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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 7

From जैनकोष



मयमूढमणायदणं संकाइवसणभयमईयारं।

जेसिं चउदालेदे ण संति ते होंति सदि̖दट्ठी ।।7।।

तो अनंत, मगर समान संख्या वाले हैं। 2, 4, 6, 8, 1॰, यों बढ़ते जावों, दो-दो अनगिनते होकर भी उनकी गणना समान में पहुँचती है और यह समान संख्या पूर बसे पश्चिम में, दक्षिण से उत्तर में और ऊपर से नीचे में सब ओर से समझना है और है समान संख्या तो बीच क्या पड़ेगा? जैसे मानो अंगुल से छोटा कोई माप नहीं है और कोई कपड़ा 8 अंगुल है तो बीच क्या पड़ेगा? दो अंगुल और 9 अंगुल है तो बीच एक अंगुल पड़ जायगा, चार अंगुल एक और चार अंगुल दूसरी ओर। अगर समान अंगुल है तो बीच में दो अंगुल कहलायगा। यह लोक समान संख्या वाला है जब एक ओर से निरखें तो 8 प्रदेश बीच कहलायेंगे और ऐसे ही ये आत्मा है, ये भी समान संख्या वाले हैं तो लोक प्रदेश प्रमाण ना? तो सबसे छोटी अवगाहना जिसमें भी असंख्यात प्रदेश होते हैं, छोटी अवगाहना लेकर कोई जीव उस स्थान पर पैदा हो, जो लोक का ठीक बीच है याने मेरु पर्वत का नीचा स्थान, सो वहाँ के 8 प्रदेश पर इस अवगाहना के बीच के आठ प्रदेश रहे ऐसे मध्य में जन्म लिया हो एक बार मिला जन्म फिर उस अवगाहना में जितने प्रदेश हैं उतनी बार उतनी ही अवगाहना लेकर वहीं जन्में। अब लो असंख्यात बार वहीं जन्में, और यह कोई नियम तो नहीं है कि मरे के बाद तुरंत वहीं जन्में। लोक में कहीं भी जन्म मरण करता रहे वह गिनती में नहीं है। जब कभी फिर जन्में मरे उतनी ही अवगाहना लेकर तो वह दो नंबर पर आयगा ऐसे ही असंख्यात बार तो उसी जगह जन्म लिया फिर कोई एक दिशा चुन लीजिए उसके बाद के एक प्रदेश पर और बढ़कर जन्म ले फिर एक-एक प्रदेश चल-चलकर जन्म ले अब देखो कोई ऐसा नियम तो नहीं कि ठीक उसके बाद के प्रदेश पर ही वह जन्म ले। कहीं भी जन्म ले, वह गिनती में न आयगा इस परिवर्तन में। तो ऐसे एक ओर बढ़ते गए, सारे प्रदेशों पर जन्म ले लिया, दूसरी ओर बढ़े ऐसा चारों तरफ क्रम-क्रम से जन्म ले-लेकर जब सारे प्रदेशों में जन्म हो जाय। कितना बड़ा लोक है? 343 घनराजू प्रमाण। वहाँ के सर्व प्रदेशों में जन्म हो ले इस विधि से तब उसे कहते हैं एक क्षेत्र परिवर्तन। यह एक पर क्षेत्र परिवर्तन है। ऐसे-ऐसे अनंत क्षेत्र परिवर्तन हो गये संसार भ्रमण में इस जीव के।

