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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 63

From जैनकोष



‘‘पुव्वं सेवई मिच्छामलसोहण हेड सम्ममेसज्जं।

पच्छा सेवइ कम्मामयणा सण चरिय सम्मयेजज्जं।।63।।’’

   हाँ पहली गाथा में बताया था कि ज्ञान मात्र से व्याधि दूर नहीं होती तो ऐसे ही समझो कि धर्म के तत्त्व की बात जान लेने मात्र से जन्म मरण के संकट दूर नहीं होते, किंतु उस ज्ञान को अपने ज्ञान में उतारे और अपने को निर्विकल्प अनुभव करें तो इस परम् समाधि के बल से रोग दूर होता है, जनम मरण का संकट दूर होता है, तो उसी दवाई को इस गाथा में कर रहे हैं। सबसे पहले तो मिथ्यात्व मल के शोधन के हेतु सम्यक्त्व रूपी औषधिका सेवन करें। कोई रोग हो जाता है तो वहां चतुर वैद्य क्या करता है। कि पहले पेट साफ करने का इलाज सोचेगा। मल शोधन का इलाज सोचेगा। तब ही तो कितनी ही बीमारियाँ कम होने से, दस्त होने शांत हो जाती हैं। तो मल शोधन की पहले दवाई देता है चतुर वैद्य ऐसे ही मिथ्यात्तमल के शोधन की दवाई यहाँ बताया है सम्यग्दर्शन। बुद्धि सही होने लगे मूढ़ता न रचे पचे। मैं ज्ञानमात्र हूँ मेरा जानन काम है। मैं जानता रहूँ बस यह ही मेरा स्वरूप है धर्म है, इसमें कोई इष्ट अनिष्ट की बुद्धि बना ले तो वह बंधन में पड़ जाता है। तो पहले अपनी सद्बुद्धि बनानी चाहिए। सद्बुद्धि के मायने यह हैं कि जगत में अणु-अणु सब स्वतंत्र अपना अस्तित्व लिए हुए हैं, ऐसी पहले परख बनना चाहिए। जैसा जो कुछ ये दिख रहे हैं स्कंध इसको लोग क्या कहते? मायाजाल कैसे माया कहलायी सो तो बतलाओ? कहाँ बैठा है वह मायातत्त्व और कैसे वह अपना विश्वास करता है? सोचना तो चाहिए। माया मापने क्या? केवल एक वस्तु रहे तो वह माया नहीं, और जहाँ दो या अनेक चीजें मिलकर कोई रूप रख लें उसका नाम है माया।
   माया-माया तो बहुत लोग बोलते हैं पर माया का स्वरूप क्या है और किस कुंजी से जाने कि यह माया का यह स्वरूप है या, याने जो नहीं मापने यह तत्त्व है अपने अंतः प्रकाश मान जो यह अंतस्तत्त्व है सो यह यो। यह नहीं है और जो यह नहीं है सो वह यह है केवल माया और केवल वे दो बातें समझना चाहिए। केवल तो परमार्थ है और माया अभूतार्थ, असत्यार्थ और मिथ्या है केवल एक तो कभी मिटेगा नहीं। एक का तो भंग कभी होगा नहीं, पर दो या अनेक मिले हुए हों तो उनका तो भंग हो जायगा। वे तो बिखर जायेंगे, पर एक कभी बिखर नहीं सकता। तो जो बिखर जाय, विनश जाय, रूपांतर हो जाय वह सब माया है, और जो एक है केवल है वह कभी बिखरता नहीं। वह तो इकाई है, मिलावट तो नहीं, वहाँ मिलावट में भी जो इकाई है ऐसा परमार्थ है वह नहीं मिटता अगर मींट मींट गिर ई, मिट गई तो क्या परमाणु मिट गए? उन परमाणुओं का मिलकर जो एक यह रूप बना रखा है वह रूप न रहो तो माया रहती नहीं है। अनेक पदार्थों का मिलकर रूप बना उसका नाम माया है, तो सो इस माया में जिसको हितबुद्धि लग गई बस यह ही मिथ्यात्वमल है जो केवल एक सत् को जाने उसके चित्त में मोह नहीं ठहर सकता मोह अज्ञान में ही ठहरता है। ज्ञान जगने पर मोह रहता नहीं है। वह कौन सा ज्ञान है जिसके जगने पर मोह नहीं रहता। वह यह ज्ञान है। प्रत्येक पदार्थ को केवल जितना वह स्वरूप सत्त्व में है। उतना माने कि यह हैं परमार्थ चीज, यह है असली चीज और उनका मिलकर जो भी रूप बन गया, पशु पक्षी, मनुष्य, भींट वगैरह जो-जो भी बन गए वह सब माया है। तो इस माया में आत्मबुद्धि रखने का नाम है मिथ्यात्व। सो इस मिथ्यात्व रूपी मल का शोधन करने के लिए सम्यक्त्व रूपी औषधि को सेवन करो। इसके बाद कर्म रस को दूर करने वाले चारित्र रूप उत्तम औषधि का सेवन करो। इसकी चीज बतायी जा रही सम्यक्त्वाचरण और संयमा चरण।
