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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 124

From जैनकोष



सम्माइट्ठी णाणी अक्खाणसुहं कहं वि अणुहवइ।

केणा वि ण परिहारइ वाहिविणासणट्ठभेसज्जं।।124।।

   व्याधिविनाशन औषधि की तरह ज्ञानी का उपभोग―यह सम्यग्दृष्टि ज्ञानी कभी किसी प्रकार इंद्रिय सुख को भी अनुभवता है मगर इस प्रकार भोगता है जैसे कि व्याधि के विनाश के लिए कोई दवाई को खाता है तो जैसे जिसको रोग हुआ तो वह दवाई को किसी प्रकार छोड़ नहीं पाता, दवाई खाना ही पड़ता है ऐसे ही पूर्व विपाक कर्म आये तो ज्ञानी भी है, सम्यग्दृष्टि भी है तो भी वह किसी पदवी में चौथे गुणस्थान में या पंचम गुणस्थान का गृहस्थ भोगों को भी विषयों को भी छोड़ नहीं पाता मगर समझता है ज्ञानी अपनी उस स्थिति का प्रतिकार और अंतः अनुभव बनाता है एक निज सहज ज्ञान स्वरूप का, जैसे पहले समय में बहुत सी महिलायें कुवें पर पानी भरने जाया करती थीं तो दो-दो तीन-तीन घड़े अपने सिर पर रख लेती थीं एक दो घड़े अपने काँख के दबा कर या हाथ में लटका कर ले जाया करती थी। वे चलते हुए में बातें भी करती जाती थीं, सिर भी मटकाती थीं मगर उनका लक्ष्य देखिये कि अपने उस कलश का संतुलन बनाये रहने को एक क्षण भी नहीं भूलती। ऐसे ही ज्ञानी पुरुष घर में रहता हुआ अनेक प्रसंगों में अनेक आचरण करता है, मगर अपने उस ज्ञान स्वरूप की प्रतीति को एक क्षण भी नहीं तजता और तब वह व्याधि के विनाश के लिए औषधि लेने की तरह उन सब स्थितियों से निपटता है, ऐसी घटना होने पर प्रशंसा किसकी है? अंतः प्रकाश मान ज्ञान स्वभाव की दृष्टि को प्रशंसा है। प्रशंसा अविरत की नहीं है। अविरत सम्यक्त्व गुणस्थान में प्रशंसा के योग्य सम्यक्त्व है अविरत नहीं हुआ करता। तो सभी पदवियों में धर्म का मूल उपाय आलंबन के योग्य केवल एक निज सहज ज्ञानस्वभाव है। मैं यह हूँ, इस ज्ञानमात्र अंतस्तत्त्व में अपने आप के सत्त्व का जिसको जितना दृढ़ निर्णय और अनुभव है वह उतना ही मोक्षमार्ग में बढ़ा हुआ है।


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