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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 26

From जैनकोष



स्ययेन योऽन्यानत्येति धर्मस्थान् गर्विताशय: ।

सोऽत्येति धर्ममात्मीयं न धर्मो धार्मिकैर्विना ।।26।।

स्वरूपदृष्टा संतजनों द्वारा धर्मात्मावों का अपमान होने की असंभवता―जो घमंडी पुरुष अपने मद के कारण अन्य धर्मात्माजनों का उल्लंघन करता, उनका अपमान करता सो वह उनका अपमान नहीं किंतु अपने धर्म का ही अपमान कर रहा, क्योंकि धर्म धार्मिक पुरुषों के बिना नहीं होता । एक बड़ा दोष है जीव में कि कुछ थोड़ा बोल बोलना जान गये तो वे मद में लिप्त हो जाते हैं । और मानों वे अपने को इस तरह मानते कि मानो संसार में कुल दो आँखे मिली हों तो डेढ़ आँख वाला तो अपने को मानते, बाकी आधी आँख में सारी दुनिया को मानते । अपने में घमंड बनाकर वे अन्य धर्मात्माजनों का अपमान करते । आखिर घमंड होने पर मन, वचन, काय की चेष्टायें तो विपरीत होंगी ही मन उसका व्यवस्थित रहेगा नहीं, वचन भी अटपट निकलेंगे, शारीरिक प्रवृत्तियों भी उसकी अटपट होंगी । तो घमंड होने के कारण उसने अपने आपका घात ही किया । धर्म उस आत्मा का ही तो नाम है । कोई आत्मा से धर्म अलग चीज होती हो तो बात नहीं । धर्म कहीं खरीदने से नहीं मिलता, किसी दूसरे से मांगने से नहीं मिलता, किंतु स्वयं को अपने स्वभाव की आराधना करने पर प्राप्त होता है । ऐसे धार्मिक पुरुषों की छोड़कर धर्म कहीं अन्यत्र नहीं । धर्मात्माजनों की विनय सम्यग्दृष्टि पुरुष करते हैं । धर्मात्माजनों की विनय करते तो समझो धर्म की विनय करते । ज्ञानी पुरुषों से किसी की अविनय नहीं बनता । वे धर्मात्माजनों की विनय करते हुए में थी अपने सहजस्वरूप की निरख बनाये रहते है । जैसे दूध में घी सामने नहीं है कि हाथ से छूकर बताया जा सके कि यह है घी, पर पारखी लोग दूध को निरखकर परख लेते है कि उसमें एक छटाक घी है । विधि से वे उस घी को निकाल भी लेते ऐसे ही पारखी पुरुष आत्मा में यह निरखकर लेते हैं कि यह सहज परमात्मतत्त्व है । यद्यपि वह प्रकट नहीं है, प्रकट तो सांसारिक दशा है विकार दशा है, परस्वरूप की दृष्टि करना आवश्यक है ।

ज्ञानकला का विलास―ज्ञान में एक प्रभाव है । ज्ञान कहीं रोके से रुकता नहीं है । चाहे बात न दिखती हो ऊपर आवरण बहुत हैं फिर भी ज्ञानी की इतनी सही दृष्टि है कि अनेक आडंबरों के बीच भी उनमें अटककर अपने आत्मस्वरूप पर दृष्टि ले जाता है । जैसे एक्सरा लेने वाला यंत्र शरीर के चाम, खून, मांस, मज्जा आदिक किसी से न अटककर मात्र हड्डी का फोटो ले लेता है, ऐसे ही ज्ञानी जीव सर्व बाह्य प्रसंगों के बीच रहकर भी उनमें न अटककर मात्र अपने आप में बसे हुए सहज आत्मस्वरूप को अपनी दृष्टि में ले लेता है । यद्यपि यह स्वरूप आज प्रकट नहीं है, विषय कषायों से ढका है, कर्म से ढका है फिर भी उसे ज्ञानी पुरुष अपनी ज्ञानदृष्टि के द्वारा तक लेता है । तो ज्ञानी पुरुष तो प्रवीण है । वह हर उपायों से अपने सहज आत्मस्वरूप को सिद्ध करता है । यहाँ जो इतनी-इतनी विचित्रतायें दिखती हैं, नाना प्रकार के देह दिखते हैं, यह सब क्या है? तो यह सब कर्मो का भार है । कर्म आक्रमण कर रहें है विकार का इस वक्त अक्स खिंच रहा है चित्रण हो रहा है फिर भी जीव का स्वरूप विकार करने का नहीं है । कष्ट का नहीं है । यह बात जो जान चुका है वह किसी का अपमान क्यों करेगा? सब परमात्मा स्वरूप है । जैसे अपने में परमात्मस्वरूप का दर्शन किया, स्वरूप का ज्ञान किया ऐसे ही वह पर को भी समझ रहा है, उनका वह अपमान नहीं करता । पर जो अज्ञानीजन धर्मात्माजनों का अपमान करते हैं और अपने आपको उनसे अधिक मानते हैं उनके प्रति कहते है तो वे अपने धर्म का ही घात करते है । क्योंकि धर्म-धर्मात्मा पुरुषों को छोड़कर कहीं अन्यत्र पाया नहीं जाता । निष्कर्ष यह है कि अपने आप अपने की ज्ञानमात्र मनन करते हुए यथाविधि, यथा बल अपने ख्याल को हटाकर एक उच्च विश्राम में एक क्षण आत्मा को रखना तो चाहिए । आखिर दिनभर श्रम करके थका हुआ मजदूर भी तो कुछ हाथ-पैर ढीले-ढाले करके जमीन में लेटकर कुछ विश्राम कर लेता है, अपनी थकान दूर कर लेता है । तो विकल्पों की भारी थकान दूर करने के लिए कुछ विश्राम तो लीजिए । वह विश्राम मिलेगा अपने आत्मस्वरूप के मनन में ।


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  • रत्नकरंड श्रावकाचार
  • प्रवचन
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