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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 86

From जैनकोष



‘‘सुदणाणब्भसं जो ण कुणड सम्मं ण होइ तवयरणं।

कुव्वंतों मूढमई संसार सुहाणुस्तो सो।।86।।’’

   श्रुतज्ञानाभ्यास के बिना सम्यक् तपश्चरण की असंभवतश्रतुका―अभ्यास जिसको नहीं है जो श्रुतज्ञान में प्रवृत्ति नहीं करता है उसका तपश्चरण सम्यक प्रकार से नहीं हो सकता। एक बात मुख्यतया ध्यान में रखना कि मोक्ष कहते हैं केवल जीव स्वरूप रह जाने को। सिद्ध भगवान के मायने क्या हैं? केवल जीव ही जीव रहो। जो कुछ और संबंध था वह कुछ न रहा। न द्रव्य कर्म रहे, न शरीर रहा, न भीतर की तरंग, विकार विचार ये कुछ नहीं रहे। मात्र जीव द्रव्य ही रहा, सो इस शुद्धता के कारण उसका ज्ञान अत्यंत विकसित हुआ, तीन लोक तीन काल का जाननहार हुवा वही सर्वज्ञ वीतराग केवल ज्ञानमात्र कहते ही हैं ज्ञानशरीरी त्रिविध कर्म मल वर्जित सिद्ध महंता है और क्या नहीं, दोनों की जानकारी से तत्त्व स्पष्ट होता है, क्या है ज्ञान ही शरीर है, सर्व कुछ ज्ञान ज्ञान मात्र ही है किसी सिद्ध दशा में और क्या नहीं है? द्रव्य कर्म, भाव कर्म, नो कर्म तो ज्ञानावरणादिक कर्म और रागद्वेषादिक विकार और शरीर ये सब कुछ नहीं रहे जहाँ, ऐसा ज्ञानपुँज आत्म द्रव्य सिद्ध भगवान कहलाता है। सो मुक्ति में क्या है? सिर्फ ज्ञान ही ज्ञान रहा, जीव ही जीव रहा, अन्य कुछ साथ नहीं है। तो यहाँ भी देखें यहाँ क्या रहा है? वस्तु स्वरूप को देखिये सत्ता की ओर से देखिये यह मैं आत्मा केवल आत्मा ही आत्मा हूँ, इसके स्वरूप में अन्य का प्रवेश नहीं अब रह रहे अगल बगल अन्य द्रव्य, सो उन अन्य द्रव्यों से मेरे आत्मा में कुछ सुधार बिगाड़ नहीं है, पर वह द्रव्य जिस विपाक उदय में आता है और उनका प्रतिफलन होता है तो शुद्ध स्वभाव को जब नहीं जाना वहाँ से चिगे हुए हैं तो भी इन विकारों को आत्मसर्वस्व समझना बस यही विडंबना की जड़ है। ये सब बातें कैसे दूर हों? तो उसका प्रथम प्रयास है श्रुतज्ञान का अभ्यास। वह जाने माने तो उसका आचरण भी बनेगा।
   खुद जानना नहीं, दूसरे ज्ञानी की मानना नहीं के हट की विडंबना―बताया है। ग्रंथों में कि कलायें 72 होती हैं मगर एक घटना की बात सुनो घटना कोई सही ही घटना होगी। गुरुजी सुनाते थे। कोई सागर जैसे स्थान में एक बड़ी सभा भरी थी उस सभा में एक मुस्लिम भाई भाषण कर रहा था और वह होगा माँस प्रेमी, उसमें भाषण की बहुत ऊँची कला थी वह जब देखता था कि सड़क से इन लोगों का जत्था जा रहा है तो उनकी ही कोई बात छेड़ देता जिसमें कि उनका आकर्षण हो कि सभा में चलें और सुनें तो कि क्या कहते हैं? एक बार पहचाना कि यह जैनियों का समूह कहा जा रहा