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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 86

From जैनकोष



यदनिष्टं तद् व्रतये-द्यच्चानुपसेव्यमेतदपि जह्यात् ।

अभिसंधिकृता विरतिर्विषयाद्योग्याद्व्रतं भवति ।। 86 ।।

आजीवन त्यागने योग्य अभक्ष्य पदार्थ―कौन-कौन से पदार्थ अभक्ष्य हैं जिनका यावज्जीव त्याग करना चाहिए? उनमें से (1) प्रथम है त्रसघात । जिन पदार्थों के सेवन करने से त्रस जीवों का घात हो वे पदार्थ सदा के लिए त्याग करना चाहिए । जिन्होंने जिनेंद्र भगवान के चरणों का शरण लिया है, आत्मा की उन्नति की अभिलाषा है ऐसे पुरुषों को त्रसहिंसा के त्याग के वास्ते मद्य, मांस, मधु का सर्वथा त्याग करना चाहिए । मद्य में हिंसा है और बेहोशी भी है । जों मद्यपायी हैं उनका चित्त ठिकाने नहीं रहता । इन तीन श्लोकों में 4 बातें तो स्पष्ट कही गई हैं । त्रसघात, बहुघात, अनिष्ट और अनुपसेव्य । किंतु अभक्ष्य होते हैं 5 प्रकार के, एक प्रमादकारक और है, सो जहाँ मद्य का वर्णन किया उस उपलक्षण से प्रमादकारक अनेक चीजों का ग्रहण कर लेना चाहिए । कोई अधिक बेहोशी लाने वाला पदार्थ है, कोई थोड़ा है, जैसे मद्य से थोड़ा कम बेहोशी लाने वाले पदार्थ होंगे । भंग, गांजा, चरस, अफीम वगैरह । उनसे कम तंबाकू होगी, उससे कम चाय वगैरह में होगी । अब इनमें कितना कम और कितना अधिक नशा है इसका हमें सही पता नहीं आप लोग खुद समझते होंगे ।

त्रसघात अभक्ष्य―मांस―इसके विषय में सबको भली प्रकार श्रद्धा है कि यह अभक्ष्य, देखने में भी बुरा लगता है, छूने में भी डर लगता है, निरंतर उसमें जीव पैदा होते रहते हैं । कच्चा हो मांस तो, पक्का हो तो ऐसी त्रसघात वाली चीज तो जीवनपर्यंत त्याग ही देना चाहिए । उसमें परिमाण नहीं होता । तीसरा है मधु । मधु भी अभक्ष्य है, उसमें भी निरंतर जीव पैदा होते रहते हैं । कोई कहे कि हम बक्स में मधु तैयार करेंगे, मक्षी पाल लेंगे, तो कुछ भी करें पर मधु स्वयं त्रस जीवों के घात का स्थान है । आखिर कय, (उगाल) ही तो है । जैसे किसी मनुष्य को कय हो जाय तो उसमें जीवजंतुवों की उत्पत्ति हो जाती ऐसे ही यह मधु मक्खियों की कय है । इसमें निरंतर जीव उत्पन्न होते, और इसके अतिरिक्त मधु छत्ता को निचोड़ने में मधुमक्खी के बच्चे ही कितने मर जाते हैं । यह भी सर्वथा त्यागने योग्य है, ये तो कहलाये त्रस घात । ये सबसे कठिन अभक्ष्य हैं, इनका प्रयोग करने वाले तो जैन नहीं कहला सकते ।

बहुघात अभक्ष्य―दूसरा अभक्ष्य है बहुघात याने जिन फलों में अनंत निगोद जीव बस रहे हैं, एक फल के खाने से अनंत एकेंद्रिय जीवों का घात होवे, वह बहुघात अभक्ष्य कहलाता । जैसे कंदमूल, अदरख, शृंगबेल, मक्खन, फूल, केतकी, केवड़ा आदिक, ये सब बहुघात में शामिल हैं । इनके सेवन का फल तो थोड़ा है, जरा देर का स्वाद ले लिया कुछ मौज माना, पर क्या है―घाटी नीचे माटी । कौर पेट में चला जाने के बाद फिर उसका स्वाद रखा है क्या? तो जितनी देर जीभ पर वस्तु है उतनी देर को स्वाद आया, इतना तो फल है जैसा कि लौकिकजन मानते हैं । और विघात कितना है? बाल का जो अग्रभाग है याने सूई की नोक बराबर जगह में अनंत निगोद जीव बसे हैं उन फलों में बहुघात वाले फल हैं । तो घात कितना एकेंद्रिय का हुआ? यद्यपि वहाँ मांस का दोष तो नहीं आया, क्योंकि एकेंद्रिय जीवों में मांस नहीं होता । पर अनंत एकेंद्रिय का तो घात हुआ । तो जीवों की उत्पत्ति योनि स्थान आदि का ज्ञान रखने वाला श्रावक है । वह ऐसी वस्तुवों का भक्षण न करेगा जिसमें बहुत से एकेंद्रिय का भी घात हो ।

