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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 1

From जैनकोष



णमिऊण वड्ढमाणं परमघाणं जिणं तिसुद्धेण।

वोच्छामि रयणसारं सायारणयारधम्मीणं।।1।।

   ग्रंथ में वक्तव्य―वर्द्धमान परमात्मा को नमस्कार करके, जिनेंद्र परमात्मा को नमस्कार करके मन वचन काय की शुद्धि से अब सागार और अनागार धर्मियों का रयणसार कहता हूँ। सागार धर्म और अनागार धर्म मायने प्रयोग करने वाले व्यक्त पुरुषों की बाह्य चर्या। जिस पुरुष ने अपने अंतस्तत्त्व का निर्णय किया है और जाना है कि यह है मेरा शरण, इसका आश्रय ही मोक्ष का मार्ग है, ऐसा जिसने निर्णय किया वह पुरुष इस अंतस्तत्त्व की धुन में अपने आपकी चर्या में बढ़ता है तो ऐसे दो तरह के योग हैं। एक तो घर बसाने वाले और दूसरे गृह त्याग करने वाले। तो उनका प्रयोग चर्या क्या होना चाहिए जो अध्यात्म साधना में सहायक बने या विरोधक न करने उस चर्चा का इस में वर्णन होगा।
   आंतरिक तत्त्व निर्णय के साधनभूत नयविभाग में व्यवहार की उपयोगिता―देखिये इस मुमुक्षु ने तत्त्व निर्णय किस ढंग से किया। जानने के उपाय नय और प्रमाण है, यह ही नय जब परस्पर सापेक्ष विधि से बोला जाता है सो प्रमाण का रूप रख लेता है तब नयों की बात समझना चाहिए। अध्यात्मत्त्व को जानने के लिए उपाय आपको इन नयों में प्राप्त होगा। शुद्धनय, परमशुद्ध निश्चयनय, शुद्ध निश्चयनय, अशुद्ध निश्चयनय व व्यवहारनय उपचार नय नहीं है, वह तो लोक रूढ़ि हैं। यह जीव प्रथम व्यवहार नय से ही समझ पाता है। वस्तु तो अखंड अवक्तव्य है। जो है सो है उसको समझने का उपाय व्यवहारनय है। उस अखंड वस्तु को उसके गुण पर्याय भेद बात कर हम उसको समझते हैं। यहाँ एक बात जान लें कि पदार्थ जितने होते हैं। वे द्रव्य पर्यायात्मक होते हैं मायने बने रहें ऐसा तत्त्व और बने बिगड़े ऐसा तत्त्व बनना बिगड़ना यह तो है पर्याय, लेकिन बना रहना यह है उसका द्रव्यपना। तो द्रव्य जैसे अखंड है, जो है सो है पूर्णसत्, इसी प्रकार प्रतिक्षण जो भी परिणम है वह उसी क्षण में अखंड है। तो जैसे हम व्यवहार नय से द्रव्य को समझने के लिए गुण भेद करते हैं, व्यवहार नय से भेद तो किया गया मगर आर्षपरंपरा से सही-सही सत्य विधि से हुआ है याने इन भेदों के द्वारा हमने वस्तु स्वरूप को पहिचाना है। अब मैं इनमें लिप्त नहीं हूँ, इस कारण ये गुण भेद बहुत आवश्यक है ज्ञातव्य। जैसे बताया ववहारेणुवदिस्सइ णाणिस्स चरित्तं दंसणं णाणं वध प्रत्यय के कारण भेद की बात मलिनता की बात तो दूर रहो पर इसमें दर्शन है, ज्ञान है, चारित्र है आनंद है। यह भी भेद प्रतिपादक व्यवहार नय से कहा गया है। जानने का यही उपाय है, तो व्यवहार नय से हम क्या-क्या समझ पाते हैं―गुण के भेद, पर्याय के भेद, एक दूसरे पदार्थ का संबंध ये सब विषय व्यवहार नय से चलते हैं और उनके समझने पर व्यवहार नय के विषय को समझने से हम फायदा भी उठाते हैं आगे बढ़ने के लिए।
