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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 93

From जैनकोष



‘‘दंडत्तय सल्लत्तय मंडियमाणो असूयगो साहू।

भंडणजायणसीलो हिंडड़ सो दीह संसारे।।93।।’’

   दंडत्रयाधीन योगी का दीर्घसंसारपरिभ्रमण―जिसने घर बार तो छोड़ दिया, साधु का भेष रख लिया, तपश्चरण भी कर रहा, जैसे भीतर में भाव बने उसके अनुसार चेष्टा भी कर रहा, भाव ही तो करा रही चेष्टा। कोई कन्या है और शादी एक मिनट में हो जाती है भाँवर पड़ने से, भांवर पड़ने से पहले तो वह लड़की जैसे चाहे सिर फटकारे इधर उधर बेखटके दौड़ती थी, आखिर लड़की ही तो थी और जब भाँवर पड़ गई तो बताओ उसे कौन कला सिखाने जाता है, कि तुम इस तरह से गोड़े चिपका कर, इस तरह से हाथ चिपका कर, इस तरह से सिर झुकाकर शांति से चलो, कोई स्वसुर वगैरह दिख गए तो इस तरह से लुक छिपकर रहो बताओ ये सब कलायें उसको कौन सिखाता है? हमारे ख्याल से इसके लिए कोई स्कूल तो होते नहीं, मगर आ क्यों जाती यह कला कि उसके यह भाव बन गया कि अब मैं स्त्री हो गई हूँ, बस इस भाव के कारण वे सब कलायें उसके अंदर आ जाती हैं, तो ऐसे ही जो सब कुछ छोड़कर तपश्चरण भी करते, पर इनका भाव यह बन गया कि मैं मुनि हो गया तो मुनि को जैसे चलना चाहिए, जैसे बैठना, बोलना चाहिए वे सारी क्रियायें भी कर रहा है तिस पर भी संसार से छुटकारा नहीं पा रहा। इसका कारण क्या है? वह यह अनुभव नहीं कर पाया कि मैं तो चैतन्य ज्योतिमात्र परमात्मपदार्थ हूँ। यह तो अनुभव नहीं बनता और शरीर का नामा रखकर मैं मुनि हूँ और उस भाव में मुनि भी और पाप स्वसुर वगैरह भी सब एक बराबर हैं। बच्चों का बाप मानता है कि मैं पापा हूँ कोई मानता कि मैं अब स्वसुर हो गया, ऐसे ही यह मान लेता कि मैं मुनि हो गया उनमें अंतर क्या रहा? शरीर के नाते से ही उसने माना, शरीर के ही नाते से इसने माना। जब तक चैतन्य ज्योतिमात्र इस सहज निरपेक्ष आत्मतत्त्व का अनुभव नहीं बनता, जब तक यह श्रद्धा नहीं बनती कि मैं तो आकाश की तरह अमूर्त और ज्ञानगुण से युक्त एक वस्तु हूँ, तब तक उसे मोक्ष का मार्ग नहीं मिलता।
   पर्यायबुद्धि से योगनियंत्रण की जबर्दस्ती से लाभ का अभाव―तो जो तपस्वी अपने मन, वचन और काय पर नियंत्रण नहीं रख पाते भले ही नियंत्रण रख लें पर वह ऊपरी नियंत्रण है, जान बूझकर नियंत्रण है, सहज नियंत्रण नहीं बना। जैसे नाटक में किसी बालक ने कोई पार्ट लिया मान लो भिखारी का पार्ट लिया तो उसे उस भिखारी की सारी चेष्टायें वहाँ करनी पड़ती हैं। अब उसकी उन चेष्टाओं को देखकर लोगों का हृदय दहल जाता है। खैर दर्शकों का चित्त उसके प्रति कैसा ही बने पर वह अपनी श्रद्धा से टस से मस नहीं होता। क्योंकि वह जबरदस्ती का नियंत्रण है। वह सारे पार्ट को अच्छी तरह से अदा करता है वह चित्त में यह बात बनाये रहता है कि मैं तो अमुक बना हूँ यहाँ तो पार्ट अदा कर रहा हूँ, भले ही वह पार्ट अदा कर रहा पर