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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 110

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णिच्छयववहारसरूवं जो रयणत्तयं ण जाणइ सो।

जं कीरइ तं मिच्छारूवं सव्वं जिणुद्दिट्ठं।।11॰।।

   संसार के सकल संकटों से छूटने का उपाय रत्नत्रय तथा निश्चय विधि से निर्णय की प्रक्रिया―संसार के समस्त संकटों से छूटने का उपाय आत्मा का सही अनुभव, आत्मा के स्वरूप का सही ज्ञान और आत्मा के स्वरूप में लीन हो जाना अर्थात् सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र यह रत्नत्रय मोक्षमार्ग है। तो जो पुरुष निश्चय और व्यवहार स्वरूप से रत्नत्रय को नहीं जानता है वह पुरुष कुछ भी कार्य करे वे सब मिथ्यारूप होते हैं। निश्चय क्या और व्यवहार क्या? निश्चय कहते हैं वस्तु को इस विधि से निरखने को कि एक ही वस्तु निरख में आये और तो कुछ भी निरखा जाय उस वस्तु की ही बात देखी जाय, दूसरे पदार्थ की दृष्टि न रहे, यह कहलाती है निश्चयनय की विधि से जानकारी। तो निश्चयनय से क्या जाना जाता है? एक ही पदार्थ, जैसे आत्मा जाना जा रहा तो उसमें तीन ढंगों में जाना जायगा। कोई भी पदार्थ आत्मा का स्वभाव जानना, आत्मा की शुद्ध परिणति जानना, आत्मा की अशुद्ध परिणति जानना, आत्मा की अशुद्ध परिणति क्या है? राग द्वेष क्रोध, मन, माया, लोभादिक के यह हैं आत्मा की अशुद्ध परिणति, और आत्मा की शुद्ध परिणति क्या है? सम्यग्दर्शन केवल ज्ञान, अनंत आनंद, यह है आत्मा की शुद्ध परिणति और आत्मा का स्वभाव क्या है? जो शुद्ध परिणति के समय भी रहे अशुद्ध परिणति के समय भी रहे सदा रहे, अनादि अनंत काल तक तो स्वरूप रहे वह कहलाता है स्वभाव।
   उदाहरण पूर्वक निश्चयनय का स्पष्टीकरण―जैसे जीव में खोज करो, जीव का स्वभाव क्या है? सिर्फ ज्ञान स्वरूप। सहज ज्ञान, उसमें और विशेषतायें मत सोचिये कि सही जान रहे, उल्टा जान रहे, या इसको जान रहे, उसको जान रहे, यह कुछ नहीं सोचना है। केवल एक अनादि अनंत स्वरूप ज्ञानमात्र, जैसे पुद्गल में स्वभाव क्या है? रूपशक्ति, मूर्त शक्ति। अब रूप को अगर काला, पीला, नीला वगैरह देखें तो वह फिर स्वभाव न रहा, वह हालत हो गई। स्वभाव है मात्र सहज रूप शक्ति। यद्यपि रूपशक्ति बिना किसी हालत में नहीं रह सकता उसकी कोई हालत को होनी ही चाहिए तो रहो हालत, पर हालत हो न देखकर केवल शक्ति को ही देखे तो वह कहलाया स्वभाव देखना। जैसे एक्सरा मशीन (हड्डी का फोटो लेने वाला यंत्र) न तो रोम ग्रहण करता, न चाम, न खून मांस मज्जा आदिक, सीधे यह हड्डी को ही जताता है ऐसे ही ज्ञान में सामर्थ्य है कि वह ज्ञान किसी पर्याय को न देखे सिर्फ शक्ति को देखे और भी दृष्टांत देखिये मनुष्य, बालक, जवान और बूढ़ा ये चार बातें समझ में आती हैं। बालक एक हालत है। जवान एक हालत है, बूढ़ा एक हालत है और मनुष्य किसका नाम है? वह एक पदार्थ जो बालपन में भी था, जवानी में भी था, बुढ़ापे में भी है और सदा इस जीवन में है, वह तो है मनुष्य पर बालक, जवान, बूढ़ा इनका समय नियत है। इतने समय तक बालक, इतने समय तक जवान और अमुक समय बूढ़ा। मगर मनुष्य तो आदि से अंत तक है उस भव में मायने। जब से है तब से मनुष्य। जब तक है तब तक मनुष्य जैसे कोई कहे कि एक मनुष्य लावो तो अब वह जवान लाये तो, बालक लाये