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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 47

From जैनकोष



मोहतिमिरापहरणे दर्शनलाभादवाप्तसंज्ञान: ।

रागद्वेषनिवृत्यै, चरणं प्रतिपद्यते साधु: ।। 47 ।।

चारित्रपालन का अधिकारी―मोहरूपी अंधकार के नष्ट होने पर सम्यग्दर्शन का लाभ होने से जिसने सम्यग्ज्ञान प्राप्त किया है ऐसा साधु रागद्वेष की निवृत्ति के लिए सम्यक्चारित्र को धारण करता है । इस छंद में कितनी ही बातों का तथ्य बताया गया है । चारित्र को साधु प्राप्त करता है, साधुता बिना, निरारंभ निष्परिग्रह हुए बिना, अपने आपके स्वरूप का परिचय पाये बिना चारित्र नहीं पाया जा सकता । गृहस्थावस्था में जो कुछ पाया जाता है धर्म, जो कुछ किया जाता है व्यावहारिक कर्म, आवश्यक बातें, उनका कितना असर है । बस जब कर रहे तब थोड़ा ध्यान है, बाद में उससे भी उल्टे चलने लगे, इसे कहते है गजस्नान । जैसे हाथी तालाब में खूब नहाये सूँड में पानी भर-भरकर पीठ में खूब डाले और बाहर आने पर अपनी आदत के अनुसार सूँड में धूल भर-भरकर अपनी पीठ में डाले । ऐसे ही गृहस्थ किसी-किसी प्रसंग में धार्मिक कार्य करता है―मंदिर आया, स्वाध्याय किया, सत्संग में बैठे, गुरुभक्ति की, अनेक कार्य किया और कुछ ही देर बाद चूँकि गृहस्थी का प्रसंग ही ऐसा है कि आजीविका बिना कार्य चल नही सकता है । सो अन्य बातें उपयोग में चित्रित होने लगती हैं । तो चारित्र पालन का अधिकार साधुओं को है क्योंकि वे आत्मज्ञानी हैं । आरंभ परिग्रह से अत्यंत दूर हैं । अच्छा तो साधुजन किसलिए चारित्र पालते है? रागद्वेष के बिल्कुल हटाने के लिए । यहाँ एक बात जानना कि चारित्र नाम है आत्मा के स्वभाव में अपने उपयोग को रमाना यह कहलाता है चारित्र, जो कर्मों के क्षय का हेतुभूत है । इसकी पात्रता आती है उनके, जिनके व्यवहार चारित्र होता है । गुप्ति समिति की योग्य क्रियाओं से आवश्यक कार्य करना, प्रतिक्रमण, प्रायश्चित आदिक जो व्यवहार चारित्र है उनके पालनहार इस निश्चय चारित्र का अधिकारी हो पाता है ।

