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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 90

From जैनकोष



‘‘अवियप्पों णिछंदो णिम्मोहो णिक्कलंकओ णिय दो।

णिम्मल सहावजुत्तो जोई सो होइ मुणिराओं।।90।।’’

   योगियों की निर्द्वंद्वता―कैसा योगी वास्तविक मुनिराज है इसका वर्णन इस गाथा में है। जो निर्द्वंद्व है वह योगी साधु परमेष्ठी है, निर्द्वंद्वता का अर्थ जैसी कि रुढ़ि है कोई फिक्र नहीं, शल्य नहीं, चिंता नहीं, आकुलता नहीं, सो निश्चिंत पुरुष निर्द्वंद्व कहलाता है। निर्द्वंद्व में दो शब्द हैं निर उपसर्ग है और द्वंद्व शब्द है, निर्द्वंद्वः यस्मातस निर्द्वंद्वः जहाँ से द्वंद्व निकल चुका है उसे कहते हैं। निर्द्वंद्व। द्वंद्व का अर्थ दो हैं, जहाँ दो नहीं वह निर्द्वंद्व है, एक में फिक्र क्या? एक को निरखना ही वास्तविक धर्मपालन है। एक स्वयं-स्वयं के एक में एक हो जाय यही धर्म पालन कहलाता है। यह जीव संसार में अन्य पदार्थों को अपना कुछ संबंधी मानकर व्यर्थ रुल रहा है। संबंध तो कुछ है ही नहीं प्रत्येक पदार्थ स्वतंत्र है, एक का दूसरे के साथ संबंध कुछ नहीं, न कोई दूसरे का कर्ता है न कोई दूसरे का कार्य है, न किसी का किसी के लिए कुछ बनाना है सर्व पदार्थों का स्वरूपास्तित्व अपने आप में परिणमता रहता है। एक में निर्द्वंद्वता है। जहाँ दो का संबंध है वहीं से विकार बिगाड़, विषमता आदिक सभी विडंबनायें होती हैं। तो आत्मा को दूसरा कुछ मिला ही नहीं। केवल एक ही उपयोग में हों तो ऐसे होते हैं निर्द्वंद्व योगी पुरुष। जैसे लोक में कहने लगते कि किसी का एक ही लड़का है तो उसे कुछ फिकर नहीं, सारा घर, सारा धन उसी को दे दिया, और अगर दो चार लड़के हो गए तो उन सबकी व्यवस्था का थोड़ा ध्यान तो रखना ही पड़ता, उन सबको मनाना पड़ता। उनके पीछे अनेक संकट सहने पड़ते। और एक है तो वहाँ संकट नहीं। ऐसा लोक में लोग कहते भी हैं तो यहाँ तो वस्तुतः एक है, वही देखने वाला, वही देखा जाने वाला, वही मेरा सर्वस्व। जिस क्षण यह स्थिति बन गई कि इसके उपयोग में केवल यही सहजसिद्ध अंतस्तत्त्व रहे, उस क्षण समझो कल्याण हो गया। जीवन में प्रयत्न इसी बात का करना है।
   ज्ञानी की सर्वत्र सावधानी―देखो भक्ति तो करता है ज्ञानी पुरुष प्रभु की, मगर बेहोश होकर नहीं रहता। बेहोशी नहीं है उस भक्त की। यह बात एक इस छंद से ही साबित है। ‘‘तब पादौ मम हृदये, मम हृदयं तव पदद्वये लीनम्। तिष्ठतु जिनेंद्र तावद्यावन्निर्वाण संप्राप्तिः।’’ भक्त प्रभु से कहता हे प्रभु तुम्हारे चरणयुगल मेरे हृदय में रहे तो मेरा हृदय तुम्हारे चरणों में लीन रहे, कब तक? जब तक कि मोक्ष की प्राप्ति न हो। यह भक्त बेसुध नहीं है उसकी यह श्रद्धा नहीं है कि सदा अनंत काल मेरे को प्रभु मिलते रहे और मैं निरंतर उनका पुजारी रहूँ, बल्कि वह यह निर्णय बनाये हैं कि मेरा चैतन्य स्वरूप जो कि अद्भुत महिमा वाला है वह मेरी दृष्टि में निरंतर बना रहे, पर इस जीव की मूढ़ता तो देखिये कि बातों से यह अपवित्र हो रहा जिस रागद्वेष मोहादिक से कर्मबंध हो रहे, दुःखी हो रहे उन्हीं को अपनायें फिर रहे। तो इससे पतन किसका है? कष्ट किसको है? जो अपने आपके विवेक पर नहीं खड़ा है वह संसार में दुःखी है, जैसे लोक में कहते हैं कि यह तो अपने पैरों पर खड़ा हो गया मायने स्वतंत्र कमाने वाला बन गया तो ऐसे ही जो विवेकी अपने पैरों नहीं खड़ा है उसको कष्ट ही कष्ट हैं। अपने भीतर का ज्ञान प्रकाश मिले बिना इस जीव की बड़ी दुर्गति हो रही है। सर्वसंकट एक साथ टल जायें इसका उपाय तो है मगर हिम्मत बनाये कोई तो एक ही बार हिम्मत बनाना है। फिर तो सदा के लिए यह संकटों से छूट गया। क्या हिम्मत बनाना? अपने आप के सहज सिद्ध स्वरूप को निरखना है। मैं ज्ञानस्वरूप हूँ, ज्ञानमात्र हूँ अन्य कुछ नहीं हूँ। न मेरा बाहर कुछ है। मैं निराकुल आनंद अपने लिए अपना सर्वस्व हूँ ऐसा कोई अपने को निरखे और पक्का निर्णय बना ले कि इस जगत में तृणमात्र भी मेरा कुछ नहीं है, उसको फिर आकुल नहीं हैं। और मान लो जीवन भर कोई किये जाये कोई तो आखिर सब कुछ छूटना नहीं है क्या? विवेक बना लें और इस जीवन में ज्ञान जगा लें मोह न रहे किसी वस्तु से, चूँकि गुजारा करना है तो रहना तो रल मिलकर है और मिलकर रहना प्रेम का व्यवहार किए बिना होता नहीं, मगर बात तो सही समझ लें कि मेरा मात्र मैं हूँ अन्य कुछ मैं नहीं हूँ। कितनी स्वाधीन बात है और कितनी सुगम बात हैं, इसमें आपका कुछ धन नहीं खर्च हो रहा। किसी से कुछ भीख भी नहीं मांगनी हैं। अपना स्वरूप अपने आप की दृष्टि में रखना है जो अपनी अंतर्दृष्टि बना लेता है उसके समान तो रईस जगत में कोई है ही नहीं। तो अपने आप के अविकार ज्ञानस्वरूप में आत्मत्व की बुद्धि करने वाला पुरुष निर्द्वंद्व होता है।
   योगियों की निर्मोहता―यह योगी निर्मोह है। न देह का मोह, न विकार का मोह, न बाह्य किसी पदार्थ का मोह। जिसका भ्रम निकल गया। वह मोह जैसी वृत्ति बना कैसे सकता है? जैसे किसी को कुछ अंधेरे उजेले में किसी रस्सी में साँप का भ्रम हो गया तो वह बहुत घबड़ा जाता है, हाथ पैर काँप जाते हैं। चिल्ला पड़ता है अरे दौड़ो साँप निकल आया। कितनी ही अटपट चेष्टायें वह करने लगता पर जब कुछ हिम्मत करके उसके पास पहुँचता और उसे हिलाता डुलाता देख लेता और समझ लेता कि अरे यह साँप नहीं, यह तो रस्सी है। तो बस इस सही जानकारी हो जाने से उसकी वे सारी अटपट चेष्टायें समाप्त हो जाती हैं। अब तो उसे कोई कहे कि पाँच सौ रुपये इनाम दूँगा यदि