   निमित्तनैमित्तिक के परिचय की वस्तुस्वातंत्र्य के परिचय की उपयोगिता―व्यवहारनय के विषय में एक बहुत ज्ञातव्य बात निमित्त नैमित्तिक योग की है। बात क्या गुजरती है कि अनुकूल निमित्त के सन्निधान में योग उपादान अपनी कला से अपनी परिणति से अपने में विकार भार की सृष्टि करता है। इतनी बात में हमको कितनी प्रेरणा मिली है स्वभाव का परिचय करने के लिए? ये जो विकारभाव हैं, क्रोधादिक विषय है, ये परभाव हैं, ये आत्मा के स्वभाव नहीं हैं ये अनुकूल निमित्त सन्निधान में हुए हैं इसलिए ये निरपेक्ष भाव नहीं, आत्मा के स्वभाव भाव नहीं, याने आत्मा ही इन विकारों का ही निमित्त हो जैसे कि आत्मा ही उपादान है, ऐसा भाव नहीं, इनमें क्यों रमूँ, इनसे मैं अलग हटूँ, आगे बढूं उपादान ने अपनी परिणति से यह परिणमन किया है। इसके परिचय में हमको यह उमग मिलती है कि इसको करने वाला दूसरा पदार्थ नहीं। कर्म ने नहीं किया यह परिणमन। यदि दूसरा मेरे विकार परिणाम को करे याने मैं विकार रूप न परिणमूँ और दूसरा ही किया करे तब तो बड़ी विवशता हो जायगी, दूसरा करेगा, हम क्या कर पायेंगे? दूसरा वैसे गम खाये कि मैं विकार न करूं। तो यहाँ जानना वस्तु स्वरूप, दूसरे ने परिणमन नहीं किया। साथ ही जानना निमित्त नैमित्तिक योग याने विकार आत्मा में स्वभाव से नहीं जगा विकार आत्मा का स्वभाव नहीं, यह दृढ़ता तो --दिखायी निमित्त नैमित्तिक योग के परिचय ने और उस विकार को किसी दूसरे ने नहीं किया, सो यह कायरता छुटायी वस्तु स्वातंत्रय के परिचय ने।
   अशुद्धनिश्चय के विषय के परिचय की उपयोगिता―व्यवहार नय सब ओर की बात एकदम सामने सब बताता है। इससे बात कुछ पायी, पर इसमें दो द्रव्यों का संबंध, दो पर दृष्टि, द्वै दृष्टि से यह बात बनी। अब उमंग कीजिए एक दृष्टि की। एक पर दृष्टि देना निश्चयनय कहलाया। अच्छा एक पर दृष्टि दो अशुद्ध निश्चय पर आइये। अशुद्ध निश्चय का विषय है एक को ही तो देखना मगर अशुद्ध पर्याय परिणत देखना। जीव में राग है जीव रागी है, जीव की परिणति से राग हुआ है, बस जीवराग, एक ही द्रव्य दिख रहा, अशुद्ध परिणाम दिख रहा, उसी में कर्ता कर्मादिक कारकों का संबंध दिख रहा, दूसरे पर दृष्टि नहीं है। अच्छा तो ऐसा अशुद्ध निश्चय नय का प्रयोग बनाने में हम पर क्या प्रभाव पड़ा। प्रभाव यो पड़ा कि इस अशुद्ध निश्चयनय में यह नियंत्रण है कि हम एक को देखें दूसरे को देखें ही मत। न विधि रूप में देखें दूसरे को, न निषेध रूप में देखें दूसरे को। जीव रागी है, जीव का राग परिणाम है, बस यह ही यह निरखे, दूसरे पर दृष्टि न दें, नहीं तो निश्चयनय के मूड से बाहर बन जायगा। इस जीव का राग कर्म ने नहीं किया इतना भी मत बोलें निषेध रूप से भी दूसरे का नाम