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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:शांतिभक्ति - श्लोक 3

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संतप्तोत्तमकांचनक्षितिधरश्रीस्पर्द्धिगौरद्युते।पुंसांत्वच्चरणप्रणामकरणात्पीडा: प्रयांति क्षयम्।।उद्यदभास्करविस्फुरत्करशतव्याघातनिष्कासिता।नानादेहिविनोचनद्युतिहरा शीघ्र यथा शर्बरी।।3।।

(46)प्रभुचरणप्रणमन से पीड़ाओं का क्षय―हे गौरद्युते ! श्रेष्ठांग प्रभु ! तुम्हारे चरणों में प्रणाम करने से प्राणियों की पीड़ायें सब नष्ट हो जाती हैं। शांतिनाथ प्रभु के देह को स्वर्णमय, कांतिमय, देदीप्यमान बताया गया है। जिनकी दीप्ति कैसी है ? जैसे कि अग्नि में तपाये गये स्वर्ण की शोभा है अथवा जैसे सुमेरूपर्वत की शोभा है, ऐसी अनुपम दीप्ति वाले हे प्रभो ! तुम्हारे चरणों के प्रणाम करने से प्राणियों की पीड़ायें क्षय को प्राप्त होती हैं। जैसे कि सूर्य का जब उदय हो रहा है तब उदयागत सूर्य की किरणों के घात से ऐसी रात्रि नष्ट हो जाती है जो रात्रि अनेक प्राणियों के नेत्रों की भी द्युति हर लेती है, इसी प्रकार हे प्रभो ! आप के चरणों के प्रणाम करने से, चरणों में नम्र होने से समस्त पीड़ायें शांत हो जाती है। इस चीज को अध्यात्मतत्व के रूप से भी निरखिये-शुद्ध अंतस्तत्व ज्ञानमात्र जिसकी द्युति एक अनुभव में लायें तो उससे एक स्वच्छ प्रतीति होगी। ज्ञान का वर्णन जब भी किया जाता है साहित्य में तो स्वच्छता से किया जाता है। और वह स्वच्छता सम्यग्दर्शन के कारण हुई है, अतएव वह स्वच्छता एक रूचि के रंग में विराजती है। रूचि और ज्ञान, सम्यक्त्व और ज्ञान, इनके मेल से जिनका वर्ण गौर है, स्वच्छ है, ऐसे हे शुद्ध ज्ञायक अंतस्तत्व! तुम्हारे चरण हैं ज्ञानदर्शन। उनमें प्रणाम का करना यही कहलाता है कि यह उपयोग झुक गया। नम धातु का अर्थ झुकने में है, यह पुरूष उनके चरणों में नम गया और यह डाली फलों के भार से नम गयी ऐसा लोग कहते भी हैं। तो नम का अर्थ है झुकना। तो जिसका उपयोग इस ज्ञान दर्शन शुद्ध स्वरूप में झुकता है उसको पीड़ा कोई रह ही नहीं सकती है।

(47)कृतकृत्यता के भाव में ही शांति का अनुभव―संसार के अन्य प्रयत्न तो ऐसे हैं कि शांति के लिए लोग करते हैं तो शांति मिल पाये अथवा न मिल पाये, यह कोई नियम नहीं है। अथवा बाह्य यत्न से तो शांति मिलती ही नहीं है। बाह्य यत्न करने पर भी जो कुछ भी शांति मिलती है, जो कुछ भी पीड़ा का शमन होता है वह कृतकृत्यता के अंश से होता है। मेरे करने को अब यह काम नहीं रहा इस प्रकार की कृतकृत्यता का जो आंशिक अनुभव है उससे सुख मिलता हैं। विषयों के प्रसंग में भी जब जब भी थोड़ी बहुत शांति सी महसूस की जाती है वह विषयों की प्रवृत्ति के कारण नहीं, किंतु उस प्रसंग में भी जिस क्षण जितने अंश में कृतकृत्यता का अनुभव है उतने अंश में शांति है। किसी भी कार्य में ले लो। समाजसेवा, देशसेवा, गुरूसेवा आदिक इन समस्त कार्यो में जब-जब भी कुछ शांति का अनुभव होता है तो वह आत्मविश्राम के अंश के कारण होता है, बाह्य की लगन में तो ऐसी प्रकृति पड़ी है कि वह नियम से क्षोभ उत्पन्न करें। तो यहाँ यह पूर्ण नियम है कि जो उपयोग ज्ञान दर्शन के शुद्ध स्वरूप में झुकेगा, ऐसा झुकेगा कि झुककर उसी में मिल जायगा, इतना झुके कि अपने आधार में एक रस हो जाय, फिर कहीं कुछ पीड़ा है क्या ?

(48)शांति का एकमात्र उपाय सम्यक ज्ञान―ज्ञान के समान सुख का, शांति का कारण अन्य कुछ हो ही नहीं सकता। है ही नहीं। दूसरी बात कोई लाये कहाँ से ? जहाँ ज्ञानघन निज अंतस्तत्व का यथार्थ रूप से ज्ञान हो रहा है उस उपयोग में दु:ख है कहाँ ? यदि दु:ख है तो समझो कि अभी ज्ञान में ज्ञान नहीं हो रहा, अभी विकल्प में हैं। विकल्प से दु:ख है। और विकल्प मेटने का उपाय है निर्विकल्प अखंड ज्ञानमात्र अपने स्वरूप का ज्ञान। यही उत्कृष्ट दशा अपनी सहाय होगी। अन्य कुछ भी अपना सहाय नहीं है। एक निर्णय का बड़ा बल होता है। खूब खोज कर लो किस कि लगन से किन पदार्थों के संबंध से आत्मा पर क्या प्रभाव होता है ? खूब परख करके पक्का निर्णय बना लीजिए कि आत्मा को शांति का कारण केवल यही भाव है कि यह ज्ञान आत्मा के सहज ज्ञानस्वरूप का ज्ञान करता रहे। यही शरण होगा, इसी से पूरा पड़ेगा। अन्य किसी दूसरी बात से पूरा नहीं पड़ सकता।

(49)लौकिक सावधानियों में परमार्थत: सावधानी का अभाव―यहाँ जितनी जो सावधानी हैं वे वस्तुत: असावधानी हैं। किन लोगों को क्या बताने के लिए, किन लोगों को क्या दिखाने के लिए अपने स्वरूप के स्पर्श से बहिर्गत होकर विकल्पों में उलझ गए हैं। कोई कुछ सज्जन हो तो वह अपनी अच्छी करतूतों के कारण अच्छी क्रियायें करके, अच्छा विकास बनाकर, अच्छे आचरण से रहकर, बड़े प्रियहित वचन बोल कर लोगों में अपना कुछ बताना चाहता है। तब देखिये-जैसे विष की एक बूँद जल में पड़ जाय तो वह सारा जल खतरनाक हो जाता है इसी तरह हम खूब व्रत, तप, करें, अच्छे आचरण से रहें, अपनी प्रगति का काम जो कुछ बने करें, पर साथ में यदि यह भाव है कि लोग समझ जायें कि यह भाई बहुत अच्छा काम कर रहे हैं तो इतना भर भाव लाने से समझो सारी खराबी आ गई। इन मायामय प्राणियों से अपने आपके बारे में कुछ महिमा चाहने का भाव यदि मन में है तो समझो कि सारे व्रत, तप, आचरण अच्छी तरह रखते हुए भी जल में विष की बूँद मिल जाने की तरह का हाल हो गया।