उसी में यह मैं हूँ इस तरह की वह बुद्धि कर रहा, उसने अपना पद छोड़ दिया तो बड़े-बड़े व्रत तप सब कुछ करे मगर ज्ञान में यह रहे कि मैं साधु हूँ अमुक प्रतिमा वाला हूँ, अमुक प्रकार का हूँ ऐसी अगर भीतर में श्रद्धा बनी है अपने आत्मा के बारे में तो वह अभी मोक्ष का मार्ग नहीं पा रहा। मैं परमात्मतत्त्व हूँ, ज्ञानस्वरूप हूँ, एक आत्मवस्तु हूँ, जैसे अनंत आत्म पदार्थ हैं वैसा ही मैं एक हूँ यह श्रद्धा जिसको हो तो उसको यह बात तो आयेगी मन में किस जैसा यह मैं केवल हूँ वैसा मैं केवल बनूँ और उस पुरुषार्थ में व्रत, नियम प्रतिमा मुनि आदिका ये सब पद आयेंगे। अगर इसमें आत्मतत्त्व की श्रद्धा की तो उसको अंधेरा है। एक ज्ञान का ही नाता रखें, ज्ञान ही जिसका धन हैं, ज्ञान ही जिसका सर्वस्व, ज्ञान का ही जो रुचिया बना ऐसा निकटभव्य जीव अपना कल्याण पाता है, सो मन, वचन, काय पर जहाँ सहज नियंत्रण नहीं है। जानबूझकर नियंत्रण है तो ऐसी जबरदस्ती करने को नियंत्रण कहते ही नहीं। जैसे बच्चे लोग अपने खेल में जब कहते हैं कि देखो हमने मौन ले लिया हमसे मत बोलना, तो वे क्या करते कि ओठ से ओठ दबाकर बैठ जाते हैं। तो वह उनकी कोई सहजवृत्ति तो नहीं हुई वह तो बनावट करके हुई। उसके भीतर में अनेक विकल्प उठते रहते हैं, कुछ-कुछ ओठ भी फड़कते रहते, कहीं मुझे हँसी न आ जाय इसके बड़े विकल्प उठते रहते। यहाँ तो लोग बनावटी मौन लेकर लोगों को मौन का रूपक दिखाते हैं पर यह बनावटी मौन कोई कार्यकारी नहीं है। कोई सही ढंग से आत्मचिंतन के कार्य में लगता है। वहाँ ही अपना उपयोग देता है तो उसके चित्त में प्रकृत्या ही बड़ी प्रसन्नता छा जाती है। उसका मौन एक सहज मौन है।
   आत्माचारहीनता में आत्म विकास की असंभवता―क्रिया कांड में देह में आत्म बुद्धि रख करके करना सो तो दोष है और सहज आचरण बने और उसमें रहते हुए वह अपने ज्ञानभाव की साधना बनाये तो वह तो विधि ही है। तो जिस तपस्वी ने ज्ञान बल से मन वचन काय का नियंत्रण नहीं किया वह पुरुष दीर्घ काल तक संसार में भ्रमण करता है। मिथ्यात्व, माया और निदान से जो युक्त है, जिसने देह को आत्मा माना, जो अपने को रागादिक रूप समझता, जिसमें मिथ्यात्व, छल, कपट माया है, जिसने अगले भव के लिए निदान बनाया है। ये भाव जिसके बन रहे हों जो ईर्ष्या करने का स्वभाव रखता है, जो झगड़ा याचना करने वाला है, ऐसा यह योगी, जिसके भीतर तो लगी है विषय वासना और ऊपर से रख लिया भेष, तो ऐसा भेष रखने वाला अज्ञानी मुनि दीर्घकाल तक संसार में भ्रमण करता है। कहते हैं ना कि अन्य जगह पाप कमावे तो धर्म की जगह पाप धोए जा सकते हैं पर धर्म को ओट में, धर्म के नाम पर धर्म के स्थान में कोई पाप करे तो वह ब्रजलेप हो जाता। तो इस प्रकार योगियों के विषय में बताया कि अपने सहज ज्ञानस्वरूप की जिसको धुन है वह मोक्षमार्ग में चल सकता है शेष सब उल्टा पतन ही करते हैं।


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