अनिष्ट अभक्ष्य―चौथा अभक्ष्य है अनिष्ट । जो पदार्थ है तो भक्ष्य, बल्कि अठपहरे घी का बनाया हो, मर्यादा का हो, ऐसे कोई भी पकवान या मावा के पेड़े आदिक हैं तो शुद्ध मगर किसी को तेज बुखार हो तो वे उसके लिए अभक्ष्य हैं, याने उन्हें न खाना चाहिए । उस काल में ऐसे पदार्थ भी अभक्ष्य कहलाते हैं, और क्यों अभक्ष्य हैं कोई पूछे तो उसका उत्तर है कि रोग बढ़ेगा । तो बढ़ेगा रोग पर उससे पदार्थ अभक्ष्य कैसे हो गया? तो पदार्थ अभक्ष्य यों हो गया कि ऐसा रोग बढ़े में इस तरह की चीज न खाना चाहिए । वैद्य लोग मना करते हैं और फिर भी यह खाता है तो आसक्ति अधिक कहलायी, इतनी बात तो माननी ही पड़ेगी । और जहाँ आसक्ति अधिक है, राग अधिक है वहाँ पाप का बंध है इस कारण अनिष्ट वस्तु भक्ष्य नहीं होती । कितने ही लोग जैसे बुखार में पड़े हैं और लोग मना करते हैं कि भाई उड़द की दाल के बड़े या मंगौड़ी पकौड़ी न खाना चाहिए, और रोगी की खाट जहाँ बिछी है मान लो वहाँ हो पास में ही रसोईघर और वहाँ वे सब चीजें धरी हों तो वह रोगी सब से आँख बचाकर चोरी से उठाकर खाता है, क्योंकि वह अनिष्ट चीज है । उसे सबके सामने खाने में कुछ चित्त नहीं चाहता कि लोग क्या कहेंगे । यह बड़ा हठी है, ऐसी अनिष्ट चीज खाता है, तो चोरी से खा लेता है । तो इन सब बातों से आप जानें कि भले ही वे भक्ष्य पदार्थ हैं शुद्ध ही मगर जिसको वे अनिष्ट हैं उसके लिए अभक्ष्य है ।

अनुपसेव्य अभक्ष्य―5वां अभक्ष है अनुपसेव्य । जो चीज भले ही ठीक हो, हिंसा भी न हो मगर भले पुरुष के द्वारा सेवन करने योग्य न हो तो उसे खाये तो वह अनुपसेव्य का भक्षण कहलाया । जैसे मूत्र, लार । जैसे मुख से लार निकली और जरा सी नीचे आयी और उसी को पोंछकर चाट ली । चाटता नहीं है कोई, कोई कहे कि लार में क्या दोष है? न त्रस जीवों की हिंसा है न बहुत से एकेंद्रिय की हिंसा है । भले ही देर तक तत्काल गिरी उसमें क्या दोष है? अरे भाई अनुपसेव्य है । यों तो गधी का दूध भी है, उसके पी लेने में क्या दोष है? इसमें कौनसा दोष लग गया? त्रस जीवों का घात हुआ कि एकेंद्रिय का घात हुआ? मगर अनुपसेव्य है । हाथी के दांत से छुई हुई चीज । शंख से, बाल से छुई हुई चीज भोजन के लिए छूने योग्य नहीं है, ऐसे ही मूत्र, मल, कफ उच्छिष्ट भोजन ये सेवने योग्य नहीं है । अब जूठा भोजन किसे कहेंगे? जो दूसरा न खा सके । एक थाली में अब तो सब लोग खाने लगे और उसी में हर एक चीज उठा उठाकर खाते हैं कई-कई लोग, फिर भी वहाँ इतना विवेक करना चाहिए कि जो चीज ऐसी है कि जिसको खाया जाय और मुख में अंगुली पहुंचे और उसका कुछ हिस्सा उठाने से भोजन में लग जाय वह तो नियम से अन्य के खाने योग्य नहीं है । भले ही कुछ चीजें साफ सुथरी अलग-अलग धरी हैं उनमें से उठाकर खा लिया, थाल एक है तो नहीं है उच्छिष्ट मगर जिसमें मुख से, लार से, किसी चीज का जरा भी संबंध हो जाय वह चीज न खाना चाहिए, और चम्मच से खाने की पद्धति जो आजकल चली वह तो बिल्कुल ठीक नहीं । चम्मच से खाने में एक तो चम्मच मुख के अंदर गया, उसका संबंध लार से हुआ, व चम्मच में भी कुछ अंश जूठे का चिपका रहा, सो खिचड़ी या चावल दाल जो भी खा रहे उसके अंदर वह चम्मच गई तो वह तो बिल्कुल अशुद्ध हो गया, फिर भी लोग एक थाली में बैठकर चम्मचों से खाते रहते, पता नहीं उन्हें खाते हुए में ग्लानि क्यों नहीं आती । अच्छा आप अगर कहें कि अंगुली में भी ऐसा ही होता है तो अंगुलियों से जो उच्छिष्ट होता है वह एक अपना अंग है हाथ का अवयव है । और अशक्य है हाथ का अलग करना । यह भी तो विचारा जाता है कि शक्यानुष्ठान और अशक्यानुष्ठान । वे तो विरुद्ध चीजें है । उसे तो बचाया जा सकता है, पर यह हाथ का अंग है, इसे नहीं बचाया जा सकता फिर भी जैसा जो करता हो ठीक है पर है वह उच्छिष्ट । और ऐसा उच्छिष्ट स्वयं का स्वयं के लिए तो वर्जनीय नहीं हो पाता है, मगर दूसरों के लिए वह त्याज्य है यह बात मुख्य लेना है ।

