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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 88

From जैनकोष



‘‘विकाहाइविप्पमुक्को आहाकम्माइविरहियो णाणी।

धम्मुद्देसण कुसलो अणुयेहा भावणाजुंदो जोई।।88।।’’

   योगी जनो की स्त्री विकथाविप्रमुक्तता तथा राज विकथा विप्रमुक्त―योगी पुरुष कैसे होते हैं उसके स्वरूप की बात चल रही है। इस गाथा में कहते हैं कि जो योगी हैं वे विकथा आदि कथनों से रहित हैं। विकथायें होती हैं चार। (1) स्त्री कथा, (2) राज कथा, (3) राष्ट्र कथा, (4) भोजन कथा। ये सभी कथन आत्मानुभव प्रेमियों के लिए अनुचित हैं, क्योंकि इनमें विकल्प बढ़ता है और आत्मा के ध्यान से स्खलन होता है। स्त्रीकथा स्त्री विषयक वार्तालाप गप्प कथा, शृंगार, अंग वर्णन, गुण दोष की चर्चा जैसी गृहस्थों में हुआ करती हो वह भी किसी सीमा तक चाहिए, फिर भी अगर योगी होकर स्त्री कथा में अनुरक्त रहे तो उनका योग कैसा, तो ऐसी विकथाओं से वे हटे हुए होते हैं। राजकथा-राजाओं की कहानी, अमुक राजा ऐसा है, अमुक ऐसा है, अरे योगी को क्या पड़ी है जो अपने राजाओं की वार्ता सुने, जाने, आलोचना करे, अमुक राजा यों, अमुक यों। विकथा कहते हैं खोटी कथा को। और जो विकथा होती है वह गप्पाष्टक से मिली-जुली चीज है, जैसे गप्पों में सच्चाई का संबंध नहीं हुआ करता है, बहुत कम हुआ करता अगर सच्चाई वाली बात गप्प में लायी जाय तो पहले कषाय दूर करनी पड़ेगी। आधा पौन घंटा अगर झूँठ साँच, गप्प सप्प, निंदा अनिंदा आदिक विषय उसमें गर्भित रहें तो ऐसी गप्प करने में 4-5 घंटे से भी अधिक समय व्यर्थ खो दिया जाता है। विकथा में कषाय राग आदिक कारण पड़ते हैं तो ऐसी जहाँ कषाय बसी हो वह योगी नहीं है।
   योगियों की राष्ट्रविकथा विप्रमुक्तता―योगीजन देशकथा से भी दूर रहते हैं। राष्ट्र कथा-देश की कथा अमुक देश ऐसा है, वहाँ रबड़ की सड़क है, वहाँ डामर की सड़क है, वहाँ सीमेन्ट की सड़क है, वहाँ 1॰-1॰ खंड के मकान हैं अरे इन बाहरी चर्चाओं के लिए जीवन है क्या? योगियों के लिए बात कह रहे और जो बात योगियों को कही जाय वह बात गृहस्थों के लिए भी थोड़ा-थोड़ा है, क्योंकि मोक्षमार्ग सबका एक है। कोई आगे बढ़ रहा है कोई जरा पीछे है, जैसे शिखर जी की वंदना को जितने लोग जाते कमजोर, बलवान, कोई पीछे रह गया कोई आगे बढ़ गया मगर सबके मुख से निकलती है अनंत सिद्ध की जय या जो भी हो सबके मुख से जय निकलती है। ध्येय सबका एक है कोई पीछे है कोई आगे हैं ऐसे ही मोक्षमार्गियों का ध्येय सबका एक है श्रावकजन जरा पीछे हैं, मुनिजन जरा आगे हैं, पर भेष वाले को मुनि नहीं कह रहे उस भेष में भी हो और भीतर भी शुद्धोपयोग का रुचिया हो, वह है मुनि। तो जो बात मुनियों के लिए कही गई वही बात कुछ-कुछ गृहस्थों के लिए भी है। देश की कथा विकथा से योगीजन मुक्त रहते हैं।
   योगियों की भोजनकथा विप्रमुक्तता―भोजन कथा―बहुत बढ़िया भोजन खाया उसकी कथा करना सो भोजन कथा है। अरे जो भोजन किया सो किया। अब अच्छा मिला तो क्या बुरा मिला तो क्या? सरस मिला, नीरस मिला, घाटी नीचे माटी, किंतु भोजन विकथा में प्रीति जगती है। कितने ही गृहस्थ ऐसे होते कि जिनको भोजन विकथा भी नहीं रुचती, और देखो रसनाइंद्रिय और स्पर्शन इंद्रिय को तो काम कहा है और घ्राण चक्षु कर्ण इंद्रिय को भोग कहा है। काम भोगबंध कथा। फर्क क्या है कि ये घ्राण चक्षु और कर्ण ये बेचारी गरीब इंद्रियाँ हैं। ये चीज से दूर रहते हुए ही अपना काम निकाल लेते हैं, पर ये दो इंद्रियाँ स्पर्शन और रसना, इनमें रईसी है। ये अपने विषयभूत पदार्थ को खूब मसल-मसलकर भोगती हैं। तो जो भोजन किया बहुत बढ़िया लड्डू देखने में बहुत सुंदर कब तक? जब तक कि वह थाली में रखा है। और जैसे ही वह मुख में गया और दो चार चबाड़े चल गए फिर उस लड्डू की बड़ी बुरी सकल हो जाती है। उसको तो अगर कोई देख ले तो नाक भौंहें सिकोड़ने लगेगा। तो खाया क्या? गंदा खाया, बढ़िया कोई नहीं खाता, कोई बढ़िया खा ही नहीं सकता। अरे वह बढ़िया चीज तो तब तक है। जब तक कि आप की उस पर कृपा न हो। और जहाँ आपने कृपा की मुख में धरा और 1॰-5 बार चबाया, बस उसकी सकल उसका रूप इतना गंदा रहता है कि देखने में बुरा लगता। उसका स्वाद लिया जा रहा है, उसका मौज मानते और उसकी कथा करते। आज तो मैंने बढ़िया हलवा खाया या ऐसा भोजन बनाना चाहिए, उसका मौज है। अरे ये कहाँ की रद्दी बातें होने लगीं। सहज ही जो बन गया, खा लिया आखिर जीवन चलाने के लिए खाना होता है, खाने के लिए जीवन नहीं होता। जो खाने के लिए जीवन समझते हैं वे सदा बीमार मिलेंगे। जो जीवन चलाने के खाना समझता है वह बीमार नहीं रहता और कदाचित किसी कारण से बीमार भी हो तो वह अशक्त और बेकार नहीं रहता। वह अपने आपको सम्हाले हुए रहता है। तो कह रहे भोजन कथा। इस भोजन कथा से विरक्त रहते हैं योगी महाराज।
   योगी की अधः कर्मादिदोष रहितता एवं धर्मापदेशकुशलता―योगी का क्या स्वरूप है यह बताया जा रहा है। वह अधःकर्मादिक दोषों से रहित है, अधःकर्म उसे कहते हैं जिसमें ममता हो ऐसा काम। अशुद्ध भोजन क्यों नहीं करते योगीजन कि उसमें अधःकरण का महा दोष लगा है। अमर्यादित भोजन है घसीटकर जैसे चाहे बनाया हुआ भोजन है, उसमें अधःकर्म का महादोष लगा है। उससे रहित हैं ये योगीजन। ये ज्ञानी पुरुष धर्मोपदेश देने में कुशल हैं। धर्मोपदेश की कुशलता किसमें आती है, जिसमें धर्म उतरा हुआ है, और स्वरूप जिसमें कि योगी की निरंतर भावना रहती है वह नित्य है, जिसने अपने नित्य स्वरूप को नहीं जाना उसका अनित्य-अनित्य बताना प्रलाप है। ये मरेंगे वे मरेंगे हम मरेंगे, मरना ही मरना देखते रहो तो उसमें पायेंगे क्या? घबड़ाहट और मिलेगी, अनित्य भावना में अनित्य को दिखाने का प्रयोजन नहीं हैं किंतु अपना जो नित्य स्वरूप है ज्ञानमान अंतस्तत्त्व उसको दिखाने का प्रयोजन है। जो प्रयोजन को छोड़ देता है वे बाहरी बातों में इतना बढ़ जाते हैं कि फिर वह विडंबना सी बन जाती है। लौकिक कामों में भी वही बात है, धार्मिक बातों में भी वही बात है।
   अशरणभावना में आत्मद्रव्य की शरण्यता का लक्ष्य―वे योगीराज अपने आत्मस्वरूप को परा शरण मानते हैं योगीजन कभी अपने को असहाय नहीं तकते। मेरे कोई नहीं है मैं अब क्या करूँ यह बात योगियों के चित्त में कभी नहीं आती। मेरा शरण है मेरा स्वरूप और वह है सदा मेरे पास अब मुझमें दीनता क्या, गरीबी क्या? वह तो अपने शरण को मन में रखे हुए है और इसी अपने शरण को पाने के लिए यह भावना करते हैं कि ओह जगत में बाहर में कुछ मेरे को शरण नहीं, तो अशरण भावना यह रटने के लिए नहीं है कि ‘‘मणिमंत्र तंत्र बहुहोई मरते न बचावे कोई’’। क्योंकि यदि इतना ही प्रयोजन रखा जाय तब तो इसे पढ़ते जाना चाहिए और रोते जाना चाहिए मेरा कोई बचाने वाला नहीं है। तब तो उसका बोल सही है, अब पढ़ते तो जायें कि मरना है हमें कोई बचाने