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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 33

From जैनकोष



गृहस्थो मोक्षमार्गस्थो, निमोंहो नैव मोहवान् ।

अनगारो गृही श्रेयान्, निमोंहो मोहिनो मुने: ।।33।।

निर्मोह गृहस्थ की मोक्षमार्गस्थता―गृहस्थ मोहरहित है वह मोक्षमार्ग में स्थित है । जो मुनि मोहवान है वह मोक्षमार्ग में स्थित नहीं है । क्या यह सम्यक्त्व हो सकता कि निर्मोह होकर गृहस्थ गृहस्थी में रहे? हां यह संभव है, पर यह संभव नहीं है कि रागरहित होकर कोई मनुष्य गृहस्थी में रह सके । राग किए बिना कोई गृहस्थी में नहीं रह सकता, पर मोह किए बिना भी गृहस्थी में रहा जा सकता है क्योंकि निर्मोहता का संबंध है यथार्थ आशय से । जहाँ वस्तु का सही ज्ञान है, प्रत्येक जीव निराला है, किसी जीव के साथ उसका कोई नाता नहीं है । उसका देह और कर्म से भी संबंध नही है । सबका सत्त्व जुदा अपने आपमें है, ऐसा स्वतंत्र स्वरूप का ज्ञान हो गया, उसको अब किसी भी पर पदार्थ में आत्मस्वरूप का लगाव नहीं रहा । बस मोहरहित हो गया । मोहरहित होने पर भी जिसकी परिस्थिति ऐसी है कि ज्ञान में रमने की दृढ़ता नहीं है वह पुरुष गृहस्थी बसायगा । वह जब घर में रहेगा तो लोगों से प्रीति भी करेगा प्रीति, बिना घर में न रह पायगा । दुर्वचन बोलकर कोई कैसे खुद शांत रह सकेगा या दूसरा भी ठीक रह सकेगा? तो राग बिना गृहस्थी में रहना नहीं बनता, पर मोह बिना गृहस्थी में बहुत अच्छा रहना बनता है । मोही गृहस्थ उतने अच्छे ढंग से घर में नहीं रह सकता जितना अच्छे ढंग से निर्मोही रह सकता, क्योंकि मोही गृहस्थ की छाप परिवार के लोगों पर भीतर में नहीं रहती। बच्चे लोग जान लेते हैं कि यह मेरा बाप मुझ पर इतना मोही है कि मरा जा रहा है, आसक्त है। तो उन बच्चों के चित्त में स्वच्छंदता आ जायगी और जहां बच्चे जाने कि मेरे पिताजी निर्मोही हैं, इनको जगत की किसी भी चीज से अनुराग नहीं है इनके साथ रहकर अपने को अच्छा व्यवहार रखना चाहिए, नहीं तो हमारे दुर्व्यवहार से घबड़ाकर यां विरक्त होकर यह किसी भी समय हम को छोड़ सकते हैं । क्योंकि इनका ज्ञानप्रकाश जगा हुआ है, ऐसी हृदय में छाप रहती है परिजनों पर और इसी सद्भावना के कारण परिजन योग्य व्यवहार करेंगे ।