चारित्रपालन का प्रयोजन―चारित्र किसलिए है कि रागद्वेष बिल्कुल हट जायें । रागद्वेष क्यों हटावें कि रागद्वेष ही दुःख है, संसार है, कष्ट है । राग से कष्ट होता है यह बात तो दूर की है, पर राग ही स्वयं कष्टरूप है । द्वेष करने से कष्ट होता है, यह बात तो दूर की है पर द्वेष परिणाम होते ही तत्काल कष्ट का अनुभव होता है क्योंकि रागद्वेष परिणाम अपने स्वभाव से विपरीत है । बाहर में उपयोग डुलाने वाले हैं । सो जैसे मछली जल से अलग हो जाय तो जैसे स्वयं ही तड़फती है उसे कोई तड़फाने वाला नहीं है ऐसे ही चूंकि वह अपने स्थान से भ्रष्ट हो गया तो यह स्वयं ही तड़फता है, कष्टरूप होता है । तो चूँकि रागद्वेष ही संकट है सो उसकी निवृत्ति के लिए साधुजन चारित्र प्राप्त करते हैं । जिसके अंदर में यह निर्णय बन गया कि मुझे जगत के इन पौद्गलिक और मायामय संगों से कुछ प्रयोजन नहीं है । मेरे को तो अपने आपके स्वरूप में उपयोग चाहिए। बस मैं केवल अपने स्वरूप को ही निरखूँ, उस ही में अपना अनुभव करूं कि मैं यह हूँ और जो वस्तु स्वभाव से हो रहा है, होता ही है उत्पाद निरंतर, सो हो, मुझे अन्य कुछ बाधा नहीं है, पर जिनका वास्तव में वस्तु स्वरूप का सही निर्णय हो गया तो उनको भीतर में आकुलता नहीं है । आकुलता होती है बनावट से, आनंद होता है सहज । आनंद होने में किसी वाह्य पदार्थ की अपेक्षा नहीं होती । अपेक्षा हो तो आनंद नहीं रहता, किंतु सुख और दु:ख पाने में बाह्य पदार्थों की अपेक्षा है । इंद्रिय विषयों से सुख माना जाता है, उसका आश्रय है, उसका विकल्प है, परापेक्ष है । किसी प्रकार का कष्ट बनता है तो उसमें किसी पर का आलंबन है । किसी पर का ख्याल करके ही तो यह दु:खी हो रहा है । परापेक्ष भाव सब कष्टरूप है । पर वास्तविक आत्मीय आनंद यह केवल आत्मा के आश्रय से होता है । पर का ध्यान आ जाय तो सहज आनंद नहीं रह सकता, स्वलीनता में आनंदमय होना यह है चारित्र की स्थिति । सम्यग्दर्शन से तो जान लिया कि आनंद का धाम यह आत्मा है और अनुभव करके पहचान लिया कि बाहर के किसी पदार्थ में आनंद नहीं है और उनका लगाव व्यर्थ है । सब बाह्य पदार्थ विनश्वर हैं, नष्ट हो जायेंगे । सर्व बाह्यपदार्थ मुझ से अत्यंत जुदे हैं, उनसे मुझ में आता क्या? बाह्यपदार्थों पर उपयोग किया तो चूँकि यह उपयोग अपनी जगह से हट गया उपयोग मुखेन तो स्वस्थान भ्रष्ट होने से यह आकुलित होता ही है, इस कारण किसी भी पर और परभाव से मेरे को लगाव नहीं रखना है । ऐसा जिसका निर्णय हुआ है, इसका यह ध्येय बन जाता है कि रागद्वेष को मूल से हटाना ही है, इस ही में मेरा लाभ है । ऐसा जानकर पुरुष आरंभ परिग्रह से रहित होकर चारित्र को धारण करता है, जिसके ऐसा सम्यग्ज्ञान नहीं जगा वह चारित्र कैसे पा लेगा? बाह्य क्रियाकांड उस ही के लिए मददगार है, सहायक है पात्र बनाने के लिए जिसने अपने सहज आत्मस्वरूप का अनुभव पाया कि मैं यह हूँ अमूर्त ज्ञानमात्र बस इन दो विशेषणों से अपने आपका पौरुष बनायें स्व में लीन होने का ।

आत्मा के बंधन का रूप व बंधन मुक्ति का सुगम उपाय―यह आत्मा शरीर से बंधता नहीं, कर्म से बँधता नहीं परनिमित्त नैमित्तिक बंधन है । एक बंधना होता है ऐसा जैसा कि रस्सी से रस्सी बांध ली । एक होता है कि जैसे गाय को बांध दिया । कोई भी मनुष्य एक हाथ में गाय का गला पकड़कर और दूसरे हाथ में रस्सी पकड़कर गले से रस्सी नहीं बांधता । बांध ही नहीं सकता, और कोई मान लो पहलवान हो, जोर लगाकर बांधना चाहे तो गाय जिंदा नहीं रह सकती, मर जायगी । तो गाय के गले से रस्सी कोई नहीं बांधता, रस्सी के एक छोर से दूसरा छोर बांधता है । गाय निमित्त नैमित्तिक बंधन से बंध जाती है । कहीं जा नहीं सकती, ऐसे ही शरीर से शरीर बंधा, कर्म से कर्म बंधा, यों डायरेक्ट नहीं बंध सकता कि इस अमूर्त आत्मा को शरीर से कर्म से बांध दिया जाय । पर निमित्त नैमित्तिक बंधन भी बड़ा विचित्र बंधन है । वह इस तरह से बांधे की ही तरह है । जैसे किसी गाय के एक दो दिन पहले ही बछड़ा हुआ है और उस गाय को कहीं बाहर ले जाना है तो लोग उस गाय को रस्सी से बांधकर नहीं ले जाते, उसके बछड़े को गोद में लेकर आगे-आगे चलते जाते हैं । और गाय पीछे-पीछे चलती जाती है । उस गाय को किसी चीज से बांधा नहीं फिर भी उसके आश्रय वाला बंधन ऐसा विकट है कि जहाँ बछड़े को ले जावेगा वहाँ गाय अपने आप चली जायगी । तो निमित्त नैमित्तिक बंधन भी विकट बंधन होता है फिर भी ऐसी स्थिति में ज्ञानी संतजन केवल आत्मा के, सहज अमूर्त ज्ञानमात्र स्वरूप को निरखते हैं और इस निरखने के अभ्यास से आटोमैटिक स्वयं ही निमित्त नैमित्तिक योगवश कर्म झड़ते हैं और जो शेष राग रहा शुभ राग, उसका निमित्त पाकर पुण्यरस बढ़ता है, यह स्थिति स्वयं होने लगती है ।

