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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 83

From जैनकोष



‘‘णाणब्भासविहीणो सपरं तच्चं ण जाणए किं वि।

झाणं तस्स ण होइहु जाव ण कम्मं खवेइण हु मोक्ख।।83।।’’

   ज्ञानभ्यासविहीन पुरुष की स्वपदरतत्वानभिज्ञता व जीवन व्यर्थता―जो ज्ञानाभ्यास से विहीन है वह जीव न अपने को जानता और न पर को जानता। अपने को अपने रूप से जानना अपना जानना कहलाता है और पर को पररूप से जानना सो पर का जानना कहलाता है। तो जो स्वपर द्रव्य को नहीं जानता वह कुछ भी नहीं जानता। किसी को भी वास्तव में नहीं जान पाता। तो जो जानता ही नहीं अपने आपको उसको आत्मा का ध्यान नहीं होता और ध्यान न होने से कर्म दूर नहीं होते और कर्म दूर न होने से मोक्ष नहीं होता। जितना जिसका जीवन शेष है उतने में ही यह उद्देश्य बनाये कि मैं अधिक से अधिक ज्ञानाभ्यास करके, ज्ञान लेकर, अध्ययन करके, स्वाध्याय करके तत्वों को परख कर मैं अपना शेष बचा हुआ जीवन अपना यह उपयोग ज्ञान से सुवासित रखूँगा। यदि यह बात न कर सके तो खुद ही उत्तर दो कि यह मनुष्य जीवन पाना किसलिए हैं। परिवार का पोषण तो पशु पक्षी भी करते, उदर पूर्ति पशु पक्षी भी कर लेते। कुटुंब की ममता, बच्चों की ममता पशु पक्षी भी किया करते, लौकिक इज्जत पशु पक्षियों में भी होती हैं यहाँ तो मनुष्य मनुष्यों को ही समझते हैं कि ये ही जीव हैं और वे ही अपनी इज्जत बनाये रहते हैं, पर ऐसी बात नहीं, ये पशु पक्षी भी अपनी बिरादरी में इज्जत से रहा करते हैं कोई अपमान भी महसूस करते। कभी देखा होगा कि बहुत से जानवर जंगल में चरा करते तो उनमें कोई गाय या बैल जिस चाहे को मारता फिरता और उन सब के बीच अपनी शान समझता तो इज्जत उनके भी होती। कौन सा लाभ पाया मनुष्य ने कि जिससे यह कहा जाय कि इसने अपना जीवन सफल किया?
   लोकेषणा की कृतियों में आत्महित का असंबंध―किसी का अगर कुछ अच्छा व्यवहार है, कोई दूसरों से अच्छा बोलता है, कुछ दूसरों के काम भी आता है, ऐसा पुरुष यदि गुजर जाये तो लोग इतना कह देते कि यह बड़ा उपकारी है, सबके काम आता है। अरे उस काम से भी क्या फायदा, उस उपकार से भी उसे क्या लाभ? वह तो लौकिक ढंग से उपकार कर रहा, कोई आत्मज्ञान के नाते से नहीं कर रहा। जो आत्मतत्त्व का बोध रखते हैं उनकी सारी क्रियायें रहस्य से भरी हुई हैं। कलापूर्ण होती हैं। वह अपना भी उपकार कर रहा और उससे दूसरों का भी उपकार हो रहा। बहुत धन कमा कमाकर रख गए कि मेरे लड़के, दामाद वगैरह भोगेंगे और सारा जीवन धर्म से विमुख होकर कषायों में आरंभ परिग्रहों में बिता डाला तो उनको न इस जीवन में शांति मिली न आगे भी शांति मिली। आत्मा के ज्ञान बिना शांति संभव ही नहीं है। तो देखो घर में रहते हैं, सब कुछ करते हैं पर जिस काम के बिना सब कुछ सूना है उसकी और दृष्टि ही नहीं, आत्मज्ञान के बिना सब सूना है, सब कुछ कार्य जंगल में रोने के समान हैं। जैसे जंगल में कोई रोये तो उसे सुनने वाला कोई नहीं है, उसका रोने का सारा परिश्रम व्यर्थ है। वह अपने आप ही कल्पनायें करके मिथ्यात्व में भ्रम कर खुद अपना घात कर रहा है। तत्त्वज्ञान तो मार्ग दिखाने वाला दीपक है। इस तत्त्वज्ञान बिना, तत्त्वज्ञान के अभ्यास बिना जीवन बिल्कुल बेकार समझिये।