सोदाहरण निर्मोह गृहस्थ का गृहस्थी में आदर्श निवास―जैसे भगवान की भक्ति दो कारणों से की जाती है । एक तो इस कारण से कि लोग मानते हैं कि भगवान ही हमें नरक भेजता भगवान ही हमें सुखी दुःखी करता, भगवान ही हमें गरीब, धनिक बनाता, सो कहीं भगवान हमें दु:ख में न डाल दे, नरक में न पटक दे इस डर से या फिर इस आशा से कि भगवान मुझे स्वर्ग के सुख देगा..., यों एक तो इस भय या आशा के वश होकर लोग भगवान की भक्ति करते है । भगवान भी उनके लिए क्या हैं? जिसको मान लिया सो भगवान । भगवान का स्वरूप उनको सही-सही ज्ञात नहीं है, पर होते हैं कुछ लोग ऐसे जो कि ईश्वर को कर्ता धर्तारूप में मानकर उसकी आराधना किया करते हैं । तो उनकी भक्ति है भय और आशा से, लेकिन जिन्होंने भगवान को वीतराग और सर्वज्ञ जाना है धन्य है उनका पवित्र आत्मा जिन में दोष रंच भी न रहे और गुण परिपूर्ण हो गए ऐसा भगवान के स्वरूप को जानने वाले अपने स्वरूप को भी जानते है कि मेरा जो असाधारण गुण है, जो चैतन्यस्वरूप है, उसका कार्य केवल चैतन्य मात्र है, रागद्वेष करना नहीं है । रागद्वेष होते है कर्म का संपर्क पाकर । मैं तो प्रभु की तरह अविकार स्वभावी हूँ । तो ऐसा जानने वाले पुरुष स्वरूप समता की दृष्टि से और स्वरूप के विकास की दृष्टि से भगवन की भक्ति करेंगे । तो आप जानें कि तत्वज्ञानी पुरुष भगवान के और अपने आत्मा के यथार्थ स्वरूप को जानने वाले पुरुष प्रीति से भक्ति करेंगे, अनुराग से भक्ति करेंगे, पर निर्दोष गुणसंपन्नता की दृष्टि न रखने वाले लौकिक पुरुष, केवल कर्ताधर्ता मानने वाले लौकिक पुरुष प्रभु की भक्ति अनुराग से नहीं कर सकते । वहाँ प्रतीति ही नहीं उमड़ सकती, वहाँ परम आल्हाद नहीं बन सकता जिससे भीतर में उमंग बने, वहाँ तो डर और आशा ये दो हैं जिस कारण लोग भक्ति में लगते हैं । तो जो यहाँ अंतर है वैसा ही अंतर निर्मोह गृहस्थ और मोही गृहस्थ के प्रति परिजनों की प्रीति में है । परिजनों की प्रीति मोही गृहस्थ के साथ सही अनुराग पूर्वक नहीं होती, आल्हाद पूर्वक नहीं होती, पवित्र बुद्धिपूर्वक नहीं होती, पर निर्मोह गृहस्थ की प्रीति परिजनों के प्रति आल्हाद पूर्वक होती है, सत्कारपूर्वक होती है । ये पूज्य हैं, पवित्र हैं, ऐसी बुद्धि रखकर हुआ करती है ।

गृहस्थ धर्म द्वारा भी यथोचित धर्मपालन की संभवता―जो गृहस्थ निर्मोह होकर घर में रहता है वह तो मोक्षमार्ग में स्थित है, किंतु मुनिलिंग भी धारण किया हो और उसके अनुकूल बड़े तपश्चरण भी कर रहा हो लेकिन वह मुनि मोही है तो वह मोक्षमार्ग में स्थित नहीं है । इस कारण मोही मुनि से निर्मोही गृहस्थ श्रेष्ठ हुआ करता है । देखिये इस बात का रंज न होना चाहिए कि हम गृहस्थी में हैं, कीचड़ में पड़े हैं, हम क्या धर्म साधना कर सकेंगे? धर्मसाधना का अधिकार तो मुनिजनों को है, ऐसा सोचकर शोक न करना चाहिए । कारण यह है कि प्रवृत्तिरूप धर्म में धर्म के दो भेद बताये गए―(1) गृहस्थ धर्म और(2) मुनिधर्म । गृहस्थ भी तो कल्याण का पात्र है । वह रहे सही ढंग से, मगर वह मोह करता हुआ रह रहा है तो उसके गृहस्थधर्म है ही नहीं । वह तो अन्य तिर्यंचों की भांति मुग्ध प्राणी है । उसे धर्म का सवाल ही नहीं उठता । जैसे गाय भैंस आदिक जानवर मोही होते हैं, बच्चों पर प्रीति करते हैं, उनमें आसक्त होते है और अपना ही अपना सोचते हैं, दूसरों में मानों जान ही नहीं, इस दृष्टि से निरखा करते हैं तो जो वृत्ति पशुओं की है वही वृत्ति मोही मुनियों की हो गई, कोई अंतर न आया, वहाँ धर्म का सवाल ही नहीं उठता, मगर जो सत्य प्रकाश पाये हुये हैं पर द्रव्यों में मोह से रहित हैं, परिस्थितिवश घर में रहना पड़ रहा है सो गृहस्थ धर्म का कर्तव्य भी निभाया जा रहा है । ऐसे सद्गृहस्थ की बात कह रहे है कि उनकी चर्या में धर्मपालन बसा हुआ है, जिसके प्रसाद से उनका मोक्षमार्ग बराबर चल रहा है ।

