यह गृहस्थ अपने देह को निरखकर कल्पना करता है कि मैं अमुकचंद हूँ, अमुकलाल हूँ, व्यापारी हूँ, सर्विस वाला हूँ, इज्जत वाला हूँ, वह यहाँ की पर्याय में आत्मबुद्धि करता है । तो पर्यायमुग्ध नग्नभेषी पुरुष ने नग्न शरीर में आत्मबुद्धि की है कि मैं मुनि हूँ, जिसको आत्मा के ज्ञायकस्वरूप में आत्मतत्त्व की दृष्टि नहीं बनती उसके पर्यायबुद्धि जगती है और जिसके पर्याय बुद्धि है उसके क्रोधादिक कषायें बनती हैं बढ़ती हैं ।

जीव के शत्रुभूत पापों में मान, माया, लोभ व काम का निर्देशन―तीसरा पाप है मान घमंड इस मान के वश में यह मनुष्य न जाने क्या-क्या अनर्थ नहीं कर रहा है । अपने को भी सताता रहता है, दूसरों को भी तुच्छ मानता है । और उसके खातिर कितनों का ही यह प्राण भी दुखाता है । चौथा पाप है माया, छल कपट करना । कोई बात किसी एक से और तरह कहे, दूसरे से और तरह कहे, तीसरे से और तरह कहे या मन में कुछ और भाव है, कहते कुछ और ढंग से है तो इस प्रकार की जो भीतर वक्र वृत्ति है उसके करने में कितना कष्ट करता है यह जीव? दुःखी होता रहता है, फिर भी मोह का ऐसा उदय है कि उस दु:ख को दु:ख न मानकर कोई स्वार्थ सिद्धि सधती हुई जाने तो उसका हर्ष मानता है, पर यह माया बहुत बुरा पाप है । इसको तो शल्य तक में भी गिनाया है । 5वां पाप है लोभ । बाह्य वस्तुओं की इतनी तृष्णा रखना कि वही-वही उपयोग में समाया रहे और उसी के लिए ही चेष्टायें बनती रहें तो यह तृष्णा अनर्थकारिणी वृत्ति है । एक काम का भी लोग नाम लेते हैं कि काम भी बैरी है सो काम बैरी तो बहुत बड़ा है ही, पर इस काम का अंतर्भाव लोभ में आता है, पर इतना बुरा पाप है काम । सब लोभों में सबसे बुरा लोभ है काम का । इस काम को लोभ से अलग गिनाने का प्रयास किया गया है । जब जीव के बैरी 6 माने गए हैं―काम, क्रोध, मान, माया, लोभ और मोह । ये पाप भाव है ।

पापभाव का विकट फल बंधन विपत्ति―पाप भाव के होते ही जो जीव के एक क्षेत्रावगाह में कार्माणवर्गणायें हैं वे कर्मरूप बन जाती हैं । यह प्राकृतिक बात है । सूर्य का उदय हुआ तो बताओ कौन उससे प्रेरणा करने गया किं यहाँ धूप आ जाय? ऐसा ही निमित्त-नैमित्तिक योग है कि जब सूर्य का सन्निधान हो तो यहाँ की पृथ्वी इस प्रकार परिणम जाती है । ऐसे ही उन कर्मों को कौन समझाने जाता है कि जीव विकार करे तो वे कर्म बंध जाते? तो न इसको प्रेरणा जीव देता है न कोई दूसरा देता है किंतु सहज ही ऐसा निमित्तनैमित्तिक योग है कि जीव में विकारभाव जगा कि कार्माणवर्गणायें तत्काल कर्मरूप परिणम जाती हैं । और कर्मरूप परिणम गईं वे वर्गणायें जब उदिरित होती हैं या उदित होती हैं याने इस आत्मा से ऐसे निकलती है तो उस समय फिर यह जीव विकृत बन जाता है । यहाँ भी कौन पढ़ाने लिखाने गया, किंतु ऐसा ही सहज निमित्त योग है, तो यह पापभाव इस जीव का बैरी है ।

जीव का बंधु धर्म―धर्मभाव जीव का बंधु है । धर्म नाम है आत्मा के स्वभाव का । ऐसा स्वभाव तो सदैव है इसलिए आत्मा धर्मरूप निरंतर है । चाहे निर्मोह अवस्था हो, कोई अवस्था हो, स्वभावमय तो यह जीव सदैव है, अगर सदैव है तो क्या करें? किसी लकड़हारे के अंगौछा के खूँट में लाल बंधा है किंतु उसका पता न होने से वह तो दरिद्र ही बन रहा है, भिखारी है, जैसे एक दोहा में कहते हैं कि―

‘‘सबके पल्ले लाल हैं, लाल बिना कोई नहीं ।

याते भयो कंगाल है, गांठ खोल देखी नहीं ।।’’

