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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:शांतिभक्ति - श्लोक 6

From जैनकोष



दिव्यस्त्रीनयनाभिराम विपुलश्रीमेरूचूडामणे।

भास्वद्वालदिवाकरद्युतिहर प्राणीष्टभामंडल।।

अव्याबाधमचिंत्यसारमतुलं त्यक्तोपमं शाश्वतम्।

सौख्यं त्वच्चरणारविंदयुगलस्तुत्यैव संप्राप्यते।।6।।

(81) प्रभुचरणस्तवन से शाश्वत सुख लाभ―हे प्रभो तुम्हारे चरणारविंदयुगल की स्तुति के द्वारा बाधारहित अचित्य सारभूत अतुल शाश्वत सुख प्राप्त किया जाता है। सुख उसे कहते हैं जिसमें आकुलता नहीं है। जिस-जिस बात में आकुलता है वह स्वयं साक्षात् दु:ख स्वरूप है। इस लक्षण से बढ़ करके देखते जावो सबको। रात–दिन दु:ख ही दु:ख पा रहे हैं संसार के प्राणी , क्योंकि जो सुख है संसार का सो भी दु:ख है, जो दु:ख है सो भी दु:ख है आकुलता जहां न हो उसे सुख कहो, आनंद कहो। इस दृष्टि से देखो तो यहां सर्वत्र आकुलता है। जहां उपयोग अपने केंद्रभूत, स्रोतभूत स्वरूप से हटकर बाहर को मुख कर रहा है वहां निराकुलता की गुंजाइश नहीं है। और जहां उपयोग ने अपना मुख बाहर से मोड़कर शुद्ध निर्विकल्प अखंड ज्ञानानंद स्वरूप सहजस्वरूप की ओर दृष्टि की, वहां रत रहा, वहां आकुलता का काम नहीं है।

(82) लोक में सर्वत्र दु:खमयता―भैया ! इतना ही ध्यान रखते रहें, अपने जीवन में प्रत्येक बात में कि यह भी दु:ख है, यह भी दु:ख है, यह भी असार है, बड़ी बुद्धिमानी करके वैभव बढ़ा लिया तो क्या, यह भी असार है, दु:खरूप है। बड़ी चतुराई करके कोई दूसरे के अधिकार को छीनकर कुछ अपने अधिकार में कर लिया तो क्या, यह भी असार है। बड़ी बुद्धिमानी करके वैभव बढ़ा लिया तो क्या, यह भी असार है, दु:खरूप है । चतुराई से विषयों कि साधन जोड़ लिये, यह भी असार, दु:खमय है। बड़े विषयों के साधन जुटे हैं, आराम से खाते हैं आराम से रहते है। बढि़या कमरा है, सोते हैं, आराम करते हें, घर बैठे खूब आमदनी आती है, सब कुछ है तो क्या ? ज्ञानानंदधाम निज अंतस्तत्व के दर्शन की स्थिति को छोड़कर बाकी जितनी स्थितियाँ है सब दु:खरूप हैं। और कोई उपद्रव आये, उपसर्ग आये, मारे पीटे वह उतना दु:ख नहीं है जितना कि विषयों के साधन में, मौज में लग रहे वह दु:ख है, क्योंकि दु:ख तो दु:ख ही है, किंतु विषयसुख दु:ख भी है और दु:ख मेंसुख मानने के भ्रम का महान दु:ख भीहै।