सद्गृहस्थ की आदर्शचर्या का दिग्दर्शन―सद्गृहस्थ की चर्या भी तो देखिये―सुबह जैसे उठे तो गृहस्थ सामायिक करते हैं । उस सामायिक में सर्वविचार करते है कि मैं कौन हूं, कहां से आया हूँ, कहां जाऊंगा, मेरा क्या कर्तव्य है, मैं क्या करने लगा इन बातों पर दृष्टि देते है प्रात: काल । प्रभु का स्मरण करते हैं, आत्मस्वरूप का भान करते हैं । पहला काम तो सद्गृहस्थों ने यह किया । अब कोई कहे कि प्रात: उठते ही खाट पर बैठे-बैठे चाय पी रहे, अखबार पढ़ रहे या परिजनों से गप्पें मार रहे यह काम है गृहस्थों का तो उनका यह कहना ठीक नहीं । सद्गृहस्थ ने प्रातःकाल उठते ही सबसे पहले धर्म का ही काम निभाया, दूसरा काम कुछ नहीं किया । उसकी चर्या देखिये―सद्गृहस्थ को प्रात: काल उठते ही कुछ गृहस्थी के आवश्यक कार्य भी करने होते जैसे दूध लेने जाना या गाय भैंस दुहना आदिक मगर सब बातें देखिये कि प्रात: काल में सब धर्म का ही काम चल रहा है । शौचादिक क्रियावों से निवृत्त होकर शीघ्र ही नहाना धोना, मंदिर जाना, पूजा, पाठ, जाप, स्वाध्याय आदि करना, ये सब उसके धर्मभावना की बातें चल रहीं । सद्गृहस्थ की चर्या बतला रहे । पूजन किया, स्वाध्याय किया, घर आये, घर आकर वह सद्गृहस्थ यह भावना करता है कि कोई अतिथि, त्यागीजन मिलें तो मैं उनको आहार कराकर आहार करूं । अब देखिये―यदि शुद्ध भोजन बन रहे हें तब तो। ये भाव कर सकेंगे, अशुद्ध भोजन बनाया, गोभी फूल, आलू, वगैरह बनाया, बाजार का आटा लेकर बनाया तो ऐसा अशुद्ध आहार बनाकर कोई यह भाव कर सकेगा क्या कि मैं किसी त्यागी व्रती को आहार कराकर आहार करूंगा? नहीं कर सकता । पर सद्गृहस्थ शुद्ध विधि से आहार बनवाकर यह भावना करता है कि मैं किसी त्यागी व्रती को आहार देकर भोजन करूंगा । भले ही कोई त्यागी व्रती न मिला फिर भी भावना का फल तो उसने पा ही लिया । आजकल तो शुद्ध विधि से आहार तैयार कराने का तो चलन ही खतम सा हो गया । खुद हाथ से आटा पीस नहीं सकते कुवें से पानी भरकर नहीं ला सकते, मर्यादा की चीजें नहीं रख सकते जीवन इतना विलासी बन गया कि आचरण का कुछ ध्यान न रहा, भक्ष्य अभक्ष्य का कुछ विवेक न रहा, भला बतलावो जहाँ ऐसी वृत्ति बन गई वहाँ त्यागी व्रतीजनों को शुद्ध आहार कराने का भाव कैसे बन सकता? सद्गृहस्थ के अंदर स्वच्छंदता की बातें नहीं होतीं । वह अपने आचरण को शुद्ध ढंग से रखने का बड़ा ध्यान रखता है । वह शुद्ध विधि से आहार तैयार कराकर त्यागी व्रती जनों को आहार देकर आहार लेने की भावना रख रहा तो भले ही आहार न हो सके किसी त्यागी व्रती का, पर धर्म पालन उस सद्गृहस्थ के निरंतर चल रहा है । अभी तक तो रहा धर्मपालन का व्यवहारिक पीरियेड़, अब आ गया उसके धनार्जन का समय ।

