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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 65

From जैनकोष



धनश्रीसत्यघोषी च तापसारक्षकामपि ।

उपाख्येयास्तथा श्मश्रु नवनीतो यथाक्रमम् ।। 65 ।।

हिंसापाप में प्रसिद्ध धनश्री का दुराचरण―श्रावक के 5 पापों का त्याग रहता है, वै पांचों ही पाप संसार में भटकाने वाले हैं । अनेक दुर्गतियों के कारण हैं । उन सब पापों में प्रसिद्ध है हिंसा । जिनका हिंसा में चित्त रहता है उनके सदैव पाप का बंध चलता है जिसके फल में मरण कर दुर्गति ही पाते है । हिंसा पाप में धन श्री की बड़ी प्रसिद्धि हुई है । बहुत पहले की कथा है कि एक नगर में धनपाल सेठ रहते थे । उनकी स्त्री का नाम धनश्री था । वह धन श्री दुष्ट स्वभाव की थी और उसके मन में निरंतर हिंसा ही रुचती थी । सेठ धनपाल ने उस धनश्री को बहुत संबोधन किया धर्म वृत्ति से रहना, पतिव्रत का पालन करना, पति की आज्ञा मानना, जीवों की दया पालना । सत्य बोलना आदिक अनेक शिक्षायें समय-समय पर दिया करता था परंतु धनश्री ने उसकी एक भी बात न मानी । तो जहाँ प्रकृति भिन्न हो वहाँ पति पत्नी की प्रकृत्या नहीं पटती, फिर जो दुष्टा हिंसा चित्त वाली हो तो उस सेठानी की सेठ से बिल्कुल ही वृत्ति न मिलती थी । तो धनश्री के द्वारा सेठ धनपाल को कोई आराम न था । कुछ दिन बाद धनश्री के एक लड़का और एक लड़की ये दो संतान हुई । लड़के का नाम गुणपाल था और लड़की का नाम सुंदरी था । संतान होने के पहले ही सेठ सेठानी ने अपने पास एक लड़का रख रखा था । जब बहुत दिन तक संतान न हुए तो यह सोचकर कि इस परिवार का, इस धन का कोई उत्तराधिकारी तो हो । सो एक लड़का गोद ले लिया था, उसका नाम था कुंडल । उस कुंडल को वे सेठ सेठानी पुत्र के समान मानते थे । कुछ दिन बाद सेठ धनपाल का तो देहांत हो गया और वह कुंडल लड़का जवान हुआ । उस दुष्ट धनश्री का उस कुंडल से अपने पति का नाता लग गया । पति तो गुजर गया था और यह कुंडल रखा हुआ लड़का था तो उस नाते से यद्यपि वह धनश्री का ही लड़का कहलाया, पर वह धनश्री उस कुंडल से स्नेह करने लगी और कुशील सेवन करने लगी । सो ऐसी स्वतंत्रता मिलने पर उस धनश्री की कुटिलता का ठिकाना न रहा ।

हिंसाप्रिय धनश्री की बधकारक प्रवृत्ति―अब धनश्री का पुत्र गुणपाल बड़ा हुआ तो वह पापिनी धनश्री सोचने लगी कि अब यह लड़का बड़ा हो गया है और यह भलाई बुराई समझने लगा है, यह मेरी और कुंडल की दोस्ती में विघ्न डालेगा यह मेरे लिए कांटा बन गया है । उस कुशील के बेग में धनश्री को अपना ही गुणपाल लड़का कांटा लगने लगा? सो सोचा कि इस कांटे को निकालना चाहिए अर्थात् किसी प्रकार से इस गुणपाल को मार डालना चाहिए । तब रात्रि को धनश्री उस कुंडल से कहने लगी कि देखो आज सवेरे ही गुणपाल को गाय चराने जंगल भेजूँगी और तुम हथियार लेकर पीछे-पीछे चले जाना और जंगल में उसे मार डालना । जब तुम गुणपाल को मार डालोगे तब ही हम तुम ठीक आनंद से रह पायेंगे । कुंडल ने भी धनश्री की यह सलाह मान ली क्योंकि कुंडल को गुणपाल से क्या स्नेह? लेकिन यह सब वार्ता गुणपाल की बहिन सुंदरी ने सुन लिया । जब वार्ता हो रही थी तो सुंदरी छिपे-छिपे सब बात सुन रही थी । तो उसने अपने भाई गुणपाल को सावधान कर दिया और रात में जो मंत्रणा हुई थी वह सब भी अपने भाई को सुना दी । तब गुणपाल बोला―बहिन तूने बड़ा अच्छा किया जो मुझे सावधान किया । आगे भी जो बात समय-समय पर हो वह भी हमें बता दिया करना । जब कुंडल मेरे मारने के उपाय में है तो मैं ही कुंडल का मार डालने का उपाय करुंगा । प्रात: काल होने वाला था तब धनश्री ने गुणपाल से कहा कि बेटा गुणपाल आज कुंडल को ज्वर हा गया है इसलिए तुम पशु चराने जावोगे । गुणपाल को सब वृतांत मालूम था ही । वह जंगल में तो चला गया पर एक तलवार अपने कपड़े में छिपाकर चला और उसने जंगल में पहुंचने पर अपने कपड़े उतार दिये और एक ठूठ को वे कपड़े पहना दिया और स्वयं एक झाड़ी में तलवार लेकर छिप गया । पीछे से जब कुंडल आया तो उस ठूठ को गुणपाल समझकर कुल्हाड़े का भारी प्रहार किया, जिससे उस ठूठ के टुकड़े-टुकड़े हो गए । यह दृश्य देखकर कुंडल आश्चर्य में पड़ गया और बड़ा घबड़ाया कि यह क्या हुआ। वह कुछ ऐसा सोच ही रहा था कि पीछे से गुणपाल ने आकर तलवार से कुंडल के टुकड़े कर डाले। देखो वह कुंडल गुणपाल को मारना चाहता था पर खुद गुणपाल के हाथ से मारा गया।

