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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 113

From जैनकोष



खई पूया लाहंसक्काराइं किमिच्छसे जोई।

इच्छसि जइ परलोचं तेहिं किं तुज्झ परलोग्यं।।113।।

   परलोक के इच्छुकों का ख्याति भावनात्माग का कर्त्तव्य―हे योगी यदि तू परलोक की चाह करता है तो फिर वह ख्याति पूजा लाभ सत्कार आदिक को क्यों इच्छा करता है। क्या इसके द्वारा तुझे परलोक प्राप्त हो सकेगा? परलोक मायने उत्कृष्ट लोक। पर शब्द का उत्कृष्ट अर्थ है। यदि तू भविष्य में उत्कृष्ट लोक चाहता है तो तू ख्याति आदिक की चाह मत कर। उत्कृष्ट लोक स्वयं यह सहज ज्ञानस्वरूप आत्मा है। इसका श्रद्धान हुए बिना वह ज्ञान वृत्ति जग ही नहीं सकती। जिसके होने पर इसको उत्कृष्ट लोक प्राप्त हो, क्योंकि ख्याति का भाव तब आता है जब देह में आत्म बुद्धि होती है। देह को निरखकर माने कोई कहे कि मैं यह हूँ जब ही वह लोक में ख्याति की भावना रख सकेगा। जो यह समझता है कि मैं तो सहज ज्ञानस्वभाव मात्र हूँ और यहाँ ही उसका उपयोग गया, इसमें ही वह रम रहा उसे ख्याति की क्या चाहे? सो हे योगी आदि तू उत्कृष्ट लोक की चाह करता है, अपना भविष्य उत्तम चाहता है तो ख्याति की चाह को छोड़ दे। ख्याति कहते हैं प्रसिद्धि को, नाम वरी को मेरा नाम बने। नाम की ऐसी आकांक्षा कि कोई फोर्स भी बने तो नीचे नाम रहना चाहिए ताकि लोग नीचे तुरंत देख लें अगल बगल भी नहीं, पर यह ध्यान में नहीं रहता कि जितने भी अक्षर हैं उन सब में श्रुतज्ञान की स्थापना है मानने वाले को सब कुछ है, न मानने वाले को कुछ नहीं। कोई श्रुत स्कंध सिद्धि यंत्र आदिक होते हैं तो उनमें स्वर क´जन लिखे जाने हैं। प्रत्येक अक्षर से सिद्ध का नाम बनता है, इस कारण से प्रत्येक अक्षर से सिद्ध का नाम बनता है, इस कारण से प्रत्येक अक्षर में पूज्यता पायी जाती है। जैसे दो चार बातें तो प्रसिद्ध ही हैं। अ से अशरीर मायने सिद्ध भगवान, स से सिद्ध, म से मुक्त, न से निरंजन, क से कर्म रहित, यों कितने ही अर्थ लगाते जावो, जितने भी अक्षर हैं, वे सब सिद्ध के नाम के आदि अक्षर हैं, यही कारण है कि सिद्ध यंत्र में स्वर व्यंजनों का प्रयोग किया गया है। सिद्ध पूजा में पढ़ते हैं ना ऊध्साधोरयुतं सविंदुसपरं ब्रह्मस्वरावेष्टितं इत्यादि जितने बाह्य स्वर हैं वर्म क, ख, ग, घ, ड, आदिक अंतस्थ आदिक सब अक्षर उसमें पाये जाते हैं। तो एक-एक अक्षर प्रभु के नाम के वाचक हैं। नीचे नाम हैं और हिंदी में नाम है जो कि शास्त्र की एक लिपि भाषा है मूल लिपि ब्रह्मी लिपि जिसे ऋषभ देव ने चलाया था उसके अक्षर लिखे हों तो उस पर पैर रखकर कैसे जाप? मगर ख्याति में यह भी सुध नहीं रहती और संभव है कि ऐसा जानते भी न हों। प्रयोजन यह है कि जब ख्याति का भाव चित्त में आता है तो देह में आत्मबुद्धि रहती है। जहाँ देह में आत्मबुद्धि है वहाँ आंतरिक सहज ज्ञान का प्रकाश नहीं हो सकता। तो यदि उत्कृष्ट लोक चाहते हो तो ख्याति की चाह छोड़ो।
