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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 65

From जैनकोष



‘‘विणओ भत्तिविहीणो महिलाणं रोयणं विणा णेहं।

चागो वेरग्गविणा एदेदो वारिया भणिया।।65।।’’

   भक्ति हीन विनय की व्यर्थता की भाँति वैराग्य हीन त्याग की व्यर्थता―इस गाथा में यह बतलाते हैं कि यदि वैराग्य नहीं है तो त्याग निष्फल है। त्याग का प्रयोजन तो है यह कि अंदर में किसी भी बाह्य पदार्थ से राग न रहे क्योंकि राग से कर्मबंध होता है, राग न रहे तो कर्मबंध नहीं होता, राग और विराग इनमें बंध अबंध है। त्याग तो इस राग और वैराग्य की साधना के लिए है। सो बतलाते हैं कि जैसे भक्ति के बिना विनय व्यर्थ है। कोई पुरुष संकोच से लज्जा से, भय से या किसी भी कारण से विनय तो दिखाये और हृदय में भक्ति नहीं है तो यह विनय व्यर्थ है क्योंकि उस भक्ति से कुछ लाभ नहीं है क्योंकि हृदय में भक्ति नहीं है, बल्कि छल का दोष है और जिस के प्रति विनय की जा रही है उसका कोई लाभ नहीं तो भक्ति के बिना विनय व्यर्थ है। विनय का रूपक कैसा था पहले और कैसा बिगड़ कर आज रह गया। पहले समय में गुरुओं को जो गृहस्थ हैं, पंडित हैं, साधुओं की बात भी नहीं कह रहे हैं दंडवत प्रणाम करते थे और चिट्ठी में अब भी बहुत से लोग दंडवत प्रणाम लिखते हैं।
   तो उस दंडवत प्रणाम का अर्थ है पैरों में गिरकर पड़ जाना माने पूरा लेटकर प्रणाम करना। (यह लौकिक बात बोल रहे) फिर यह घट कर कितना रह गया? झुककर सिर नवाकर प्रणाम करना, फिर यह भी मिटा तो क्या रह गया कि खड़े ही खड़े प्रणाम करना, फिर यह भी मिटा तो क्या रह गया कि खड़े ही खड़े हाथ जोड़ कर सिर नवा लेना। जब इतना भी मिटा तो क्या रह कि सिर तो पेड़ की तरह सीधा रहे और हाथ जोड़ लेना। इतना भी मिटा तो क्या रह गया एक हाथ सिर पर लगा लेना, यदि उल्टा हाथ मस्तक पर लगायें तो वह हो गया एक आधुनिक रूप और सीधा लगायें तो पता नहीं कि वे अपने कर्म ठीक रहे या क्या कर रहे। (हँसी) और इतना तक भी मिटा तो हाथ वाथ कुछ न जोड़ना, सिर्फ खड़े ही खड़े प्रभु का नाम ले लिया। जब इतना भी मिटा तो प्रभु नाम भी न लेना किंतु बाबू जी, सेठ जी...यों बोल देना, यह हो गया प्रणाम। जब इतना भी मिटा तो जब सामने आते देखा तो जरा सा एक ने खिलखिला दिया जरा सा दूसरे ने खिलखिला दिया, यह हो गया विनय, और इतना भी मिटा तो यह रह गया कि एक दूसरे के गालों को हाथ लगाकर (थप्पड़ जैसा मानकर) विनय कर लिया। विनय का संबंध भक्ति से है। बाहरी विनय कम हो और आंतरिक भक्ति हैं तो उसका लाभ है कि भक्ति करता रहे और अंतरंग भक्ति नहीं है तो ऊपर से कितना ही विनय हो उसको लाभ नहीं होता तो यहाँ दृष्टांत दिया जा रहा है कि जैसे भक्ति के बिना विनय व्यर्थ है इसी तरह वैराग्य के बिना त्याग व्यर्थ है।
   स्नेहहीन महिलाओं के रुदन की भांति वैराग्यहीन त्याग की बनावट―दूसरा दृष्टांत देते हैं कि जैसे स्नेहहीन महिलाओं का रुदन व्यर्थ है स्नेह तो है नहीं प्रीति तो है नहीं, मगर दुनिया को दिखाने के लिए प्रीति वाला रुदन करती। जैसे अक्सर विदा होते समय बड़ी उम्र की महिलायें भी रोती हैं। यद्यपि उनको भीतरी में उल्लास है, खुशी है कि अच्छे मौके पर हम अपने घर पहुँच रही हैं फिर भी बाहरी रूप में ऐसा दिखावा करना पड़ता है कि मानो उन्हें जाने में बड़ा दुःख हो रहा। तो जैसे स्नेहहीन महिलाओं का रुदन व्यर्थ है ऐसे ही वैराग्य बिना त्याग व्यर्थ है। वैराग्य बिना त्याग की विडंबना भी होती है। वह कब तक त्याग निभायेगा। भावुकता में आकर त्याग ले लिया पर उस त्याग का निभाना तो मुश्किल होता है। वैराग्य नहीं है और त्याग किया तो पीछे अटपट परिणाम होने लगते हैं।


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