न लें। इस जीव का राग कर्म ने किया यह भी मत बोलें, वह तो मिथ्या ही है। तो इस में नियंत्रण है कि एक द्रव्य को देखना, एक पर ही दृष्टि होना, परिणाम यह निकलता है कि जब आश्रयभूत पदार्थ पर भी दृष्टि नहीं निमित्तभूत पदार्थ पर भी दृष्टि नहीं, तो रागद्वेष ये पर को आश्रय बनाये बिना, पर को जाने बिना जिंदा नहीं रह पाते। इनकी परंपरा नहीं चल पाती। यह जब किसी दूसरे को देखे ही नहीं तो ऐसा अवसर मिलता है कि वह राग शांत होता है और चूँकि यह आत्मा स्वभाव रूप ही तो है सो यह पर शुद्ध निश्चयनय का पात्र बन जाता है।
   शुद्धनिश्चयनय के विषय के परिचय की उपयोगिता―अच्छा यह तो अशुद्ध परिणति का प्रयोग बना। शुद्ध परिणाम के प्रयोग से देखो, शुद्ध निश्चयनय इसका विषय है एक को ही देखना, मगर शुद्ध पर्याय देखना, दूसरे को न देखना, जीव केवल ज्ञानी है, जीव में केवल ज्ञान हुआ, जीव से हुआ, जीव में तन्मय, सब कुछ देखते जावो, दूसरे का नाम न लेना। यह केवल ज्ञान ज्ञानावरण के क्षय से हुआ, यह दृष्टि नहीं देना है नहीं तो शुद्ध निश्चयनय के मूड से पृथक् हो गए। तब क्या दिखता कि यह जीव केवल ज्ञानी है, जीव के केवलज्ञान है। अच्छा ऐसा देखने का नतीजा क्या निकलेगा वही नतीजा यहाँ भी निकलेगा जो अशुद्ध निश्चयनय में निकला था, पर दोनों में एक फर्क है। अशुद्ध निश्चयनय के प्रयोग में उस नतीजे पर देर में न आया था। कुछ दुर्गम था, पर इस शुद्ध निश्चयनय के प्रयोग में परम शुद्ध निश्चयनय के विषयभूत सहज ज्ञान भाव को सुगमतया पा लेता है तो उसमें मददगार कौन बना? शुद्ध पर्याय की दृष्टि है ना और वह पर्याय स्वभाव के समान है तो इस समानता के कारण स्वभाव के समान है तो इस समानता के कारण स्वभाव की ओर पहुँचने में कुछ और सुगमता हुई।
   परमशुद्ध निश्चयनय के विषय के परिचय की उपयोगिता―अब यह जिज्ञासु स्वभाव दर्शन सीधा (Indirect) ही करने चला इसे कहते हैं परम शुद्ध निश्चयनय। स्वभाव को निरखिये जीव चैतन्य स्वभावी है, जीव का चैतन्य स्वभाव भाव है दूसरी बात नहीं देखी जा रही है। न संबंध, न प्रवृत्ति, है सब, रहे आये, जैसे है, एक भींट को देख रहे हैं सामने वाली भींट को तो पीछे की भींट नहीं है ऐसा तो नहीं है, है, रहो पर देख रहे हम केवल उसी भींट को, अगर पीछे वाली भींट का निषेध करके हम सामने वाली भींट की बात कहें तो वह अटपट बात बनेगी। दूसरी भींट प्रतीति में है, मगर प्रयोजनवश हम सामने वाली ही भींट को देख रहे। ऐसे ही प्रयोजनवश निश्चयनय में जिस निश्चयनय का जो विषय है वही देखा जा रहा है।
