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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 18

From जैनकोष



अज्ञानतिमिरव्याप्तिमपाकृत्य यथायथं ।

जिनशासनमाहात्म्यप्रकाश: स्यात्प्रभावना ।।18।।

सम्यग्ज्ञान की प्रभावना में वास्तविक प्रभावनांग का पालन―सम्यग्दर्शन के 8 अंग होते है, जिनमें अंतिम अंग है प्रभावना । धर्म की प्रभावना करना प्रभावना अंग है, उसका ही लक्षण यहाँ कहा जा रहा है । धर्म मायने क्या है? ज्ञान । आत्मा का स्वरूप ज्ञान है और ज्ञान की दृष्टि करना, ज्ञान का ही प्रचार करना ज्ञान का प्रसार करना, सो प्रभावना अंग है । आजकल प्रभावना के लिए जितनी बातें की जाती हैं रथ निकलना या समारोह करना आदि वे ज्ञान की प्रभावना में सहायक है तब तो प्रभावना कहलाता है, नहीं तो मन बहलाना उसका नाम है, प्रभावना नहीं । प्रभावना का लक्षण समंतभद्राचार्य कह रहे हैं । अज्ञानरूपी अंधकार के फैलाव को हटाकर यथा योग रीति से जैन शासन के माहात्म्य का प्रकाश करना प्रभावना कहलाता है । ये समग्र संसारी जीव अनादिकाल से ही अपने धर्म को नहीं जान रहें । ये सब आत्म ही तो हैं । इनके आत्मा का जो धर्म है सो ही इनका धर्म है । धर्म कहीं अलग-अलग नहीं होते । जैसे कि आजकल संप्रदाय में बँट गया है । यह इनका धर्म है वह उनका धर्म है । धर्म तो आत्मा का होता है । और वह धर्म है ज्ञान । ये संसारी जीव अनादिकाल से इस ज्ञानस्वभावरूप धर्म को न जानकर संसार में भटक रहे हैं । इनको इसका भी पता नहीं कि मैं कौन हूँ । मेरा क्या स्वरूप है, मैं कहां था कहां से आया कैसा हूँ कहां जाऊंगा, और जो जीवन चल रहा है इस जीवन में मेरे को करने का क्या काम था, क्या कर रहा हूँ यह कुछ पता नहीं है । बस जन्म लिया, पंचेंद्रिय के विषयों के भोगने में लग गये विषयों के साधन जुटाने में लग गये और मरणकाल आ गया, मर गये, यहाँ का काम खत्म हुआ, अब अगले भव में जायेंगे, यही चक्की आगे चलेगी, ऐसे ही भव-भव में ये जन्म लेते फिरे । इन संसारी जीवों को अपने आत्मा का बोध नहीं हैं । इन्हें बोध मिले ऐसा उपाय बनाये, इसको कहेंगे प्रभावना । खाली धन वैभव, रथ सोना चांदी बड़े-बड़े ध्वजा पता का फहराना बड़े-बडे जुलूस निकालना इसमें प्रभावना नहीं कहलाती, जिससे लोगों को यह परिचय हो कि अपने आत्मा का कल्याण तो जिनेंद्र देव ने बताया है जो जैन शासन में कहा है और मार्ग का सही यहाँ परिचय मिलता । जन समूह सराह उठे कि धन्य है यह जैन शासन जिसमें संसार के संकटों से छूटने का उपाय बताया है । यह बात दूसरों के चित्त में आ सके तब तो आपने प्रभावना की, नहीं तो प्रभावना तो दूर रही, उल्टी विपत्ति ही मोल ली । जब लोग देखेंगे कि इन जैनियों का ऐसा वैभव सोना, चांदी रथ के घोड़े । ऐसा जुलूस, ऐसी सामग्री तो लोग तो ईर्ष्या करेंगे, क्यों इनको ऐसा वैभव मिला, यह सोचकर वे उपद्रव ढायेंगे, तो यह कोई प्रभावना नहीं । हां ठीक यात्रा समारोह आदि भी है, मगर ज्ञान प्रभावना के साथ ही ठीक है । यदि लोगों को अपने ज्ञान की खबर मिले और उससे ही जैन शासन पर मुग्ध हो गये तो ये सब बाहरी समारोह उत्साह उसकी शोभा बढ़ा देंगे, पर ज्ञान की प्रभावना रंच भी न हो तो ये सब कार्य प्रभावना के न कहलायेंगे ।

