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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 144

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णिक्खेवणयपमाणं सद̖दालंकारछंदलिहयाणं।

णाडय पुराणकम्मं सम्मविणा दहिसंसारं।।144।।

   सम्यक्त्व के बिना निक्षेपपरिचय में भी दीर्घ संसार―सम्यक्त्व यदि नहीं है तो चाहे ज्ञान के बारे में क्रियाओं के बारे में, चारित्र आदिक के बोध के बारे में कितना ही बढ़ा चढ़ा हो जाय पर सम्यक्त्व न होने से वहाँ संसार ही संसार है जन्म मरण ही है। वहाँ मोक्ष का मार्ग नहीं है। ज्ञान में निक्षेप, नय, प्रमाण खूब समझ लीजिए और जिसके आधार से बड़ी तत्त्व चर्चायें चलती हैं। निक्षेप मायने लोक व्यवहार। नाम निक्षेप। किसी भी वस्तु का नाम रखो कुछ भी व्यवहार नहीं बन सकता। नाम के बिना कुछ चल नहीं सकता। किस को पुकारोगे क्या चीज मँगाओगे? न परमार्थ में कोई तीर्थ प्रवृत्ति चलेगी न लोक व्यवहार चलेगा इसलिए नाम तो पहले जानना जरूरी है। देखिये रागद्वेष नहीं है तो कहीं अड़चन नहीं और अगर मोह रागद्वेष वर्त रहे हैं तो एक नाम ही इतनी बड़ी अड़चन है कि जिसके कारण पर्याय बुद्धि बनती है। कर्म का आश्रव होता है हर एक मनुष्यों के नाम है न? तो हर एक कोई अपने नाम के अक्षरों में बड़ी रुचि रखता है। उससे अपना बड़ा महत्त्व समझता है। तो इससे कर्मों का आश्रव है ना। और जितने कर्मों के आश्रव हैं उपाय हैं उनमें अभेद का विषय बौद्धग्रंथों में तो नाम को बताया है। सारा सिलसिला नाम से चलता है जैन शासन में पर्याय बुद्धि के बताया है कि जिसमें सब गर्भित हो जायगा उसमें नाम भी आयगा। नाम को मानना कि यह मैं हूँ यह मेरा नाम है देह को मानना कि यह मैं हूँ यह मेरा देह है तो आश्रव का मूल है देहात्मबुद्धि सो सम्यक्त्व नहीं हैं। तो कोई ज्ञान भी विशेष करले तो उसे ज्ञान में ज्ञान विकल्प में चलेगा। स्थापना निक्षेप क्या है कि किसी भी चीज में तत्त्व की स्थापना करना जैसे मूर्ति में भगवान की स्थापना करना मूर्ति स्वयं भगवान तो नहीं हैं। भगवान तो अब देवालय में विराजे हैं पर उनकी स्थापना है इससे लोक व्यवहार चला। द्रव्य निक्षेप आगे पीछे कि बात को वर्तमान में जोड़ना इसके बिना भी व्यवहार नहीं चलता। जिसका संकल्प किए हुए हैं उसका नाम पहले से ही लेना चाहिए अथवा जो बात गुजर गयी है उसको वर्तमान में ही लेना चाहिए ऐसा यह द्रव्य निक्षेप है। जैसे दीवाली आयी उस दिन भगवान महावीर मोक्ष गये बताओ आज गये क्या किस जगह से गए उनको तो हजार वर्ष से कुछ अधिक ही हो गए मगर लोग आज का नाम लेते हैं। कोई पहले कोतवाल था कुछ भी रहा रिटायर हो गया या स्थगित हो गया अब भी उसे कोतवाल कहना इसके बिना व्यवहार नहीं चल रहा। नाम लेते ही हैं भाव निक्षेप है जैसा है वैसी ही बात उस ही क्रिया में कहना जैसे पूजन करते समय पुजारी शब्द बोलना अन्य समय नहीं।