तो, बूढ़ा लाये तो उसकी आज्ञा सही मान ली तो मनुष्य सभी हैं। तो ऐसे ही जीव तो है सदा ज्ञानस्वरूप वह ज्ञान शक्ति तो सदा है और उस जीव की जो हालत है वह समय-समय पर हुआ करती है तो बात यह कह रहे हैं कि एक ही द्रव्य को एक ही पदार्थ की बात उस ही पदार्थ में देखें तो यह कहलाया निश्चय से देखना। औपाधिक स्थिति में भी निश्चयनय के प्रकाश का अंतः प्रकाशन जैसे खड़ा है और उसकी छाया जमीन पर आ गई तो यह निर्णय करना है कि यह छाया किसकी है? तो छाया जिन प्रदेशों में है जिस पदार्थ में है उस पदार्थ में देखें तो यह निश्चयनय से देखना कहलाया। और इस दृष्टि में उत्तर आयेगा कि यह छाया पृथ्वी की है पृथ्वी की परिणति है यह तो हुआ निश्चयनय से उत्तर और व्यवहारनय से चूँकि आदमी खड़ा है तब छाया हुई है तो आदमी का निमित्त पाकर छाया हुई है यह कथन व्यवहार का है निश्चय में आदमी का नाम न लिया जायेगा। पृथ्वी छाया है जैसे एक दर्पण को देख रहे हैं और पीठ पीछे चार बालक खड़े है तो उस दर्पण में चारों बालकों का प्रतिबिंब पड़ता है अब बताओ वह फोटो, छाया, प्रतिबिंब किसका है? जब यह पूछा जाये तो निश्चय से क्या बताया जाये कि यह फोटो छाया जिस आधार में है जिसका परिणमन है उसकी यह छाया है मायने दर्पण की है वह छाया हालत और चूँकि वह नैमित्तिक है औपाधिक है पर अपने स्वरूप में नहीं तो बताना होगा कि उन चार बालकों का सामना पाकर दर्पण में वह फोटो आयी तो यह हुआ व्यवहारनय का उत्तर तो जान तो दोनों ही चाहिए मगर उसमें से कोई एक का ही हठ पकड़ ले तो वह असत्य होगा। जैसे कोई कहे कि इस दर्पण में फोटो है दर्पण की फोटो है देखिये बात तो ठीक कही जा रही तो दूसरा तो बहुत दूर खड़ा हैं वह अपने में काम करेगा, मगर जो निमित्त नैमित्तिक भाव को मानते ही नहीं और यह ही कहो कि जब दर्पण में छाया आनी थी आ गई जब जिसका जो होना है सो होगा, बात यह भी सही है कि जिसका जिस समय जो कुछ होना है सो होगा।
   निमित्तनैमित्तिक भाव का निराकरण करके वस्तुस्वातंत्र्य के एकांताशय में विरूद्धता―यदि इस आशा से कहे कोई कि दूसरा निमित्त कुछ नहीं है? पदार्थ में पर्याय भरी हैं तो समय-समय पर क्रम से निकलती जाती हैं इसमें दूसरे की कोई बात नहीं है। निमित्त का भी खंडन करें तो यह मिथ्या है। क्यों मिथ्या है कि निमित्त माने बिना, निमित्त का सन्निधान पाये बिना अगर ये विकार के काम हो गए ये विकार सदा रहेंगे फिर अभी तो निमित्त पाकर हुए हैं इसलिए ये मिट सकते हैं इसके स्वभाव में नहीं हैं। यह ज्ञान करने से विकार हटने की उमंग रहती है किंतु जब यह ही स्वीकार कर लिया जाएगा कि दर्पण में हुई, जब होनी थी हुई दर्पण की ही बात है निमित्त न माने तो वह विरुद्ध पड़ जाता है और हैं दोनों ही बातें। जैसे हम दर्पण को ही देख रहे और दर्पण को ही देखकर हम सब बात बताते जा रहे इसने हाथ हिलाया, यह लड़का यों खड़ा, इसने टाँग उठाया, इसने जीभ चलाया यों सारी बात बताते जा रहे और हम एक भी लड़के के न देखे तो दर्पण ही देखे तो इसने हाथ हिलाया, यह लड़का यो सारी बात बताते जा रहे और हम एक भी लड़के को न देखें सिर्फ दर्पण ही देखें तो दर्पण को ही देखकर दर्पण की छाया का वर्णन किया यह बात तो सही है मगर वहाँ कोई ऐसा निर्णय बना ले कि इसमें दूसरे की क्या आवश्यकता? दर्पण में आया है अपने आप आया है तो यह मिथ्या हुआ कि नहीं। तो निमित्त भाव भी है और वस्तु स्वातंत्र्य भी है दोनों का परस्पर विरोध नहीं है तो ऐसा निश्चय से वस्तु का परिचय कीजिए। व्यवहार से वस्तु का परिचय किया जा चुका।