अपने आचरण द्वारा अपने में व जनता में धर्मप्रभावना―अब जरा अपनी भी करनी देखिये―यदि स्वयं जैन लोग अच्छे आचरण से रहने लगे, जैसे अभक्ष्य न खाये, रात्रि भोजन न करें, झूठ कभी न बोले, दूसरे पुरुषों को न सताये, और-और भी जितने पापकार्य हैं उनसें बचे रहे, धन को दान में परोपकार में लगाते रहें तो इसमें भी प्रभावना बनती है और लोग सब कह उठेंगे कि धन्य है ये जैन शासन के भक्त लोग, जिनका ऐसा पवित्र आचरण हैं, ये कभी असत्य बोलते नहीं, दूसरों को सताते नहीं, पुण्योदय से परिग्रह जुड़ जाय, वैभव मिल जाय तो सबके उपकार में लगाते है । धन्य है यह जैन शासन । इसमें ऐसी ही शिक्षा बसी है कि लोग अच्छे कार्य करें । तो आप अपने आप अच्छे आचरण से रहें, यह भी प्रभावना अंग है ।

धर्मप्रभावना के लिए अपने सदाचार की व ज्ञान के प्रसार की आवश्यकता―अब न तो खुद अच्छे आचरण से रहें और न जनता में ज्ञान का प्रचार करें, जहाँ ये दोनों ही कार्य नहीं हैं वहाँ प्रभावना नहीं है । यदि जैन शासन की प्रभावना करना है, कल्याण के मार्ग की प्रभावना करना है तो ज्ञान का प्रसार कीजिए और अपने आपको अच्छे आचरण में रखिये―यदि ये दो बातें हो सकें तो प्रभावना बनेगी । दोनों ही प्रभावना के उपायों में ज्ञान प्रकाश का मूल आधार जहाँ ज्ञान की बात मिले और समझ में आये उपदेश द्वारा, विद्यावों द्वारा ज्ञान का प्रचार होने पर जब समझ में आयगा जनता के कि अहो सत्य है, मैं देह से न्यारा ज्ञानमय आत्मा हूँ । मेरा मैं ही सर्वस्व हूं मैं खुद के ज्ञान स्वरूप को, अवस्थावों को करता रहता हूँ, और इस ही ज्ञान के फल को भोगता रहता हूँ । अन्य किसी पदार्थ पर मेरा अधिकार नहीं है । अहो इस प्रकाश ने मोह ही मिटाया और आत्मा को व्याकुलता से रहित कर दिया । यह बात जब ध्यान में आयगी तो वे जैन शासन की अनुमोदना करने लगेंगे । जैन शासन कोई संप्रदाय का नाम नहीं है । किंतु जो आत्मा रागद्वेष को जीतकर जिन कहलाने लगे उसके द्वारा कहा गया जो मार्ग है उसका नाम जैन धर्म है । यों तो आप कोई भी शब्द रख लें उसी में लोग पक्ष मान लेंगे । जैसे मानों धर्म का निष्पक्ष धर्म कह दिया हो वह भी लोग संप्रदाय में घसीटने लगेंगे । ये निष्पक्ष धर्म के मानने वाले हैं । तो यों तो कोई भी नाम रखकर संप्रदाय बनाया जा सकता है, किंतु भाव देखना चाहिए कि जैन धर्म का मूल अर्थ क्या है? रागद्वेष मोह पर विजय पाने वाले सर्वज्ञदेव के द्वारा कहा गया मार्ग जैन धर्म कहलाता है । सो ज्ञान के प्रसार में आत्मदृष्टि बनना मूल आधार है, उसी से ही प्रभावना बनती है और जो लोग शुद्ध आचरण से चलने लगें तो उससे भी आत्मस्वभाव की दृष्टि बनती है । जब जैनों का आदर्श चरित्र देखें कोई कि इनका बोल कितना हितमित प्रिय है, इनकी चेष्टा सर्व प्राणियों के लिए हितकारी है । इनकी दृष्टि कभी खोटी नहीं बनती है । ये व्रत, तप, नियम के बड़े सावधान है । जो व्रत, तप, नियम लिया अहिंसाव्रत आदिक तो प्राण जाने पर भी ये व्रत को छोड़ते नहीं है । और ऐसा है ही करीब-करीब कि जो व्रत नियम लेते है वह मरते समय भी इसका विकल्प नहीं करता और कह देता है वह रोगी कि रात्रि को मुझे कुछ न पिलाना, तो लोग जानते नहीं क्या कि जो व्रत नियम लेते है लोग वे पूरी शक्ति से निभाते हैं । तो इन सब आचरणों को देखकर उनका अनुमान न बनता होगा क्या कि कौनसा ज्ञानप्रकाश इन्होंने पाया जो अशुभ कर्म में नही लगते और शुभ बातों में ही चलते हैं । वह है आत्मज्ञान । इस आत्मज्ञान का प्रसार होना यह ही वास्तव में प्रभावना कहलाती है ।