हिंसापापप्रिय धनश्री की हिंसावृत्ति और उसका परिणाम दुर्दशा दुर्मरण व दुर्गति―अब वह गुणपाल लौटकर घर आया, उसके कपड़ों पर खून के धब्बे दिखाई दिए, पर कुंडल के न दिखने पर धनश्री ने पूछा कि कुंडल कहां है? तो पहले तो चुप रहा, फिर साहस करके बोला कि इस तलवार से पूछो कि कुंडल कहां है। धनश्री सब बात समझ गई कि कुंडल मार डाला गया । उसी समय तत्काल धनश्री ने गुणपाल के हाथ से तलवार छुड़ाकर गुणपाल की हत्या कर दी । यह दृश्य गुणपाल की बहिन सुंदरी देख रही थी कि मेरी ही मां ने मेरे प्रिय भाई की हत्या कर दी सो वह भी मूसल लेकर धनश्री को मारने दौड़ी। धनश्री और सुंदरी के बीच मारा-मारी हो रही थी कि वह समाचार नगर में सब जगह फैल गया। राजा के पास भी इसकी खबर गई तो राजा ने उस धनश्री को हत्यारिनी पापिनी जानकर सेवकों को आज्ञा दी कि इस धनश्री के नाक, कान काट लो, फिर इसे गधे पर बैठाकर नगर में फिरावो और फिर इसे प्राणदंड दे दो । सेवकों ने राजाज्ञा से वैसा ही किया। धनश्री खोटे ध्यान से मरकर नरक गई । हिंसा पाप के फल में जीवों को धनश्री के समान दोनों ही जन्मों में दुःख भोगना पड़ता है । यह हिंसा पाप सर्वथा ही छोड़ने योग्य है।

श्रीभूत का सत्यता की दुहाई सत्यघोष नाम प्रसिद्ध करवाना―श्रावक ने दूसरे पाप झूठ का त्याग किया है। असत्य पाप के कारण लोगों को प्रतीति नहीं रहती, स्वयं का उपयोग कलुषित रहता है, वह धर्म का पात्र नहीं रहता। झूठ बोलने वाले लोग प्राय: मायाचार का आश्रय लेते हैं जिससे उनका पुण्य निरंतर कुटिल रहता है इस पाप में सत्यघोष प्रसिद्ध हुआ है । इसी भरत क्षेत्र में सिंहपुर नगर था जहां राजा सिंहसेन राज्य करता था, उनकी रानी का नाम रामदत्ता था, उसी नगर में एक पुरोहित रहता था जिसका नाम श्रीभूत था। श्रीभूत बहुत ही धोखा देने वाला और धोखा देकर अनेकों का धन हड़पने का प्रयत्न रखता था । उसने लोगों को धोखा देने के लिए अपने जनेऊ में एक छोटा चाकू बांध रखा था और उसे दिखाकर लोगों से कहता कि मेरे सत्यव्रत का नियम है । यदि भूल से झूठ बोल जाऊं तो मैं इस चाकू के द्वारा अपनी जीभ काट लूँगा इसलिए मैंने यह चाकू जनेऊ में लटका रखा है । और इसी प्रसंग को लेकर उसने अपना नाम सत्यघोष कर रखा था । नगर के लोग उस पर बड़ा विश्वास करते थे । अनेक लोग उसके यहाँ अपना धन धरोहर के रूप में रखने आते थे । लेकिन वह सत्यघोष किसी-किसी की धरोहर तो वापिस कर देता था और कई लोगों की धरोहर हड़प लेता था । वह यदि कहीं फरियाद भी करे तो नगर के लोग उल्टा उसे ही झूठा कहते थे । यदि कोई लोग राजा के पास जाकर इस सत्यघोष की नालिस भी करते थे तो भी राजा के चित्त में सत्यघोष ने इतना प्रभाव जमा रखा था और विश्वास बना रखा था कि जिससे राजा किसी की भी न सुनता था ।

