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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 53

From जैनकोष



असुहादो णिरयाऊ सुहभावादो दुसग्गसुहमाओ।

दुहसुहभावं जणइ जं ते रुच्चेइ तं कुज्जा।।53।।

   अशुद्ध भाव व शुद्ध भाव का फल―अशुभ भाव से नरकायु मिलती है और शुभ भाव से स्वर्ग के सुख मिला करते हैं, और सुख दुःख को तो यह जानता ही है। संसार का सुख क्या है और संसार के दुःख क्या हैं, इससे लोग परिचित ही हैं। दुःख मिलता है अशुभ भाव से और सुख मिलता है शुभभाव से। अब जहाँ रुचि हो वहाँ लगियेगा। अगर दुःख ही पाना है। नरकादिक दुर्गतियाँ ही पाना है तो उसका उपाय है खोटे भाव करना। अशुभ भाव क्या है सो आगे विस्तार से बताया जायगा, पर संक्षेप में इतना ही समझिये कि जो पापभाव है वह अशुभ है, जो पुण्यभाव है वह शुभ है। एक पहिचान मोटी और है। जो भाव सबको न सुनाये जा सकें, जो बात सबके आगे न की जा सके वह अशुभ भाव है करीब करीब। जो सब को दिखाकर भी किया जा सके जो अपने भाव भी बताये जा सकें वे भाव पुण्यभाव ही होते हैं, कोई समाज में, कोई सभा में कोई भीतर अपने पाप की बात कह सकता क्या? और पुण्य की बात चित्त में आये, शुभ की बात तो हर कोई कहते हैं। न भी आये तो भी बनाकर कहते हैं कि हमारी तो बड़ी शुद्धभावना है। तो एक मोटी सी बात है। अरे, अशुभ भाव और शुभभाव को कौन नहीं जानता? पाप की बात और भली बात इनको तो कुत्ता बिल्ली भी जानते। कुत्ता अगर चोरी से आपके रसोईघर में से रोटी चुरायगा तो कितना दबा हुआ जायगा, अगल बगल भी देखेगा, पूँछ दबाकर जायगा और उसको आप अपने हाथ से रोटी दें तो कैसा खुश होकर पूछ हिलाकर और कुछ शब्द करके प्रसन्नता से खाता है। तो वह कुत्ता भी जानता है कि यह चोरी का काम है ꠰ तो जो अशुभ भाव है उनसे नरकायु मिलती। अशुभ भावों में प्रधान अशुभ कौन है? बहुत आरंभ, बहुत परिग्रह, विषयों में आशक्ति, इनसे ही नरकायु का आश्रव होता है। बहुत काम बढ़ा लिया, कई जगह काम कर लिया उनमें आशक्ति है। परिग्रह बहुत जोड़ा है उसे देख देखकर खुश होते हैं, विषयों में बड़ी आशक्ति है। पंचेंद्रिय के विषय उसे बहुत प्रिय लगते हैं, तो ये बातें जीव के हित के लिए नहीं है।
   जीवोपकार व देहोपकार का परस्पर विरोध व कर्मफल का निर्देश―आचार्य देव ने बताया है कि यज्जीवस्योपकाराय तद्देहस्यापकारकम। यद्देहस्योपकाराय तज्जीवस्यापकारकम―जो बात जीव के उपकार के लिए है वह बात देह के अपकार के लिए है। व्रत नियम, तप, त्याग, संयम आदि ये जीव की भलाई करने वाले हैं तो इन कामों से शरीर सूखता है, इनको करने के लिए कोई तैयार कहाँ होता? और, जो बात शरीर का उपकार करने वाली है वह बात जीव का बुरा करने वाली है। खूब खावें दो बार, चार बार, छह बार, शरीर को बहुत पुष्ट करें तो इसमें जो विषय भाव बने वे तो इस जीव के अपकार के लिए हैं। तो लोग थोड़ा धन वैभव पाकर, थोड़े साधन पाकर अपने आपको भूल जाते हैं। वहाँ अशुभ भाव बनता और उनका फल आगे भोगना होता है। आज कोई जन्म से ही धनी है कोई दरिद्र है कोई पूर्ण अंग वाला है। किसी के गर्भ में ही कोई हाथ पैर बिगड़ गए। जन्मते ही हाथ पैर बिगड़ गए। आँखें बिगड़ गईं, बड़ा मोटा सिर हो गया या छोटा सिर रह गया। दिमाग काम