रत्नत्रय धर्म व उसकी प्रारंभिक आधारशिला―सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र इन तीन रूपों में आदर्श की बात है । श्रद्धान ऐसा दृढ़ होना चाहिए कि सर्वज्ञ वीतराग आत्मा ही देव हैं । जो अल्पज्ञ हो जो रागसहित हो वह तो संसारी जीव है, देव कैसे हो सकता? ऐसा दृढ़ श्रद्धा देखकर जनता कहने लगेगी कि इन जैनों का कितना दृढ़ श्रद्धान है । किसी भी मुसीबत में ये देव का श्रद्धान नहीं छोड़ते और यदि खुद ही श्रद्धान से डिगा रहे जीव तो वह अप्रभावना कर रहा है । जो वास्तविक जैन शासन का भक्त है उसका यह चिंतन रहता है कि मेरे द्वारा कोई ऐसा अपकृत्य न हो जिससे जैन शासन की प्रभावना में आंच आये । श्रद्धान उनका दृढ़ होता । जो संवेग वैराग्य को बढ़ाये, जिनमें आत्मा का ज्ञान मिले, विषय कषायों से विरक्त करायें वे वचन, वे ग्रंथ शास्त्र है । ऐसे ही शास्त्रों को ये जैन लोग मानते है । जिनमें विषय कषायों की बात लिखी हो, पोषण करायी गई हो, भगवान का रूप दिखाया गया हो खूब जैसा चाहे खावो जैसा चाहे प्रेम करो, जैसा चाहे रागद्वेष करो, भगवान का चरित्र ही ऐसा दिखाया गया हो तो वहाँ वीतरागता की शिक्षा कहां से मिल सकती है । धन्य है यह जैन शासन जिसमें छोटे से लेकर बड़े-बड़े शास्त्र तक सर्व जगह एक इस वीतरागता की प्रेरणा दी है । गुरु वे जो विषयों की आशा न रखें, निर्ग्रंथ हों, दिगंबर हों, ज्ञानध्यान तप में लीन हो, ऐसे पवित्र आत्मा को पुरुष को ये जैन लोग गुरु मानते हैं । गाँजा भाँग पीने वाले और-और प्रकार के भेष रखने वाले, रागवृत्ति पोषने वाले पुरुषों को गुरु नहीं मानते । इनकी श्रद्धा अटल हैं ऐसे ही श्रद्धा की बात जानकर जनता जैन शासन की ही तो प्रशंसा करेगी । इससे अपना श्रद्धान पवित्र होना चाहिये । ज्ञान भी इस जैन शासन में इन जैनों का कितना विशुद्ध है । तत्त्वज्ञान में वस्तुस्वरूप मूल में बताया है कि प्रत्येक पदार्थ जो भी है वह अपने आप पूरा है । और जो है उसमें स्वयं यह सामर्थ्य है कि प्रति समय कोई न कोई अवस्था बनाये रहेंगे । भले ही अशुद्ध स्थिति में परद्रव्य का निमित्त पाकर उसकी दशा बनती है पर बनी तो खुद के परिणमन से । कैसा वस्तुस्वातंत्र्य बताया है जैन शासन में कि कोई किसी का मालिक नहीं, कोई किसी का कर्ता नहीं, कोई किसी का भोक्ता नहीं । सुख दु:ख दाता कोई न आन । मोह राग रुष दुःख की खान । सो ऐसे दुखी से बचने का उपाय कैसा सत्यार्थ बताया है जैन शासन में कि निज को निज पर को पर जान । फिर दु:ख का नहिं लेश निदान । निज आत्मा को जान लो, यह मैं हूँ । बाकी जीवों को और समस्त पुद्गलादिक को जान लो कि ये सब पर हैं । पर से मेरा लेन देन? निज स्वयं परिपूर्ण है दुःख का कहीं भी काम नहीं है । जहाँ ऐसा तत्त्वज्ञान जिन गुरु मुख से मिला करता हो उन गुरुवों द्वारा जैन धर्म की प्रभावना होती है और ऐसे गुरुवों की ही श्रद्धा है जैनों की, यह जानकर भी प्रभावना चलती है । तो प्रभावना का आधार है ज्ञान का प्रचार करना जिससे जीवों को आत्मा का ज्ञान मिले बस यह कहलाया प्रभावना।


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