   मोक्ष व मोक्ष के अनुरूप मोक्ष साधन―अब प्रकृत में चलो मोक्ष मार्ग की बात कही जा रही। मोक्ष मार्ग है रत्नत्रय। तीन रत्न। तीन रत्न कौन? सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र आत्मा का स्वभाव है ऐसा जो पदार्थ जैसा है उस प्रकार का श्रद्धान बने मैं आत्मा स्वयं सहज क्या हूँ उसकी श्रद्धा बने यह तो हुआ सम्यग्दर्शन और जिसमें अनुभव जगा है उसका ज्ञान सही ज्ञान है और सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान हुए बाद फिर अविकार स्वरूप में मग्न होना यह है सम्यक्चारित्र। तो इन तीन का समुदाय मोक्ष का उपाय है। देखिये जो भी बात होती है। तो जिस विधि से होनी है उस विधि से हुआ करती है। जैसे लौकिक काम देखो भोजन जिस विध से बनता है वही विधि अपनाते हैं, भोजन बन जाता है। दुकान, आफिस आदि जिस विधि से होते हैं उस विधि से करने होते हैं, वे भी ठीक चलने लगेंगे। तो मोक्ष का मोक्ष हो जाना अर्थात् आत्मा सिर्फ अकेला ही रह जाय इसका नाम है मोक्ष, न शरीर का साथ न कर्म का साथ, किंतु आत्मा केवल वही एक मात्र सत्ता में रहे, यह ही चाहिए ना, तो इसके पाने की विधि क्या है? क्या होना है? केवल सिर्फ मैं आत्मा ही आत्मा रह जाऊं, यह अभिलाषा की जा रही है। इसी का दूसरा नाम है मोक्ष। मैं सब संपर्कों से, सर्व परभावों से हटकर केवल रह जाऊं, तो मोक्ष मायने क्या है कि है आत्मा मात्र आत्मा ही आत्मा रह जाऊं, दूसरे का मुझ में बंधन न रहे, यह है मोक्ष। इस मुक्ति की यदि चाह है तो उसका उपाय यह है कि वर्तमान में स्वरूप दृष्टि से अपने आप को अकेला निरख ले तो पर्याय में अकेला हो जायगा।
   दृष्टि के अनुसार सृष्टि का स्पष्टीकरण―जैसी दृष्टि होती है वैसी सृष्टि होती है। यदि हम अपने को मोही शरीरवान देखें तो मोह और शरीर ये मिलते ही रहेंगे और अपने को पर समय रहित केवल अकेला ज्ञानप्रकाश मात्र ऐसा ही देखते रहेंगे तो ऐसी ही शुद्ध पर्यायें मिलती रहेंगी। दृष्टि के अनुसार सृष्टि होती है। जैसी हमारी नजर बनेगी वैसा ही हमारा भविष्य बनेगा। तो मुक्ति पाने के लिए इस ही समय अपने भीतर स्वरूप दृष्टि करके अकेला निरखना है। यदि हम यहाँ अकेला निरख पायें तो हम अकेले हो सकेंगे और यहाँ तो हम अकेला निरख न सकें और दूसरे पदार्थ रूप अपने को मानते रहे तो कैवल्य नहीं होने का। जिस काम की जो विधि है उस ही विधि से कोई चले तो उस काम की सिद्धि होती है। तो इस केवल आत्मस्वरूप का श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन है, ज्ञान करना सम्यग्ज्ञान है और इस ही में रम जाना सम्यक्चारित्र है। तो निश्चय रत्नत्रय क्या? केवल आत्मा में ही आत्मा की बात निरखना। यह आत्मा अपने पर दृष्टि दे रहा है, अपने में अपनी सहज शुद्ध अवस्था निरख रहा है। यदि यह दृष्टि अपने सहज स्वरूप को कुछ क्षण निरखता रहे तो इसको केवलज्ञान की शुद्ध परिणति होगी। तो आत्मा को आत्मा में निरखना, आत्मा में लीन होना यह कहलाता है निश्चयमोक्षमार्ग। यह 7 तत्त्व की बात सीखना, आत्मस्वरूप का चिंतन करना, मनन करना, देव शास्त्र गुरु की श्रद्धा रखना और श्रद्धानुसार अपना जीवन चलाना यह सब है एक व्यवहारी की बात।