किसी के छूने से भी अनुपसेव्य हो जाता है आपके टिफिन बाक्स से या भोजन से कोई अस्पृश्य का, चांडाल का हाथ लग गया, अब आप यह बतलावो कि उसमें त्रसघात हो गया क्या, या एकेंद्रिय का घात हो गया क्या? यहाँ घात की बात नहीं है । पर वह अनुपसेव्य हो गया । भले पुरुष के सेवने योग्य नहीं रहा । इसी अनुपसेव्य के आधार पर यह छुवाछूत बढ़ी, उस भोजन में । अब आप देखिये―यदि महिला का कोई धोती का छोर किवाड़ से लग गया तो झट भोजन त्याग देते, ऐसे भी कोई तेज व्रती पड़ें हैं । भला बताओ उसमें अभक्ष्य की कौनसी बात आयी? अभक्ष्य तो 5 तरह के हैं, उन्हें 5 में की बात बोलना चाहिए तब तो कहा जा सकता कि हां भक्षण करने योग्य वह भोजन नहीं, मगर वह अनुपसेव्य कैसे? तो ऐसा अनुपसेव्य माना जाता कि कोई ऐसा आदमी छू ले या किसी बाहरी वस्तु का संयोग हो जाय तो वह अनुपसेव्य होता है । कोई बहुत बढ़-बढ़कर अनुपसेव्य की संज्ञा दे देना यह बात न निभेगी । जो उचित है वह निभना चाहिए, एक होता है अनुपसेव्य । जैसे कुत्ता बिल्ली आदिक से छू गया या किसी मांसभक्षी ने बनाया, शराब पीने वाले ने बनाया, ऐसा भोजन यह लोकनिंद्य है और यह अनुपसेव्य कहलाता है । तो ये 5 प्रकार के अभक्ष्य हैं जिनका सेवन न करना चाहिए और इसके पालन के लिए कुछ और भी विवेक करना होगा ।

अभक्ष्य से बचने के लिए कुछ विवेकपूर्ण कार्य―अन्न आदिक घर में थोड़े रखना । बहुत अगर रखा कि भाई साल भर को इकट्ठे रख लिए जायें और उसकी सावधानी न रख सके, उसमें घुन लग जाय तो फिर उसे आप क्या करेंगे? दूसरों को दे देंगे या कहीं फेंक देंगे । सो थोड़े से ले आये, जब निपट गए तो दुबारा ले आये, माह दो माह का रख लिया, फिर ले आये । इस प्रकार से तो उसका चल जायगा, और अगर विवेकपूर्वक कोई सालभर भी रखे तो उसमें नीम की पत्तियां डालकर या कोई पाउडर डालकर या पारा मिली मिट्टी डालकर इस तरह से भी कोई सालभर गेहूं रख सकता, फिर भी कम से कम रखे तो वह अभक्ष्य त्याग का पालन कर सकता है । भोजन की जो मर्यादा बतायी गई है उस मर्यादा में उसे खा लेना चाहिए, उससे बाहर न खाना चाहिए । जैसे रोटी, दाल, साग, खिचड़ी वगैरह की जो म्याद बतायी गई उससे बाहर न खाना चाहिए । बासी खाना खाने का निषेध है । बासी खाने में स्वाद का भी अंतर पड़ जाता है । अभक्ष्य की निशानी यह है कि जो असली स्वाद होना चाहिए वह बिगड़ जाता है । ऐसा रस चलित पदार्थ न खाना चाहिए । जैसे सबकी म्याद बतायी गई है, रोटी, पूड़ी, पराठा इनकी म्याद एक दिन की है । कड़ाही में पकी हुई चीज जैसे बूंदी वगैरह जिन में पानी तो नहीं रहता मगर पानी पड़ा था बनते समय वह चीज तो दूसरे दिन भी खायी जा सकती है और जिसमें पानी बनाते समय भी नहीं डाला जाता बेसन के लड्डू वगैरह वे उतने दिन खाये जा सकते जितनी कि बेसन की म्याद है ऐसी अनेक म्याद हैं जिन्हें आप सब लोग करीब-करीब जानते ही हैं । म्याद के अंदर भोजन करना, उससे बाहर न लेना । अगर उससे बाहर लेवे तो कई चीजें तो अनुपसेव्य हो जाती हैं और कई चीजों में तो त्रसघात का भी दोष होता है, ऐसे ही भोगोपभोग का परिमाण करना ये सब भोगोपभोग परिमाण व्रत है ।


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