   संसार काल परिवर्तन का दिग्दर्शन―काल परिवर्तन थोड़ा समझ लीजिए जैसे जब से हमें परिवर्तन शुरू समझना है वहाँ से दिखाये मानों कोई जीव उत्सर्पिणी काल के पहले समय में जन्म ले फिर मरकर किसी अन्य उत्सर्पिणी काल के दूसरे समय में जन्म ले तुरंत तो लगातार के उसी के दूसरे समय में जन्म होना असंभव है। अन्य उत्सर्पिणी आने पर हो भी सके पर बड़ा कठिन है। कहीं भी जन्म मिले। फिर उत्सर्पिणी का दूसरा समय आया। उस समय जन्म न हो अन्य समय में जन्म हो तो वह गिनती में नहीं। इस क्रम से उत्सर्पिणी के दूसरे समय में, तीसरे समय में ऐसे-ऐसे क्रमशः सारे उत्सर्पिणी के समयों में जन्म मरण हो जावे। और इस विधि के क्रम से और उत्सर्पिणी व्यतीत हुए बाद अवसर्पिणी में जन्म होवे ऐसा एक कल्पकाल में इस विधि से जन्म हो ले उसे कहेंगे एक काल परिवर्तन। ऐसे-ऐसे अनंत परिवर्तन व्यतीत हो चुके इस जीव को संसार में भ्रमते हुए।
   भवपरिवर्तन का दिग्दर्शन―भव परिवर्तन भी समझिये। कोई जीव जघन्य स्थिति की आयु से नरक में उत्पन्न हुआ। जघन्य स्थिति है नरक में 1॰ हजार वर्ष की कम से कम इससे अधिक है सागरों की याने इतने समय तक जीव को नरक में नार की होकर रहना होगा? जो नरक में जायगा। कम से कम स्थिति होगी तो 1॰ हजार वर्ष की। नरक में जन्म लेने से अब 1॰ हजार वर्ष में जितने समय होते हैं उतनी ही बार इस ही स्थिति को लेकर जन्म ले लेवे। नरक में नरक के बाद तो जन्म होता नहीं, अन्य भवों में जन्म लेकर नरक में आयेंगे और फिर भी वही स्थिति पाये सो नियम नहीं अनेक बार-बार नारकी हो ले असंख्यात बार मगर पास वाली एक समय अधिक वाली आयु न पाये तो वह गिनती में नहीं। ऐसे 1॰ हजार वर्ष के समय बराबर 1॰ हजार की स्थिति लेकर जन्म ले, फिर 1॰ हजार वर्ष एक समय की स्थिति लेकर जन्म ले, फिर 1॰ हजार वर्ष एक समय की स्थिति के जन्म, फिर इसमें समय बढ़-बढ़कर 22 सागर तक ही स्थिति में जन्म हो जाय तो एक नरक भव परिवर्तन है। ऐसे सब गतियों के परिवर्तन हैं। सिर्फ नव ग्रैवेयक से ऊपर के आयु वाले देवों में परिवर्तन न लगेगा, क्योंकि वे अतिनिकट भव्य हैं।
   द्रव्य परिवर्तन व भाव परिवर्तन का निर्देश―द्रव्य परिवर्तन में कोई द्रव्य ग्रहण किया अगृहीत। बहुत बार याने ऐसे अनेक बार अगृहीत ग्रहण कर ले तो एक बार गृहीत अनेक बार अगृहीत ग्रहण कर-कर एक-एक गृहीत करे ऐसा अनंत बार गृहीत ग्रहण हो तो एक मित्र जो ग्रहण भी है, नहीं भी है, ऐसे इनके 9 फेरों में उन परमाणुओं को ग्रहण कर ले उस काल को कहते हैं द्रव्य परिवर्तन। भाव परिवर्तन में भावों की बात है हल्के भावों से जन्म लिया फिर उसमें एक डिग्री और अधिक करे और अधिक करे, ऐसा कषाय योग ये सभी साधन बन जायें वह है भाव परिवर्तन। तो इस जीव ने अनादि से लेकर अब तक यों अनेक परिवर्तनों द्वारा संसार घूमा सो क्यों घूमा? मिथ्यात्व के वश होकर।
   आत्म प्रतीति से क्षणों की सफलता―अपने आत्मा के स्वरूप परिचय बिना जीवन बेकार। मनुष्य हुए का क्या लाभ? जीते रहे, खाते रहे, उमर बढ़ती है, मरण होता है, दूसरा जन्म होता है, ऐसा मनुष्य भव पाने पर और यहाँ अगर कुछ चिंता न रहे, इतना वैभव पाया कि गुजारा चलता रहे अथवा कुछ बड़ा कहलाये, तो सबकी सार्थकता है अपने आत्मस्वरूप के परिचय और अनुभव में। यह नहीं हुआ सो मिथ्यात्व के वश होकर यह जीव इस पंच संसार में भ्रमण कर रहा। इसने सम्यक्त्व प्राप्त नहीं किया। संसार परिभ्रमण का निवारण सम्यक्त्व से होता है। मार्ग ही न दीखे शांति का तो उस पर चले कैसे? पाये कैसे? तो ऐसे ही सम्यग्दर्शन ने शांति का मार्ग दिखा दिया। शांति का उपाय कहीं बाहर नहीं हैं। अपने ज्ञान के द्वारा अपने ही सहज ज्ञान स्वरूप को देखें, उसमें वह उपयुक्त होकर सहज आनंद रस का पान करे पता पड़ जाता कि शुद्ध होने का, अष्ट कर्म से रहित होने का सदा के लिए अनुकूल रहने का मार्ग बस यही है कि यह उपयोग अपने सहज अविकार ज्ञानस्वरूप में रमा करे। जिसको सम्यक्त्व हुआ उसके संसार परिभ्रमण नष्ट होता है। इस जीव ने सम्यक्त्व नहीं पाया इसलिए अनंत काल तक संसार में भ्रमण कर रहा। जब तक सम्यक्त्व न पायेगा। तब तक यह संसार में परिभ्रमण करता रहेगा।


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