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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 122

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सिविणे वि ण भुंजइ विसयाइं देहाइभिण्भावमई।

भुंजइ णियप्परूवो सिवसुहस्तो दुमज्ज्ञिमप्पो सो।।122।।

   ज्ञानी का स्वप्न भी भोग की अनुत्सुकता―बहिरात्मा का वर्णन करके अब कुछ अंतरा का वर्णन किया जा रहा है, अंतरात्मा का अर्थ है अंतः आत्मा। अपने अंतः स्वरूप को जिसने आत्मारूप से माना है याने ज्ञानी सम्यग्दृष्टि। कितने ही ज्ञान कर लिए जायें और कितने ही व्रत चारित्र कर लिए जायें, पर एक इस सहज ज्ञान स्वभाव में हो ऐसी अनुभूति, वह सब असफल है। तो यहाँ अंतरात्मा की अंतर्वृत्ति बतला रहे हैं कि यह अंतरात्मा स्वप्न में भी विषयों का उपयोग नहीं करता, आशक्ति नहीं, ज्ञानदृष्टि बन गई, उसके संस्कार अब ज्ञान के ही बनते हैं। भले ही पूर्व संकार कुछ पदवी तक इस ज्ञानी को भी सतायें लेकिन उनसे विरक्त ही रहता है और इस विरक्ति के कारण मानसिक संस्कार नहीं बनता जो स्वप्न भी इस प्रकार आया करे। भले ही जागृत दशा में चौथे पंचम गुणस्थान वाले यथायोग्य पुरुषों को धनार्जन के काम में और बाह्य चेष्टाओं में लगना पड़े मगन वहाँ भी विरक्त रहता है। इस जागृत दशा में तो कुछ बने पर स्वप्न में चूक नहीं बनती ज्ञानी के क्योंकि स्वप्न में खोंटा दर्शन उन्हीं प्राणियों के होता है जो खोटी बातों का संस्कार बनाये रहते हैं। पर ज्ञानी जीव संस्कार नहीं बनाता, पर पूर्व संस्कार वश कर्म उदय में आयें तो उसको घर में रहना पड़ता। गृहकार्य अनेक करने होते मगर यह उन सबसे भी विरक्त है। तो यह ज्ञानी जीव स्वप्न में भी विषयों को नहीं भोगता।
   देहादिभिन्नभावमति आत्मा का निजात्मा रूप का उपभोग व सहजानंद रमण―ज्ञानी का तो देहादिक से भिन्न भाव है ऐसी उसकी बुद्धि बनी है देह निराला, मैं आत्मा निराला इतना सब कुछ निरखने पर भी कि जीव निकल जाने के बाद इस देह को जला दिया जाता है। घर के परिवार के लोग उस मृतक को घर में रखना पसंद नहीं करते। इतनी तो प्रकट बात है कि जीव निराला देह निराला। लेकिन अपने पर खुद नहीं की जाती, यह बात दूसरे के प्रति झट समझ में आ जाती कि अमुक जीव चला गया या मृतक शरीर ही रह गया। उस मृतक शरीर को घर में कोई नहीं रखता। रखकर भी करें क्या? वह तो सड़ कर बदबू देगा। लोगों को कष्ट देगा। उसके प्रति किसे रुचि रहती है इतना तो स्पष्ट दर्शन है, पर जैसे इस दूसरे का हुआ कि यह जीव चला गया, शरीर पड़ा रहा ऐसा हमको भी तो होगा। उस शरीर से मैं अत्यंत निराला हूँ ऐसा अनुभव क्यों नहीं किया जाता? सम्यग्ज्ञान बिना, सत्पथ पर चले बिना जैसे अब तक अनंत भव खोया वैसे ही यह भव भी खोने में ही जायगा। उसका लाभ भी न हुआ और ज्यों के त्यों रह गए, तो देहादिक से अपने आत्मा को भिन्न समझने की अंतरात्मा की बुद्धि रहती है। यह अंतरात्मा अपने आत्मस्वरूप को भोगता है। मैं ज्ञान को ही भोग पाता हूँ, ज्ञान सिवाय और कुछ नहीं भोग पाता। भोग भोगते समय भी यह जीव भोगों को नहीं भोगता, किंतु उस प्रकार की परिणति ज्ञान से भोगता है। जीव में सामर्थ्य ही नहीं कि वह किसी पर पदार्थ को भोग सके, पर पर की जगह है, जीव जीव की जगह है, यह पर में क्या कर सकता है अपने में ही कर सकता जो कुछ करे। तो यह ज्ञान का परिणमन कर रहा, ज्ञान को ही भोग रहा है अन्य को नहीं। यह एक वस्तु सिद्धांत है किंतु इस सिद्धांत को जान चुका वह बुरे ज्ञान को भी नहीं भोगता किंतु ज्ञान की सही वृत्ति को भोगता है, यह अंतरात्मा ज्ञानी की पहिचान है। यह तो आत्मीय कल्याणमय सुख में ही रमता है ऐसा यह भव्य आत्मा अर्थात् अंतरात्मा एक पवित्र जीव है।


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