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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:लिंगपाहुड - गाथा 1

From जैनकोष



काऊण णमोकारं अरहंताणं तहेव सिद्धाणं ।

वोच्छामि समणलिंगं पाहुडसत्थं समासेण ।।1।।

(1) मोक्षमार्ग में जिनलिंग का महत्त्व―इस ग्रंथ का नाम है लिंगप्राभृत । मुनिलिंग का इसमें वर्णन है । आचार्य कुंदकुंददेव कहते हैं कि प्रभु अरहंत एवं सिद्धों को नमस्कार करके मैं संक्षेप से मुनियों के भेषविषयक इस प्राभृत शास्त्र को कहूंगा । इससे पहले मोक्षपाहुड ग्रंथ की रचना की थी । जिनलिंगधारण किए बिना मोक्षमार्ग नहीं चलता, मोक्ष का उपाय नहीं बनता । उसके बाद यह कहना आवश्यक हो गया कि वह मुनिभेष जिनलिंग कैसा होना चाहिए? उसके विषय में इस ग्रंथ में वर्णन होगा । इस गाथा में अरहंत और सिद्ध भगवंतों को नमस्कार किया है । ये दो पद हैं मोक्षमार्ग के फल । इसकी साधना साधु जन करते हैं । तो साधुलिंग की बात क्यों कही जा रही है? यह नमस्कार गाथा से सिद्ध हो जाता । चूंकि साधुलिंग धारण करके अरहंत और सिद्ध की अवस्था मिलती है जिसको कि इस गाथा में नमस्कार किया है । इसलिए साधुलिंगविषयक सच बात प्रसिद्ध होना बहुत आवश्यक है । साधु कहलाता है वह जो आत्मा की साधना करे । आत्मा है दर्शनज्ञानमयी । उसकी साधना होती है ज्ञान द्वारा । धीरता, गंभीरता, अंत: परिचय, बाह्य विकल्प का त्याग, निज स्वरूप की दृष्टि हो, ऐसी भीतरी साधना के द्वारा इस सहज परमात्मतत्त्व की साधना बनती है । बात सीधी यों है कि जिस ज्ञान में यहाँ लोग कितनी ही बातें बसाया करते हैं यह ज्ञान कभी खाली नहीं रहता, कुछ न कुछ सोचता रहता है, न जाने कहाँ-कहां के विचार किस तरफ की भावना, कैसी वासना, किस ओर का उद्यम यह सब अज्ञान का चल रहा है । तो ज्ञान में बाह्यपदार्थविषयक कल्पनायें न चलें और केवल सहज आत्मस्वरूपविषयक ज्ञान रमा रहे तो इस ही को कहते हैं साधना । यह साधना तब ही संपन्न हो सकती है जब किसी बाह्य पदार्थ का । विकल्प न रहे ꠰ बाह्य पदार्थ का विकल्प न रहे यह बात वहां संभव है जहाँ कोई आरंभ परिग्रह न रहे । सो यद्यपि एक मार्ग का निर्णय कर लिया गया सम्यग्दर्शन में, फिर भी जब तक आरंभ और परिग्रह का त्याग नहीं होता तब तक सम्यग्दर्शन से जैसा, सन्मार्ग का निर्णय बनाया है उसका प्रयोग नहीं हो पाता । तो निरारंभ और निष्परिग्रह अवस्था कैसी होती है उसका बताना आवश्यक है ꠰

(2) साधना के फल के अनुरूप साधक की साधना―भैया, जैसा कार्य किया जाना हो उसके अनुरूप कारण और साधन बनते हैं । साधु की साधना का फल है निरारंभ निष्परिग्रह निर्विकार सहज आत्मस्वरूप का विकास । तो जिस विकास के लिए साधना है वह साधना उसके अनुरूप है । किसी बाह्य क्रियाकांड मात्र से या किसी बाहरी पदार्थ के ध्यान ख्याल से यह ज्ञान पद संभव नहीं, यह पद ज्ञान द्वारा ही संभव है । फिर भी जो जीव ज्ञान द्वारा इस ज्ञानस्वभाव की साधना करना चाहते हैं वे जीव प्रवृत्ति की प्रकृति में लगे थे, सो साधना का प्रयत्न करने पर भी प्रकृति सामने आती है और प्रवृत्तियाँ होने लगती हैं । तो वे सब प्रवृतियां कैसी हो जैसे कि ज्ञानस्वरूप की साधना में विघ्न न आ सके ꠰ बस इन्हीं प्रवृत्तियों को कहते हैं मुनिक्रिया । जैसे खाये बिना जीवन नहीं चलता । जीवन साधु का भी है, खाना उन्हें भी पड़ेगा । तो ज्ञानस्वरूप की धुन रखने वाला, सहज आत्मस्वरूप में मग्न होने का प्रयत्न करने वाला किस तरह से खाने की प्रवृत्ति बनाये कि जो लक्ष्य से विपरीत दिशा में न ले जाये । बस यही हो गया एक मुनिलिंग । पहली बात यह है कि वे भिक्षावृत्ति से भोजन करें । समय पर आहारचर्या के लिए उठें और नवधा भक्तिपूर्वक जिसने पड़गाहा वहां आहार कर लिया, न पहले विकल्प, न बाद में विकल्प ꠰ केवल आहार करते समय तक ही थोड़ी प्रवृत्ति रही, पर उस साधु में न पहले विकल्प है कि कहां आहार बनेगा, कहाँ क्या होगा? हमें क्या युक्ति लगाना और न बाद में विकल्प कि क्या बना, क्या खाया? कल क्या होगा? कुछ भी विकल्प नहीं रहता, और यदि भिक्षावृत्ति मुनिचर्या में न हो अर्थात् कुछ प्रबंध करने कराने की रीति हो तो वहाँ विकल्प जगेंगे । तो विकल्प वाली प्रवृत्ति तो मुनिधर्म के विरुद्ध है, और जहाँ विकल्प हटे ऐसी वृत्ति मुनिचर्या में है । जिन पदार्थों के भक्षण में हिंसा हो, ऐसे पदार्थों का भक्षण किया जाये तो इसमें जीवस्वरूप की भावना में कमी है । जिसके जीवस्वरूप की भावना बनी रहती है, अन्य जीवों में भी जीवत्व को निरखता है उसके कभी खाने की वृत्ति ऐसी न होगी कि जिसमें जीवहिंसा भी हो जाये, क्योंकि यदि ऐसी वृत्ति बने तो उसकी भावना में कमी आयी तब वह वृत्ति बनी, सो उसके भाव बढ़ नहीं सकते । इस कारण निर्दोष आहार साधु को मिले तो ले ले । कई बातें विघ्न की होती हैं जिन्हें अंतराय कहते हैं । जैसे मानो भोजन करते हुए में भोजन में कौवा बैठ गया या उनके हाथ में से कोई कागपक्षी कोई ग्रास उठाकर ले गया और फिर भी वे खाते रहें तो भैया, जिसमें आसक्ति की अधिकता है उसकी ही यह वृत्ति बनती है । नहीं तो, जरासी कमी में आहार छोड़ देना यह विरक्ति का चिन्ह है । तो जहाँ खाने की इतनी अधिक आसक्ति कि कैसा ही अंतराय आये, फिर भी भक्षण करते रहें तो यह है आत्मसाधना के विरुद्ध प्रवृत्ति । साधुवों की चर्या में, बस यह ही पहिचान बनाते जाइये प्रत्येक चर्या, प्रत्येक मूलगुण इस प्रयोजन के लिए है कि आत्मसाधना के विपरीत वृत्ति न बने, किंतु आत्मसाधना के पात्र रहे आयें ।

(3) मुनिचर्या का प्रयोजन आत्मसाधना की पात्रता बनाये रहना―आत्मसाधन की पात्रता बनी रहे ऐसी चर्या करना मुनि का कर्तव्य है यह कुंजी आप उनकी सभी क्रियावों में, मूलगुणों में घटाते जाइये तो सब मिल जायेगी । जैसे केशलोंच करना । विरक्त परिणाम हैं, शरीर से भेद का उन्हें दृढ़ अभ्यास है इस कारण यह तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता कि उनको संक्लेश होता होगा । और सुगमता, स्वाधीनता इतनी है कि जब समय हुआ और अपने हाथ से केश उखाड़कर फेंक दिया । यदि ऐसा न करें तो फिर उन्हें क्या करना होगा? किसी नाई को बुलवाना होगा, उसका इंतजार करना होगा, उसका परिश्रम चुकाना होगा । तो देखो उसमें कितनी पराधीनता है और कितना उसमें अर्थ का संबंध है । ये बातें आत्मसाधना के विपरीत बन गईं, इस कारण आत्मसाधना के विपरीत बात न की जानी चाहिए । और भी जो भी क्रियायें हैं, जैसे मुनिजन स्नान नहीं करते, सिर्फ हाथ, पैर, मुख जरासा धो लेते हैं, यदि ऐसा न हो और वे स्नान करें तो काफी पानी बिखरेगा जमीन पर, वहाँ जो यत्र तत्र चींटियाँ डोलती हैं उनको कष्ट होगा । गरम पानी है उससे भी चींटियों को अधिक कष्ट होगा और अधिक पानी बिखरेगा उससे भी कष्ट होगा । अब भला बताओ वे साधुजन ऐसे जीवों की तड़फन वाली बात देखें या साधुक्रियावों को करें? अरे साधु के मन में इतनी उदारता होती कि वे संसार के सभी जीवों को अपने ही जीव स्वरूप के समान समझते । उनके जीवन की ऐसी ही साधना होती है कि वे अपने आत्मस्वरूप में समाने की ही निरंतर धुन रखते हैं । हाँ कुछ बाहरी प्रवृत्तियों भी करनी पड़ती हैं जो कि जीवन चलाने के लिए आवश्यक होती, पर उनकी भी कुछ सीमा होती है । तो साधुवों की जितनी क्रियायें हैं, उनका आधार यह है कि ऐसी मन, वचन, काय की शुद्धता वाली वृत्ति रहे कि जो वृत्ति आत्मसाधना के विपरीत न जाये और निःशल्य रहकर ज्ञान में ज्ञानस्वरूप को समाये रहने का कार्य बनता जाये । तो मोक्ष के लिए जो साधना करना चाहे उसके लिए यह अति आवश्यक है कि वह ऐसे साधुलिंग में रहकर चले ताकि वह भटक न जाये । तो साधुवों को क्या करना चाहिए, क्या उसका चिन्ह है, कैसा उसका भेष है, इसका जानना अति आवश्यक है, इस कारण इस लिंगपाहुड ग्रंथ में इस ही मुनिलिंग का वर्णन किया जायेगा ।



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