(50) ज्ञानी की अनात्मतत्व के प्रति प्रणमन की अप्रवृत्ति―काम तो यह चाहिये कि ज्ञानदर्शनात्मक जो निज आत्म का स्वरूप है उस स्वरूप में ज्ञान बना रहे। अब इस कार्य का तो यह लोकेषणा दुश्मन है। लोग मुझे समझ जायें कि यह भाई कितने अच्छे है इस तरह की बात बताने के लिए अपनी प्रवृत्ति रखना यह तो बड़ी गंदी भीख है। लोगों से रोटी मांग कर खा लेना यह उतनी गंदी बात नहीं हैं, लेकिन उन दु:खी कर्मकलंकित, जन्ममरण के प्रेरे भटकने वाले मोही प्राणियों से चाहना, एक तो यह खराबी फिर दूसरी बात-ये मुझे अच्छा समझे इस प्रकार की चाह करना, इक यह खराबी। यह बात यदि कणिकामात्र भी चित्त में है तो प्रभु के चरणों में प्रणाम नहीं बन सकता। प्रणाम के मायने झुकना। तो लोगों से कुछ चाहने वाला पुरूष लोगों में झुके कि भगवान में ? वह तो लोगों में ही झुका मायने मोह में झुका। मोह और वीतरागता इनका तो परस्पर में विरोध है। जो पुरूष अपने स्वरूप का परिचय पाकर यह एतावन् मात्र है, यह चैतन्यमात्र है, इसमें दूसरा लपेट कुछ नहीं है, ऐसा जिसने अपने आपका निर्णय किया, प्रतीति की, उसके कभी यह भाव नहीं जग सकता कि इन लोगों में मैं कुछ अपना रुतबा दिखाऊँ, कुछ बात बताऊँ। उसके लिए जब यह ज्ञान सामने पड़ा हुआ है कि यह लोक 343 घनराजू प्रमाण है, अनगिनते असंख्याते योजनों प्रमाण है इतनी ही दुनिया से तो मेरा संबंध नहीं। यहाँ से मरे, न जाने कहाँ पैदा हो, फिर क्या रही यहाँ की बात ? तो फिर यहाँ किससे क्या चाहना ? यद्यपि श्रावक अवस्था में कीर्ति संपादन का भी उपदेश किया गया है किसी दृष्टि से उसका इतना ही मतलब है कि लोक में आबरू रहेगी तो बुरा काम करने से हिचक रहेगी। इतना ही मात्र उसका फल है, और इससे आगे तो सारा विष ही विष है, लेकिन जो इस अंतस्तत्व के अभ्यास में भी सावधान हो गया है ज्ञानभावना कर करके, खोटी बातों के लिए उसका चित्त न चाहेगा, उसको फिर दुनिया में अपनी कुछ कीर्ति बने उसकी रंचमात्र भी इच्छा नहीं होती।

(51) ज्ञानी के इज्जत की चाह के न होने का चिंतन-क्या करेगा कोई मेरे आत्मा का ? ये मोही प्राणी प्रसन्न भी हो जायें हम पर तो क्या कर देंगे ? कर क्या देंगे, ये तो मुझे विपत्ति में ही डाल देंगे। इन मोहियों के संपर्क से अपने आत्मा के सुधार की बात सोचना, यह तो विष पीकर जीने की बात सोचने की तरह है। माता-पिता प्रसन्न हो जाते हैं बच्चे पर तो बच्चे का क्या करेंगे ? विवाह करा देंगे, दूकान करा देंगे, उसको सारी बातें भी सिखा देंगे चालाकी की, इस तरह कमाना चाहिये, यों कहना चाहिये। प्रसन्न होकर प्राय: लोग यही तो करते हैं। और क्रुद्ध हो जायेंगे तो क्या करेंगे? उसको कुछ भी देंगे नहीं, चाहे वह कैसी ही तकलीफ सहे, पर उसकी कुछ भी पूछ न करेंगे। तो ये मोही प्राणी प्रसन्न होंगे तो भी विपत्ति देंगे। यहाँ किससे क्या चाहना ?