वैसी ही सारी बातें करके दिखा दो तो भले ही रुपयों के लोभ से वह बनावटी अटपट क्रियायें करे पर वह कला नहीं आ सकती जो साँप का भ्रम होने पर थी। तो मिथ्यादृष्टि में भी वह कला है जो प्रभु में नहीं। यह बात एक अलंकार की दृष्टि से कह रहे। क्या कला है मिथ्यादृष्टि में कि वह न जाने किस-किस ढंग की लीलीयें करके दिखा देते हैं। कभी एकेंद्रिय में पहुँचा कभी दो इंद्रिय में, कभी कीड़ा मकोड़ा हुआ, कभी पेड़ पौधे रूप में हुआ, वहाँ रहकर न जाने कितनी-कितनी कलायें दिखा दिया पर ये सब बातें प्रभु में कहाँ धरी हैं। वे तो सीधे-सादे अकेले विराजमान हैं। उनका सीधासादा काम हो रहा। आत्मा है ज्योतिस्वरूप है, प्रतिमास हो रहा है। प्रभु में ऐसी कला कहाँ धरी है जो मिथ्यादृष्टि में है? अरे प्रभु की बात ही ठीक है। उसे सीधी सादी बात का न जानना। मिथ्यादृष्टि की कला की कौड़ी बराबर भी कीमत नहीं है और प्रभु की उस सरलता में, उस सहज भाव में सुगम स्वाधीन परिणाम की महिमा है। ऋद्धियां मोह में नहीं जगती। ऋद्धियां स्वच्छता में जगती हैं और काल की दृष्टि से देखें तो जिस काल में तीन लोक तीन काल के समस्त पदार्थ एक साथ प्रतिबिंबित हुए उससे बढ़कर कला किसकी है? यह सब मोहरहित होने का प्रताप है मोही बनने में बड़ी हानि है। जन्म मरण करें संसार में रूले अपना ज्ञान प्रकाश पावों और आनंदमग्न होवो। तो ये प्रभु निर्मोह मंदकषाय होते हैं इस कारण ये ही योगी वास्तविक साधु परमेष्ठी है।
   योगियों की निष्कलंकता―योगी निष्कलंक होते हैं। कलंक क्या? रागद्वेष चिंता ईर्ष्या आदिक जितने सर्व विकार हैं, उपद्रव हैं, ये ही तो इस जीव पर कलंक हैं। इन कलंकों को किसने धोया? ये थे तो कलंक पहले। इस कलंक को ज्ञान जलने धोया। जैसे किसी के शरीर पर कोई मैल आया, कोई रंग डाल दे, कोई कूड़ा डाल दे या पसीना आ गया, या मैल जम गया तो बताओ उसको काहे से धोया जायेगा? पानी से। और कोई सोचे कि पानी के साथ साबुन भी तो चाहिए, खाली पानी डालने से तो मैल नहीं छूटता, साबुन भी तो चाहिए। तो यहाँ भी साबुन देख लो भावना का साबुन। उस भावना से अंतः स्वरूप की बार-बार भावना से मल मलकर और ज्ञान के जल से धो धोकर इन सब कलंकों को जो योगी छुटा देता है वह निष्कलंक है। लोक में यह कहते हैं कि इसके सिर पर कलंक का टीका लग गया। यह टीका कितना सा होता? कोई दो अंगुल लंबा समझलो, और इससे भी कम समझ लो। जैसे माथे पर चंदन लगा होता है ऐसे ही कलंक का टीका लग गया इस पर और अगर सारा का सारा कलंकमय हो तो टीका की कुछ बात ही नहीं, कहाँ टीका लगायें? तो शायद इसीलिए कि कलंक के टीके से बच जायें। मिथ्यादृष्टि जीव का तो सारा का सारा शरीर कलंकमय बन रहा, उसके टीका कहाँ से लगाया जाये, टीका तो उसके लग सकता जिसका