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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 97

From जैनकोष



‘‘जो इसवे ज्जामंतो व जीवणं वायवस्स ववहारं।

धणधण्णपडि̖उग्गहणं समणाणं दूसणं होइ।।97।।’’

   ज्योतिषविद्योपजीवन तथा मंत्रोपजीवन श्रमणों का दूषण―जो किसी लौकिक प्रयोजन से अथवा साधुवों की प्रशंसा कीर्ति देखकर भावुकता से साधु का रूप तो रख लेता है मगर अपने आत्मा की साधना नहीं करता है और उल्टे उससे विपरीत आचरण करता है तो वह साधुवों का दूषण है। जैसे ज्योतिष विद्या से अपनी आजीविका बनाना, ज्योतिष की बात बताकर लोगों का आकर्षण करके अपने आराम को बढ़ाना, जो भी अपना गरज सोचा हो। उसकी पूर्ति करना यह साधुवों का दूषण है। याने साधु बनकर फिर एक ब्रह्म स्वरूप की साधना का ही प्रोग्राम रहना चाहिए, फिर लौकिक बात क्यों की जावे? इसी प्रकार मंत्र का उपजीवन बनाना, किसी को मंत्र दिया, यंत्र बनाया, यंत्र लिखा और उससे अपनी जीविका बनाना या अपनी कीर्ति बढ़ाना ये सब साधुवों के दूषण हैं और साधुवों के ही एक धर्म के नाम पर मोक्षमार्ग के नाम पर जो भी श्रावक ज्योतिष विद्या और मंत्र विद्या का व्यवहार बन गया उसको भी दूषण है किंतु मुक्ति का मार्ग इसमें नहीं है। मोक्ष का मार्ग तो मात्र निज सहज ज्ञानस्वरूप की उपासना है।
   उदाहरणपूर्वक बंध व मोक्ष की व्याख्या व ज्योतिषमंत्रोपजीवन की मोक्षप्रतिकूलता―गाय बँधी है उसको मुक्त कौन करेगा? जो यह जानता है कि गाय तो बँधी नहीं है गिरवा के एक छोर से दूसरे छोर को अलग कर दिया जाय तो गाय अभी जंगल चली जायेगी। ऐसी श्रद्धा है तब ही गाय को बंधने से मुक्त करते हैं। यह सब अपने अनुभव से जान सकते हैं। यदि यह श्रद्धा होती कि गाय के गले से गिरवा की गाँठ लग गई बड़ी तेज तो यह बात कहाँ से हो सकती? इस तरह से तो गाय जीवित नहीं रह सकती। यह बात सबको मालूम है, रस्सी ही बँधती है, गाय का गला बिल्कुल सुरक्षित है। तो जिसको यह विदित है कि गला सुरक्षित है, गाय स्वतंत्र है, वहाँ बँधी है रस्सी ही, किंतु वह इस तरह बँधी है कि गाय परतंत्र है। उस गाय को बंधने से मुक्त किया जा सकता है। ऐसे ही जो अपने आत्मतत्त्व को जानता है कि यह आत्मस्वरूप अपने स्वरूप में परिपूर्ण है, यह अमूर्तिक है। ज्ञानस्वरूप है, इसमें कर्म नहीं बँधा करते। कर्म तो कार्मण शरीर में ही बंधा करते हैं, पर इस तरह से बंध गये और यह ज्ञानी स्वयं भूल कर रहा, इस कारण परतंत्रता हो गया सो इस परतंत्र को हटाना सो ही मोक्ष है, तो क्या यह परतंत्रता क्या यह कर्म बंधन ज्योतिष विद्या से अथवा मंत्रोपार्जन से दूर हो सकती है? नहीं दूर हो सकती तो धर्म के नाम पर तो कोई भी ज्योतिष विद्या और मंत्र का प्रयोग नहीं करता, सिर्फ अनादि अनंत परमब्रह्म स्वरूप की ही उपासना हुआ करती है।
   वातकव्यवहार व धनधान्य परिग्रहण श्रमणों का दूषण―जो साधु वायुविकार का भूत प्रेत आदिक के झाड़ने के संबंध का कोई व्यवहार करता है और उससे अपने आपका बड़प्पन समझता है, यह कृत्य भी साधुवों का दूषण है। साधु वह कहलाता है जो सर्व लौकिक बातों से विरक्त होकर केवलज्ञानमात्र निज अंतस्तत्त्व की ही साधना करते हैं। उनके लिए ये अन्य व्यापार सब दूषण हैं। धन धान्य का परिग्रहण करना, धान्य रखना, धन लेना, गोदान लेना या और किसी भी प्रकार का परिग्रह लेना साधुवों को दूषण है क्योंकि साधु तो निष्परिग्रह होते हैं। यदि गृहस्थों जैसी बात साधुजन भी करें तो फिर साधुता कैसी? साधु होकर भी यदि वह धन धान्य का ग्रहण करता है तो वह उस साधु के लिए दूषण है। सांसारिक जीव ये अनेक प्रजाजन मानव तो गुरू को पूजें और गुरु स्वयं हो गृहस्थों जैसा भाव रखने वाले तो यह कोई सही तुक नहीं बैठता है। केवल एक बाहरी रूप मुद्रा देखकर ही आकर्षण हो जाना यह कोई विवेक की बात नहीं है। किंतु रत्नत्रय की बात विदित हो, श्रद्धा सही, ज्ञान सही, आचरण सही यह बात साधु में दृष्ट हो तो वह साधु वंदनीय हैं और ऐसे गुरु के सत्संग से भावों में निर्मलता जगती है।


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