लोक में इज्जत बनाना नियम से खतरे से भरा हुआ है। हां, न चाहते हुये भी इज्जत होना, वह एक सहज परिणमन की बात है। पर उसमें भी यदि आकांक्षा है तो वह भी खतरे वाली चीज है। इज्जत बढ़ाते-बढ़ाते मान लो देश के राष्ट्रपति हो गए, प्रधानमंत्री बन गए तो उनके खतरे कितने हैं सो लोग अखबारों से जानते हैं, कुछ समझकर भी जानते हैं। वे सुखी हैं क्या ? शांत हैं क्या ? वे शांत नहीं हैं, संतुष्ट नहीं हैं, रही दुनियावी इज्जत, सो यह दुनिया, ये दुनिया के लोग स्वयं मायामय हैं, दु:खी हैं, अपरमार्थ हैं, इंद्रजाल हैं। यहाँ की इज्जत से क्या लाभ उठाया ? जो पुरूष महा भक्तिभाव से इस ज्ञानदर्शनात्मक सहज परमात्मदेव के दोनों चरणों में अपना उपयोग झुकाकर प्रणाम करते हैं, समस्त पीड़ायें उनकी शांत होती हैं दूसरे की नहीं।(52)अकेले पर क्षोभमय प्रवर्तन―कुछ भी करे यह जीव, रहता तो अकेला का ही अकेला है। हज़ारों राजाओं में भी यह जीव अपनी इज्जत बना रहा है, पर यह तो है अकेला का ही अकेला । परिवार जनों के बीच यह बड़ा बड़प्पन महसूस करके मौज मान रहा है, पर है तो यह अकेला का ही अकेला। जो कुछ बात बन रही, बीत रही इस पर वह अकेले से अकेले में बीत रही। इसका साथी दूसरा नहीं है, और परख करके देख लो जीवन में, शांति का उपाय क्या है ? एक धर्म और आस्तिक्य, परलोक के नाते से भी नहीं कह रहे, किंतु यहीं पर एक परख करने के लिए कह रहे कि शांति का कौनसा उपाय बनता है? जो जितने उपन्यास आजकल छप रहे हैं उनमें जो वर्णन है वहां प्रारंभ से लेकर अंत तक, क्षोभ क्षोभ का ही वर्णन है। कहीं लूटमार की चतुराई, कहीं दुराचार की चतुराई, यों क्षोभ भरी घटनाओं के रुचियाँ हैं उनके पढ़ने वाले लोग, तभी तो वे उन घटनाओं को बड़े चाव से पढ़ते हैं। तो वे उपन्यास तो कागजों पर ही लिखे हुए हैं, पर उन उपन्यासों के पढ़ने वाले रुचियाँ जन स्वयं उपन्यास की जीती जागती मूर्ति है। इन उपन्यास रुचियाँ पुरूषों की सारी क्रियायें उनके सारे परिणमन क्षोभ ही क्षोभ से भरे हुए हैं। क्यों भरे हैं कि 6 बातों से अपना संपर्क लगाया है इन मोही जीवोंनेरूप, रस, गंध, स्पर्श,शब्द और इज्जत। इन 6 कामों को छोड़कर 7 वां काम कौन सा ये मोही प्राणी कर रहे हैं सो तो बताओ ? और ये सभी चीज़ें हैं पर में।(53)इज्जत का हाल―इज्जत नाम किसका सो तो बताओ ? रुप, रस, गंध, स्पर्श, शब्द ये तो प्रकट पर मालूम हो रहे हैं। एक थोड़ा सा इज्जत के संबंध विचार करो कि क्या चीज है ? पर चीज है या स्व चीज है ? इज्जत कहते किसको हैं ? कुछ लोग इस प्रकार की प्रवृत्ति करें या वचन बोले उसका नाम है इज्जत । यह तो हुई द्रव्य इज्जत और इस प्रकार की अपने आप में कल्पना कर ली यह है भाव इज्जत । दोनों ही परतत्व हैं। दूसरे की इच्छा, दूसरे का परिणमन, दूसरे की प्रवृत्ति, वह तो दूसरे की है। कोई किसी के आधीन नहीं है दूसरे की खुशामद कर करके भी थक जावो, पर उसकी इच्छा में आयगा तो प्रिय वचन बोल देगा, न आयगा तो न बोलेगा। बच्चे की कोई कितनी ही खुशामदें करे कि ऐ बच्चे एक गिलास पानी दे दे, पर उसके मन में आ गया तो दे देता है, नहीं तो खेलने के लिए भग जाता है, पर ये मोही प्राणी ऐसे हैं कि मुझे पूछे चाहे न पूछे, पर हम तो तेरे ही लिए मर रहे हैं। मान न मान, मैं तेरा महिमान। कोर्इ किसी को नहीं मान रहा, सब अपनी आशा से, विषय से, कषाय से, परिणति से अपना परिणमन कर रहे है। पर ये मोही प्राणी मानते हैं कि ये मेरे लिए ये सब कुछ कर रहे हैं, मेरी ही चाह से सब कुछ कर रहे हैं। बस बन गया स्नेह का बंधन और बन गया पीड़ाओं का ताँता।