अपने भावों की निर्मलता पर अपना पवित्र होनहार―जीव का अधिकार भवि करने पर है । सर्व कुछ बात जीव के भावों पर निर्भर है । लौकिक आनंद जीव के भावों पर निर्भर है । मोक्ष का आनंद जीव के भावोंपर निर्भर है । जिसको शरीर निरोग मिला, रूपवान मिला, आकर्षक मिला अथवा जिसको वाणी मनमोहक मिली, जिसका आज मन बड़ा पवित्र बना, जो सबका भला चाहता । दीन दुःखियों पर दया करता, ये सब बातें जो मिली हैं ये पूर्व में जो शुभ भाव किए उसके प्रताप से मिले हैं । धन भी खूब आये यह बात भी आत्मा के भावों पर निर्भर है, पर वर्तमान भाव पर नहीं । किंतु पूर्वभाव शुभ किया था, जिनका निमित्त पाकर पुण्यबंध होता । आज उस उदय काल में इष्ट समागम मिला । तो देखिये सर्वकुछ बात अपने भावों पर निर्भर है । अत: भाव विशुद्ध होने चाहिए । सबकी भलाई की हो, आत्मदृष्टि की हो । अपने आपको अकेला निरखिये, आपका कोई सहयोगी नहीं है, आपके परिणमन में कोई योग दे सके, ऐसा न कभी हुआ, न कभी हो सकेगा । आप अकेले ही परिणमते हैं, अकेले ही अवस्था बनाते हैं इसलिए खुद-खुद के ही जिम्मेदार हैं । ऐसा विश्वास रखना है । अपना कर्तव्य देखिये । जिस जीव ने सम्यग्ज्ञान प्राप्त किया है ऐसा साधु रागद्वेष के हटाने के लिए चारित्र को धारण करता है ।