सत्यघोष के पास समुद्रदत्त के पांच महामूल्य के रत्न फंस जाना―एक बार पद्मखंड नगर में रहने वाला समुद्रदत्त व्यापार के काम से सिंहपुर नगर में आया । उसकी इच्छा विदेश जाकर व्यापार करने की थी । सो उस समुद्रदत्त ने सोचा कि हम बहुत दूर विदेश व्यापार करने के लिए जा रहे हैं, यदि वहाँ कुछ टोटा पड़ जाय या जहाज आदिक डूब जाय तो यहाँ का रखा हुआ धन तो काम आ जायगा । इस कारण जो उसके पास 5 रत्न थे उन्हें सत्य घोष के पास जमा करने गया और बड़े विनय से उसके यहाँ 5 रत्न रख दिया यह समुद्रदत्त अब रत्नद्वीप में वहाँ बहुत दिन तक रहा । अच्छा व्यापार चला और धन कमाया तब वह लौटकर आ रहा था तो उसका जहाज टकरा गया और फट गया जिससे उसके साथी और सारा धन समुद्र में डूब गया । अब वह बेचारा समुद्रदत्त जहाज के टूटे हुए किसी काठ के टुकड़े के सहारे तैरता हुआ बड़ी कठिनाई से उस समुद्र के किनारे आ सका और वह समुद्रदत्त सीधा सत्यघोष के पास गया, यह सोचकर कि सत्यघोष के यहाँ मेरे 5 रत्न रखे हैं उन्हें लूँगा और पुन: व्यापार करके अपना दरिद्रय मिटाऊंगा इधर सत्यघोष ने समुद्रदत्त के जहाज के डूबने की बात पहले ही सुन रखी थी और अब समुद्रदत्त को आते देखा तो सत्यघोष ने समझ लिया कि यह अपने रत्न अवश्य मांगेगा । अब सत्यघोष ने एक मायाजाल रचा, वह पहले से ही अपने पास के बैठने वाले लोगों से कहने लगा कि आज कुछ असगुन होने वाला है । देखो वहां कोई भिखारीसा आ रहा जान पड़ता है यह वही मनुष्य है जिसका कि कल जहाज डूब गया सुना था । अब यह धन डूब जान से अवश्य पागल हो गया होगा । और यह न जाने किससे क्या कह बैठेगा? इतने में समुद्रदत्त आ ही गया और सत्यघोष को नमस्कार कर बड़े विनय से अपने पांचों रत्न मांगने लगा । तब सत्यघोष ने पास बैठे हुए लोगों से कहा कि देखा जी जो मैंने अभी कहा था वह बात यथार्थ सत्य निकली । सत्यघोष ने समुद्रदत्त को उत्तर दिया कि भाई तू कौन है, कहां का रहने वाला है । मैं तो तुझे पहचानता भी नहीं हूँ और तुम क्या कर रहे हो? तुम्हारा चित्त ठीक भी है या नहीं । तेरे पास रत्न आये भी कहां से? और फिर मेरे पास रखने का सवाल ही क्या? मालूम होता है कि तेरा धन डूब जाने से तू पागल हो गया है । यदि तेरे पास रत्न भी थे तो और किसी के यहाँ भूल आया होगा, यहाँ तू कैसे मांगने आया? सत्यघोष ने समुद्रदत्त को अनेक भली बुरी बातें कहीं और खूब उसे डाट लगायी, और इतना ही नहीं, उसने अपने नौकरों के हाथ राजा के पास भेज दिया और यह कहलाकर भेजा कि यह भिखारी हमें बिना कारण कष्ट देता है, आप इसका प्रबंध कर दे । अब राजा सिंहसेन इस झूठे सत्यघोष को सच्चा सत्यघोष जान रहे थे इस कारण उन्होंने उस बेचारे समुद्रदत्त की एक भी बात न सुनी और उसे झूठा घोषित करके निकलवा दिया ।

समुद्रदत्त व सत्यघोष के मामले का निर्णय कराने का रानी द्वारा प्रयास―अब वह बेचारा समुद्रदत्त उस पापी सत्यघोष के द्वारा ठगा जाने से सचमुच पागल जैसा हो गया । वह नगर में बाजार में जहाँ भी जाता वहाँ यह कहता रहता था कि मेरे 5 रत्न नहीं देता । कोई उसकी बात सच न माने? अब तो नगर के लोग उसे पागल कहने जगे । वह समुद्रदत्त दिन भर नगर में रोता हुआ घूमता रहता था और रात्रि को राजा के महल के पीछे एक पेड़ पर चढ़कर रोज पुकारा करता था कि सत्यघोष के पास मैं 5 रत्न जमा कर गया था वह नहीं देता । ऐसा चिल्लाते-चिल्लाते 6 महीना हो गए । एक दिन महारानी रामदत्ता ने राजा से कहा कि आप सत्यघोष की माया में न भूल जाये इस बेचारे समुद्रदत्त का ठीकठीक न्याय करो । राजा ने रानी के कहने से समुद्रदत्त को बुलवाया तो उसने सच बात राजा से कह सुनाया । राजा ने रानी से कहा कि मालूम तो ऐसा पड़ता है कि समुद्रदत्त सच कह रहा है पर इसका भेद खुलने का कोई उपाय नहीं सूझ रहा । रानी ने कुछ देर सोचा और कहा कि हम इसका उपाय करेंगी ।