नहीं देता, जन्मते ही मनुष्यों में यह फर्क कहाँ से आ गया? वह जन्म लेता, 1॰-5 वर्ष का होता, फिर खोटे काम करता तब बन जाता लंगड़ा लूला, अपाहिज, अंधा। मगर जन्म से ही ऐसा पैदा हो गया। तो यह फर्क कहाँ से आया? जो लोग ऐसा मानते हैं कि ईश्वर ने बनाया सबको और पहले यह जीव था ही नहीं, नया-नया पैदा कर दिया तो नया-नया पैदा करने में पैदा के समय फर्क क्यों? वह तो एक समान होना चाहिए था। पहले तो यह था नहीं, पहले तो इसका कोई कर्तव्य था ही नहीं। सत्ता ही न थी अब नया बना है एक चीज, तो शुरु-शुरु में फर्क कैसे आ गया?
   यह फर्क सिद्ध करता है कि जीव पहले था। जैसे भाव हुए, जैसे कर्म बंध हुए उसके अनुसार यह अंतर पड़ रहा है। तो आज जो खोटे कर्म किए जायेंगे तो ये आगे अपना फल न देंगे क्या? अंतर न आयगा क्या? तो अशुभ भावों से बचना, शुभ भावों में रहना, यह एक कर्तव्य है। एक रीति रिवाज के कारण लोग 8-1॰ दिन तक पर्व मना रहे तब तक तो धर्म होड़ लगाकर किया जा रहा है, अंतस्त्तत्व का परिचय नहीं तो धर्म कुछ नहीं हो रहा, धर्म तो आत्मा के सहज स्वरूप का श्रद्धान, ज्ञान और आचरण है। न उसके पहले कोई धर्म की भावना और न उसके बाद भावना। तो लोग कह देते कि चलो इतना ही अच्छा है। जैसे जिसके कोई संतान नहीं होती और हो जाय एक कानी लड़की तो लोग कहते हैं कि चलो न होने से कानी ही अच्छी है। तो ऐसा संतोष धर्म के मामले में कोई कर ले कि चलो 1॰ दिन ही सही, धर्म के काम में अपना कुछ समय तो लगाया, तो ऐसी बात मोक्षमार्ग के लिये न चलेगी।
   शुद्ध अंतस्तत्त्व का लक्ष्य रखने के शुभ भाव की वृत्ति होने व अशुभ भाव से बचने का कर्तव्य―अरे आत्महित के नाते से कुछ सोचना पड़ेगा। ये परिवार के लोग, ये बाहरी धन वैभव आदिक समागम, ये कुछ भला न कर देंगे। ये धार्मिक क्रिया कांडों की ऊपरी-ऊपरी बातें भी कुछ भला न कर देंगी, ये तो एक साधन है। देव पूजा, गुरु सेवा, वंदना आदिक जो-जो भी करते हैं, वे साधन हैं। ये ही साध्य नहीं हो गए कि जो यह संतोष कर लिया जाय कि हमने तो विधान कर लिया, बस पार हो गए। सो वे साध्य नहीं हैं। वे एक साधन है कि उनमें गुजरते हुए हम अपने आत्मा का ध्यान, आत्मा की भावना बनावें, अशुभ भाव न होने दें, शुभ भाव चलने दें। इन शुभ भावों के फल में अच्छा कुल मिले, स्वर्ग के देव हुए तो जिनेंद्र देव के दर्शन करने का मौका मिलेगा। धर्म में स्थित बने रहेंगे, आगे बढ़ते जायेंगे। तो नरक गति से स्वर्ग गति तो भली ही है। संसार के नाते से तो एक बराबर है। स्वर्ग में गए तो संसार में रहे, नरक में गए तो संसार में रहे मगर एक प्रेक्टिकल ढंग से देखा जाय तो नरक से स्वर्ग भला है। अनेक प्रसंग मिलते हैं धर्म के। तो आचार्यदेव कहते हैं कि अशुभ भावों से नरकगति होती है जिसमें कठिन दुःख है। शुभ भावों से स्वर्ग गति मिलती है जिसमें कि लौकिक बहुत सुख हैं। अब तुम्हारी जैसी मर्जी हो वैसा काम कीजियेगा तो समाधान तो यह ही होगा कि दुःख में रुचि नहीं है सुख में रुचि है। अगर सुख में रुचि है तो शुभ भाव कीजिए, सुख शांति रहेगी, अगर दुःख से ही प्रेम है तो वह तो करने ही जा रहे हो। जो अशुभ भाव किए जा रहे हैं उनका फल है क्लेश।


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