सद्गृहस्थ की धनार्जनादि के समय भी सही दृष्टि―सद्गृहस्थ धनार्जन करने जायगा, धनार्जन भी करेगा पर उसका भाव यह रहता है कि न्याय नीति से जितने धन का अर्जन होगा उसका कुछ हिस्सा गुजारे के लिए रहेगा, बाकी हिस्सा धर्म के कार्यों में लगाऊंगा । यदि उसका यह भाव है तो समझो कि धनार्जन करते हुए भी उसके धर्मपालन चल रहा है । यदि धनार्जन करते समय मात्र उद्देश्य रहे अपने परिवार के गुजारे का, धर्मायतनों में खर्च करने का भाव न रहे तो समझो कि वहाँ धर्मपालन नहीं हो रहा । सद्गृहस्थ की भावना रहती है धर्मायतनों में धन को खर्च करने की, इस कारण उसके निरंतर धर्मपालन चल रहा है । तो ऐसा धर्मपालन करते हुए गृहस्थ का जीवन धन्य है । वह आगे अवश्य ही उत्तम संग पायगा और जल्दी ही बड़ा कल्याण पायगा । तो यहाँ इस श्लोक में बतला रहे कि जो निर्मोह गृहस्थ है वह मोक्षमार्ग में स्थित है और जो मोही मुनि है वह मोक्षमार्ग में स्थित नहीं है । बाहर से तो यों लग रहा कि गृहस्थ बड़े कीचड़ में पड़ा है पर उसका अंतरंग आशय इतना विशुद्ध है, वह मोक्ष मार्ग में लगा हुआ है । किसी-किसी मुनि का ऊपर से यह दिख रहा है कि यह बड़ा निर्लेप है, शुद्ध है । प्रभु का रूप है, पर अंतरंग में वह कीचड़ में फंसा है, क्योंकि उसमें भीतर में अज्ञान बसा है । तो ऐसे मोही मुनि की बात कही जा रही है कि उस मुनि से निर्मोह गृहस्थ श्रेष्ठ है, तो इस सद्गृहस्थ को श्रेष्ठता मिली कैसे? इस सम्यक्त्व के प्रभाव से, इसलिए इस मनुष्य जीवन में सम्यक्त्व पाने का पौरुष करना चाहिए ।