रानी द्वारा सत्यघोष की बेईमानी व माया का प्रकट करना―दूसरे दिन रानी ने सत्यघोष को महल में बुलवाया और चौपड़ खेलने को कहा तो सत्यघोष रानी का कहना न टाल सका और चौपड़ खेलने लगा । रानी ने पहले ही बाजी में सत्यघोष की अंगूठी जीत ली और भीतर उसे खेल खिलाती रही और चुपचाप दासी को बुलाकर कहा कि सत्यघोष के घर जावो और उसकी स्त्री से कहो कि सत्यघोष ने तुम्हारे पास अपनी यह निशानी भेजी है और समुद्रदत्त के रत्न मंगवाये हैं । दासी सत्यघोष के घर गई और अंगूठी दिखाकर पांचों रत्न मंगवाने की बात कही तो पुरोहितन ने दासी को उत्तर दिया कि यह अंगूठी उन जैसी मालूम तो पड़ती है पर पूरा विश्वास नहीं कि यह उन्हीं की अंगूठी है । दासी लौटकर रानी के पास आयी इस बीच रानी ने सत्यघोष की चाकू और जनेऊ भी जीत लिया था । जब पुरोहितन का उत्तर रानी ने सुना तो रानी ने इस बार जनेऊ और चाकू दासी को देकर फिर सत्यघोष के घर भेजा । दासी पहुंची और सत्यघोष की स्त्री के हाथ में चाकू और जनेऊ देकर कहा―लो यह उनकी निशानी, क्या अभी भी आपको कुछ संदेह है? फौरन पांचों रत्न दे दीजिए, तुरंत इसी समय मंगाया है । तो पुरोहितन को पूरा विश्वास हो गया और उसने पांचों रत्न दासी को दे दिया, दासी ने वे रत्न ले जाकर रानी को दे दिया । अब रानी ने प्रसन्न होकर खेल समाप्त कर दिया और पुरोहित जी अपने घर पहुंचे । रानी ने रत्न राजा के सामने रख दिया ।

असत्यवादी सत्यघोष को कठिन दंड―महाराज ने सिपाही भेजकर सत्यघोष को पकड़ बुलवाया । सत्यघोष भी सब जान गया और अपने को अभागा और दंड पाने योग्य समझने लगा । राजा ने कुछ अपने रत्न उन पांचों रत्नों में मिलाकर समुद्रदत्त को बुलाकर कहा कि इन रत्नों में से अपने रत्नों की पहिचान कर लो । समुद्रदत्त ने अपने ही रत्न छांट लिए, सत्यघोष की गुंडागर्दी राजा की समझ में आ गई और मंत्रियों की सलाह से सत्यघोष को तीन दंड सुनाये । एक तो यह दंड कि थाली भर गोबर खाये, या फिर हमारे मल्ल के 32 घूँसे सहे या फिर अपना सारा धन राजा को दे-दे । अब सत्यघोष ने सबसे पहले थाली भर गोबर खाना मंजूर किया, जब खाने लगा तो दो चार ग्रास भी न खा सका । फिर मल्ल के 32 घूँसे सहना स्वीकार किया, पर एक ही घूँसा लगने पर वह अधमरा हो गया, फिर विवश होकर उसे सब धन देना पड़ा । तो देखिये सत्यघोष ने इस तरह से तीनों ही दंड भोगे और थोड़े ही दिनों में खोटे भावों से मरकर वह कुगति मे गया । झूठ बोलने का परिणाम बहुत बुरा होता है । मनुष्य को चाहिए कि कोई परिस्थिति ऐसी आये कि थोड़ा नुकसान भी होता हो तो भले ही सह ले पर उसे बचाने के लिए भी झूठ न बोले ।