   आत्मानुकंपा का अनुरोध―भैया कुछ थोड़ा होश तो लाना चाहिए कि इस असार संसार में जन्म मरण कर करके ही इस संसार में अपना सारा समय बिताना है क्या? क्या यह ही बात मंजूर है? अगर नहीं मंजूर है यह बात तो बताओ उसकी विधि क्या यही है कि घर में बेहोश रहें, ममता करें, उनको ही अपना सर्वस्व समझों इस विधि से जीवन बिताना क्या यह विधि है संसार से छूटने की? कुछ अपने आप पर करुणा होनी चाहिए और एक ऐसा दृढ़ संकल्प होना चाहिए कि जगत के किसी भी पदार्थ से मेरा कोई संबंध नहीं। यह सब गुजारा कमेटी है घर में जितने लोग रहते हैं। सबके अलग-अलग काम बटे होते हैं, तुम घर में खाना बनाओ हम दुकान धंधा काम काज करके कमायी करें, अमुक व्यक्ति घर के ऊपरी काम करें, यो जिस में जैसी योग्यता हुई उसको वैसा काम बँटा रहता है। कोई अगर कुपूत है, समझदारी नहीं, बुद्धि नहीं तो उसे कुछ थोड़ा सा काम दे दिया। तो यों अपने-अपने को सभी लोग गुजारा कमेटी का एक मेंबर समझलो। सबके सहयोग से इस परिवार का गुजारा चल रहा है। यहाँ आप का लेशमात्र भी कुछ नहीं हैं। जो अपने में निधि है जो अपने आप में सर्वस्व है, जो अपने में बसा हुआ है उसकी तो सुध नहीं और उपयोग बाहर-बाहर डोलता रहता है सो डुलायें मगर इस उपयोग की दशा फुटबाल की तरह ही चलेगी।
   बाह्य संपर्क से सर्वत्र अशांति व आघात जानकर स्वतत्त्व में प्रवेश करने के साधनभूत ज्ञानाभ्यास का अनुरोध―फुटबाल जिसके पास जायगा वह इसे लात ही मारेगा। कोई उठाकर गले से लगाकर फुटबाल को चूमने वाला न मिलेगा। यह उपयोग जिसके पास पहुँचेगा वहाँ से लात ही मिलेगा धक्का ही लगेगा, मगर कुछ अपनी कषाय के अनुकूल बैठे तो उसके धक्के और तरह के हैं। जैसे पिटाई दो तरह की होती है। एक तो पिटाई से तो खून निकलने लगता कुछ टूट फूट जाता और एक पिटाई ऐसी होती है कि बाहर से देखने में कुछ नहीं, मगर उसमें मुदी चोट बहुत गहरी होती है। अब जिस पिटाई से कुछ टूट फूट गया। उसकी तो चिकित्सा जल्दी हो जाती है पर मुदी चोट की पिटाई जिंदगी भर याद कराती रहती हैं कि रे बच्चू तेरी इस तरह की पिटाई हुई है। अगर कषाय के अनुकूल कोई चल रहा है तो उसमें भी कष्ट ही कष्ट हैं, और फिर बीच में अनबन बने तो उसका भी दुःख मानना होगा किसी का मरण हो गया तो उसका कष्ट मानना पड़ता है। तो यह उपयोग जहाँ जायेगा संसार में बाह्य पदार्थ की ओर वहाँ से ही सिवाय लात धलने के इसको ओर कुछ न मिलेगा। चाहे चेतन हो चाहे बाह्य अचेतन पदार्थ हों, तब क्या करना? कुछ तो ज्ञान से अपने आत्मा को सुगंधित बना लो। मोह की बदबू भरते रहने में क्यों रुचि रहती? ज्ञान और वैराग्य का सुबास भी तो अपने आत्मा में लाना चाहिये। और उस सबका उपाय है ज्ञानाभ्यास। जो पुरुष ज्ञानाभ्यास से रहित है वह तो न अपने को पहिचानता और न पर को जानता। उसका ध्यान कभी सम्यक हो ही नहीं सकता और ध्यान ठीक हुए बिना कर्म का क्षय नहीं हो सकता।


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