है तो यह बात छेड़ दी कि कलायें तो 72 होती है। मगर जैनियों में तो 74 कलायें होती है। अब उन जा रहे जैनियों में उत्सुकता हुई कि सुनना तो चाहिये कि हम लोगों में दो कलायें कौन सी बढ़कर बता रहे हैं। तो सब के सब उस सभा में पहुँच गए। अब उसने जो व्याख्यान दिया था सो खूब दिया जीव हिंसा जायज है तो माँस खाना बलि करना धर्म है, अपराध नहीं आदिक जो-जो भी कहना था वह सब उसने कह डाला सब लोग सुनते भी गए उन जैनियों के जत्थे में एक पंडित जी भी थे। तो लोग उनसे बहुत-बहुत कहें कि कहाँ फँसा दिया यहाँ ले आये तो उन्होंने कहा कोई हर्ज नहीं सुनते जाओ पीछे देखें एक आदमी ने छेड़ भी दिया व्याख्याता को कि आप अभी कह रहे थे कि जैनियों की 74 कलायें होती है तो वह दो कलायें तो बताओ कौन अधिक हैं? तो वह मौलवी व्याख्याता बोलता है कि सुनो दो कलायें कौन सी ज्यादा है? पहली कला तो यह ज्यादा है कि खुद जानना नहीं और दूसरी कला यह है कि दूसरे की मानना नहीं। ये दो कलायें जैनियों में अधिक है। वह भाषण कर चुका मगर दो कलाओं की बात समझना चाहें तो यह ही बात समयसार में आत्मख्याति टीका में एक गाथा में बताया है इदं तु नित्य व्यक्ततयाद्रंतः प्रकाशमानमपि कषाय चक्रेण सहैकीकि यमाणत्वादत्यंततिरोभूत सत्स्वस्यानात्मज्ञतया परेषामात्मज्ञानामनुपासनाच्च न कदाचिदपि श्रुतपूर्व इत्यादि याने इन संसारी जीवों ने भोग बंध कथा खूब सुनी है आत्मा को जानते नहीं और आत्मज्ञ जो दूसरे जीव है उनकी उपासना सेवा करते नहीं मायने खुद जानना नहीं दूसरे की मानना नहीं ये दो कलायें दिखाई है मनुष्य की (हँसी)। उसका व्याख्यान तो पूरा हो गया, अब यह पंडित जी जैनी जत्थे में साथ थे उनसे लोग बोले कि कहाँ लाकर फँसा दिया, उसने तो सारा उल्टा व्याख्यान दिया तो पंडित जी बोले भाई उसने सब सही कहा उल्टा कुछ नहीं कहा। अब कैसे सही कहा सो सुनो सही यों मिथ्यात्व के उदय में ऐसा ही बोला जाता है बोलो सही है कि नहीं? अब लोग बोले कि यह बात तो सही है। मिथ्यात्व का उदय हो और कोई धर्म तत्त्व की बात सुना दे तो वह उल्टी बात होगी।
   मिथ्यात्व के उदय में विपरीत चिंतन मनन―सही सीधी बात यह है कि मिथ्यात्व के उदय में विपरीत ही चिंतन और वचन होते हैं। और उसके अलावा कोई दुराग्रह हो जावे तो उसमें दूसरे के मानने में गुंजाइश भी नहीं रहती है, क्योंकि उसका खोटा होनहार है। सो जितने भी दोष हैं उन सब दोषों को दूर किया जा सकता है। तो मतिज्ञान के अभ्यास से दूर किया जा सकता है यह आयु पहाड़ से गिरने वाली नदी की तरह बड़े वेग से बह रही है। जैसे नदी का वेग लौट कर नहीं आता है उसी तरह आयु गुजर जाती है। तो वह लौट कर नहीं आती है। जीवन वेग से जा रहा है इस रहे सहे जीवन का सदुपयोग कर लें