   शुद्धनय की उपयोगिता―अच्छा परमशुद्ध निश्चयनय तक अभी अखंडता नहीं आ सकी, थोड़ा स्वभाव का भेद विकल्प चला तो उसके प्रताप से जो समझा उसी को ही जब संकल्प विकल्प जाल से रहित हो कर निरखेंगे तो शुद्धनय का आलंबन करेंगे। यह शुद्धनय अनुभूति के निकट का साधन है, जिसके विषय में बताया गया कि शुद्धनय आत्मस्वभाव को प्रकट करता है, तो परभाव से भिन्न है, रागादिक भावों से जुदा है वह है औपाधिक, यह है निरुपाधि स्वभाव। इतने पर भी यह मति श्रुत आदिक रूप नहीं। वह है अपूर्ण और यह स्वभाव है परिपूर्ण। इतने पर भी केवल ज्ञान रूप नहीं। परिपूर्ण होने पर भी केवलज्ञान किसी दिन से हुआ। आत्मस्वभाव अनादि है, इतने पर भी इसको भेद दृष्टि से परखें तो विदित न होगा, वह तो एक रूप है और एक रूप का विकल्प भी तब तक है जब तक कि वह आत्म स्वभाव बुद्धि में न आये। वस्तु का वाह्य परिचय आ गया, मगर प्रायोगिक नहीं बना, तो जब संकल्प विकल्प इतना भी छूट गया है, एक है इतना भी विकल्प न रहे तो वहाँ आत्मस्वभाव का अभ्युदय है। एक मोटी सी बात देख लो आपने कोई खाना बनाया, आटा, घी, शक्कर आदि इन को यों मिलायें, यों करें, यों बनायें, ऐसे बहुत से विकल्प करके बनाया और जब खाने बैठे और उसका अगर एकतान होगा एक रस का स्वाद लेंगे तो उस समय आप इतना भी विकल्प नहीं करते कि इस में घी खूब पड़ा, शक्कर ड्खीक डाली, उसे तो आँखें मींच कर एकरस होकर उस रस का आसक्त स्वाद लेता है। जब विषय सुखों में यह विधि है। उसके मौज के लिए अन्य विकल्प बाधक हैं, अन्य विकल्पों को नहीं करता, केवल उस ही में रत होता, तो फिर अध्यात्म की बात तो विलक्षण ही है, यह संकल्प विकल्प जाल से नहीं पाया गया।
   नयों की प्रक्रिया से आगे बढ़कर अंतिम निर्णीत उद्देश्य की धुन―यों व्यवहार से सीखा, अशुद्ध निश्चयनय में अभ्यास बना, शुद्ध निश्चयनय के अभ्यास का प्रयोग बना, परमशुद्ध निश्चयनय का प्रयोग किया, अंत में ये सब विकल्प छूटे और ऐसे धाम में आ कि जिसको कौन सा नय कहें। शुद्धनय। शुद्धनय और निश्चय नय में अंतर है। निश्चयनय तो एक के विकल्प को लेकर उठता है, शुद्धनय एक के विकल्प को भी नहीं स्वीकार करता, ऐसा प्रयोग करके जिस भव्य पुरुष ने अपने अंतस्तत्त्व को पाया, अब उसकी धुन यह बनती है कि यह ही शरण है, यह ही आश्रेय है, इसे ही ग्रहण करना है, इस ही में निरंतर रमना है, एक ही काम है, दूसरे काम में हित नहीं।
   अंतस्तत्त्व की धुन वाले की प्रायोगिक प्रगति में गुजरने वाली गृहस्थचर्या व मुनिचर्या का निर्देष―स्वभावाराधना की सारता का निर्णय और धुन रखकर अब बढ़ें तो यहीं खुद का प्रयोग करके देख लो कहाँ टिक पाते हैं, कहाँ रह पाते हैं, क्या कारण है, विषय वासना, विकार योग्यता सब पड़ी हुई है। कभी भी ये उमड़ जाते हैं। और फिर मोटे रूप से देखिये―जो घर में रह रहा, परिवार के प्रसंग में है उसके लिए कितनी जल्दी-जल्दी बाधायें आती हैं, कहाँ-कहाँ शल्य, कहाँ-कहाँ चिंता, कहाँ कैसी बात.......