तापसी के भेष में चोर की मायाचारी―श्रावक ने तीसरे चोरी पाप का भी त्याग किया है । चोरी करने वाले का कभी भी समाधान चित्त नहीं रहता, निरंतर शंकित रहता है और इस शंका से उनका रहना बैठना सब कुछ असमंजस रूप होता है । चोरी के पाप में एक साधु भेषधारी चोर प्रसिद्ध हुआ है । पूर्वकाल में कौसंबी नगरी में सिंहरथ राज्य करता था, वह न्यायप्रिय था, उसी नगर में एक चोर रहता था । उसका क्या कार्य था कि साधु के भेष में रहता था और एक बड़े पेड़ की डाल से छींका बांध रखा था और उसमें बैठ जाता था, लोग उसके पास आते थे तो वह यह कहता था कि दूसरे की वस्तु की तो बात क्या, मैं तो धरती तक को भी नहीं छूता हूँ । सदा छींके पर अधर लट का रहता था । दिनभर वह उसी तरह से डाल पर रहता, था पर रात्रि को वह बस्ती में जाकर चोरी किया करता था । उसके साधुभेष के कारण, मीठे उपदेश के कारण लोगों को उस पर बड़ा विश्वास जम गया । वह चोरी का धन एक पास ही में खोद रखे कुवें में डाल देता था और नीचे-नीचे दूर तक गुफा बना रखी थी जिसमें उसकी स्त्री भोजन तैयार कर के उसे खिलाती थी । जब नगर में बहुतसी चोरियां हो चुकी और पता न लगे तो राजा ने थानेदार को बुलवाया और बड़ी डाट लगायी, थानेदार पता लगाता फिरे पर अंत में हार मानकर चिंता में बैठ गया ।

एक ब्राह्मण द्वारा ढोंगी साधुवों के ढोंग की सूचक कथा का कथन―वहां एक भिखारी ब्राह्मण आया और खाने को कुछ भोजन थानेदार से मांगा । तो वहाँ थानेदार ने नाराज होकर कहा कि तुम्हें खाने को पड़ी है यहाँ तो जान की आफत आ रही है । तो वहाँ ब्राह्मण ने थानेदार से उदासी का कारण पूछा तो थानेदार ने अपना सारा हाल उससे कह सुनाया । तो उस ब्राह्मण ने वहाँ कुछ सोचकर कहा कि चोरी करने वाला तो वही मनुष्य हो सकता है जिसने अपनी सच्चाई की बड़ी प्रसिद्धि कर रखी हो, जिन्होंने अपनी बड़ाई की बड़ी प्रसिद्धि कर रखा हो और उसका बड़ा ढोंग फैल रहा हो, ऐसे लोग बड़े ठग निकलते हैं । तब थानेदार बोला कि वहाँ तो एक साधु पास ही में रहता है जो बड़ा संतोषी है, उस पर मुझे रंच भी संदेह नहीं । उसे तो नगरवासी लोग महात्मा मानते हैं । तो वह ब्राह्मण बोला कि आप उसकी सच्चाई का पता तो लगाइये । देखो हम (ब्राह्मण) अपने ऊपर बीती हुई एक घटना सुनाते हैं, सुनो हमारी स्त्री ने अपने की बड़ी सती प्रसिद्ध कर रखा था, जब वह बच्चे को दूध पिलाती थी तो बच्चे को अपने पूरे स्तन निकाल कर दूध न पिलाती थी, सारे स्तन को कपड़े से ढांके रहती थी सिर्फ स्तन की काली घुँडी बच्चे के मुख में डाल देती थी । जब कोई पूछता कि ऐसा क्यों करती? तो वह कहती थी कि यह बच्चा भी पर पुरुष है । उसे यदि मैं अपने स्तन छुवाती हूँ तो उसमें मेरे सतीत्व में दोष आता है । इस प्रकार की बड़ी सती बनती थी । एक दिन मैंने अपनी आंखों से दूसरे के साथ व्यभिचार करते देखा तभी से मैं उससे विरक्त होकर तीर्थ यात्रा को निकल पड़ा हूँ । मैं भिखारी न था, बड़ा संपन्न था । बहुतसा सोना मेरे पास था । मैंने उस सोने को एक पोली लाठी के अंदर भरवाकर उसका मुख बंद कर रखा था और उस लाठी को मैं हमेशा अपने हाथ में रखता था । एक दिन की घटना कि यात्रा करते हुए में हम को एक जगह एक लड़का मिल गया, अब वह भी हमारे साथ रहने लगा । साथ रहते हुए में कुछ दिनों में हम को उस पर विश्वास हो गया । एक दिन हम और वह लड़का दोनों एक कुम्हार के यहाँ शाम को ठहर गए, सुबह वहाँ से आगे बढ़ गए । कुछ दूर जाकर वह लड़का मेरे से बोला―अरे रे रे बड़ा गजब हो गया, मैं हूँ चोरी का त्यागी और यह कुम्हार के घर का तिनका मेरे देह में चिपक कर चला आया, मैं उसे वापिस करके आऊंगा । आखिर वापिस करने गया तब से उस बालक पर मुझे बड़ा विश्वास हो गया । फिर एक दिन की बात कि मेरे पास भोजन न था सो उस लड़के से एक जगह से भोजन लाने को कहा तो वह लड़का बोला कि भोजन लेकर लौटते-लौटते रात हो जायगी इसलिए रात को कुत्ते आदिक से बचने के लिए यह लाठी मुझे दे दीजिए । सो मैंने विश्वास में आकर वह लाठी उसे दे दी । पर वह लाठी लेकर अभी तक लौटकर नहीं आया । मैंने उसका बड़ा पता लगाया पर वह कहीं न मिला । तो ऐसे कितने ही ढोंगी लोग होते हैं जो अपनी सच्चाई की बड़ी प्रसिद्धि करते हैं मगर वे चोर और दगाबाज होते हैं ।

