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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:शांतिभक्ति - श्लोक 15

From जैनकोष



क्षेमं सर्व प्रज्ञानां प्रभवतुबलवांधार्मिको भूमिपाल:।काले काले च सम्यग्वर्षतु मघवा व्याधयो यांतु नाशम्।दुर्भिक्षंचौरिमारि: क्षणमपि जगतां मास्मभूज्जीवलोके।

जैनेंद्रं धर्मचक्रं प्रभवतु सततं सर्वसौख्यप्रदायी।।15।।

(156) सर्वजीवों के क्षेम मंगल की भावना में शांति का योग―सबकी जो शांति चाहता है वही स्वयं की शांति का पात्र हो सकता है जो दूसरा में कोई अशांति, दु:ख, कष्ट, बाधा, की बात सोचता है वह तुरंत ही नियम से अशांत रहता है। दूसरे के अकल्याण की बात, दूसरे के विनाश, विरोध, उपद्रव की बात उस ही दिल में आ सकती है जो दिल क्षुब्ध हो। शांत दिल किसी की अशांति चाह सके ऐसा नहीं हो सकता। शांति का इच्छुक यह पूजक भावना कर रहा है कि सर्व प्रजा में क्षेम कुशल हो। जैसे परिवार के लोग अपने परिवार जनों को अपना समझकर सबके सुख की भावना भाते हैं, सब सुख से रहें, तो जीवत्व के नाते से जीव स्वभाव की दृष्टि रखकर समस्त जीवों को अपने स्वभाव के नाते जो अपना मान लिया वे सब जीव भी मेरे ही जैसे हैं, ऐसा मानकर उसके क्षेम कुशल की भावना करते हैं तो सब जीवों के प्रेम क्षेम कुशल की भावना करते है।

(157) भावों की सम्हाल का महान् पुरूषार्थ--जीव को सिवाय भावों के और कुछ हाथ नहीं आता। अपने परिणाम बना लें। अन्य योग तो, समागम तो पुण्य पाप के आधीन हैं। जैसा मिला न मिला यह तो उदयानुसार है पर शांति, प्रकाश तृप्ति ये सब शुद्ध भाव के आधीन है। पुण्यात्मा होना और बात है और पुण्योदय वाला होना और बात है। जिसके पुण्य का उदय है उसके इष्ट समागम धन-वैभव अटूट आते हैं। कोई कसाई भी है, जो धनिक है, राजमान्य है उसका भी पुण्य का उदय कहा जा सकता है, पर पुण्यात्मा वही कहला सकेगा जिसके भाव पवित्र है। पुण्यात्मा मायने पवित्र आत्मा , चाहे उसके पाप का उदय चल रहा हो तो भी वह पुण्यात्मा कहला सकता है । पाप का उदय है, उपसर्ग आता है, निर्धनता है, कोई सता रहा है, बड़े बड़े साधुवों पर भी उपसर्ग आया । जब ऋषभदेव को छह महीने के उपवास के बाद भी 6 महीना आहार न मिला, आहार करने जायें, पर विधि न मिली तो उस समय क्या कुछ पाप का उदय नहीं कहा जा सकता है? असाता वेदनीय व अंतराय का तो उदय था ही, लेकिन आत्मा तो पुण्यात्मा था, पवित्र आत्मा था। और जैसे आजकल के कसाई लोग, अन्यायी लोग या जिन्हें लुच्चा-लफंगा की प्रकृति वाला कहते हैं, ऐसे लोग नेता बनकर या कुछ चतुराई की बातें दिखाकर लाखों करोड़ों रुपये इकट्ठे कर लेते हैं तो उन्हें कुछ लोगों की अपेक्षा तो कहा जायगा कि इनके पुण्य का उदय है लेकिन उनका आत्मा कैसा है ? पापात्मा है। अब यहाँ देखिये कि तृप्ति का, शांति का संबंध पुण्योदय के साथ हैं या पुण्यात्मा होने के साथ । पुण्यात्मा होने के साथ है न कि पुण्योदय के साथ। तो जो जीव मात्र को अपने स्वरूप के समान तक कर विरोध को तो एकदम नष्ट कर देता है। विरोध तो है नहीं किसी के प्रति और उन सबके प्रति आनंद और शांति की भावना करता है। वह स्वयं शांतिलाभ पाता है। यहाँ उपासक भावना कर रहा है कि सर्व प्रजा में क्षेम कुशल हो।