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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 96

From जैनकोष



प्रेषण-शब्दा-नयने, रूपाभिव्यक्ति-पुद्गलक्षेपौ ।

देशावकाशिकस्य व्यपदिश्यनोऽत्ययाऽपंच ।। 96 ।।

देशावकाशिक व्रत के पंच अतिचारों की हेयता―इस छंद में देशावकाशिक व्रत के अतिचार बताये गए हैं । जो देशव्रत की मर्यादा की उसके बाहर तो समग्र 5 पापों का त्याग होने से वहाँ वह महाव्रत के समान हुआ, पर देशावकाशिक व्रत लेकर कौन से कार्य करना चाहिए उनका वर्णन यहाँ चल रहा है । निरतिचार देशावकाशिक व्रत हो तो महाव्रत के तुल्य है । (1) पहला अतिचार है प्रेषण । जितने क्षेत्र में मर्यादा की हो उससे बाहर किसी प्रयोजन से अपने सेवक को मित्र पुत्र आदिक को कहना कि तुम वहाँ चले जाओ कोई काम कराने के लिए कहना यह है प्रेषण अतिचार । काल की मर्यादा और कम रख ले जिसमें अतिचार न लग सके मगर जितनी मर्यादा रखकर देशावकाशिक व्रत लिया है वहाँ तो निर्दोष इस व्रत का पालन होना चाहिए । (2) दूसरा अतिचार है शब्द । मर्यादा से बाहर क्षेत्र में ठहरे हुए लोगो से वचनालाप करना तथा अन्य शब्द की समस्या करके समझ लेना यह शब्द नाम का अतिचार है । जा तो नहीं रहे हैं बाहर मगर शब्द बोल रहे हैं या कोई संकेत कर रहे हैं तो यह दोष है । (3) तीसरा दोष है आनयन । मर्यादा से बाहर क्षेत्र में ही रहने का नियम ले लिया, अब कुछ जरूरत समझा तो कह दिया―जरा पतला चद्दर ले आना । मोटा चद्दर पहिनकर पूजा करने में कुछ परेशानी सी चल रही थी सो किसी से हल्की चद्दर मंगा लेना, मगर मंगाना म्याद रखे हुए क्षेत्र से बाहर से तो वह देशावकाशिक व्रत का अतिचार है । जिस काल में मर्यादा रखी हो उसके बाहर के क्षेत्र के प्रति विकल्प ही न चलेगा । (4) चौथा अतिचार है रूपाभिव्यक्ति । जितनी मर्यादा रख ली उससे बाहर तो नहीं जा रहा मगर उससे बाहर में ठहरने वाले खड़े हुए लोगों से अपने रूप का प्रदर्शन करना, किसी काम कराने के वास्ते या उसका ध्यान न जाये उस ओर तो ताली बजाकर या खकार कर उसका लक्ष्य अपनी ओर कराना और फिर संकेत से समझाना, यह काम कर आवो यह दोष है क्योंकि उसने क्षेत्र की मर्यादा रख लिया था, कि इससे बाहर मेरा विकल्प न होगा । मर्यादा तो रखा था कि स्वानुभव के लिए मैं अधिक समय लगाऊंगा पर वह विकल्प करता है तो वह अतिचार है । (5) पांचवां अतिचार है पुद्गलक्षेप―कोई मर्यादा से बाहर खड़ा है, उसका मुख दूसरी और को है, अब उससे कुछ काम है बोलने का, काम है बताने का तो उसको थोड़ासा कंकड़ मार दिया ताकि मुँह घुमाकर देखने लगेगा कि किसने मारा, बस उसे संकेत से बुला लेना, फिर चाहे अपने ही क्षेत्र में जो मर्यादा किया हो उसके अंदर बात करे तो वह भी अतिचार है । इस प्रकार देशावकाशिक व्रत के 5 अतिचार है । अब शिक्षाव्रत के द्वितीय भेद का स्वरूप कहते है ।


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  • रत्नकरंड श्रावकाचार
  • प्रवचन
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