ब्राह्मण द्वारा तापसी चोर की मायाचारी व चोरी का प्रकाशन―अच्छा थानेदार साहब मैं ही आज रात को उस साधु की परीक्षा करुंगा । अब ब्राह्मण रात होते ही उस तापसी के आश्रम पर पहुंचा, तापसी के चेलों ने टोका कि तू कौन है? तो ब्राह्मण बड़े दीनता भरे शब्दों में बोला कि मैं एक मुसाफिर हूँ, मुझे रात को सूझता नहीं है, यहीं कहीं किसी कोने में रातभर पड़े रहेंगे और सवेरा होते ही यहाँ से चले जायेंगे । यह समाचार उन चेलों ने तापसी को तो तापसी बोला―कोई बात नहीं, अंधा है, पड़ा रहने दो रातभर किसी कोने में, उससे अपना कुछ बिगड़ता नहीं । तो एक जगह कोने में उसे पड़े रहने की आज्ञा दे दिया । वह पड़ा-पड़ा सब हाल छुप-छुपकर देखता रहा कि यहाँ ये लोग क्या करते हैं । सो आधी रात बीतते ही तापसी अपने चेलों सहित नगर गया, वहाँ से बहुत धन चुराकर लाये, पास के कुवें में सब धन जमा किया, और पास की गुफा में रहने वाली उसकी स्त्री ने भोजन बनाकर खिलाया, यह सब दृश्य उस ब्राह्मण ने रात को देखा । बस अब था, सवेरा होते ही वह ब्राह्मण उस थानेदार के पास पहुंचा और सारा हाल कह सुनाया । थानेदार ने राजा को भी खबर कर दिया, आखिर वह तापसी चेलों सहित पकड़ा गया, सारा माल बरामद हुआ । चेलों को तो जेल करवा दिया और उस तापसी को फांसी का हुक्म दे दिया जिससे वह मरकर नरक गया । तो चोरी करना बड़ा पाप है । चोरी करने वाले लोग न इस भव में सुख से रह पाते और न वे परभव ही सुधार पाते, इस कारण सज्जन पुरुष चोरी के पाप का त्याग करते हैं । श्रावकजन कुशील का भी त्याग करते हैं । जिसके ब्रह्मचर्य नहीं उसका तन, मन, धन, वचन सब कुछ हीन हो जाता है और धर्म में चित्त नहीं रह पाता ।

कुशील पाप से कुशील यमदंड की दुर्दशा―कुशील पाप में एक कोतवाल प्रसिद्ध हुआ है । नासिक नगर में एक कनकरथ राजा रहता था, उसी नगर में एक कोतवाल था जिसका नाम था यमदंड । यमदंड की माता का नाम वसुंधरा था । वह वसुंधरा छोटी उमर में ही विधवा हो गई थी और वह व्यभिचारिणी भी अधिक हो गई । एक दिन यमदंड तो रात्रि में चौकसी करने चला गया, उधर वसुंधरा (कोतवाल की मां) अपने ही लड़के यमदंड की स्त्री से उसके सब गहने लेकर अपने यार को देने के लिए चली गई । जिस समय यार के बताये हुए ठिकाने पर वह जा रही थी उस समय यमदंड ने रात को ही देख लिया कि यह कोई स्त्री है जो कहीं जा रही है सो उसने उसका पीछा किया । दोनों ही एक दूसरे को न पहिचान सके । जब उस ठिकाने पर वह स्त्री पहुंची तो वहीं यमदंड भी पहुंच गया, उस वसुंधरा ने उसे समझा कि यह मेरा वही यार है और उस यमदंड कोतवाल ने समझा कि यह तो कोई व्यभिचारिणी स्त्री है । आखिर वसुंधरा के साथ उस कोतवाल ने व्यभिचार भी किया और वसुंधरा ने उसको सब गहने भी दे दिया पर दोनों एक दूसरे को पहचान न सके । घर आने पर कोतवाल ने वे गहने अपनी स्त्री को दे दिया, तो स्त्री ने पूछा कि मेरे ये गहने तो सासजी याने तुम्हारी माताजी हम से मांगकर ले गई थीं ये तुम्हारे हाथ कैसे लगे? तो यमदंड कोतवाल निरुत्तर रह गया और सब बात समझ गया । आखिर उसको वसुंधरा के साथ कामसेवन करने का चस्का लग गया । लुके छिपे वह रोज-रोज कामसेवन करता रहा । देखिये विषयवासना में पड़कर यह मनुष्य अंधा हो जाता है उसके लिए क्या माता, क्या बहिन, क्या पुत्री उसे कुछ सुध बुध नहीं रहती । अब उस कोतवाल की स्त्री को शंका तो उसी समय हो गई, बाद में भी स्त्रियों में कुछ उसकी चर्चा चली, यहाँ तक कि महाराजा कनकरथ के पास भी यह खबर पहुंची कि यमदंड कोतवाल अपनी माता के साथ व्यभिचार करता है । तो पहले तो उसे विश्वास न हुआ इस बात पर फिर भी उसका पक्का पता लगाने के लिए उसने सिपाहियों को भेजा । सिपाही रात्रि में इसकी खोज को निकले और यमदंड वाला सब समाचार राजा को स्पष्ट दिखा दिया । राजा ने उस पापी यमदंड को कठोर दंड दिया जिससे वह थोड़े ही दिनों में मरकर नरक गया । तो सारांश यह है कि चाहे कोई पुरुष हो अथवा स्त्री हो, जिस किसी को भी व्यभिचार का चस्का लग जाता है वह माता, बहिन, पुत्री आदि कुछ नहीं गिनता, सबके साथ पाप करने लगता है । जिस पाप के कारण इस भव में घोर दुःख उठाना पड़ता है और परभव में कुगति में जाना होता है । इस कारण शांति सुख चाहने वाले पुरुषों को ब्रह्मचर्य में दृढ़ रहना चाहिए और जो गृहस्थ श्रावकजन हैं उनको अपनी स्त्री और पति से ही संतोष रखना चाहिए । जो गृहस्थी में रहकर भी ब्रह्मचर्यव्रत का पालन करते हैं उनका मन प्रसन्न रहता है और आत्मतत्त्व को निरखकर अनेक बार अद्भुत आनंद का अनुभव करने का अवसर मिलता रहता है ।