(158) अविरोध के भाव का महान् तपश्चरण―यह भी बड़ा तपश्चरण है किसी भी जीव के प्रति विरोध और द्वेष का भाव न हो। कोई मनुष्य मेरे प्रति विरोध भी रखता हो तो सोचना चाहिये कि प्रथम तो उसने मुझे जाना नहीं। मैं तो अमूर्त ज्ञानानंदस्वरूप मात्र हूँ, इस स्वरूप को उसने जाना नहीं। केवल इस शरीर सकल को ही समझ रहा है कि यह है यहाँ, और उसको लक्ष्य में लेकर ही यह विरोध भाव रख रहा है, पहिली बात तो यह है । दूसरी बात यह है कि वह मेरा विरोध बिल्कुल भी नहीं रख रहा। जैसे हम सुख शांति चाहते हैं इसी प्रकार वह भी सुख शांति चाहता है। और उसको इस समय यह कल्पना में आया हुआ है कि मैं ऐसा करुँ तो सुख शांति मिलेगी। उसका मूलत: प्रयत्न मेरे को मिटाने का नहीं है, किंतु स्वयं को सुखी शांत बनाने का है। सो यह जगत की नीति ही है कि प्रत्येक जीव सुख शांति चाहता है। एक पड़ोसी दूसरे पड़ोसी से विरोध करके विरोध नहीं चाहता, सुख शांति चाहता है। कल्पना में चूंकि ऐसा ही आया कि इसका विनाश कर दें, अथवा घर मिटा दें, आजीविका मिटा दें तब हमें सुख मिलेगा। तीसरी बात यह सोचो कि यह सब काम ऊपर-ऊपर से हो रहा है, वह भी परमार्थ तत्त्व नहीं है जो विरोध कर रहा है, जिससे विरोध किया जा रहा है वह भी परमार्थ तत्त्व नहीं है। तो माया की छाया से हो रही पहिचान ठान । जो वास्तव में मैं हूँ उस मेरे को पहिचानने वाला कोई है नहीं। मेरा पहिचाननहार दूसरा न कोई है। मैं ही मैं अपने को समझ लूं, यह बात तो बन जायगी, पर ये दूसरे मेरे को पहिचानें, समझें, जानें, सो न बनेगा। और कभी वह दूसरा भी ज्ञानी बन गया और मेरे स्वरूप को पहिचानने लगा वह तो ज्ञाता दृष्टा हो गया। उसकी निगाह में अब व्यक्तित्व का नाता न रहा। तो इस तरह भी उसने मुझे नहीं पहिचाना । तो जितना व्यवहार बन रहा है यह सारा व्यवहार माया का माया से बन रहा है। परमार्थ तत्त्व तो शाश्वत एक ध्रुव है। मुझमें जो परमार्थ ज्ञानस्वभाव है वही मैं हूँ, ऐसा अपने आप में निर्णय करके जगत के सब जीवों के प्रति मित्रता का भाव लाइये। वह है ऐसी विशुद्धि कि जिस विशुद्धि से आत्मा को शांति प्राप्त होती है।सब सुखी हों, सब शांत हों। जब किसी पर कोई बड़ा दु:ख आ पड़ता है और चाहे वह सज्जन प्रकृति का भी नहीं है तो भी उसके मुख से निकल ही आता है कि ऐसा दु:ख किसी को न हो। तो मालूम होता है कि सभी जीवों के प्रति सुखी शांत होने की भावना में वह प्रभाव है कि स्वयं भी शांत हो जाय। जैसे―कहते हैं ना, जुड़-मिलकर मेल पूर्वक खावो, पियो । इसी तरह जुड़-मिलकर शांति का भाव करो। दूसरों के प्रति शांति का भाव किये बिना खुद के आत्मा में शांति के अंकुर नहीं उत्पन्न हो सकते। यहाँ पूजक शांति जिनेंद्र के सामने शांतिनाथ प्रभु को उपयोग में समक्ष रखकर अभ्यर्थना कर रहा है कि सब जीव सुखी शांत होवो।(159) शांतिपूजक की पर के प्रति द्वितीय भावना―राजा धार्मिक और बलवान बने, यह दूसरी भावना की जा रही है। जो प्रजा का रक्षक हो, प्रजा का हितैषी हो वह है प्रजा का मालिक । उसी को कहते हैं राजा। जो प्रजा पर अन्याय करता हो, प्रजा को दु:खी रखता हो उसे मालिक नहीं कह सकते। एक बार किसी शिकारी ने एक हंस पक्षी को तीर मारा। वह पक्षी गिर गया। और किसी सज्जन ने उस पक्षी को उठा लिया और उसका खून साफ किया, उसके शरीर पर हाथ फेरा और बड़े प्रेम से उसे ह्रदय से लगा लिया। यों