   सम्यक्त्व के विना नयप्रमाणविषयकज्ञानवितर्क में भी दीर्घ संसार―नयों का भी बहुत बड़ा विषय है। द्रव्य दृष्टि से वस्तु नजर आती है ध्रुव। पर्याय दृष्टि से वस्तु नजर आती है विनश्वर। इसी तरह एक अनेक, तो उन नयों में पदार्थ का परिचय पाना यह नय अज्ञान है और समग्र पदार्थ गत धर्म का बोध करना प्रमाण है। तो नय निक्षेप प्रमाण आदि का बहुत बड़ा ज्ञान भी सम्यक्त्व के बिना दीर्घ संसार रूप है क्योंकि सम्यक्त्व नहीं है तो उस ज्ञान से अहंकार बढ़ेगा। अपनी उस वर्तमान पर्याय में रमेगा। उसको लाभ नहीं हैं।
   सम्यक्त्व के बिना शब्दालंकार छंद नाटक पुराण आदि परिचय में भी दीर्घसंसार―सम्यक्त्व के बिना लौकिक कला भी बहुत पा ले जैसे शब्दालंकार छंदशास्त्र नाटक पुराण आदिक का ज्ञान करले तो भी सम्यक्त्व न होने से चिरकाल इसका संसार में ही भ्रमण होता है। सबसे पहले उसके अलंकार काव्य रचना ये लोक में ऊँचे ज्ञान माने जाते हैं। जैसे जब कभी कवि सम्मेलन कोई कराता है। तो उसमें कई हजार रुपया लोग खर्व कर देते हैं। उस समय तो कविजन सबका मन खुश कर देते हैं कोई हँसी की बात, राग की बात या जो बात मोहियों को चाहिए उसके अनुकूल वे कविजन बात कहेंगे तब ही तो इनाम मिलेगा। यह क्या है? शब्द और शब्दालंकार। यह लौकिक ज्ञान है। जिसका लोगों पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। मगर सम्यक्त्व यदि नहीं है तो उसमें अहंबुद्धि ही तो रही। सुनने वाले ने पर्याय बुद्धि का पोषण किया। कहने वालों ने पर्याय बुद्धि का पोषण किया तो संसार सबने बढ़ाया यदि सम्यक्त्व नहीं है और ज्ञान वाली कविता हो, ज्ञान की बात हो तो वह कहाँ सुहाती? उसके सुहाने वाले बहुत अल्प है तो उन बहुसंख्या वालों को प्रसन्न करें या आपको प्रसन्न करें? बहुसंख्या को प्रसन्न करते हैं तो शब्दालंकार आदिक से मोह पुष्ट करने वाली बात ही तो आयी। तो सम्यक्त्व बिना यह सब दीर्घ संसाररूप है। छंदशास्त्र आशुकवि भी हैं जो कि तुरंत ही छंद बना लेते हैं। मौका पाकर जो घटना है उसी का काव्य बना लें पर यह भी एक परिज्ञान है रहो परिज्ञान और इस दुनिया में चाहे कुछ पंथ भी पाले लेकिन सम्यक्त्व के बिना ये सब बातें दीर्घ संसार के कारण हैं। नाटक पुराण, शास्त्र वगैरह इनका भी ज्ञान होता है मगर प्रायः करके कोई रागवर्धक बातें ही बातें लाते ज्ञानी पुरुष कम है और ज्ञान से संबंध रहे ऐसा नाटक लोग कम करते हैं क्योंकि बहुसंख्या में लोग मोहीजन हैं। सो एकदम सीधा तो नहीं कुछ ज्ञान की बात उनके गले उतर सकती है तो अनेक कलाओं से यह भी चलता मगर सम्यक्त्व अगर नहीं है। तो ज्ञान भी दीर्घ संसार के कारण हैं। सम्यक्त्व यदि है तो उसके लिए सब भला ही भला है सम्यक्त्व भाव नहीं है तो उसके लिए सर्व क्रियायें विडंबना रूप हैं।


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