   निश्चय व्यवहार विधि से रत्नत्रय के अनभिज्ञ पुरुषों की क्रियायों में वैपरीत्य―जो मोक्षमार्ग को इन दोनों विधियों से नहीं जानता, व्यवहार के क्रियाकांड करके संतुष्ट हो जाय कोई कि मैंने तो जीत लिया सब काम, तो वह धोखे में है। अपने आप के स्वरूप का बोध हुए बिना मोक्षमार्ग नहीं चल सकता। तो जड़ में यदि अज्ञान है तो जितनी भी क्रियायें की जायेंगी वे सब मिथ्या बनती चली जायेंगी। जैसे मान लो साग छौंकने वाली कई पतीली एक पर एक रख कर किसी कोने में लगाना है तो वे कैसे लगायी जायेंगी? उनमें पेंदी तो होती नहीं सो उनमें से सबसे नीचे रखी जाने वाली पतीली औंधी या सीधी जिस तरह से रखी जायगी ठीक उसी तरह सब पतीली उस पर रखी जा सकेंगी तो ऐसे ही आत्मस्वरूप का सही निर्णय बोध हो जाय तो उससे जो कुछ बन पड़ेगा वह आत्महित के प्रयोजन से चलेगा। और, यदि आत्मा का श्रद्धान नहीं है, सम्यक्त्व नहीं है तो वह पुरुष जो कुछ भी करे वह सब मिथ्या ही करेगा। जैसे जिस पुरुष को यह श्रद्धा है कि यह शरीर ही मैं हूँ, अन्य कुछ मैं नहीं हूँ, ऐसी प्रतीति हो जाय तो वह सब असत्य-असत्य ही कल्पनायें करता चला जायगा। जिसने माना कि शरीर मैं हूँ तो वह दूसरे को मानेगा कि यह मेरा अमुक नातेदार है, यह धन संपदा है, यह मेरे काम आने की चीज है। इस तरह वह सब मिथ्या ही कल्पनायें करता चला जायगा।
   अज्ञान अवस्था में प्राणियों की प्रवृत्ति का दिग्दर्शन―यदि भेद विज्ञान हो गया, आत्मा के अविकार सहज स्वरूप का अनुभव हो गया तो उसका उपयोग बाहरी पदार्थों पर न टिकेगा, क्योंकि उससे अपना भला ही नहीं दिख रहा। सर्व पदार्थों से भिन्न समझ रहे तो उसका उपयोग अब किसी बाहरी पदार्थ पर न टिकेगा और उत्सुकता होगी कि मैं अपने आप के स्वरूप में ही रमूँ। देखिये ज्ञानमय भाव बने तो सारी क्रियायें ज्ञान वाली बनती चली जायेंगी और अज्ञानमय भाव बने तो सारी क्रियायें अज्ञान की चलती जायेंगी, जैसे किसी पुरुष पर भ्रम हो गया कि यह मेरे खिलाफ है, विरोधी है दुश्मन है और वह चाहे कुछ नहीं है, यह बात अगर एक ख्याल ही बन गया कि यह तो मेरा विरोधी है, बैरी है, खोटा है तो अब उसका उठना बैठना चलना, देखना आदिक सारी क्रियायें इसी रूप में दिखेगी कि देखो है ना यह विरुद्ध! कैसा हमको देख रहा है, अगर मुस्कराये नहीं तो समझते कि देखो यह मुझसे कितना बैर किए है और अगर मुस्कराये तो लगता कि देखो यह मेरी मजाक उड़ा रहा। यों सारी बातें उसे खिलाफ-खिलाफ नजर आयेंगी तो ऐसे ही आत्मा के बारे में जिसको मिथ्याज्ञान हुआ कि शरीर ही मैं हूँ उसकी सारी कल्पनायें चलेंगी। मेरा दुनिया में यश फैले, मेरा नाम चले, मेरी परंपरा रहे, मैं कुछ यहाँ अपना खंभा गाड़ जाऊं, बड़े-बड़े अक्षरों में अपना नाम लिखा जाऊं, यों कल्पनायें जगती हैं। अरे मरकर न जाने कहाँ से कहाँ जन्में, उसके लिए फिर यहाँ का क्या? यहाँ बड़ा परिश्रम करके बहुत-बहुत धन संचय कर लिया, बड़ा मकान बनवा दिया, सब कुछ बहुत बढ़वारी कर दी, पर मरे के बाद उसका यहाँ है क्या कुछ? उसका यहाँ कुछ भी नहीं है।