सम्यक्त्व बिना शांति के सर्व उपायों की व्यर्थता जानकर सम्यक्त्वलाभ का यत्न करने का अनुरोध―सम्यक्त्व की महिमा में यह बताया जा रहा है कि यदि सम्यग्दृष्टि गृहस्थ है, निर्मोह गृहस्थ है तो वह मोक्षमार्ग में लगा हुआ है । यदि सम्यग्दृष्टि नहीं है मुनि अर्थात् निर्मोह नहीं है मुनि तो वह मोक्षमार्ग में स्थित नहीं है । निर्मोह कहो, ज्ञानी कहो, सबका एक अर्थ है । जिसके मोह नहीं रहता वही सम्यग्दृष्टि कहलाता है । राग और द्वेष तो रह जायेंगे पर सम्यग्दृष्टि के मोह रंच नहीं रहता । मोह कहते हैं बेहोशी को । जहाँ आत्मा को होश है आत्मा के स्वरूप का प्रकाश है वहाँ बेहोशी नहीं है अर्थात् मोह नहीं है । जो पुरुष सम्यग्दर्शन से भ्रष्ट है वह ही पुरुष वास्तव में भ्रष्ट है । कोई चारित्र से भ्रष्ट हो गया, सम्यक्त्व से भ्रष्ट नहीं है तो उसका उत्थान संभव है, वह पुन: चारित्र पा लेगा, पर जो सम्यक्त्व से रहित है उसकी उन्नति का कोई उपाय नहीं है । चाहे कोई कितने ही शास्त्र जानता हो, 11 अंग 9 पूर्व तक का जिसका अध्ययन हो गया हो वह भी यदि सम्यक्त्व से रहित हैं तो वह आराधना से रहित है । किसकी आराधना करेगा? ऐसा पुरुष संसार में ही भ्रमण करता है । हजारों, लाखों, करोड़ों वर्षों तक भी यदि कोई तप कर रहा है, लेकिन है सम्यक्त्व से रहित तो वह कभी रत्नत्रय का लाभ, सम्यग्ज्ञान का लाभ, केवल शान का लाभ पा नहीं सकता । चारित्र से भ्रष्ट को भ्रष्ट कहेंगे और सम्यक्त्व से भ्रष्ट को महाभ्रष्ट कहेंगे । भला जहाँ जड़ कट गई वहाँ कोई वृक्ष का परिवार रह सकता है क्या? वृक्ष वृद्धि को प्राप्त हो सकता है क्या? नहीं, ऐसे ही जहाँ मोक्षमहल की जड़ कट गई, सम्यक्त्व नहीं है वहाँ समाधि का लाभ, मुक्ति का लाभ कैसे प्राप्त हो सकता है? तो बहुत ध्यान से अपने आपको इस संसार में अकेला जानकर अपनी दया का भाव रखना चाहिए । मैं इस जगत में अकेला ही दुःख सुख भोगने वाला हूँ, और अकेला ही मुक्त हो सकूंगा । सर्व स्थितियों में मैं अकेला हूँ, मेरा साथी कोई दूसरा नहीं है । ये जो व्यर्थ के राग प्रेम मोहादि के परिणाम बढ़ रहे हैं परिजनों के साथ ये सब आपत्ति हैं, इनसे जीव के चैतन्यस्वरूप का घात हो रहा है । उनके लगाव में अपने को अकेला जानें और अपने आप में जैसे आपका कल्याण हो वह उपाय बनायें, उन उपायों में सर्वप्रथम उपाय है सम्यक्त्व का लाभ ।

सम्यक्त्वलाभ का उपाय वस्तुस्वरूपविज्ञान―सम्यक्त्व प्राप्ति के लिए मुख्यतया वस्तु की स्वतंत्रता का ज्ञान करना होता है । मेरे आधीन दूसरा कुछ नहीं, किसी दूसरे के अधीन, मैं कुछ नहीं । जहाँ विकार भी जगता है तो वहाँ भी कर्म का उदय उपस्थित भर है, वह कहीं अपनी परिणति से जीव को विकारी नहीं करता, किंतु उसका निमित्त पाकर यह जीव अपनी परिणति से विकृत होता है । तो वहाँ भी स्वतंत्रता निरखिये, यदि कोई दूसरा मेरे को विकारी बनाता तो मेरा कुछ वश न चलता कि मैं उस विकार से अलग होऊंगा, क्योंकि वह मुझ से बलवान हो गया जो मुझे विकारी बना देता, अब मैं उससे कैसे पेश पा सकता? पर ऐसा नहीं है कि कोई मुझे विकारी बना दे । विकार निमित्त है अन्यथा विकार मेरा स्वभाव बन जायगा । पर उपाधि के सन्निधान बिना जीव में विकार नहीं बनते, यह बात निश्चित है । स्थिति वहां यह है कि कर्म उपाधि के सान्निध्य में यह जीव अपनी परिणति से अपने में विकारभाव करता है । जहाँ वस्तु का यह स्वातंत्र्य भी जाना, विकार का निमित्त पाकर जाना वहाँ यह भव्य स्वभाव के अभिमुख होकर अपने स्वरूप की दृष्टि कर लेता है । यह जिन्होंने पाया उन्होंने सब कुछ पाया, बाकी तो बाह्यपदार्थों की तृष्णा में, अर्जन में समय गंवाया तो वह बेकार ही गया । स्वभावदृष्टि में जितना समय बीते उतना समय सफल है । और सम्यक्त्व का उपाय करना यह इस मनुष्यभव में आवश्यक और प्रथम कर्तव्य है । अथवा यही एकमात्र काम है प्रारंभ में कि मैं अपने सहजस्वरूप का दर्शन और अनुभव करूं ।