वाला नहीं है और हँसते जायें, तो यह तो उल्टी बात कर रहे। रोकर पढ़ना चाहिए भावना (हँसी)। भैया रोने की बात नहीं है। यह बाहरी रूपक भर बताया है। थोड़ा अशरणभावना में अपने शरण की भावना करना चाहिए। उसे तो कोई दो एक बार बोल लिया, पर उसी पर दृष्टि न रहनी चाहिए कि मेरा कुछ शरण नहीं, ऐसे तो घर में जब तेज लड़ाई हो जाय तो जो कोई निर्बल सा है, जीत नहीं सकता वह रोता है इस तरह कि कोई किसी का भाई नहीं है, कोई किसी की स्त्री नहीं, कोई पति नहीं, कोई पुत्र नहीं, सबको देख लिया सबने धोखा दे दिया। तब तो क्या उनकी अशरण भावना सही होगी क्योंकि रोकर बोला, तो यह नहीं है अशरण भावना का प्रयोजन? अपना जो शरणभूत अंतस्तत्त्व है, सहज ज्ञानभाव है उसमें शरणपने का निरंतर भाव रहता है और उसे देखकर प्रसन्न रहे कि मेरे को कोई दिक्कत नहीं है। मैं हूँ सदा मेरा परमात्मस्वरूप उसमें उपयोग लगाना, फिर कोई डर ही नहीं है। तो योगीपुरुष अनुप्रेक्षा आदिक सभी भावनाओं से युक्त हैं।
   संसारभावना में आत्मसार देखने का भाव―संसार भावना में ऐसा बोला जाता है ‘दाम बिना निर्धन दुःखी, तृष्णावश धनवान। कहूँ न सुख संसार में सब जग देखो छान।’ क्या करें कहीं सुख नहीं हैं। दाम नहीं हैं पास तो दुःखी रहेंगे और दाम हो जायेंगे तो दुःखी रहेंगे। ऐसा दुःख ही दुःख देखने के लिए संसार भावना नहीं है। बल्कि वैज्ञानिक तथ्य तो यह है कि आप दुःख ही दुःख देखते रहेंगे सर्वत्र, सारा संसार दुःखमय है तो देखते-देखते आप भी पूरे दुःखी हो जायेंगे। तो संसार दुःखमय है, यह बात इसी को देखते रहने के लिए नहीं कही गई है, किंतु मेरा सार मेरा स्वरूप है और वह सहज आनंदमय है। उसमें कोई बाधा देने वाला भी नहीं है ऐसे अपने सार को निरखने के लिये ये बातें कही गई हैं कि ‘दाम बिना निर्धन दुःखी तृष्णा वश धनवान’।
   समस्त भावनाओं का प्रयोजन अखंड अंतस्तत्त्व का आश्रय करना―कोई अगर कहे कि जरा ये सेव जो तुम बाजार से लाये हो उसे दिखाना तो सही, हम भी देखना चाहते कि कैसे हैं ये सेब। तो इस देखने का अर्थ क्या हुआ? अरे उसका अर्थ है बीनार कर खाना। अगर उन्हें सिर्फ आँखों से देखते रहना भर था तो फिर बाजार से मंगाया ही क्यों? तो जो ऊपरी बातें कही जाती हैं उनका कुछ प्रयोजन होता है। अपने प्रयोजन पर आइये। तो ऐसे ही सभी भावनाओं में प्रयोजन हैं अपने अंतः प्रकाशमान ज्ञायक स्वभाव को निरखने का। यदि यह नहीं अनुभव कर पाया तो यों समझिये कि पुद̖गल से भिड़े तो मानो जड़ ही बन गए। मूर्ख, मूढ़, मोही इनमें यदि किसी को मूढ़ कहो तो वह बड़ा नाराज होता और कह दिया कि मोही तो उतना नाराज नहीं होता। और अर्थ है दोनों का एक। अर्थ में कोई फर्क नहीं। चाहे मूढ़ कहो चाहे मोही कहो। मुह धातु में अण प्रत्यय लगा कर पहले तो कृदंत का मोह बना और तद्धित में इन प्रत्यय लगाकर तद्धित वाला मोहिन शब्द से मोही बना अर्थ तो वही है। मोह करने वाला, बेहोश करने वाला, और मोह में मुह धातु में त्य प्रत्यय लगाया गया, मूढ़ बन गया, फर्क क्या रहा? तो मूढ़ शब्द सुनना बुरा लगता और मोही कहना बुरा नहीं लगता। बल्कि कितने ही लोग तो प्रशंसा मानते हैं। तो अपने आप के अंतः प्रकाशमान परमात्मतत्त्व को न निरखकर धर्म के नाम पर बाहरी बातों में ही आसक्त रहना यह भी मोह है, मूढ़ता है तो ऐसी अनुप्रेक्षा भावना से सहित योगी पुरुष हुआ करते हैं।


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