(83) विषयसुखों की प्रकट दु:खों से भी अधिक दु:खरूपता―दु:ख आते हैं, सब पर आते हैं। बड़े-बड़े मुनीश्वरों पर भी दु:ख आये। किसी के सिर पर अँगीठी जलाई गई, किसी को कोल्हू में पेल दिया गया, किसी को शस्त्रों से मार दिया गया, किसी को कोठे में बंद कर उसके अंदर लकड़ी कंडा आदि भरकर आग लगा दी गई, किसी को नदी में बहा दिया गया, किसी को अग्नि में तपाये हुए लोहे के आभूषण पहिनाये गए, यों दु:ख अनेक हैं, लेकिन वे दु:ख ही हैं, असाता ही हैं, और जो लोग घर में मौज से रहते हैं, बच्चों के प्यार में, परिजनों की प्रीति में, परिजनों के बीच बैठकर जो कुछ लोगों से इज्जत मिलती है, उसके बड़प्पन में, वैभव के संचय में, आराम के साधन जुटे हैं, अच्छे महल हैं, कार मोटर है, बड़े सिपाही लोग हैं, सब प्रकार के जो संसार के मौज हैं इनमें रहने वालों को जो दु:ख है वह दु:ख उन अँगीठी जलाने, नदी में बहाने, आग में जलाने आदिक के दु:खों से ज्यादा भयंकर दु:ख है। टूटी पुरानी खाट पर कोई बैठ जाय और उसकी रस्सियां टूटकर थोड़ा धस गया, तो उस बैठने वाले पुरूष को उतनी चोट न लगेगी जितनी कि कोई बिना बुनी हुई खाट पर बैठ जाय, जिस खाट पर केवल अच्छी चादर तनी हुई बिछी थी और वह चादर कच्चे धागों से इधर-उधर चारों पायों में बँधी हुई थी। उस खाट पर खुश होकर बैठने वाला तो धड़ाम से जमीन पर गिर जायगा और उसके सिर पैर एक हो जायेंगे। तो यों समझिये कि जो संसार में दु:ख हैं, जिन्हें देखकर चेत कर सह रहे हैं, समझ रहे हैं, उन दु:खों से भी भंयकर दु:ख हैं विषयों में रमण करके मौज मानने के सुख। अब इस दृष्टि से देखो- सारा संसार दु:खपूर्ण है। इसके अतिरिक्त इसलिए भी ये विषय सुख बहुत बड़े दु:ख है कि ये आगामी बड़े दु:खों के कारण बनेंगे। संसार में रूलाने के साधन है। जन्ममरण की परिपाटी के हेतुभूत हैं, इसलिए भी ये भंयकर क्लेश हैं।

(84) क्लेशों के विनाश का एकमात्र उपाय―ये सारे क्लेश मिटेंगे तो उसका उपाय केवल एक ही है। यह उपयोग अपने आत्मा में सहज ज्योतिर्मय आनंदधाम की ओर लग जाय। जैसे बच्चे पैदा होते हैं तो एक तरह से, लोग मरते हैं तो एक तरह से। दुनिया में क्लेश होते हैं एक तरह से (परदृष्टि करके)। इसी प्रकार आनंद भी मिलेगा सभी जीवों को एक ही तरह से। वह क्या कि आनंदस्वरूप सहजज्ञानस्वरूप अपने आत्मा में उपयोग लगा दे, विकल्प छोड़ दे, मोह रागद्वेष हटा दे, यही एक उपाय है शांति पाने का। तो शांति पाने का भी यही उपाय है और मोक्षमार्ग भी यही है, धर्मपालन भी यही है, ध्यान भी यही है, कर्तव्य भी यही है। तो हे ज्ञानानंदस्वरूप भगवन्! तुम्हारे इन चरणकमल, ज्ञानदर्शन स्वरूप के स्तवन से इसके स्वरूप को उपयोग में समा देने से स्वाधीन सत्य निरूपम बाधा रहित शाश्वत सुख प्राप्त होता है।

(85) शांति प्रभुस्तवन–यह शांतिभक्ति है।जो शांति प्रभु हैं उनकी भक्ति की गई है, पर साथ ही साथ जब विशेष भेद व्यवहाररूप भक्ति में आता है तो नाम की तुलना से शांतिनाथ भगवान की दृष्टि करके भी भक्ति की गई है। शांतिनाथ का दूसरा नाम जगन्नाथ भी है जो कि बहुत प्रचलित है। पहिले जगन्नाथधाम में शांतिनाथ भगवान की मूर्ति थी और कुछ मूर्ति अब भी पायी जाती है। एक जगन्नाथ धाम का नाम प्रसिद्ध हो गया। तो इसका नाम जगन्नाथ क्यों है कि शांतिनाथ भगवान चक्रवर्ती हुए हैं। सभी तीर्थंकर चक्रवर्ती नहीं होते, और होना भी नहीं चाहिए क्योंकि इससे पदवीधरों की संख्या कम हो जाती बताते हैं कि यह हुंडावसर्पिणी का दोष है कि चक्रवर्ती, कामदेव व तीर्थंकर भी एक व्यक्ति हुआ। इसके साथ-साथ शांतिनाथ कामदेव भी थे। उनका शरीर सुंदर था, शांतिनाथ, ऐसा नाम भी अच्छा रखा गया है। तो ऐसे कारण हैं जिनके कारण शांतिनाथ को जगन्नाथ कहते है। आज की ज्ञात दुनिया भरत क्षेत्र के बराबर नहींहै । हे शांतिनाथ ! आप दिव्यस्त्रीनयनाभिराम हैं ललनाओं के नेत्रों के लिए भी आप सुंदर है। जिनको देखने को दिव्यस्त्री भी उत्सुक हो, ऐसे हे दिव्यस्त्रीनयनाभिराम। इस विशेषण ने बताया है कि प्रभु आप कामदेव हैं। कामदेव कोर्इ अलग से देवता का नाम नहीं हे। काम एक विकार का नाम है। और उस कामविकार के आधीन प्राय: यह विश्व है इस कारण से एक देवता के अलंकार में कवि है बैठते हैं सो कहते हैं कामदेव । यह कामदेव नाम उसका है और जो कामदेव की पदवी है, कुछ पुरूष कामदेव हुए है, उसका अर्थ दूसरा है उसका कामविकार से मतलब नहीं है, किंतु जो शरीर से सुंदर हो उसे कामदेव कहते हैं। कामदेव पद में भी न हों, ऐसे भी लोग जब अति सुंदर रूपवान पाये जा सकते हैं तो फिर जो कामदेव के पद में हैं उनकी सुंदरता का तो वर्णन ही कौन करे ?