सारा शरीर पवित्र हो, बस कोई जरा सा दोष लग गया हो। तो वह मिथ्यादृष्टि जीव सारा अपवित्र बन रहा उस अपवित्रता को मिटाना चाहिए। जहाँ अज्ञान बसा है विकार में जो समझता कि यह ही मैं हूँ वह बड़ा दुःखी है। लोग चाहते हैं कि मेरा ऐसा हो जाय तो मैं दुःखी न रहूँगा। न जाने क्या-क्या नहीं चाहा अब तक? जैसे―मेरे इतने बच्चे हो लें तो बस फिर दुःख नहीं कुछ। इतने मकान बन जायें तो फिर आनंद है। ऐसी दुकान बन जाय, अमुक बात हो जाय न जाने क्या-क्या सोचा इस जीव ने पर कभी शांत हो सका क्या? अरे वे सब शांति के उपाय ही नहीं है। चाहे कितना ही धन वैभव कुटुंब परिजन जुड़ जाय, उसमें कोई चतुराई नहीं। वह तो होता ही रहता। पशु पक्षियों के भी तो बच्चे होते, वे भी तो मोह ममता करते, इतना मनुष्य भव में कर लेना तो कोई बुद्धिमानी की बात नहीं है। बुद्धिमानी तो इसमें है कि अपने उद्धार का काम इस मनुष्यभव में बना लें, एक ऐसा ज्ञान प्रकाश पावे अपने उद्धार का काम इस मनुष्य मन में बना लें। एक ऐसा ज्ञान प्रकाश कि मेरे को तो मात्र मेरा आत्मा ही सब कुछ है, यही स्वयं धर्मस्वरूप है। मैं इसकी शरण को प्राप्त होता हूँ। एक यह उत्साह बनावें अपने अकलंक स्वभाव को निरखें कि मैं तो हूँ अपने आप वह केवल प्रतिभासमात्र हूँ। वहाँ कोई कलंक नहीं हैं। स्वरूप में पंक नहीं। तो जो योगी निष्कलंक स्वभाव की भावना करके उस परिणति में भी निष्कलंक बनता है वह योगी साधु परमेष्ठी है।
   योगियों की नियतता―योगी होते हैं नियत स्थिर, स्थिर कोई हो सकता है तो अपने स्वरूप को निरखकर ही स्थिर हो सकता है, बाहरी पदार्थों में कुछ सोचकर, चाहकर वृत्ति बनाकर स्थिर होना चाहे तो नहीं हो सकता, क्योंकि वहाँ दोनों ओर से कमी है। जिन पदार्थों को चित्त में बसाते हैं वे पदार्थ विनश्वर हैं। मिटेंगे वे मेरे आधीन नहीं। उनका मेरे से कुछ सरोकार नहीं और उनसे बनाया है संबंध कल्पना में तो उसका फल कौन भोगेगा? जैसे किसी छोटे बच्चे ने किसी दूसरे बच्चे के हाथ में खिलौना देख लिया तो वह भी खिलौना लेने के लिये रोता है तो क्या उस बच्चे को चुप कराने का यह उपाय है कि उस दूसरे बच्चे का खिलौना उससे छीनकर उस दूसरे बच्चे को दे दिया जाय? नहीं यह उपाय ठीक नहीं हैं। उसका उपाय यह है कि उस ही तरह का दूसरा खिलौना खरीदकर उसे दे दिया जाय तो उसका रोना बंद हो जायेगा। तो ऐसे ही समझो कि अपने आत्मा का खिलौना है अपने आत्मा का सहज ज्ञानस्वरूप। वह दृष्टि में आ जाय तो समय का कुछ पता नहीं पड़ता हुए वर्षों का समय कैसा तपश्चरण में निकल जाता। योगियों को तो उनके समय का पता नहीं पड़ता। उनको मिल गया है अपना बढ़िया खिलौना जो कि उनसे कभी गुम नहीं सकता। जो कभी टूट नहीं सकता जिसमें कभी बिगाड़ ही नहीं आ सकता, ऐसा अनुपम ज्ञानमात्र स्वरूप का खिलौना दृष्टि में आया है अब वह वहाँ खूब रम रहा और स्थिर हो गया। बाह्य पदार्थों में दृष्टि दे देकर सिवाय दुःखी होने के कुछ हाथ नहीं लगता। योगिराज स्थिर हैं क्योंकि समस्त ज्ञानस्वरूप में ही अपना उपयोग जुड़ा लिया है। अतएव अब वह अस्थिर नहीं। जो नियत है ऐसा योगी साधु परमेष्ठी है।