इसका सदुपयोग है ज्ञानार्जन आत्मतत्त्व की दृष्टि से चिंतन और मनन सो ये सब श्रुतज्ञान के अभ्यास रूप हैं। सो ज्ञान के अभ्यास के द्वारा अपने आत्मा में प्रकाश लाना चाहिए। यदि श्रुतज्ञान के अभ्यास बिना कोई सोचता हो कि मैं बहुत ऊँचा बन गया हूं। मेरी इतनी महिमा हो गई है कि लोग मुझे यों-यों समझते हैं। अरे यह तो मायाचार में भी बढ़ जाता है। जनता भोली भाली होती है। कोई कपट रच ले और जिस तरह जनता को धोखे में डाले उस तरह जनता धोखे में रह सकती है। पर तत्त्व तो नहीं पाया जा सकता तो रहा सहा जीवन खोटे संग में जाये नहीं श्रुतज्ञान के अभ्यास में बना रहे उसमें चिंतन मनन की दिशा मिलती रहे यदि ऐसे पौरुष से समय गुजरे तो यह जीवन धन्य होगा। रहा सहा मोक्षमार्ग का काम अगले भव में भी किया जा सकेगा। पर होना चाहिये मनुष्य को आत्मकल्याण का इच्छुक।
   धर्म पालन के लिए निष्कपटता की अनिवार्यता―कपट का और धर्म का बहुत बड़ा बैर है। जहाँ कपट है वहाँ धर्म का प्रवेश नहीं है। क्रोध करने वाले को कभी धर्म मिल भी जायगा, क्योंकि क्रोध सदा नहीं रहता। घमंड करने वाले को कभी बोध मिल भी जाएगा। घमंड की वृत्ति भी सदा नहीं रहती है क्रोध करने वाला भी कभी मौका पा ही लेगा मगर कपट करने वाला कभी अपना उद्धार नहीं कर सकता क्योंकि कपट का संस्कार जीवन में छूटता नहीं। कपट करके कोई गलती भी हो तो इतनी हिम्मत हो नहीं सकती कि अपनी आलोचना कर सके और अपने पापों की शुद्धि कर सके, यह कुछ कठिन है काम, इस कारण कपट वृत्ति से रहने वाला पुरुष, धर्म का ऊपरी ढोंग रखने वाला पुरुष वह स्वयं दुर्गति में जाता है और उनकी सेवा सुश्रुषा और हाँ में हाँ मिलाकर चलने वाले लोग भी दुर्गति में जाते हैं। तो खुद को बहुत सावधान रहना चाहिए। इस जीव का दूसरा कोई मदद्गार नहीं है। खुद ही खुद का मदद्गार है। स्वयं चेतें, सावधान हों, अपनी बुद्धि बल का प्रयोग करें तो हम खुद अपने में जाग सकते, सम्हल सकते हैं। सारी बातें श्रुत ज्ञान के अभ्यास से प्राप्त होती हैं। तो अपने में यह बात देखना चाहिए कि उस श्रुत ज्ञान के अभ्यास में मैं कुछ चल रहा हूँ अथवा नहीं। अगर नहीं चल रहे तो खुद-खुद को पहिचान तो सकते कि मेरे ज्ञान संस्कार बन रहा या नहीं, मैं ज्ञानार्जन के लिए कुछ पौरुष कर रहा हूँ या नहीं? यदि नहीं किया जा रहा है तो यह अपना बड़ा अपराध है, और इसमें खुद को ही संकट भोगना पड़ेगा। तो श्रुतज्ञान के अभ्यास बिना चाहे कितना ही कोई कुछ करे, पर वह सम्यक् तपश्चरण नहीं होता, और वह मूर्ख पुरुष सांसारिक सुखों में अनुरक्त होता हुआ यदि ये सब कार्य कर रहा है तो वह मुक्ति लाभ, शांति लाभ प्राप्त नहीं कर सकता।


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