ते ऐसी गृहस्थावस्था में रहने वाले लोग अपनी चर्या विधि कैसे बनायें कि वे स्वानुभव के पात्र रह सकें इसका नाम है गृहस्थ धर्म, जिसमें और सामर्थ्य प्रकट हुई है, राग हट गया है, गृहस्थी छोड़ दी है, निर्ग्रंथपद में रहता है, जिसमें और विशेष सुविधा है कोई चिंता नहीं, कोई शल्य नहीं। ध्यान कीजिए इस आत्मस्वभाव का, जिसमें अब दूसरे से कुछ मतलब नहीं जैसा कि गृहस्थी में नहीं निभ पाता था, न दुकान जाय, न कुछ करे, जो भी विकल्प करते, जो भी ढंग बनता उस ढंग से गृहस्थी में रह पाता कोई। गृहस्थी में बहुत बाधायें हैं। इन गृहस्थी की बाधाओं को भी जिन्होंने त्याग दिया, जो निर्ग्रंथ पद में आये तो उनके भी अभी वासना वहाँ भी सताती है, किसी भी प्रकार चित्त वहाँ भी नहीं टिक पाता, टिके तो पार हो जाय। जिन मुनियों का चित्त टिक गया वे पार होते ही हैं। पर जो नहीं टिक पाते तो वे अपने बाकी समय में कैसी चर्या बनायें जिस व्यवहार में रहकर जिस चर्या को करके उस स्वानुभूति के पात्र रह सकें। उसका नाम है मुनिधर्म।
   निश्चय धर्म के लाभ की धुन में रहने वाले भव्य का व्यवहार चारित्र से संगम―धर्म तो एक ही है―सहज स्वभाव का आश्रय करना, पर उसके लिए जब कोई तैयार हो कि मैं अंतस्तत्त्व का आश्रय करूंगा, अपनी ऐसी ज्ञान की भीतरी वृत्ति बनावें तो उस पर क्या गुजरता है, कैसा ढंग बनता है वे तो सब उस पर प्रयोग आयेंगे। तो हममें कहीं अपात्रता न बन जाय ऐसी राग की चर्या न बनावें बस उसके सावधानी है इन धर्मों में, जिसे संक्षेप में आप ऐसा कह सकते हैं कि कोई सुभट युद्ध में उतरता है लड़ने के लिए तो अपने पास वह दो प्रकार की चीजें रखता है। शत्रु के आक्रमण को रोक सके एक ऐसा साधन और शत्रु को मार सके एक ऐसा साधन। जिन के नाम कहो आप ढाल और तलवार। आज के समय में और ढंग की बात हो गई मगर ये दो चीजें रहेंगी युद्ध में सभी के, शत्रु के वार का रोक सके ऐसा साधन ढाल और शत्रु का संहार कर सके, ऐसा साधन तलवार, कोई सुभट ढाल लिए बिना युद्ध में उतरे तो उसकी खैर नहीं और-और कोई योद्धा युद्ध में बिना तलवार लिए चल देता उसकी खैर नहीं। तो हम आप सब इस परिस्थिति में हैं कि यह कर्मानुभाग, कर्मविपाक, में उदित होते हैं, पूर्वबद्ध और हो रहे हैं, बीत रहे, चल रहे हैं और वहाँ भाव खोटे राग में भी जा सकता, व्यसन आदिक में भी जा सकता, कोई खोटा भाव भी हो सकता। पुराणों में एक जगह यह चर्चा आयी है कि किसी ने समवशरण में जाकर पूछा किसी मुनि के बाबत कि महाराज उसकी कैसी गति है? तो उत्तर मिला कि अभी एक सेकेंड पहले तो ऐसे भाव थे कि वह नरक ही जाता और अब उसके ऐसे भाव हैं कि वह स्वर्ग जायगा। भला बतलाओ इतनी जहाँ चंचलता है, परिवर्तन है वहाँ अपना कर्तव्य क्या? अपात्र खोटे राग में न पहुँचे यह जीव, इस पर व्यसन आक्रमण न कर जाय। स्वानुभव का अपनी न बन जाय, ऐसी स्थिति है व्यवहारचारित्र की। वह ढाल की तरह काम देता कि तुम योग्य रहो, स्वानुभव के पात्र रहो तुम्हें उठाना तो पड़ेगा तो कैसे उठो, खाना तो पड़ेगा