(54)स्नेह के बंधन की विडंबना―कहीं किसी गुरु के पास कुछ शिष्य पढ़ते थे, उनमें से एक शिष्य दो दिन बाद आया, तो गुरु ने पूछा कि तुम दो दिन अनुपस्थित क्यों रहे ? तो वह शिष्य बोला-‘सगाई हो रही थी। तो गुरु बोला-‘अब तुम गाँव से गए।’ तो समझ लो जब किसी की सगाई हो जाती है तो जिस गाँव में होती है वहीं उसका चित्त घूमता है। अब अपने गाँव घर के आदमी कुछ नहीं नजर आते। फिर कुछ दिन बाद वही शिष्य दो तीन दिन बाद आया तो गुरु ने पूछा-दो तीन दिन तक क्यों अनुपस्थित रहे ?’तो वह शिष्य बोला-‘ मेरी शादी हुई है’ तो गुरु ने कहा-‘अब तो तुम घर से भी गए।’

सो देख लो-जब शादी हो जाती है तो लोगों को अपने घर के लोग अच्छे नहीं लगते-ससुराल के साला साली वगैरह ही उन्हें अच्छे लगते हैं। कुछ दिन बाद गृहिणी घर आ गई। उस प्रसंग में अनुपस्थित रहने पर गुरु ने कहा कि अब तो तुम अपने माँ-बाप से भी गए। तो ऐसा है यह स्नेह का बंधन । इसका प्रारंभ तो हो। प्रारंभ हुआ कि फिर सम्हलना कठिन हो जाताहै। जैसे बरसात के दिनों में चिकनी मिट्टी वाली जगह पर जरा सा पैर का फिसलना प्रारंभ तो हो, फिर उसका सम्हलना कठिन हो जाता है। वह रपटकर गिर ही जाता है, ऐसे ही स्नेह का बंधन प्रारंभ तो हो, फिर सम्हलना कठिन हो जाता है। अगर पहिले से ही सम्हला हुआ रहे तब तो ठीक है, नहीं तो थोड़ा सा भी स्नेह का प्रारंभ हो जाने पर फिर सम्हाल नहीं हो पाती, और वह स्नेह बहुत बड़ी बरबादी का कारण बन जाता है। उसे फिर अपने विशुद्ध अंतस्तत्व की उपासना का अवकाश ही कहाँ मिल सकता है ? जैसे मेढकों को कोई तोले तो एक मेढक वह तराजू पर रखेगा तो दूसरा उछल जायगा, फिर कोई मेढक तराजू पर रखेगा तो और कोई मेढक उछल जायगा, यों मेढकों का तोलना कठिन है, इसी प्रकार स्नेहों का शमन करना कठिन है। यदि एक स्नेह का शमन किया तो संस्कार में पड़े हुए अन्य स्नेह सामने आ खड़े होंगे। यों स्नेहों का उपशमकरनाकठिन हो जायगा।