सम्यग्दर्शन व सम्यग्ज्ञान की निष्पत्ति―सम्यक्त्व ने मार्ग दिखाया, चारित्र ने मार्ग में चला दिया, अब यह जीव अपने मंजिल पर पहुंच ही जायगा । मार्ग दिख जाने पर जितनी उमंग होती है भीतर चलने के अभिमुख होते हैं । इतनी बात तो सम्यक्त्वाचरण हो ही गई है, किंतु उस पर प्रयोग बने, यह सम्यक्चारित्र में होता है जिसने सम्यग्ज्ञान पाया है वह साधु चारित्र पालता है । सम्यग्ज्ञान मिला कैसे? सम्यक्त्व के लाभ से । सम्यक्त्व कब पाया? सर्व से निराले अमूर्त ज्ञानमात्र इस परमार्थ अंतस्तत्त्व की दृष्टि रखकर इसके अभ्यास से जब ज्ञान इस ही ज्ञानमात्र को अनुभवने लगे, जानने लगे उस काल में इसके सम्यक्त्व उत्पन्न होता । जिसके सम्यक्त्व उत्पन्न होता उसके सम्यक्त्व से पहले का ज्ञान झूठा न था, सही था फिर भी सम्यग्ज्ञान न था । जैसे जिसने जो देश नहीं देखा, मानो अमेरिका नहीं देखा । उसने पुस्तकों से पढ़कर, नक्शों को देखकर, अमेरिका गए हुए पुरुषों से मुहजबानी सुनकर अमेरिका का ज्ञान तो किया । वह ज्ञान सही है मगर अभी सम्यक् नहीं है, और वही पुरुष उस देश में जाकर आँखों देखे वहाँ के नदी, पहाड़, महल, सड़कें आदि तो उसका वहाँ जो ज्ञान स्पष्ट बना है उसे मान लो लौकिक सम्यक् । जिसने श्रवणबेलगोल में बाहुबलि के दर्शन नहीं किया वह जान रहा सही-सही पुस्तकों से पढ़कर या दर्शन कर चुकने वाले पुरुषों से सुनकर पर वही पुरुष जब वहाँ पहुंचकर साक्षात् रूप में दर्शन करता है । सामने मूर्ति को निरखता है तो बताओ इन दोनों प्रकार के ज्ञानों में कुछ फर्क है कि नहीं? हां है फर्क । साक्षात् दर्शन करने से पूर्व का जो ज्ञान था वह सही था पर अनुभवपूर्ण ज्ञान न था । सामने निरखने से बना अनुभवात्मक ज्ञान । अनुभवात्मक ज्ञान को ही सम्यग्ज्ञान कहते हैं । अनुभव से पहले का ज्ञान सम्यक् नहीं है । जो पुरुष जीव अजीव आदिक तत्त्वों का ज्ञान नहीं रखते । आत्मा के स्वरूप की बात नहीं सुनते उन पुरुषों के तो सम्यक्त्व दुर्लभ है पर जिन्होंने 7 तत्त्वों का ज्ञान किया, सही आत्मा के स्वरूप की बात समझी, जानी, उस ही सही ज्ञान के आधार पर तो आत्मा की उपासना करते है । उस उपासना को करते हुए में जिस समय ज्ञान से ज्ञान में ज्ञान ही हो, इसका परिचय बनता है वहाँ जगता है अपना अनुभवात्मक ज्ञान और ज्ञानानुभव होने के बाद अब जो आत्मा का ज्ञान है वह है सम्यग्ज्ञान । ज्ञानानुभव के साथ ही जो ज्ञान बना वह है सम्यग्ज्ञान । जैसे किसी ने जो चीज नहीं खाया, मानो एक अनन्नास फल है जो बंगाल आसाम में अधिक होता, कभी-कभी यहाँ भी बिकने आ जाता, तो जिसने उसको कभी नहीं खाया, उसे कोई कितना ही समझाये कि उसका ऐसा मीठा स्वाद होता है कितने ही उदाहरण दे देकर समझाये फिर भी उसको उस अनन्नास फल का सही-सही स्वाद अनुभव में न आयगा । हां यदि वही फल उसे जरा सा चखा दिया जाय तो झट उसे उसका अनुभवपूर्ण ज्ञान हो जायगा । तो अनुभवसहित ज्ञान को ही सम्यग्ज्ञान कहते हैं । सम्यग्दर्शन जब उत्पन्न होता है तो वह अनुभव पूर्वक ही होता है । सम्यक्त्व हुए बाद फिर उसका अनुभव बहुत दिन तक न भी बने तो भी सम्यक्त्व रहता है प्रतीति रूप में, पर अनुभव बिना सम्यग्दर्शन नहीं है ।

निर्मोह स्थिति ही सुखदाता―सम्यग्दर्शन प्राप्त कैसे होता है? मोहरूपी अंधकार के नष्ट होने पर । जहाँ मोह बसा है वहाँ सम्यक्त्व नहीं है । मोह अज्ञान पड़ा है वहाँ सम्यक्त्व का क्या काम? मोह मिटाकर गृहस्थ धर्म रह सकता है । राग दूर करके घर में न रह पायेंगे । मोह दूर करके घर में रहने वाला गृहस्थ शान से रहता है, गौरव से रहता है । अनाकुल रहकर रहता है और मोही गृहस्थ घर में व्याकुल होकर रहता है, अव्यवस्थित रहता है । तो मोह दूर करके घर रहने में आपका क्या बिगाड़ है? घर है आपका माना हुआ, वह कहीं जायगा नहीं । न भी मोह करें तो उसमें फर्क क्या पड़ता है । न किसी बच्चे को कोई तकलीफ होती, न किसी के बीच में ही मृत्यु होती । आपके मोह न करने से नुकसान क्या होता है? आप भले प्रकार व्यवस्थित रहने लगें, अनाकुल रहने लगें, सद्गृहस्थ बनकर रहें, स्वयं किसी से मोह न करें और परिजनों को भी हित के मार्ग में लगायें, उन्हें समझायें कि देखो यहाँ किसी का कोई कुछ नहीं है, सर्व जीवों की सत्ता स्वतंत्र-स्वतंत्र है । सर्व में अपने भावों के अनुसार कर्मबंधन है, उसके अनुसार संसार के सुख दुःख प्राप्त होते हैं, सो ये भी न चाहिए । इन सब विकारों से हटकर अपने आपके सहज स्वरूप का मनन करने में कल्याण है । मोह न करो कोई किसी से । ऐसा परिजनों को समझायें तो देखिये कितना शुद्ध वातावरण होता है । शांतिमय वातावरण होता है । सबको लाभ मिलेगा । पर मोह करने से, घबड़ाने से, लगाव रखने से आकुलता, अव्यवस्था अशांति रहती, इस कारण तत्त्वज्ञान बढ़ायें जिससे मोहभाव न रहे । तो मोहरूपी अंधकार के दूर होने पर सम्यक्त्व का लाभ होता है । अच्छा तो मोह अंधकार दूर हो इसके लिए क्या करना? जिसमें मोह रंच भी न रहा ऐसे वीतराग प्रभु के गुणों का स्मरण करना । जिनके मोह नहीं है ऐसे गुरुजनों का सत्संग करना, वीतराग सर्वज्ञ देव द्वारा प्रणीत आगम का अभ्यास करना, ये काम करने होते है।

