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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 16

From जैनकोष



दिण्णइ सुपत्तदाणं बिसेसदो होइ भोगसग्गम ही।।

णिव्वाणसुहं कमसो णिदि̖दट्ठं जिणवरिंदेहिं।।16।।

   सुपात्रदान से सुगतिलाभ―सुपात्र में दिया गया दान विशेष रूप से भोगभूमि और स्वर्गसुख प्राप्ति का हेतु बनता है। यह तो बात प्रसिद्ध ही है कि दान से भोग भूमि मिलती है, पर साथ में सम्यग्दर्शन भी हो तो उससे भी ऊँची बात मिलती है। देवगति में भी अनेक ऊँचे पद हैं जो उनको प्राप्त होते हैं। जितने दक्षिण स्वर्ग के इंद्र हैं वे सब एक भवावतारी हैं। सौधर्म स्वर्ग का इंद्र अब सीधा मनुष्य होकर निर्वाण को प्राप्त होगा, ऐसे ही लोकपाल। लोकपाल होता है कोतवाल की तरह। उन पर बड़ी जिम्मेदारी होती है और वे इतने दयालु और सर्व हितचिंतक होते हैं कि उनका समय विशुद्ध ध्यान में जाता है, वे भी एक भव पाकर मोक्ष जाते हैं। लौकांतिक देव सर्वार्थसिद्धि के देव, कितने ही पद ऐसे हैं देवगति में कि जो एक भव पाकर मोक्ष जायेंगे और उनसे भी बढ़कर देखो सौधर्म इंद्र की इंद्राणियां करीब अरब खरब नील कई नील इंद्राणियाँ सौधर्म इंद्र की, उनके जीते जी मोक्ष चली जायें क्योंकि इंद्राणियों की आयु थोड़ी होती है पल्यप्रमाण, तो झट मनुष्य हुई और मोक्ष गई। ऐसे ही अरब खरब नील इंद्राणी मोक्ष चली जाती सौधर्म इंद्र के देखते देखते। कितने ही पद देवगति में ऐसे हैं जो एक भव पाकर मोक्ष जायेंगे। तो ऐसी सद̖गति में प्राप्त होना सुपात्र दान का फल है। यह बात इस गाथा में कुंदकुंदाचार्य ने जिनका कि अध्यात्म बहुत जबरदस्त विषय था, जिन्होंने समयसार―प्रवचनसार, पंचास्तिकाय जैसे अनेक पाहुड़, रचे, उन्हीं कुंदकुंदाचार्य ने श्रावकजनों पर दया करके उनके गृहस्थोचित कार्यों को बताया है कि इस प्रकार से वे अपना जीवन बितावें और अध्यात्म की दृष्टि को गंभीर बनावें।
   श्रावकों का ध्यान, अध्ययन कर्तव्य होने पर भी प्रभुपूजा और दान का मुख्य कर्तव्य―तो इस गाथा में कह रहे हैं कि सुपात्र को जो दान दिया जाता है वह विशेष रूप से भोग भूमि और स्वर्ग को प्राप्त कराता है और क्रम से मोक्ष सुख भी मिलता है, ऐसा जिनेंद्रदेव ने कहा है―अब मोक्षमार्ग और मोक्ष के निकट होने वाले भव्य पुरुष शुद्धोपयोग में रत हुआ करते हैं, पर शुद्धोपयोग की प्राप्ति जिन-जिनको भी प्रारंभ में हुई शुभोपयोग पूर्वक ही हुई। अशुभोपयोग के बाद किसी को नहीं हुई। वे ही शुभोपयोग बताये जा रहे हैं। मोक्षमार्ग में चलने वाले साधुजन हैं, उनके प्रति प्रेम जगने के मायने मोक्षमार्ग के प्रति प्रेम जगना है। तो इस प्रकार यह श्रावक अपने कर्तव्यों में रहता है तो वह मोक्षमार्ग से भ्रष्ट नहीं हो पाता। अब इस अवस्था में कोई कहे कि क्या मतलब पूजा और दान से? ध्यान और अध्ययन बिना मुक्ति नहीं होती तो सीधा ध्यान और अध्ययन ही पकड़ें तो भाई ऐसा कोई पकड़कर दिखाओ जो ध्यान और अध्ययन के सिवाय कुछ न करें। गृहस्थी में है और वह केवल ध्यान अध्ययन के कार्य से ही जीवन बिता ले ऐसा उदाहरण मिलेगा नहीं, कोई विशेष कर ले वह बात तो ठीक है, मिलेगा, किंतु वह जिस स्थिति में है वह स्थिति तो अनेक पापों का कारणभूत है। क्या करेगा? असि, मसि, कृषि, सेवा, वाणिज्य आदि कोई तो उपाय बनायेगा अपनी आजीविका का बनाना ही पड़ता है गृहस्थ को तो उस ओर तो विकल्प जगा, वहाँ तो यह उत्साह से, उमंग से लगा रहता है। और उसके द्वारा लगने वाले पापों का प्रायश्चित न ले और ध्यान और अध्ययन की ही एकमात्र बात कहे तो उसके भीतर के हृदय को तो देखो वह स्वच्छंद रहता है, अभिमान में रहता है और उसका स्वयं विवेक काम नहीं कर पाता। भले ही कुछ कहने सुनने को कुछ बात बताये लेकिन उसके पात्रता नहीं रह पाती अतएव गृहस्थावस्था में रहकर पूजा दान भक्ति दर्शन आदि ये सब बातें आवश्यक हैं। इनको करते हुए ध्यान और अध्ययन में चलें तो वे तो निकल सकेंगे नहीं तो गर्व और स्वच्छंदता का कारण बनेंगे तो अध्यात्म विषय के महान विद्वान श्री कुंदकुंदाचार्य यहाँ यह बतला रहे हैं कि श्रावकों का मुख्य कार्य पूजा और दान है।


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