• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • वर्णीजी-प्रवचन
  • Discussion
  • View source
  • View history

वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 69

From जैनकोष



मकराकरसरिदटवी-गिरिजनपदयोजनानि मर्यादा: ।

प्राहुर्दिशां दशानां, प्रतिसंहारे प्रसिद्धानि ।। 69 ।।

दिग्व्रत में आजीवन गमनागमनादि की सीमा लेने की विधि के कुछ उदाहरण―दसों दिशाओं की मर्यादा करने के लिए जो प्रसिद्ध चीज हो दूर पर उसका नाम लेकर मर्यादा बनती है, जैसे मैं अमुक समुद्र से बाहर न जाऊंगा, या समुद्र की इस सीमा का न उल्लंघन करुंगा, इस प्रकार की एक प्रतिज्ञा बनती है । दूसरे यदि कोई ऐसी सीमा करने लायक चीज न हो जिसका नाम ले सके तो वह योजन कोश दूर की मर्यादा लेकर भी कर सकता कि मैं हजार योजन से बाहर न जाऊँगा । ऐसी मर्यादा किए हुए क्षेत्र से बाहर गमनागमन न करुंगा । समुद्र आदिक लोक में विख्यात हैं इस कारण उनका नाम लेकर प्राय: दिशावों की मर्यादा किया है । दिशायें कोई वस्तु नहीं होतीं । पर हमारी कल्पना में है ना यह बात कि पूरब यह है, पश्चिम यह है, उत्तर यह है और दक्षिण यह है । जिधर सूर्य निकलता उधर मुख करके खड़े हों तो पूरब की और मुख है । पीठ पीछे पश्चिम है, दाहिने हाथ की ओर दक्षिण है और बायें हाथ की ओर उत्तर है । जैसे जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, काल पदार्थ हैं ऐसा कोई दिशा पदार्थ नहीं होता । अन्य दार्शनिकों ने तो दिशा को पदार्थ माना है पर उस ओर के जो आकाश प्रदेश है उन्हीं में हम दिशावों की कल्पना करते हैं । सो उस आधार पर यह बात तो आ गई कि पूरब में यहाँ तक जाना, पश्चिम में यहाँ तक जाना, उत्तर में यहाँ तक जाना और दक्षिण में यहाँ तक जाना, और इतना ही नहीं, ऊपर नीचे के क्षेत्रों में भी मर्यादा चलती है । पर्वत पर कितना ऊपर चढ़ना, नीचे कहां तक जाना, जैसे कुवां बावड़ी आदि किसी जगह उतरे बाहर में गमन न करना दिग्व्रत है । दसों दिशाओं की जो मर्यादा कर लेता है और उससे बाहर अपना व्यापार संबंध नहीं रखता उसके क्या परिणाम रहते हैं और क्या फल प्राप्त होता है यह बात बतलाते हैं ।


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=वर्णीजी-प्रवचन:रत्नकरंड_श्रावकाचार_-_श्लोक_69&oldid=85237"
Categories:
  • रत्नकरंड श्रावकाचार
  • प्रवचन
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 2 July 2021, at 16:35.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki