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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 141

From जैनकोष



कालमणंतं जीवो मिच्छत्तसरूवेण पंच संसारे।

हिंडदि ण लहइ सम्मं संसारब्भमणपारंमो।।141।।

   संसारी जीव का मिथ्यात्वस्वरूप से पंच संसार में अनंतकाल परिभ्रमण―अनंत काल व्यतीत हुआ मिथ्यात्व के स्वरूप से तन्मय रहने में इस जीव का और यही कारण है कि अनंत काल यह पंच संसार में भ्रमण करता रहा। संसरण का नाम संसार है अर्थात् भ्रमण। जन्म लेना और मरण करना यह ही जहाँ बना रहता है उसे कहते हैं संसरण। यह संसरण अनादि काल से जीव का चला आया है। उस अनादि काल का परिचय बताने के लिए पंच परिवर्तन की बात कही गई है। एक परिवर्तन का ही बहुत समय है फिर ऐसे तो अनंत परिवर्तन हो गए जीव के, जब से यह संसार में है याने आदि ही नहीं है। सत् है चला आया है कितना पुराना बूढ़ा है यह जीव ने संसार में जनम मरण करके खोया और जब भी जिस भव में गया उस भव में जो संग प्रसंग मिला उसको ही इसने अपना सब कुछ मान डाला और यही अटक इस जीव को संसार में रोके हुए है। यदि सर्व पदार्थों से विभक्त होकर केवल अपने आप के स्वरूप में रमे तो इस जीव को संकट न रहेगा। करना यह ही होगा। यदि होनहार भला है तो यह जीव अपने अविकार सहज ज्ञानस्वरूप को पाये बिना संसार में अनादि से रुलता चला आया। अब उस अनंत काल का समय जानने के लिए पंच परिवर्तन की बात सुनिये।
   पंच संसार परिवर्तनों में क्षेत्रसंसार परिवर्तन का दिग्दर्शन―(1) द्रव्य परिवर्तन, (2) क्षेत्र परिर्वतन, (3) काल परिवर्तन, (4) भाव परिवर्तन, और (5) भव परिवर्तन ये पाँच परिवर्तन हैं इनमें द्रव्य परिवर्तन और भाव परिवर्तन पीछे सुनिये, पहिले क्षेत्र परिवर्तन, काल परिवर्तन व भव परिवर्तन की बात सुनिये ये सुगममतया समझ में आ जायेंगे। क्षेत्र परिवर्तन क्या कि जैसे मानो जब से एक परिवर्तन की बात मानी है यह जीव इस लोक के ठीक बीच में अतीव छोटा शरीर लेकर उत्पन्न हुआ, मायने निगोद जैसा जीव, एकेंद्रिय जैसा। ठीक बीच कहाँ है लोक का? इ सुमेरु पर्वत की जड़ में उसके ठीक बीचों बीच नीचे। वह बीच भी क्या एक प्रदेश का है या दो प्रदेश का है। नहीं वह बीच 8 प्रदेश का है। इस लोक में प्रदेश हैं 


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