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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 18

From जैनकोष



खेत्तविसेसे काले वविय सुबीयं फलं जहा विउक्तं।

होइ तहा तं जाणहि पत्त विसेसेसु दाणफलं।।18।।

   क्षेत्रविशेष में बोये गये फल की भांति पात्रविशेष में दिये गये दान की बहुफलकारिता―योग्य काल में उत्तम क्षेत्र में बोया गया बीज जैसे बहुत फल को देता है ऐसे ही उत्तम पात्र में उत्तम अवसर पर दिए हुए दान का फल बहुगुण फल को देता है--द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव, बोने वाला कुशल हो, अच्छे खेत में बोया जाय उपजाऊ जमीन उत्तम अवसर पर बोया जाय और विशुद्धभाव वाला भी हो वह भी एक हेतु है अधिक उपजाऊ होने में। कारण कि वह पुण्य भाव को साथ लिए हुए है तो उससे पापकर्म खिरते रहते हैं। जैसे एक बीज बोया जाय तो उसमें करीब-करीब ढाई तीन सौ दाने तो उत्पन्न हो ही जाते होंगे, क्योंकि एक बीज बोने से कम से कम उसमें से 5-7 पौधे निकलते हैं। और प्रत्येक पौधे में से अगर एक-एक बाल निकलें तो एक दाने से 5-7 बाल तैयार हो गए। और एक बाल में करीब 4॰ बीज तो होते ही होंगे। इस हिसाब से लगा लो, एक बीज से कितने बीज पैदा हो गए? करीब ढाई तीन सौ बीज पैदा हो गए। ऐसे ही दान देने वाला भी योग्य कुशल पुरुष विनय भाव से मोक्षमार्ग के प्रति आदर (आस्था) होने से और उत्तम पात्र को दिया हुआ हो। ज्ञानी सम्यग्दृष्टि एक आत्मध्यान में ही रत ऐसे साधु संत को दिया हुआ हो, उत्तम अवसर पर दिया हुआ हो, उत्तम भाव से दिया हुआ हो तो वह बहुत विशेषफल को प्रदान करता है। यदि पात्रदान की परंपरा न होती तो यह परंपरा तीर्थ प्रवृत्ति यह भी न हो पाती। देखिये जिस समाज में गुरु नहीं होते वह समाज ऊँचे उठ नहीं पाता। किसी भी प्रकार के गुरुजन हों, अगर समाज का रूप रहता है तो वह गुरुजनों के आश्रय से रहता है। अन्यथा सब स्वच्छंद और अपने-अपने मन की बात, उनको कोई आदर्श मार्ग देखने को मिलता नहीं तो किंकर्तव्यविमूढ़ से होकर अपने कल्याण के उपाय को नहीं पा सकते। और, जब समाज में गुरुजन होते हैं तो उनके योग्य उनकी सेवा सुश्रुषा में हर प्रकार से जो चलता है तब तो वह परंपरा रहती है। इन सब बातों को ध्यान में रखकर आचार्यदेव यहाँ पात्रदान को जुदे ही एक प्रकरण में कह रहे हैं।


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