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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 138

From जैनकोष



गुण-वय-तव-सम-पडिमा-दाणं-जलगालणं अणत्थमियं।

दंसण-णाण-चारित्तं किरिया तेवण्ण सावया भणिया।।138।।

   श्रावक की 53 क्रियावों मं आठ मूल गुण, बाहर व्रत व बारह तप―यह रयणसार ग्रंथ अब कुछ की गाथाओं के बाद पूर्ण होने वाला है। तत्त्वस्वरूप के बारे में काफी वर्णन हो चुका था, किंतु अब कैसे प्रभो गृहस्थ बनायें कि धर्म कार्य में सफल हो सकें, उस विधि से इस गाथा में बताया है कि श्रावक के 53 गुण होते हैं। 53 क्रियायें वे कौन सी हैं? आठ मूलगुण मद्य मांस मधु का त्याग, पंच उदंबर फलों का त्याग, ये 8 चीजें अभक्ष्य हैं, बुद्धि को बिगाड़ने वाली हैं। निर्दयता को बढ़ावा देने वाली है इनका त्याग गृहस्थ श्रावक के रहता ही है। मद्य तो चीजें सड़कर बनती है और मद्य पीने में अनेक जीवों की हिंसा होती है और मद्य से बेसुधी भी होती है। यह बहुत अनर्थ की चीज है। इसका त्याग विवेकी गृहस्थ के रहता ही है। मांस जीव के घात से उत्पन्न होता है और मांस हुए बाद उस मांस में निरंतर असंख्याते जीव उत्पन्न होते रहते हैं। माँस अभक्ष्य है। मधु त्याग, शहद मक्खियों का वमन और मल है और उसमें अनेक जीव उत्पन्न होते रहते हैं, जो लोग शहद तोड़ते हैं उसमें अनेक हिंसायें हो जाती हैं, और वह वस्तु ऐसी है कि उसमें निरंतर जीवोत्पत्ति होती रहती है। तो यह माँस अभक्ष्य है। जैन शासन में उत्पन्न हुए लोगों के अष्टमूल गुण के विरुद्ध प्रवर्तन भी नहीं है और कदाचित किसी ने मद्य, मांस, मधु का प्रयोग किया हो तो उस बेचारे को जैन शासन की महिमा ज्ञात नहीं है। तो मद्य मांस मधु का त्याग और पंच उदंबर फलों का त्याग ये श्रावक के 8 मूल गुण हैं। उदंबरबड़ पीपर ऊमर कठूमर पाकर आदिक बताये गए हैं, पर लक्षण से यह जानें कि जिस पेड़ में फूल तो आयें नहीं और पेड़ की शाखाओं में ही फल लग जाये तो ऐसे फल उदंबर कहलाते हैं। इनका त्याग हो, बारह व्रतों का पालन हो। 5 अणुव्रत, 3 गुणव्रत, 4 शिक्षा व्रत, इनका वर्णन आ चुका है और 12 प्रकार के तपों में श्रावकों की शक्ति के अनुसार जो बन सकता है वह करता है इस तपश्चरण को। तपश्चरण के रहने पर यह उपयोग खोंटी जगह नहीं आता है। यह अपने विशुद्ध भावों को ही अनुभवता है। तो 12 प्रकार के तप ये श्रावकों की मूल क्रियायें हैं। श्रावकों की 53 क्रियावों में ये सब बातें बतलायी जा रही हैं।
   श्रावक की 53 क्रियावों में समतापरिणाम, एकादश प्रतिमा, दान, जलगालन अनस्तमित भोजन, दर्शनाराधना, ज्ञानाराधना व चारित्राराधना―समता परिणाम श्रावक की 53 क्रियावों में हैं। पूर्ण समता तो ऊपर के गुणस्थानों में आती है फिर भी लोक व्यवहार माफिक उसके समता परिणाम हुआ ही करता है। कोई अपराध करे तो उसको क्षमा कर देना, ऐसी अपने स्वभाव की रुचि बने, वह समता भाव है। श्रावक की 53 क्रियावों में 11 प्रतिमायें हैं ये संयम में बढ़ते हुए जीव के दर्जे हैं। दान यह श्रावक की 53 क्रियावों में हैं प्रतिदिन दान करना चाहिए जो व्यापारादिक से किसी प्रकार से पाप उत्पन्न किया है तो उसके दूर करने का उपाय यह ही उन बाह्य पदार्थों का त्याग कर देना है जिसको उपयोग में लेकर यह जीव अनर्थ विकार करता चला आ रहा। जलगालन―यह श्रावक की क्रियावों में है। जल छानकर पीना। कहीं भी जा रहे हैं। जल छानकर कैसे पिया जा सकेगा कि अपने पास छन्ना गिलास वगैरह साधन रखें। तो जल छान कर पीना, यह श्रावकों की 53 क्रियावों में है और अनस्तमित याने सूर्य का अस्त न हो पाये उससे पहले ही दिन में भोजन कर लेना। इस अनस्तमित को बुंदेलखड़ में अंथौ कहते हैं। यह इसका बिगड़ा रूप है। संक्षिप्त शब्द है अनस्तमित भोजन। सूर्यास्त से पहले भोजन कर लेना अनस्वमित अथवा अंथो शब्द के अतिरिक्त कोई ऐसा संक्षिप्त शब्द नहीं जो यह बात जाहिर करे कि दिन में भी भोजन करना श्रावक का कर्तव्य है, फिर जो शब्द लगाते हैं लोग―जैसे व्यालू कर लो, खाना खालो मगर उन सबका अर्थ अनस्तमित नहीं। रात्रि में भोजन करने को भी व्यालू कहते हैं, खाना शब्द तो किसी भी समय खाने को बोलते हैं। पर श्रावक की 53 क्रियावों में सूर्यास्त से पहले भोजन कर लेना क्रिया बताया है और सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्र, इनका आदर होना, इनके प्रति शक्ति अनुसार चलना, ये सब मिलकर श्रावक की 53 क्रियायें होती हैं। वे 53 क्रियायें क्या हुई? 8 मूल गुण, 12 व्रत, 12 तप, समता, 11 प्रतिमा, दान, जलगायन, अनस्तमित भोजन और दर्शन ज्ञान चारित्र की क्रियायें, ये सब श्रावक की 53 क्रियायें कहीं गई हैं।


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