तो कैसे खावो बोलना तो पड़ेगा तो कैसे बोलो, बस यह ही उसका व्यवहार धर्म है उसके प्रताप से हम कुमार्ग में नहीं लग पाते, हम पर व्यसनों का आक्रमण नहीं हो पाता। हम एक स्वानुभव में पात्र रहे और फिर करें क्या? व्यवहार चारित्र से सुरक्षित होकर अपने में करें क्या? यही तैयारी का प्रयोग, इस ज्ञानाश्रय का प्रयोग। अपने आप में यह अनुभव बनायें कि मैं सहज ज्ञान मात्र अंतस्तत्त्व हूँ। बस तारीफ इसकी है। जो अपने आप में अभ्यास बनायेगा उसका कल्याण होगा।
   निर्नाम शुद्ध चैतन्य स्वरूप के परिचयी की प्रवृत्ति गृहस्थ धर्म व मुनि धर्म―देखो नाम जिसका जो कुछ है वह अपने नाम में कैसा राग बनाये हुए है, संस्कार बनाये हुए है कि वह नाम लेकर अगर कोई गाली दे तो यहाँ इस के क्रोध जग जाता। यह बात चित्त में नहीं बैठती कि इसने मुझे गाली नहीं दी। मैं तो एक चैतन्य स्वरूप हूँ। इसमें शब्द ही क्यों अड़ेंगे? इसने मुझ को गाली नहीं दी यह बात नहीं बैठती चित्त में नाम लेकर किसी ने निंदा की तो इसको झट बुरा लग गया, विह्वल हो गया। तो जिस नाम से लगाव है वह तो व्यग्रता का कारण है, यदि इस चैतन्य स्वरूप में लगाव हो और अपने को निर्नाम अनुभव करें, अगर कोई नाम भी है तो वही सबका नाम है, फिर बुरा क्या? मानों सभी प्राणियों का अगर एक ही नाम होता है, भिन्न-भिन्न नाम नहीं हैं, मानो एक ऐसी व्यवस्था बनायी जाय कि सभी पुरुषों का एक ही नाम रखा जाय, भिन्न-भिन्न न रहे तो फिर न धनी बनने की होड़ मन में आयगी, न किसी तरह का श्रम करने की बात मन में आयगी। न नाम चाहने की बात मन में आयगी। सभी का एक ही नाम है। ये जो विभिन्न नाम है ये नाम प्रत्यय कहलाते हैं। बौद्ध सिद्धांत ने आश्रव के कारण में सबसे पहला नाम है ये नाम प्रत्यय कहलाते हैं। बौद्ध सिद्धांत ने आश्रव के कारण में सबसे पहला नाम लिया है नाम का, जिसके आधार पर सारी बातें आती हैं। तो नाम रहित चैतन्य स्वरूप निर्नाम शुद्ध चैतन्य स्वरूप हूँ, ऐसा बहुत अभ्यास करना पड़ेगा। बराबर यह दृष्टि अपने अंतस्तत्त्व में लानी पड़ेगी। यह अभ्यास करें, अन्य सब बातों की उपेक्षा करके भीतर में इस अंतस्तत्त्व की आराधना का अभ्यास बनायें। ऐसा अभ्यास बन सके तो, और न बन सके तो प्रवृत्ति के समय क्या करना? मन, वचन काय की प्रवृत्ति चलेगी तो किस तरह करना, उसकी भी तो कोई एक सम्मत बात होनी चाहिए। बस वही है चरणानुयोग। वह एक गुजारा है किस तरह से हम अपना गुजारा करके चलें कि हम शुद्ध नय के विषय को दृष्टि में रख सकें। धर्म के लिए बात तो एक है ‘हेयः शुद्धनयो नहि’, शुद्धनय कभी भी न छोड़े, पर न छोड़ सकें तो यह तो सर्वोत्तम बात ही है, मगर जिनको छूट जाता, पा ही नहीं पाते उनका और कैसा कर्तव्य है बस वही चर्या गृहस्थ धर्म और मुनिधर्म में बतायी जा रही है।
