• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in
Shivir Banner

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • वर्णीजी-प्रवचन
  • Discussion
  • View source
  • View history

वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 88

From जैनकोष



भोजन-वाहन-शयन-स्तन-पवित्रांगरागकुसुमेषु ।

तांबूलवसनभूषण-मन्मथसंगीत-गीतेषु ।। 88 ।।

भोगोपभोग परिमाण नामक व्रत में रोज ही नियम किया जाता है―यम रूप तो है ही पर नियम भी किया जाता है तो वे किन विषयों के नियम होते हैं उनको उदाहरण रूप में बतलाते हैं । (1) भोजन आज इतनी बार करुंगा, इतने अन्न, इतने रस लूँगा । इतनी चीजें खाऊंगा, इस प्रकार भोजन की सीमा में नियम होता है । (2) वाहन मैं आज इतनी सवारियों का उपयोग करुंगा । हाथी, घोड़ा, ऊँट, बैलगाड़ी, नाव, जहाज आदिक जिनमें बैठकर गमन हो वे सब वाहन हैं कोई पालकी में चले वह भी एक वाहन है । इन वाहनों का नियम करना कि आज मैं इतने वाहनों का उपयोग करुंगा और उससे अधिक का उपयोग न करुंगा । यों काल की मर्यादा लेकर ऐसा वाहन का नियम किया जाता है । (3) तीसरा है शयन नियम । पलंग, खाट आदि शैया का नियम करना । आज मैं पलंग पर शयन करुंगा, या तखत पर शयन करुंगा या भूमि पर शयन करुंगा ऐसे नियम को शयन का नियम कहते है । (4) स्नान―आज मैं एक बार स्नान करुंगा या स्नान न करुंगा, जिस दिन उपवास किया उस दिन स्नान नहीं किया जाता, या अन्य किसी स्थिति में स्नान के बार का नियम रखना यह स्नान का नियम है । (5) पांचवां है पवित्रांगराग याने अंग में चंदन, कपूर आदिक का लेप करना मैं एक बार लेप करुंगा, इससे आगे न करुंगा आदि प्रकार से नियम लेना पवित्रांगराग नियम है । (6) एक है कुसुम का नियम―माला पहिनना या अन्य आभरण आदिक धारण करना यह कुसुम संबंधित नियम हैं । (7) एक नियम है तांबूल―इसमें पान खाने का नियम लिया जाता है कि आज मैं इतनी बार पान खाऊंगा । यहाँ यह बात जानना कि व्रती श्रावक पान का नियम ले-ले तो इसके मायने हैं कि पान स्वरूप से अभक्ष्य नहीं है । अरे पान तो स्वरूप से ही अभक्ष्य है । इसके अतिरिक्त इलायची लौंग आदिक जो खाने की चीजें नहीं हैं, केवल एक मुख सुधारने की, स्वाद लेने की है उन सबका इसमें नियम होता है । (8) एक होता है वसन अर्थात् वस्त्र का नियम, मैं इससे अधिक वस्त्र न पहनूँगा, ऐसा दिन का नियम लेकर करता है । (1) एक होता है आभूषण का नियम―मैं आज इतने से अधिक आभूषण न पहनूँगा, इस प्रकार के नियम कर लेना आभूषण नियम है । (10) एक होता है मन्मथ नियम―याने आज, मैं काम सेवन नहीं करुंगा इस प्रकार का नियम लेना मन्मथ नियम है । (11) एक होता है संगीत नियम―आज मैं न तो संगीत सुनाऊंगा और न खुद सुनूँगा या एक बार सुनूँगा आदि प्रकार से नियम लेना संगीत नियम है । (12) एक होता है गीतनियम―आज मैं इतनी देर गीत सुनूँगा इससे अधिक नहीं इस प्रकार का नियम लेना गीत नियम है ।


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=वर्णीजी-प्रवचन:रत्नकरंड_श्रावकाचार_-_श्लोक_88&oldid=85258"
Categories:
  • रत्नकरंड श्रावकाचार
  • प्रवचन
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 2 July 2021, at 16:35.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki