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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 99

From जैनकोष



‘‘ण सहंति इयरदप्पं थुवंति अप्पाणमप्प माहप्पं।

जिब्भणिमित्तं कुणंति ते साहू सम्मउम्मुक्का।।99।।’’

   अन्य गौरव के असहनशील साधुवों की सम्यक्त्वहीनता―यह ग्रंथ और यह प्रकरण साधुवों के लिए बताया जा रहा है, पर गृहस्थजन पढ़ते हैं और सुनते हैं तो उन्हें इस विधि से सुनना चाहिए कि मैं भी साधु होऊँ जब कभी, तो मुझ में ये सब दोष न रहें आर मैं निर्दोष आत्मस्वरूप की साधना करके कर्मों से रहित होऊं। तो यह सब साधुवों के लिए शिक्षा दी जा रही है। कुंदकुंदाचार्य उस समय समस्त मुनिसंघ के नायक थे सबको उपदेश करना धर्म मार्ग में प्रवर्ताना यह उन पर एक बोझ था आचार्य के नाते। तो वे साधुवों को ही ऐसा शिक्षण दे रहे हैं और इस बात को सुनकर हमें भी यह समझ लेना चाहिए कि साधु इसलिए होते हैं और अगर लौकिक विद्यायें रखे विषय कषाय से युक्त हो जाये तो उन साधुवों को समझाकर धर्म में स्थिर करना चाहिए इस कर्तव्य की शिक्षा यहाँ लेनी चाहिए। साधु होकर दूसरे साधु का बड़प्पन न सह सके या गृहस्थजनों का किसी धर्मात्मा का बड़प्पन न सह सके तो वह साधु सम्यक्त्व से रहित है जिसको देह में आत्मबुद्धि है और इस शरीर को ही आत्म सर्वस्व मानता है उसके ही दूसरों का बड़प्पन न सह सकने की बात जाग सकती है जो तत्त्वज्ञानी है वह अपने ज्ञानस्वभाव की आराधना के लिए लालायित है और इस विरागता का अभ्यास करके वह कभी वीतराग बन जाता है मगर जो ज्ञान स्वभाव की आराधना नहीं करता उसमें ही सब दोष आया करते हैं तो जो साधु दूसरे का बड़प्पन न सह सके वह सम्यक्त्व से रहित है।
   स्वप्रशंसक साधुवों की सम्यक्त्व हीनता―जो साधु अपने आप की प्रशंसा अपने आप ही करते हैं अपने आप ही माहात्म्य बताते तो वे साधु सम्यक्त्व से रहित हैं एक बात भी प्रयोग की है कि जो पुरुष अपने गुणों का अपने मुख से वर्णन करता है उसके गुणों में कमी आ जाती है और जो अपने गुणों का अपने आप वर्णन नहीं करता तो उसके गुणों में वृद्धि होती रहती है इसी कारण बताया है कि दूसरों के गुणों की तो प्रशंसा करना और अपने आप की निंदा करना यह उच्च गोत्र के आश्रव का कारण है अर्थात जो अपनी कमियों की निंदा करता है और दूसरे के गुणों की प्रशंसा करता है वह पुरुष अगले भव में उच्च कुल में पैदा होता है और जो इससे उल्टे काम करे अपनी तो करे प्रशंसा और दूसरों की करे निंदा तो ऐसे भाव वाले पुरुष के ऐसे कर्मों का बंध होता है कि वह नीच कुल में पैदा होता है।
   कर्मबद्धता की स्थिति में महत्त्व का अनवकाश―कर्म एक वास्तविक कोई पदार्थ हैं जो जीव के साथ बँधे हुए हैं और कोई कितनी भी समता लाना चाहे कि प्रजा में पूरी समानता आ जाय, ऐसा कोई उपाय बनाये तो यह उपाय बन भी नहीं सकता भले ही अनेक देशों ने इस बात का प्रयास किया है हमारे देश के सब लोग एक समान हो जायें तो भले ही धन न रहे किसी के पास अधिक सबके पास एक सा रहे या सरकार के भोजनालय में खायें ऐसी व्यवस्था भले ही बना लें मगर पुण्य पाप और हीनाधिक की बात को कोई देश नहीं कर सकता अन्यथा बताओ कोई तो देश का मालिक है, मंत्री है उच्च अधिकारी है कोई सिपाही है कोई चपरासी है तो समानता कहाँ की जा सकती। यह प्राकृतिक बात है हाँ कोई थोड़ी अवधि में समानता की बात सोचे तो भले ही कुछ बन सके। जैसे किसी एक व्यक्ति के पास धन अधिक न रहे सबके पास करीब एक सी स्थिति रहे फिर भी पूर्ण रूपेण यह बात बन नहीं सकती क्योंकि सब जीवों के साथ पुण्य कर्म और पाप कर्म बँधे हुए हैं उनका उदय होता है तो इसके अनुसार स्थिति बनती है तो इससे यह श्रद्धा करे कि किसी दूसरे अमूर्त के संपर्क से मेरे में विकार न हो सकेगा। मेरे स्वरूप के प्रतिकूल ही कोई वस्तु उपाधि लगी है तब मुझमें विकार जगे हैं तो वह प्रतिकूल वस्तु कौन है? पौद̖गलिक कर्म।
   कर्मविपाकोदय में हुए ज्ञान गुण हीन स्वप्रशंसक साधु की सम्यक्त्वहीनता―जब कर्म बंधे थे तो उन कर्मों में विपाक फलदान शक्ति बंध गई थी। उदय में आयें तो उसका निमित्त पाकर उसके अनुसार जीव पर बात बीतती है। तो यह भावना रखना चाहिए कि मैं कर्म से बंधा हूँ शरीर से परतंत्र हूँ मेरा क्या बड़प्पन रहा। मेरा बड़प्पन तो केवल स्वरूप में हैं वह जब मुझे नहीं प्राप्त हैं तो इस स्थिति का क्या बड़प्पन मानना? कौन सा गुण हो गया जिससे कि प्रशंसा खुद करे? कोई अगर अपने ज्ञान की प्रशंसा करता है वह ज्ञान क्या है केवलज्ञान के समक्ष, मनः पर्यय ज्ञानादिक के समक्ष जिसके ज्ञान विशाल है वह तो ज्ञान का घमंड नहीं करता और जिसके ज्ञान थोड़ा होता है और उससे अपने आप को बड़ा मानने लगा है तो वह ज्ञान का विकल्प करता है ऐसे ही हर एक बात समझना। तो जो पुरुष अपने आप ही अपने मुख से अपनी महिमा बताये तो वह साधु सम्यक्त्व से रहित है।
   जिह्मनिमित्त मुनिवेशियों की सम्यक्त्व हीनता―जो साधु जिह्वा के निमित्त अपनी साधुता धारण किए है वह भी सम्यक्त्व से रहित है जिह्वा के निमित्त खूब स्वादिष्ट भोजन मिले बनाना न पड़े आदि सब बातें सोचकर जो साधु का रूप धारण करता है वे साधु सन्मार्ग पर नहीं हैं देखिये हमेशा के लिए संसार के दुखों से छूटने की बात चित्त में हो तो वह साधु मुद्रा रखे बिना न बढ़ सकेगा आगे मगर कोई साधु मुद्रा में ही मोह रखे कि मैं यह हूँ और मेरा यह कर्तव्य है तो वह साधु सम्यक्त्व से रहित है तो जो अपने ज्ञान रस का स्वाद लेता रहता है वह कभी भी पौद̖गलिक रस का स्वाद लेने का उत्सुक नहीं होता। तो इस प्रकार साधुवों को कौन सी बात दोष त्रुटियाँ दूर करना चाहिए इसका वर्णन अब तक चलता है अब आगे की गाथा में साधुवों की प्रवृत्ति बतायेंगे। कि साधु पुरुष किस प्रकार से अपना व्यवहार करते हैं और किस तरह आत्मा का पोषण करते हैं।


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