   कल्याणलाभ के लिये सम्यक्त्वाचरण कि प्रथम आवश्यकता―सही ज्ञान होने पर जो अपने आप सहज वैराग्य और ज्ञान होता है वह तो है सम्यक्त्वा-चरण और बाह्य प्रसंगों से हटकर एक अपने आत्मा में ही मग्न होने का पौरुष चलता है वह है संयमाचरण। तो यहाँ उपदेश में बताया क्रम कि पहले तो सम्यक्त्वाचरण की औषधि का पान करो जो मिथ्यात्व मल को शोध देवे, उसके पश्चात् फिर कर्म मल को नाशने के लिए संयमाचरण चारित्र पालो। पहले सफाई करो फिर आनंद से रचना करो। पहले आत्मा में सफाई करो फिर आनंद से अपनी रचना बनाओ। तो पहले आवश्यक है कि यह निरखें कि एक-एक अणु पृथक-पृथक् अपनी सत्ता लिए हुए है। प्रत्येक जीव केवल अपने सत्त्व में है। इसका कुछ कारण तो बतलाओ कि जो यह मान रखा है कि यह तो मेरा लड़का है, यह तो मेरा अमुक है, उसका कारण तो बतलाओ, कैसे होगा आपका? केवल कल्पना बनाया है कि यह मेरा है, उससे कहीं हो नहीं गया आपका। तो इस मायामल का शोधन करने के लिए सम्यक्त्वाचरण है। इसके पाने के बाद सूक्ष्म से सूक्ष्म कर्म को मानो ढूंढ़-ढूंढ़ करके उसका विध्वंस करो, यह है सम्यक् औषधि जैसे धुनिया एक किलो रुई को धुनता है तो उसको वह इस तरह से धुनता कि इसमें से कोई भी अंश अछूता न रह जाय। एक-एक जगह देख-देखकर उसको धुन डालता है तो ऐसे ही ज्ञानी जीव सर्व मिथ्याभावों को धुन डालता है। तो यों संयंमाचरण औषधि है। संयम का तो रखना है ध्यान कि मैं कब संयमी होऊं कब समस्त रागद्वेषों से दूर बनूँ और सम्यक्त्वाचरण में अपने आत्मा के सहज स्वरूप का आभास लेना चाहिए।
   तत्त्वबोध और वैराग्य से ही शांति लाभ―कोई दो मित्र थे तो उनमें परस्पर यह विवाद हुआ परलोक के बारे में--एक कहे कि परलोक कुछ नहीं और एक कहे कि परलोक है, देर तक यही विवाद चलता रहा। अंत में जब एक यह बात आयी कि वह कौन सा उपाय है कि जिससे यह जीव शांत हो सके? तो बताया कि विषयों में प्रवृत्ति बढ़ाने से कभी शांति नहीं मिल सकती। शांति तो निवृत्त होने में है। अपने आप में अपने अविकार सहज चैतन्य ज्योति का अनुभव करने में शांति मिलती है। सो परलोक पर हो रही थी बहस। बहस होते-होते अंत में यह निर्णय आया कि देखो परलोक है अथवा नहीं कुछ देर को यह विचार भी छोड़ दो और वर्तमान की शांति तो देखो कि यह कैसे मिलती? क्रोध न करें, घमंड न करें, मायाचारी न हों, तृष्णा का लोभ न बढ़े ऐसी वृत्ति से कोई रहता है तो वह तो सन्मार्ग पाता है और जो सोचता कि जीवन पाया, जो चाहे खायें पियें, जैसे चाहे रहें, आखिर यह जीवन है काहे के लिए? जो इस तरह से मानता है वह संसार में रुलता है। तो वह परलोक वादी कहता है कि तत्काल तो शांति मिल ही गई। कु व्रत से रहे, संयम से रहे, आत्मध्यान में रहे तो अगर परलोक नहीं है तो न सही, इस भव में तो सुखी शांत हो लिया और परलोक अगर हुआ तो यहाँ का व्रत तपश्चरण यह सार्थक हो जायगा। मतलब यह है कि परलोक है या नहीं इस विषय में उलझने की अपेक्षा वर्तमान में उत्तम कार्य करना चाहिए, फिर तो पुनर्जन्म सफल ही हो गया। और यदि नहीं है पुनर्जन्म तो वर्तमान में तो शांति मिल ही गई। यह तो आगम के अभ्यास से ज्ञात होगा कि अपना शांति धाम कौन है और वह कैसे मिलता है। वर्तमान में तो इस उपाय से मिल ही गया। तो यों पहले सही-सही जानें कि मैं क्या हूँ और फिर उसी ही रूचि बन जाय, मिल जाय, तो ऐसे सम्यक्त्वाचरण और संयमाचरण से आत्मा को मुक्ति प्राप्त होती है।


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