उससे जो बना सो उस पक्षी की सेवा की। अब उस शिकारी ने आकर राजा से शिकायत की कि महाराज! इसने मेरा पक्षी ले लिया है, वह दिला दीजिए। तो वह सज्जन कहता है कि महाराज यह पक्षी इसका नहीं है, यह तो मेरा है। शिकारी अपनी कहानी सुनाने लगा-देखो मैंने तो इसे मारा, गिराया, यह तो मेरा है ,तो वह सज्जन कहता है―देखो मैंने इसे उठाया, इसका खून साफ किया, इसके शरीर पर हाथ फेरा, इसकी खूब सेवा की, यह तो मेरा है। अब दो समस्यायें आमने आयीं। एक था रक्षक, एक था भक्षक । तो विवेकियों का यह निर्णय हुआ कि जो रक्षण करे वह मालिक और जो भक्षण करे वह मालिक नहीं। तो राजा भी वहीं कहलाता है जो प्रजा की रक्षा करता है। उस राजा के प्रति यह भावना भायी जा रही है कि यह धार्मिक ओर बलवान होओ।(160) राजा के धार्मिक और बलवान होने पर ही शांति व्यवस्था―राजा केवल बलवान हो याने धार्मिक न हो तो उससे काम न चलेगा। राजा बलवान हो गया, जितने चाहे राज्यों को हड़प करे, जिस चाहे पुरूष को बाधा दे, उससे काम न चलेगा ठीक । क्योंकि धार्मिक हुए बिना उपकारी न बन सकेगा। पूजा पाठ भी करता रहे, सब कुछ करता रहे, मगर बलवान न हो तो उससे भी प्रजा का काम नहीं चलता। उसका भी काम नहीं चलने का। वह भी कर्तव्य से गिर रहा। इतना बड़ा धर्मात्मा बनना है तो योगी बन जाय। प्रजा की रक्षा का भार क्यों लाद रखा है? तो दूसरी भावना में यह भावना की जा रही है कि राजा धार्मिक और बलवान बने। जो धार्मिक हो और साथ ही बलवान भी हो वह राजा प्रजा की रक्षा करने में समर्थ है और तब ही वह स्वयं निर्वाधरूप से रह सकेगा। और इसी प्रकार से शांति बर्त सकेगी। पूजक सब जीवों के प्रति शांति की भावना कर रहा है।(161)शांतिपूजक की पर के प्रति तृतीय भावना―तीसरी भावना में कह रहा पूजक कि समय-समय पर मेघ बरसो। समय पर मेघ न बरसना अशांति और त्राहि-त्राहि से संबंध बनाता है। जब जल चाहिए तब बरसे, जब न चाहिए तब न बरसे यह तो वहाँ के निवासियों के पुण्य पर निर्भर है। मेघों का ठीक समय पर बरसना देशवासियों के पुण्य पर निर्भर है। तभी तो एक कवि ने कहा कि हे मेघराज, तुम धनी तो बहुत हो , पानी बरसता है तो मानो सुख शांति बरसती है, पर तुम ऊसर बंजर में भी उतना ही बरसाते, समुद्र में भी उतना ही बरसाते और अच्छी भूमि में भी उतना ही बरसाते, तो तुम्हें कुछ विवेक ही नहीं है। तो भावना की जा रही है कि समय-समय पर वृष्टि होवो। एक ऐसी दिल बहलावा की कहानी में कहा जाता है कि एक बार राखी का होली ने निमंत्रण किया। राखी होली के घर गई तो राखी ने देखा कि वहाँ तो बड़ी सजावट थी, सभी लोग बड़े खुश दीखते थे, छोटे बड़े सभी हँस खेल रहे थे, घर-घर अनेक प्रकार के मिष्ठान बन रहे थे। बड़ी खुशियाँ मनाई जा रही थीं। राखी तो निमंत्रण पूरा करके घर लौट आयी। अब राखी ने होली का निमंत्रण किया। (तो राखी तो बरसात के दिनों में होती है ना?) होली जब राखी के यहाँ आयी तो देखा कि वहाँ तो सभी घर गंदे हैं, कूड़ा कचरा सब जगह है। कपड़े भी गंदे पड़े हैं, लोगों में कोई खुशियाँ नहीं दिख रही है, तो होली नाक-भौंह सिकोड़कर वहाँ से अपने घर चली आयी। अब दूसरे वर्ष राखी ने क्या किया कि पानी न बरसाया, अकाल पड़ क्या। तो लोगों में बड़ी त्राहि त्राहि मच गयी। जब अकाल पड़ गया। तो लोगों में खुशियाँ गायब हो गयी। ऐसे मौक़े पर जब होली ने राखी को बुलाया तो राखी को वहाँ पहिले वाला दृश्य गायब दीखा। राखी ने होली से पूछा कि होली बार जब मैं आयी थी तब तो लोगों में बड़ा उल्लास था। घर-घर खूब मिठाइयाँ बनाई जा रही थी, बड़ी खशियाँ मनाई जा रही थी। अब क्या हो गया ? तो होली ने कहा कि हमने तुम्हारे यहाँ आकर तुमसे घृणा की थी यह उसका फल है। तो मतलब यह है कि जब समय-समय पर वर्षा होती रहती है तब ही तो लोग बड़े सुख चैन में रहते हैं। काम करने वाले लोग काम करते समय मामूली कपड़े पहिनकर परिश्रम करते रहते हैं और काम से निपटने पर नहा धोकर साफ कपड़े पहिनकर बन ठनकर निकलते हैं। तो वे लोग ऐसा श्रम, काम न करें तो वह ठाठ कहाँ से नसीब आये? तो वैभव की बड़ी शोभायें बनाना ये सब बातें इस पर निर्भर हैं कि समय-समय पर वर्षा होवे। पूजक का यह भाव है कि समस्त प्रजा सुख शांति से रहे, क्षेम हो, कल्याण हो । तो तीसरी भावना में वह कहता है कि समय-समय पर भली प्रकार से मेघ बरसो।(162)शांतिपूजक की पर के प्रति चतुर्थ भावना―चौथी भावना में कहते हैं कि समस्त व्याधियाँ नाश को प्राप्त हों। राजा भी बलवान हो, समय पर वर्षा भी होती रहे। और मान लो सावन भादों में हैजा या प्लेग पड़ गया, लोग दु:खी हो रहे, कोई ऐसी व्याधियाँ आ गयी तो लोग कितना परेशान हो जाते हैं। तो चौथी भावना में कह रहे हैं कि लोगों की व्याधियाँ नाश को प्राप्त हों। व्याधियाँ होने का अंतरंग कारण तो पाप का उदय है, और बाहरी आश्रय है असंयम, अटपट खानपान। अगर नियमित भोजनपान रहे और बराबर शारीरिक श्रम रहे तो बहिरंग कारण तो हट गया। अब कोई पाप का तीव्र उदय हो और च्याधियाँ आ जायें तो उस पर क्या ? तो संयम से रहना, व्रत पालन करते हुए रहना यह अपने लाभ के लिए बहुत आवश्यक बात है।(163)शांतिपूजक की पर के प्रति पाँचवी भावना―5 वीं भावना में पूजक कह रहा है कि कहीं दुर्भिक्ष मत फैले। दुर्भिक्ष कहो अथवा अकाल कहो जिससे सब जीवों को बाधा हो, महंगाई बढ़े ऐसा दुर्भिक्ष का समय मत होवो। यह य शांतिजिनेंद्र के स्तवन में प्रार्थना की जा रही है। जिन प्रभु के उपस्थित होने पर 100-100 योजन चारों तरफ सुभिक्ष रहती है ऐसे सुभिक्ष के निमित्तभूत शांति जिनेंद्र से पूजक कह रहा है कि कहीं भी दुर्भिक्ष न हो, सभी लोग सुखी होवें। सब सुखी होवें ऐसी भावना करने वाले ने अपने स्वरूप का स्पर्श किया तब अंदर से यह आवाज निकली । जैसे कितना ही क्रूर दुष्ट मनुष्य हो, जब उसके ऊपर तेज दु:ख आता है तब वह कहता है कि किसी को ऐसा दु:ख मत हो, तो जब उसने दूसरों के दु:ख की भी झलक उस अपने दु:ख में ले लिया तब ही उसके अंदर से ऐसी आवाज निकली। ऐसा कहने पर भी दो बातों का आशय हो सकता है । एक अपने स्वरूप के समान दूसरों का स्वरूप समझकर कहे और एक यह बताने के लिए कहे दूसरों से कि इससे ज्यादा दु:ख और कुछ हो नहीं सकता। जैसे घर की कोई लड़ने वाली महिला को जब किसी के द्वारा बड़ा कष्ट मिलता है तो वह कह बैठती है ना कि ऐसा कष्ट किसी पर न गुजरे। तो दयावश नहीं कह रही है, किंतु दुनिया को यह बताने के लिए कि इससे बढ़कर दु:ख और नहीं हो सकता जो दु:ख मुझे है। तो जब अंत:ध्वनि से यह बात बनती है तो समझो कि उसने अपने स्वरूप के समान दूसरों को भी लक्ष्य में रखा है।