(55)जीवन का एक निर्णय―अब स्व और पर का यथार्थ निर्णय करके अपने जीवन में एक निर्णय बनाना है कि मेरे को करने के लिए केवल एक ही काम है-शुद्ध सहज ज्ञानस्वभाव को ज्ञान में लिए रहना। जीवन केवल एक इसी कार्य के लिए पाया। गृहस्थावस्था में रहकर चाहे कितने ही झंझट सामने आ जायें कुछ भी करना पड़े पर इस बात को न भूलें। इष्टवियोग अनिष्टसंयोग आदिक हर स्थितियों में एक इस सहज ज्ञानदर्शनात्मक अंतस्तत्व को ज्ञान में लिए रहें। मैं तो अकेला ही हूँ बाहर में मेरा कहीं कुछ नहीं है, किसी पर से मेरा कुछ भी सुधार-बिगाड़ नहीं है, इस प्रकार का एक अपना दृढ़ निर्णय होना चाहिए। आप इस बात को खूब सोच लें कि जिन इष्ट पदार्थों का संयोग हुआ है उनका कभी वियोग न होगा क्या ? अरे वियोग अवश्य होगा और उनके पीछे आपको बहुत दु:खी होना पड़ेगा। इससे अभी से ही जरा ज्ञान बनाकर ऐसा चित्त बना लें कि मेरे लिए जगत में इष्ट कुछ भी नहीं है। इस प्रकार का सही निर्णय कर लेने से आप इस जीवन में भी चैन से रहेंगे और मरण समय भी चैन से रहेंगे। तो काम एक यही करने का है, पर कर रहे है काम दूसरे के ही दूसरे। जो काम उदय के अनुसार स्वत: ही हो रहे हैं आपके करने से नहीं हो रहे उनमें तो हम आप रात दिन अपना उपयोग लगा रहे हैं और जो काम स्ववश है,

जिसे खुद के ही द्वारा किया जाना है ऐसे काम को करने का हम आप कुछ उत्साह ही नहीं करते, तो यह कितनी मूढ़ता भरी बात है? यह अपना काम, ज्ञान भावना, अपने को सहज ज्ञानमय अकेला निरखना, यह सब किये जाने पर नियम से सफलता है। किसी अन्य से मेरा रंचमात्र भी संबंध नहीं है। और किसी से संपर्क है तो वह मेरी बरबादी का ही हेतुभूत है। कोई मेरा शत्रु नहीं है, इस प्रकार के निर्णय के साथ अपने को ज्ञानमात्र रूप में भावें, देखे, समझें, प्रतीति करें, यह ज्ञान ऐसा है कि स्वाधीन है ओर इस भावना के लिए जाने पर नियम से सफलता है।

(56)ज्ञानघन परमात्मतत्व की उपासना का कर्तव्य – अब हमारा मुख्य कर्तव्य क्या है इसके निर्णय में लग जायें। मैं सहज जैसा हूँ बस वैसा ही मैं अपनी निगाह में रहूं, समझूं। मैं इतना ही मात्र हूँ। बस यही उद्धार का मूल उपाय है। जानने की तो चेष्टा सबकी होती है। जब कोई व्यक्ति बाजार से कुछ चीजें लेकर घर पहुंचता है, तो चाहे लाया हो वह लोहे के पेंच पुर्जे अथवा कोई मशीनरी चीजें, पर घर के बच्चे लोग उस मेले के अंदर क्या चीज लाये हैं ऐसा देखने व जानने के लिए दौड़ते है, बिना ज्ञात किए उन बच्चों को चैन नहीं पड़ती । तो जब बच्चे लोग भी उस थैले के अंदर रखी हुई चीज को जाने बिना चैन नहीं मानते तो फिर हम आपको भी अपनी ऐसी प्रकृति बनानी चाहिए कि अपने इस शरीर थैले के अंदर क्या चीज रखी हुई है इसको जाने बिना चैन न मानें। इस देह थैले के अंदर जो एक पावन तत्त्व रखा हुआ है उसे तो देख लीजिए। उसके देखने के बाद यह विश्वास हो जायगा कि मेरा तो यह मैं इतना ही हूँ और मेरी सारी ऋद्धि सिद्धि यही है। इस एक सही निर्णय के कारण फिर दुनिया में कोई पीड़ा नहीं हो सकती। पीड़ा तो इष्टवियोग व अनिष्टसंयोग में होती है। जब यह निर्णय हो चुका कि मेरा इस दुनिया में अन्य कुछ है ही नहीं तो फिर उसकी समस्त पीड़ायें अपने आप शांत हो जाती हैं। हे प्रभो! हे स्वर्णमय कांतिमान, देदीप्यमान, गौरद्युते ! आपके चरणद्वय में नमस्कार करने के प्रसाद से प्राणियों की समस्त पीड़ायें क्षय को प्राप्त हो जाती है।


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