   स्वरूपात्मत्वबुद्धि व पर्यायात्मत्व बुद्धि के प्रभाव का दिग्दर्शन―जब शरीर में आत्माबुद्धि होती है तो शरीर के ढंग से ही सारी कल्पनायें बनेंगी। दूसरे की कुशलता पूछेगा तो यों पूछेगा कि भाई तुम्हारी तबीयत ठीक है ना? बच्चे लोग मजे में हैं ना, यों सब बातें पूछता जायेगा और अगर उसकी दृष्टि अपने आप के यथार्थ ज्ञान स्वरूप की बन गई तो अपने मित्र से एक बार यह भी पूछेगा कि आपको अपने आत्मा में प्रसन्नता रहती है या नहीं। आपको अपने आत्मा की सुध चलती रहती है या नहीं? उसको यों ही दिखेगा। जो अपने आपके स्वरूप में अपने सहज ज्ञान तत्त्व को निरख सकता, निश्चय व्यवहार की गति ही नहीं जानता उसको आत्मा की उपलब्धि नहीं। हाँ तो निश्चय से मोक्षमार्ग क्या हुआ? आत्मा के यथार्थ स्वरूप की श्रद्धा, इस ही स्वरूप का ज्ञान और इस ही स्वरूप में आचरण, यह है निश्चय से रत्नत्रय। निश्चय बताया था कि एक हो ही देखना, उस एक में ही देखना, उस एक की ही बात देखना, यह है निश्चय तो अपने आत्मा को देखे, ज्ञान स्वरूप देखे और ज्ञानस्वरूप अनुभव करें तो यह है उसका मोक्षमार्ग, और जो ऐसा नहीं कर सकता वह बाह्य पदार्थों को मानता कि यह मैं हूँ, यह मेरा है, उसको सिद्धि नहीं।

प्रयोग के योग्य कुछ प्रयोग का अनुरोध- मोटे रूप से एक यह ही बात विचारें कि इस लोक में मोह करने से जीव को क्या लाभ मिलेगा? खूब आशक्ति से, अज्ञान से दूसरे जीवों को अपनायें तो उससे इस जीव को मिलता क्या है? रही एक यह बात कि दुनिया तो समझ लेगी, अरे दुनिया ही खुद फंदे में फंसी है वह स्वयं अभी समर्थ नहीं है, उसको देखकर क्या लाभ? जो बनावट से धर्मपालन करता है उसके अंदर में धर्म की गंध नहीं आती। और यह बनावट कायम कब तक रहेगी? कभी न कभी भंड़ाफोड़ हो ही जायगा, और न भी हो तो इसके लिए कोई लाभदायक बात नहीं, इसके लाभ ही बात तो यही है कि जगत के सारे पदार्थ असार जानकर उनमें चित्त ही न फंसायें, उनका ध्यान ही न रखें और जो अकेला रहेगा ऐसे अपने अकेले स्वरूप को निरखना, तो ऐसा जो केवल अपने आत्मा को देखता है वह निश्चयरत्नत्रय का जानकार है और समझा जीव अजीव आश्रव, जीव में कर्म का आना आश्रव, जीव में कर्म का बँधना बँध, जीव में कर्म न आ सकें संबर, जो पहले जीव में कर्म बँधे थे वे झड़ जायें सो निर्जरा। ये कर्म बिल्कुल झड़ चुके लो मोक्ष हो गया, इस तरह समझा तो है कुछ, मगर यह व्यवहार मोक्ष मार्ग है क्योंकि अनेक बातें हैं सोची तो जा रही, सही मगर सही सोचने पर भी यदि अनेक बातें है तो वह निश्चय में नहीं है। निश्चय में तो एक अद्वैत केवल ज्ञान स्वरूप अंतस्तत्त्व यह ही दृष्टि में हो तो वह है निश्चयनय का कदम और भेद कर करके जितना जो कुछ भी जाना जा रहा है वह सब है व्यवहार की बात। तो देव की श्रद्धा, शास्त्र की श्रद्धा गुरु की श्रद्धा तत्त्व की श्रद्धा यह सब है व्यवहार और एक अपने स्वयं सिद्ध ज्ञान को स्वयं समझ लेना यह है सच्ची श्रद्धा। जब कभी देश की स्वतंत्रता का नारा लगता था तो लोग कहते थे कि ‘‘स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्धा अधिकार है पर यहाँ तो देखिये अणु में प्रत्येक जीव में, प्रत्येक पदार्थ में स्वतंत्रता वस्तु का स्वरूप है अनादि अनंत ओर स्वरूप है तो वस्तु की स्वतंत्रता उस स्वरूप के अधिकार में है। तो निश्चय से अपना स्वरूप निरखे। व्यवहार से सर्व विधियों से आरे अपने से ज्ञान मात्र पाने का अनुभव करें तो यह ही है मोक्षमार्ग। जो इसे नहीं जानता वह पुरुष जो कुछ भी करेगा वह सब मिथ्यारूप ही होगा।


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