सम्यक्त्वरहित व ब्रतरहित होकर भी अपने पैरों में दूसरे को पड़ने देने का दुष्फल―जो जीव सम्यग्दर्शन से भ्रष्ट है और अपने मन में सब जानता ही है, अथवा उद्दंडता का भाव भी है और मान लो कोई भेष भी रख लिया धर्मात्मापने का और यह आकांक्षा रही कि मैं दूसरों से नमस्कार चाहूं, दूसरा मेरे पैर छुवे तो ऐसा जीव परभव में लूला, लंगड़ा, मूर्ख आदिक होकर दुर्दशा को प्राप्त होता है । सम्यक्त्वरहित पुरुष के पैरों में पड़ना अथवा सम्यग्दृष्टि पुरुषों को अपने पैरों में पड़ाना यह सब एक मोक्षमार्ग की प्रक्रिया से बाहर प्रक्रिया है । यहाँ यह जानना कि सम्यक्त्व का परिचय कौन करता है । अगर जानबूझकर समझ में आये कि इसके सम्यक्त्व नहीं है, इसने सम्यक्त्व किया है मोटे रूप से समझ में आता है तो उसको ऐसी क्रिया न करना चाहिए किंतु सम्यक्त्व के लाभ के लिए प्रयास करना चाहिए । देखिये व्यवहार पद्धति में यह बात बहुत कही गई है कि जैन शासन में 3 लिंग ही उत्कृष्ट कहे गए है । तीन लिंग ही पूज्य माने गए हैं । (1) एक तो मुनि का रूप । (2) दूसरा उत्कृष्ट श्रावक क्षुल्लक ऐलक का रूप और (3) तीसरा अर्जिका का रूप । चौथा लिंग जैन दर्शन में पूज्य नहीं बताया गया है । तो इन लिंगों के सिवाय बाकी जो जीव है वे अपने को सम्यग्दृष्टि घोषित करें और अपने पैरों में दूसरों का सिर धरावें तो उनके बारे में बताया गया है कि अन्य भवो में वे दुर्गति के पात्र होते हैं । देखिये देह भी वंदनीक बन गया यदि उस देह में रत्नत्रयधारी आत्मा विराजमान है । बताते ना कि मुनि का स्वर्गवास हो गया, मृतक देह पड़ा हुआ है तो भी उसे अजीव मंगल कहा गया है । उसके प्रति कुछ थोड़ी बहुत एक आस्था की बुद्धि रहती है । आस्था तो आत्मा में थी मगर उसके प्रति भक्ति की कुछ बात चित्त में आती तो है । यद्यपि यह देह तो हाड़ मांस का पुंज है, उसमें पूज्यता की क्या बात, मगर उसमें गुण रत्न से भूषित आत्मा बसा हुआ है इसलिए वह वंदनीक बताया गया है ।

अपनी भलाई के लिये जीवन में एकमात्र सम्यक्त्वलाभ का आवश्यक कर्तव्य―सम्यग्दर्शन सम्यक् में सम्यक् के द्वारा सम्यग्दर्शन करना कल्याण का प्रथम सोपान है । समीचीन है मेरा आत्मस्वरूप, उसमें सम्यक् द्वारा अर्थात् शुद्ध परिणाम के द्वारा मन और इंद्रिय से कुछ ज्ञान करके जहाँ मन और इंद्रिय का आलंबन भी छूट जाता है, ऐसी अपनी ज्ञानानुभूति द्वारा उस सम्यक्त्वरूप का दर्शन अनुभव करना सम्यग्दर्शन है । सम्यक्त्व की महिमा जानकर अपने में एक ऐसा निर्णय बनावें कि मेरे को सम्यक्त्व लाभ हो, बाकी जो संग है, समागम है वह चाहे किसी भी दशा को प्राप्त हो, उससे मेरा क्या मतलब है? मेरा तो प्रयोजन मेरे आत्मा से है । मेरा सही आत्मस्वरूप मेरे ध्यान में रहे तो मुझे कोई आकुलता नहीं है । जब अपने स्वरूप को भूलकर बाह्य पदार्थो में विश्वास जमाकर उनके अनुरागी बनते हैं तो वहाँ कष्ट होना प्राकृतिक बात है ।


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