   योगियों की निर्मलस्वभावयुक्तता―निर्मल स्वाभावयुक्त योगी मुनिराज कहलाते हैं। आत्मा का स्वभाव उस ही पदार्थ रूप होता है दूसरे रूप नहीं होता है। मैं आत्मा हूँ ज्ञानमात्र हूँ जानन इसका स्वरूप है। तो स्वरूपतः यह जानन मात्र है इसमें किसी प्रकार का कष्ट नहीं है। ज्ञानस्वरूप उस ज्ञान स्वभाव में जिसने उपयोग दिया है उसकी प्रमादरहित वृत्ति भी निर्मल है। पवित्र है। जो बाह्य पदार्थों में ललचायेगा वह अपवित्र है, अज्ञानी है, ज्ञानस्वभाव से विमुख हुआ है उसे आकुलता से बचाने वाला कोई नहीं है और जो बाह्य पदार्थों से उपयोग हटाकर अपने ज्ञान स्वरूप को निरखे वह पवित्र है, ज्ञानी है, निराकुल है। इस असार संसार में बाह्य परिग्रहों के बारे में अपनी चाह मचाना अपने भगवान पर अन्याय करना है। ऐसा ही तो अनादि से करते चले आये जिसका फल है यह कि जन्मे और मरे, और जितने समय तक उस भव में टिके उसमें बिना काम की विह्वलतायें ही की। आज मनुष्य हुए हैं। और घर में वे जो दो चार जीव आ गए हैं मनुष्य बन गए सो मान रहे कि ये मेरे हैं और मान लो वे मनुष्य न होते कीड़े मकोड़े मक्खी मच्छर आदि होते तो फिर ये क्या थे इसके लिए? क्या हुए नहीं? थोड़े ही समय बाद जीवन लीला समाप्त होने पर फिर जैसा का तैसा हो जायगा। तो इस क्षणिक समागम में इतना अज्ञान बसाने का क्या महत्त्व है? अपना निर्मल स्वभाव निरखें, और उस ही स्वभाव में तृप्त रहें। जो योगी निर्मल स्वभाव में युक्त हैं। वे मुनिराज हैं।
   योगियों की अविकल्पता―ये योगी अविकल्प हैं कैसी पवित्रता पायी है कि केवल ज्ञान स्वभाव जिनके उपयोग में है, अब उनको विकल्प से क्या प्रयोजन? क्या करना यहाँ वहाँ के विकल्प से जितना अपने को नियंत्रित करें अपने आप के स्वरूप मात्र को देखें निर्विकल्प बनें वह तो है सारे जीवन की बात और अपने स्वरूप से चिगकर बाह्य पदार्थों में उपयोग भिड़ाया, विकल्प किया वह है इस जीव की दुर्गति। भावना भाइये कि हे प्रभु मुझे वह क्षण प्राप्त हो कि यह उपयोग केवल निज में सहज ज्ञानस्वरूप को ही देखे उस ही में मग्न होकर एकमेक हो जाय ऐसी आत्मलीनता की भावना रखिये। ये योगी विकल्परहित हैं अतएव ये साधु परमेष्ठी मुनिराज प्रभु के लघुनंदन कहे जाते हैं। ऐसे योगियों की भक्ति उपासना, भावना करने से आत्मा पवित्र होता है।


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