(164)शांतिपूजक की पर के प्रति छठी भावना―छठी भावना में कहते है कि कहीं चोरी का उपद्रव मत हो। जब कभी डाका चोरी लूटमार आदि चलने लगते हैं तब भी अशांति का वातावरण हो जाता है। भैया ! इस अनीति से न तो चोरी डकैती करने वाले लोग भी छुपकर रहेंगे, भय मानेंगे, वे भी शांति सुखी न रह सकेंगे। और जो समाज के लोग हैं वे भी उस वातावरण से शांत सुखी न रह सकेंगे। तो संपूजक यह भावना करता है कि चोरी मत होवो। क्षणभर भी, रंचमात्र भी मत हों। चोरी में आता है हराम का माल, ऐसा लोग कहते ही हैं। तो वह चोरी किया हुआ माल भी वे दूसरों को ही लुटा देते है, वे खुद उसका उपभोग नहीं कर सकते। न्याय से की गई कमाई का वे उपभोग भी करते हैं और शांत भी रहते हैं।

(165)चोरी से चोरों की विपत्ति का एक दृष्टांत―एक कथानक है कि चार चोर चोरी करने गए और दो लाख का माल लूटकर लाये। अब सुबह होने से दो घंटे पहिले किसी नगर के समीप जंगल में वे ठहर गए ओर बांटने लगे धन। तो कहा-अभी जल्दी क्या पड़ी है? पहिले मिठाई मांगकर अच्छी तरह से खाया पिया जाय बाद में धन बाँट लेंगे। सो उनमें से दो चोर तो चले गए मिठाई लेने और दो चोर धन की रखवाली में रहे। मिठाई लेने जाने वाले दो चोरों के मन में यह पाप आ गया कि अपन दोनों मिठाई में जहर मिलाकर ले चले, वे दोनों उस विष भरी मिठाई को खाकर मर जायेंगे और हम तुम दोनों एक एक लाख का माल बाँट लेंगे। इधर धन की रखवाली करने वाले चोरों के मन में पाप आया कि अपन दोनों बंदूक तानकर बैठ जायें और उन दोनों को गोली से शूटकर दें। वे दोनों मर जायेंगे तो अपन दोनों एक-एक लाख का धन बाँट लेंगे। सो दो चोर तो लाये विष भरी मिठाई और दो चोरों ने उन दोनों को आते ही गोली से शूटकर दिया । वे दोनों तो मर गए। अब वे दोनों जीवित चोर सोचने लगे कि पहिले अपन लोग इस आयी हुई मिठाई को अच्छी तरह खालें, बाद में धन बाँटेंगे। उन दोनों चोरों ने वह मिठाई खाली तो वे भी मर गए। सारा धन जैसा का तैसा पड़ा रह गया । तो ये जो अन्याय की बातें हैं, चोरी डकैती आदि की बातें हैं उनमें न वे चोर डकैत ही सुखी शांत रह पाते हैं और न समाज के लोग। तो यह भावना करता है कि हे प्रभो! चोरी कहीं न होवे।

(166)पूजक की पर के प्रति सातवीं व अंतिम भावना―सातवीं भावना में पूजक कहता है कि महामारी रोग क्षणभर को भी न हो। ये जो हैजा, प्लेग, चेचक आदिक बीमारियाँ हैं ये महामारी रोग ही तो हैं। इनके फैलने से समाज में क्षोभ मच जाता है, सर्वत्र अशांति फैल जाती है। तो पूजक कहता है कि हे भगवान् ! यह महामारी रोग कहीं न होवे। अंतिम भावना में पूजक कहता है के सबको सुख देने वाला जैनेंद्र धर्मचक्र निरंतर प्रभावशाली रहे। वस्तुस्वरूप का जहाँ सम्यक् प्रतिपादन है, प्रत्येक पदार्थ अपने द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव से है, किसी का किसी अन्य से संबंध नहीं है। सब पदार्थ परिपूर्ण हैं, उत्पाद व्यय ध्रौव्य वाले हैं, इस प्रकार के वस्तु स्वातंत्र्य का जिस धर्म में, मार्ग में, शासन में ज्ञान हो, जिसके प्रताप से संसार के सारे संकट टल जाते हैं, ऐसा यह जिनेंद्र देव के द्वारा कहा गया, उस परंपरा से आया हुआ, वस्तुस्वरूप का बताने वाला यह धर्मचक्र अर्थात यह ज्ञानप्रकाश जो सब जीवों को सुख देने वाला है, निरंतर प्रभावशाली बने।


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