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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 136

From जैनकोष



भुत्तो अयोगलोसइयो तत्तो अग्गिसिखोवमो यज्जे।

भुंजइ जे दुस्सीला स्तपिंडं असंजतो।।136।।

   अज्ञता में दुष्प्रवर्तन―जिन जीवों का आत्मा के सहज अविकार स्वरूप का अनुभव नहीं बना, ऐसे अज्ञानी मिथ्यादृष्टि जीव कभी कुछ बुद्धि पाये तो भी उनका दुरुपयोग ही किया। पंचेंद्रिय के विषयों में अज्ञानी जन आशक्त होते हैं। वे नाना प्रकार से मांस आदिक अभक्ष्य भोजन भी करने लगते हैं। उनके चित्त में दया नहीं रहती। केवल एक अपने इंद्रियविषयों की साधना ही इष्ट है, यज्ञ में बलि का रूप बना दिया, अग्नि की शिखा में पशुओं को होम दिया, अनेक प्रकार से धर्म का रूप बनाकर और अन्य-अन्य भी घटनाओं को मांस पिंड को खाते हैं वे जीव असंयमी हैं, अज्ञानी हैं, मिथ्यादृष्टि हैं। देखिये सबसे पहले जीव दया आती है। धर्म मार्ग में जो बढ़ते हैं उनको प्रथम जीव दया आनी चाहिए और जीव दया वास्तव में उसके होती है जिसने अपने जीव के समान समस्त जीवों को जाना है और स्वरूप दृष्टि से जाना है। तो वह तो मोक्षमार्ग का भी रास्ता भूल गया है जिसको कि अपने स्वरूप का दर्शन नहीं है वह फिर दूसरे जीवों पर दया नहीं कर सकता। वह अज्ञानी है और असंयमी है।


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