   परलोक क इच्छुकों स्वपूज्यभाव परिहार का कर्तव्य―पूजा की चाह छोड़ो, मेरे को लोग पूजें ऐसा पूजन का भी भाव छोड़ों। यह ग्रंथ मुनिराज के प्रति बोधन के लिए है प्रायः पर इसमें श्रावकों का भी वर्णन आया। उसके बाद साधुवों के लिए उपदेश है। और अंत में उपसंहार जब करेंगे तो मिला जुला उपदेश होगा। तो यहाँ साधुवों के संबोधन के लिए कह रहे हैं कि हे योगी यदि तू परलोक की चाह करता है, परलोक मायने मरण नहीं, परलोक मायने अगली गति नहीं किंतु उत्कृष्ट लोक। अगली गति तो है मगर वह उत्कृष्ट हो तो कहते हा कि परलोक को निहारो, पहले लोग परलोक को सिधारे ऐसा लिखा करते थे। किसी की मृत्यु होने पर लोगों को सूचना देने के लिए परलोक को सिधारे अर्थात् उत्कृष्ट लोक को गए, फिर देव लोक को सिधारे, वह उत्कृष्ट तो न रहा। उत्कृष्ट में तो और ऊंचा नाम हो सकता, फिर चलते-चलते देवलोक, स्वर्गवास और अब देहांत कहा जाने लगा। तो वहाँ जो परलोक शब्द का पहले प्रयोग होता था। वह कुछ अगली गति मात्र से प्रयोजन न रखता था किंतु उत्कृष्ट लोक को गये, यह अर्थ हुआ। तो हे योगी यदि तू उत्कृष्ट लोक चाहता है तो पूजा का विकल्प छोड़ दे क्योंकि यह भी विकल्प आता है तो देहात्म बुद्धि होने पर आता है। जब यह जाना शरीर को निरखकर कि यह मैं हूँ, यह मैं योगी हूँ, मुनि हूँ, ये लोग भक्त हैं, उपासक हैं, इनको इस तरह पूजना चाहिए और अपने आप में पूजा का अहंकार जगता है। लेकिन इन विकल्पों में सहज ज्ञानस्वरूप आत्मतत्त्व की सुध नहीं रहती। तो हे योगी यदि तू परलोक को चाहता है तो पूजा का विकल्प छोड़।
   परलोक के इच्छुकों का लाभ सत्कारादि भावनापरिहार का कर्तव्य―इसी प्रकार कह रहे हैं कि परलोक के चाहने वाले योगियों को लाभ और सत्कार आदिक का भी विकल्प छोड़ना चाहिए। लाभ में क्या है? कोई इष्ट वस्तु हो, आहार आदिक हो, उसकी चाह होना या जैसा जो कुछ अन्य वस्तुओं की आवश्यकता समझे ग्रंथ आदिक और भी वस्तुवें उनके लोभ की इच्छा रखे, यों पर वस्तुओं के लोभ का विकल्प रखा जायेगा तो वह परवस्तुओं में ही तो उपयुक्त रहेगा। आत्मा का जो सहज अविकार चित्प्रकाश है उसमें तो भाव न जगेगा इसलिए हे योगी यदि तू परलोक की चाह करता है तो लाभ और सत्कार आदिक का विकल्प छोड़। सत्कार किसे कहते? मन, वचन, काय से ऐसी चेष्टा करना कि वह दूसरों को रुचे उसे कहते हैं सत्कार। यदि उत्कृष्ट लोक की वांछा है तो उत्कृष्ट लोक मायने आत्मा की पवित्रता। लोक कहीं बाहर है क्या? परलोक कहीं बाहर है क्या? आत्मा का सब कुछ आत्मा में है। यही यह लोक है, यही परलोक है, आत्मा आत्मा का ही साथी है। आत्मा आत्मा के साथ ही रहा आया। आत्मा आत्मा के साथ ही रहेगा। इसका ठिकाना अन्यत्र नहीं है। अपने में ही कुज्ञान बसाकर भ्रांति बसाकर अपने आप को हैरान किया जाता है और अपने आप में भ्रांति दूर करके एक ज्ञान स्वभाव से रुचि करके अपने आप में ही आनंद पाया जाता है, तो इसका यह लोक और परलोक इस आत्मा से दूर ही नहीं है। यह आत्मा ही लोक है, यदि ऐसी उत्कृष्टता चाहिए हो मायने सही दृष्टि बने, कषायें दूर हों, आनंद का लाभ लें यदि ऐसा सहज आनंद का लाभ चाहिए हो तो हे योगी तू सत्कार आदि के विकल्पों को छोड़। उनकी क्यों इच्छा करता है? क्या उनके होने से तुझे उत्कृष्ट लोक प्राप्त हो जाएगा? कभी न प्राप्त होगा, क्योंकि उनकी चाह है अज्ञानमय दशा और अज्ञानमय दशा रहने पर आत्मा की सद्गति नहीं हो पाती। यदि तू उत्कृष्ट लोक चाहता है तो इन सबका विकल्प छोड़। विकल्प छोड़कर यदि सहज ज्ञान स्वभाव आत्मा में उपयोगी रहेगा तो ये सारी बातें जो संसार में कुछ ऊंची मानी जाती हैं वे यों ही प्राप्त होंगी और ज्ञानी है तो ये सब प्राप्त होते जायें तो भी उनमें विकल्प न रहेगा। ऐसो तू अपने आपके निर्विकल्प स्वरूप की दृष्टि कर, जिसके प्रसाद से तेरा कल्याण होगा।


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