वह धर्म जिसके प्रसाद से मोक्ष मिलता है, वह हम आप में इस वक्त भी मौजूद है, वह कहीं बाहर नहीं गया, धर्म तो है पर धर्म का पालन नहीं हो रहा । सो वह धर्म व्यक्त नहीं हो रहा, दो बातों की कमी है । पालन के मायने है उसकी दृष्टि आ जाना । मैं सहज शांतस्वरूप हूँ, आनंदमय हूँ, कष्ट रहित हूँ, विकाररहित हूँ, स्वतंत्र सत् हूँ इस प्रकार की दृष्टि नहीं बनती, सो यह धर्म से विमुख कहलाता है । यह ही दृष्टि बनी कि धर्म का पालन होने लगा । नग्न हो जाना धर्म का पालन नहीं है, किंतु नग्न अवस्था में धर्म का पालन सुगम है और नग्न भेष पाये बिना, निर्ग्रंथ हुए बिना, सर्व और से नि:शल्य हुए बिना धर्म का पालन नहीं बन पाता, इस कारण मुनिपद का धारण आवश्यक हो गया, मगर नग्न भेष स्वयं धर्मपालन नहीं है, वह धर्मपालन में सहायक है, वातावरण है, आवश्यक है, अनिवार्य है, फिर भी स्वरूपदृष्टि से देखे तो धर्मपालन तो आत्मा का आत्मा में भावरूप ही हो सकता है । शरीर जड़ की क्रिया धर्मरूप नहीं हो सकती । पर जो अनादिकाल से विकारभाव में पला आयीं है वह जीव एकदम इस धर्म में मग्न कैसे हो सके? पूर्वबद्ध कर्मविपाक तो सता रहे हैं, अर्थात् उनके उदय में यह जीव विकृत बन रहा । तो बराबर हैरानी होती है तो बाह्य वातावरण धर्मपालन के अनुरूप अनुकूल बनाना ही पड़ेगा । इस तरह है तो अनिवार्य मुनि भेष, जो कुछ बाह्य है फिर भी स्वरूपदृष्टि से देखेंगे तो आत्मा का भाव ही धर्मपालन बन सकेगा । शरीर की परिस्थिति का नाम धर्मपालन नहीं हो सकता । तो आत्मा का बंधु, मित्र, गुरु, रक्षक, शरण, सर्वस्व धर्म है । ऐसा जो निश्चय रखता है वह पुरुष कल्याण का पात्र होता है ।

निज उपादान की सम्हाल में कल्याण का लाभ―मिथ्यादृष्टि जीवों की बुद्धि सुख दुख पाने में दूसरी ओर जाती है । यह इस तरह रहे, लड़के यों बोलें, व्यवहार करें तो मेरे को सुख हो जाता, यह अनुचित बोले तो मेरे को दुःख हो जाता, यह कल्पना गढ़ रखी है मोही जीव ने । जो सुख हुआ है इस मोही गृहस्थ को सो लड़के के सद्व्यवहार की वृत्ति से नहीं होता है किंतु भीतर में कल्पना बना डाली है, यह मेरा बड़ा भला है, मेरे को बड़ा अच्छा है उस कल्पना में सुख मानता है । कहीं बाह्य पदार्थों से सुख निकलकर आत्मा में नहीं आता । जिसने किसी बाह्य पदार्थ की कुछ परिणति को दुःख माना है सो वहाँ दु:ख किसी बाह्य पदार्थ से नहीं आया, किंतु कल्पना गढ़ रखी है कि यह मेरे सुख में बाधा क्यों डालता? मेरे सुख के साधन को क्यों बिगाड़ता आदिक उस कल्पना में दु:ख का प्रादुर्भाव है । सुख दुःख बाह्य पदार्थों से नहीं, इस कारण बैरी कौन है? तो मेरे में रहने वाला भाव बैरी है, और मित्र भी कोई है तो मेरे में रहने वाला भाव ही मित्र बन सकता है । तो पापभाव है बैरी और धर्मभाव है बंधु, ऐसा निश्चय करने वाला पुरुष इस आत्मा को जानता है, इस आत्मस्वरूप को दृष्टि में रखता है, ऐसे ही आत्मा ‘‘ज्ञान से ज्ञान में ज्ञान ही हो’’ इस परिस्थिति को प्राप्त करता है । सो जो समय को, अंतस्तत्व को जानता है वही श्रेष्ठ ज्ञाता कहलाता है । जब कभी कष्ट का बाह्य प्रसंग जुड़ता है उस समय ज्ञानी अपने कमाये हुए कर्म विपाक के कारण वह कष्ट भी मानता हो तो भी वहाँ प्रतीति खोटी नहीं बनती और वह तत्त्वार्थ का निर्णय रखता है कि मेरे ही कर्म का उदय है, उसका निमित्त पाकर कष्ट हो रहा है । कोई दूसरा जीव मेरे को कष्ट नहीं देता । वह भी अपनी शांति के लिए अपना प्रयल करता है । उस मोही को अपनी शांति के लिए प्रयल जंचा कि मेरे को लक्ष्य में लेकर वह कोई विरोध की बात किया करे । उसने इसी में ही शांति समझा पर वह अपना ही कार्य कर रहा है वह मेरी विराधना नहीं कर सकता । कर्मोदयवश मैं ही अपने भावों से चिगकर अपनी विराधना कर पाता हूँ, दूसरा नहीं, ऐसा ज्ञानी के निर्णय है, जिस ज्ञानबल के आधार पर थोड़ा आत्मभाव से चिगता है, निज दृष्टि से हटता है तो बहुत ही जल्दी फिर अपने आपको सम्हाल लेता है । ऐसा ज्ञानी पुरुष आत्मकल्याण में प्रगति करता चला जाता है ।


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  • रत्नकरंड श्रावकाचार
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