परिग्रहपाप में तृष्णावृद्धि में प्रसिद्ध लुब्धदत्त का प्रारंभिक परिचय―आत्मा की रक्षा अपने आपके सहजस्वरूप के मनन में है । मैं वास्तव में क्या हूँ । दूसरे की मदद के बिना शरीर और कर्म के संबंध के बिना अपने आपकी सत्ता से मैं एक ज्ञाताद्रष्टा पदार्थ हूँ । सो इस ज्ञानानंद स्वभाव में अपनी आस्था रखना यह ही आत्मरक्षा का उपाय है । जितने भी धर्मपालन है वे सब इसही आत्मस्वरूप की स्मृति के लिए हैं । इस वास्तविक धर्मसाधन में बाधक है तो बाह्य विषय साधनों का संग, परिग्रह का लगाव । तब इस जीव को सिद्ध भगवान होने में ही कल्याण है, और वहाँ ही यह रहेगा अकेला केवल पुंज, ऐसी स्थिति पाने के लिए यहाँ भी केवल सहज आत्मस्वरूप की दृष्टि करनी होगी और इसके लिए जो बाधक हैं बाह्य परिग्रह उनका परित्याग करना होगा । गृहस्थावस्था में परिग्रह का परिमाण करना होगा । जिसके परिमाण नहीं है, परिग्रह की तृष्णा है उसका जीवन सारा कष्ट में व्यतीत होता है । परिग्रह पाप में एक लुब्धदत्त प्रसिद्ध हुआ है, बहुत पुरानी घटना है―अयोध्या नगरी में एक भवदत्त नाम का सेठ था, उसके लड़के का नाम था लुब्धदत्त । वह लोभी विशेष था । धन कमाने के लिए वह परदेश गया । धन तो कमाया बहुत मगर रास्ते में जहाज में आ रहा था कि वहाँ लुटेरों ने सारा धन छीन लिया और इसके पास कुछ भी न रहा । आया अपने गांव । जब कुछ भी न रहा, पूर्ण निर्धन हो गया तो जैसा चाहे काम करे । एक बार किसी के घर उसने छांछ पिया तो छांछ पीने के बाद जो उसने मूंछ पर हाथ फेरा तो कुछ मक्खन के कण हाथ में आ गए । उसने सोचा कि यह रोजगार अच्छा है । रोज-रोज 25-30 जनों के यहाँ छांछ पीने जायेंगे और मूंछ पर हाथ फेरकर जो घी जुड़ेगा उस घी को जोड़कर रखूँगा । जब कुछ पूँजी न रही तब बैठे-बैठे क्या करे? लोभ प्राकृतिक था । सो इस तरह से वह मक्खन को जोड़ने लगा । धीरे-धीरे उसका नाम भी स्मश्रुनवनीत याने मूंछ मक्खन पड़ गया । दो चार साल में ही उसके पास काफी मक्खन जुड़ गया । एक बड़े मिट्टी के घड़े में वह मक्खन अपने घर में झौंपड़ी में छीके पर टांगे रखता था । उसके नीचे आग जलती रहती थी ठंड से बचने के लिए ।