देव शास्त्र गुरु की आस्था की सम्यक्त्वोत्पाद में प्रयोजकता―यहां यह भी जानना है कि देव शास्त्र गुरु पर ही दृष्टि रखने से सम्यक्त्व नहीं उत्पन्न होता । कोई ऐसा ही जान ले कि ये भगवान ही मुझे सम्यक्त्व देंगे, ये गुरु ही मुझे सम्यक्त्व देंगे, को यों सम्यक्त्व न मिलेगा, क्योंकि उसकी श्रद्धा में वह सम्यक्त्व का धाम सहज आत्मस्वरूप दृष्टि में नहीं आया है तब फिर सम्यक्त्व कैसे मिलेगा? सारे विकल्प छूट कर जब यह सहज चैतन्य स्वरूप को ही ज्ञान में लेगा तो सम्यक्त्व होगा, तो यहाँ कोई कहे कि जब अपने ही भगवान सहज आत्म स्वरूप की दृष्टि के आश्रय से सम्यक्त्व होता है तो फिर ये उपाय क्यों बताये जाते कि देव, शास्त्र, गुरु की उपासना करो । सत्संग, स्वाध्याय, तत्वज्ञान, अध्ययन आदि इन उपायों को क्यों बताया जाता है? तो भाई इन उपायों को किये बिना वे शुभ भाव नहीं बन सकते है जिन शुभ भावों के अनंतर सम्यक्त्व उत्पन्न होता है । अशुभ भाव के बाद कभी भी सम्यक्त्व नहीं होता । एक भी दृष्टांत ऐसा नहीं है कि अशुभोपयोग के बाद ही सम्यक्त्व हुआ हो किसी को । जिन्हें कारण लब्धियाँ कहा करते, उनके पाये बिना सम्यक्त्व नहीं होता और ये उपलब्धियाँ शुभोपयोग में हैं । तो शुभोपयोग के ये सब साधन है । ये उपाय है, जानकर, समझकर और करने का कर्तव्य क्या है कि जिससे सम्यक्त्व लाभ हो? आत्मा के स्वरूप का ज्ञान करें, उसका मनन करें, उसका साधन है स्वाध्याय व अध्ययन और वीतराग सर्वज्ञ देव के गुणों का स्मरण करना । आत्म स्वभाव के इस स्वरूप को एक दृढ़ता पूर्वक समझिये, यही है जानबूझकर पौरुष करने की बात । फिर किसी क्षण बाल विकल्प छूटकर अपने आप में अपना ज्ञानोपयोग आयेगा, रमेगा, सम्यक्त्व लाभ होगा । तो यह जो बाहरी भौतिक पौद्गलिक मायामय पदार्थ है इनको ही जो अपना हितकारी मानता है, सुखकारी मानता है । यह तो एक घोर अंधकार है । सत्य परिचय रखिये और फिर गृहस्थी में हैं तो उसके योग्य कार्य करिये । करना पड़ेगा मगर इसमें मेरा हित होगा, ऐसे मिथ्या आशय को निकालना होगा । मेरा हित ज्ञानानंद निधान मेरे चैतन्य स्वरूप के आश्रय से ही होगा, दूसरा कोई मेरा हित न हों । तो ये सब बातें जिनके चित्त में बसी हैं और इस ही आत्मा की धुन लगी है वे पुरुष इस आत्मतत्त्व के पाने के लिए सर्व कुछ त्याग कर देते हैं, निर्ग्रंथ दिगंबर साधु होते हैं और वे रागद्वेष की निवृत्ति के लिए अपने आत्मस्वरूप में रमने का पौरुष करते हैं । इसी का नाम है सम्यक्चारित्र । जिसमें यह सम्यक्चारित्र संयम नहीं बन पाता वह गृहस्थ धर्म में रहकर श्रावक के योग्य आचरण कर अपनी पात्रता बनाये रहता है ।



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