   दुर्लभ नरजन्म की संयम से सफलता―यह नरभव बहुत दुर्लभता से प्राप्त हुआ है। इसमें अपने शरीर की अनुराग आराम, प्रीति, राग, ममता, ये न आने चाहिए और जितना संभव है उतना अपना समय संयम में गुजारें और भीतर में काम करें इस ज्ञानतत्त्व की आराधना का। मैं ज्ञान मात्र हूँ ढाल को सुरक्षित बनावें, तलवार से शत्रु का संहार करें, सदाचार बनावें और आराधना उपासना उस सहज ज्ञान तत्त्व की करें। ऐसे इस ज्ञान स्वभाव का परिचय कर लेने वाले अभ्यास के इच्छुक जन अपने प्रयोग में आते हैं तो ऐसे प्रयोगी पुरुष दो प्रकार के हैं―गृहस्थ और मुनि। तो उनकी प्रवृत्ति कैसी हो, उस चर्या का यहाँ वर्णन है।
   बाह्य विकल्पों को त्याग कर सब में परम विश्राम लेने का एक प्रयोग―भैया एक अभ्यास और बने जो सर्व साधारण कर सकते हैं, न भी ज्यादह ज्ञान हो, विशेष बात न भी बोल सके, वह कर सकते हैं और ज्ञानी भी करते हैं। वह प्रयोग ऐसा हे कि कम से कम इतना  तो बोध हो कि संसार में जो दृश्य पदार्थ हैं वे सब मुझसे भिन्न हैं, असार है। उनसे मेरा कुछ काम नहीं बनता, ये सब मिट जाते हैं, इतना थोड़ा बहुत बाह्य पदार्थों के बारे में बोध हो और कभी एकांत में एक आसन से बैठकर सामायिक में या अन्य किसी समय ऐसा एक निर्णय बनावें कि जब बाह्य पदार्थ भिन्न हैं, बाह्य पदार्थ असार हैं तो मैं तो एक भी पदार्थ को अब सोचूँगा नहीं, मैं किसी पर पदार्थ में ध्यान दूँगा नहीं, अच्छा इस तरह तो चले मगर किसी पर ध्यान तो गया। हाँ तो उसी से निपट लें पहले जिस बाह्य वस्तु का ध्यान बना उससे बात करें हे बाह्य पदार्थ तू मेरा मददगार बनेगा क्या? मुझे कष्ट से बचायगा क्या? तू मेरा साथ निभायेगा क्या? तो वहाँ उत्तर मिलेगा कि ध्यान छोड़ों बाह्य पदार्थों का और एक इस आग्रह से बैठ जावो कि मुझे चाहिए कुछ नहीं, मैं करूँगा कुछ नहीं, जो हो सो हो, स्वयं हो, तथ्य क्या है? तो अपना भगवान आत्मा स्वयं उत्तर देगा कि बाह्य विकल्प न करो, अपने आप में एक विश्राम से बैठे रहो, तो बाह्य को तो छोड़ा, खुद छूटता नहीं तो स्वयं ही अपने आप में से कोई अनुभूति बनती है और उसमें कोई अलौकिक आनंद जगता है। वह आनंद हमेशा बना रहे उसके कारण है शांत का अनुभव। सहज आनंद का अनुभव बने, यहाँ दृढ़ता आती है कि धर्म इस स्थिति में है और हम को ऐसी स्थिति बनाना है, यह ही अभ्यास बनाना है। तो आत्महित के लिए हमें इस सहज स्वरूप का ही आलंबन, आश्रय रखना है, उसका प्रयोग करें, केवल बात ही बात से काम नहीं चलता। उसका प्रयोग करने के लिए अपने में इतनी साधना चाहिए कि सर्वजीवों में समता का परिणाम हो। किसी के प्रति रंच भी विरोध की बात न हो, यह अपनी दया है, यह अपने को प्रगति के पथ पर ले जाने का उपाय है, ऐसी तैयारी वाला गृहस्थ कैसी चर्या से चलता है उसका वर्णन इस ग्रंथ में किया गया है। 15/1/76



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