लुब्धदत्त की तृष्णा की बाढ़―एक दिन चारपाई पर लेटा हुआ था पड़े-पड़े उसे ख्याल आया कि मेरे पास तो अब काफी घी जुड़ गया है । इसको मैं कल बाजार में बेचूँगा और जो नफा आयगा उससे बकरी खरीदूँगा । फिर बकरी बेचकर गाय खरीदूँगा, फिर उसे बेचकर भैंस खरीदूँगा । फिर बैल खरीदूँगा, खेती खरीदूँगा, फिर महल बनवाऊँगा, फिर विवाह भी कर लूँगा, बच्चे होंगे । कोई बच्चा जब मुझे भोजन के लिए बुलाने आयगा कि चलो मां ने भोजन के लिए बुलाया है तो मैं कहूंगा कि मैं अभी नहीं जाता, फिर दुबारा कहेगा तो कहूंगा कि अभी नहीं जाता । और यदि तिबारा कहेगा यों लात मारकर कहूंगा कि अभी नहीं जाता लो उसकी वह लात सचमुच ही मानो मारने के लिए उठ गई और वह घी के उबले में लग गई । उबला छींकें से नीचे गिर गया, नीचे जलती हुई आग पर पड़ गया । आग पर घी का उबला गिरने से सारा घी जल गया, आग तेज बढ़ी, झौंपड़ी जलने लगी । अब तो वह स्मश्रुनवनीत (मूंछमक्खन) बहुत घबड़ाया और चिल्लाकर झौपड़ी से बाहर भग गया यह चिल्लाता हुआ कि अरे दौड़ो भाइयों मेरा मकान जल गया, मेरी गाय, बैल, भैंस, स्त्री, बच्चे तथा अन्य सब संपत्ति जल गई... उसकी इस प्रकार की आवाज सुनकर लोग जुड़े । सब आश्चर्य में पड़ गए कि यह क्या बक रहा है । अभी तो भीख मांगता था, आज इस तरह से बोल रहा । तो लोगों ने उससे कहा―अरे कहां तेरा कुछ जल गया? तेरे पास तो कुछ भी नहीं है । तो उसने अपनी सारी कथा सुनाया । तो वहाँ लोगों ने यही कहा कि तेरा कुछ जला तो नहीं । था ही कहां तेरे पास कुछ, वह तो तेरी एक कल्पना की बात थी । तो वहाँ मानों कोई विवेकी पुरुष बोला कि आप लोग भी तो यही कर रहे । आपका है कहीं कुछ नहीं केवल कल्पना से आप उन्हें अपना समझ रहे और उनके नष्ट होने पर दुःखी हो रहे ।

तत्त्वज्ञान से ही उद्धार की संभवता―अरे जरा स्वरूप दृष्टि से तो निहारो, सत्त्व सबका पृथक-पृथक है । एक का दूसरा कुछ हो ही नहीं सकता है ममत्व करना, लगाव रखना यह ही तो कष्ट दे रहा है । सो परिग्रह नाम बाह्य पदार्थ का ही नहीं है, वे तो एक सब आश्रयभूत हैं । पर परिग्रह नाम है मूर्छा का । ममत्त्व परिणाम करना । सो यह मूर्छा केवल धन की ही नहीं है धन की भी मूर्छा, यश की भी मूर्छा, नामवरी की भी मूर्छा और धर्म के नाम पर जो चाहता हूँ वही होता, इनका चाहा कुछ नहीं होता, इस प्रकार की बात चले तो उसके भी मूर्छा है । इस जीव को दुःख देने वाला है तो यह मूर्छा का परिणाम है । जिसके मूर्छा नहीं है उसके बाहरी पदार्थ रहते हुए भी परिग्रह नहीं है वैसे तो अंतरंग बहिरंग परिग्रह जब तक रागांश है कहां जायेंगे मगर ममत्व के हटते ही श्रद्धा में वह निष्परिग्रह हो गया । जगत में मेरा कहीं कुछ नहीं है, मेरा सर्वस्व मेरा स्वरूप है । रहता तो स्वरूप के साथ है, मरण करके जायगा तो साथ कौन जाएगा? कौन साथ रहेगा? मेरा स्वरूप, मेरा भाव, मेरी करनी, सो यदि मेरा भाव और करनी बिगड़ गई, ममता रूप हुई, दूसरों को सताने रूप हुई तो उससे जो पापकर्म का बंध होगा उसका फल कोई दूसरा न भोगेगा । खुद को ही भोगना पड़ता है । तो जिसको संतोष से रहना है धर्म साधना करके जीवन सफल करना है उनका कर्त्तव्य है कि वे अपने परिग्रह का परिमाण करले । मैं 10 लाख का करुंगा, 15 लाख का करुंगा, जो वर्तमान स्थिति है उससे दुगुना कर लिया पर परिमाण कर लेने से उस म्याद के बाहर तृष्णा न जगे, और जितना परिमाण किया उतना पूरा हो जाय और व्यापार करने में यदि अधिक लाभ हो जाय तो परिमाण से अधिक हुए धन को परोपकार में लगाये धर्म में लगायें, तो उसका यश भी है और धर्मपालन भी है । तो वास्तविक कर्त्तव्य है कि परिग्रह का परिमाण तो नियम से रखें और उसमें ही संतुष्ट रहें ।


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