(86) कामदेवों का विशिष्ट सौंदर्य―बलभद्र और नारायण ये दोनों भी रूप से बड़े मनोहारी होते हैं। बलभद्र और नारायण एक घर में उत्पन्न हुए भाई-भाई होते है। उनका पिता एक, माँ न्यारी-न्यारी। और उनमें भी बलभद्र होता है बड़ा भाई और नारायण होता है छोटा भाई। जैसे बलदेव और श्रीकृष्ण । बलदेव बलभद्र थे, श्रीकृष्ण नारायण थे, श्रीराम और लक्ष्मण में श्रीराम बलभद्र थे और लक्ष्मण नारायण थे। इसी प्रकार जितने भी ये जोड़े होते हैं उनमें बड़ा भाई बलभद्र और छोटा भाई नारायण होता है। साथ ही प्राकृतिक बात है कि बलभद्र की प्रकृति शांत, गंभीर, धीर होती है और नारायण की प्रकृति उग्र और लोकेषणा वाली होती है। मैं सारे विश्व पर विजय प्राप्त करुँ ऐसी प्रकृति होती है नारायण की। तो श्रीराम बलभद्र जब अपने जीवन का सारा नाटक खेल चुके- भैया ! यहाँ भी सभी लोग जो कि इस जिंदगी से जी रहे हैं वे सब नाटक ही तो खेल रहे हैं। बचपन में और तरह का नाटक खेला और वृद्धावस्था में और तरह का नाटक खेला। देखो- सिनेमा थियेटर आदि में क्या दिखाया जाता है ? असली नाटक करने वाले की नकल। वह असली नाटक नहीं है।तो जो बहुत गंदे काम करें उनके भी थियेटर सिनेमा आदि बन जाते हैं। और बेचारे मंझले आदमियों का अर्थात् जो मध्यम श्रेणी के लोग हैं उनका थियेटर सिनेमा आदि नहीं बन पाता। खैर वह नाटक क्या चीज है ? जो साक्षात् खेल कर चुके हैं उनकी नकल है। तो जब श्रीराम बलभद्र अपने जीवन के सारे नाटक खेल चुके, सीताजी आर्यिका हो गई, लक्ष्मणजी की मृत्यु हो गई, श्रीराम को वैराग्य हो गया। निर्ग्रंथ निष्परिग्रह होकर आत्मसाधना में लग गए राम, तो श्रीराम जब निर्ग्रंथ अवस्था में आहार चर्या के लिए गाँव में निकले तो श्रीराम का इतना सुंदर रूप और फिर उस समय लोक में उनके प्रति आदर भक्ति बहुत, और अब तो साक्षात् श्रीगुरू भी बन गए। और जिनको थोड़े समय बाद परमत्व भी प्राप्त होना है वे जब चर्या को निकले तो पनघट पर रहने वाली स्त्रियाँ सभी वे इधर-उधर से दृष्टि हटाकर, कुवें की और से भी दृष्टि हटाकर श्रीराम की और टकटकी लगाकर देखने लगी, मगर स्त्रियों में विशेष करके यह आदत होती है कि वे कोई काम भी करती जाती हैं और इधर उधर देखती भी जाती हैं। तो वे स्त्रियाँ रस्सी में घड़ा भी फसाती जातीथीं अथवा कुवें के अंदर घड़े को जल से भरने के लिए लटकाती भी जाती थीं और श्रीराम की और आकर देखती भी जाती थी। श्रीराम थे निर्ग्रंथ गुरु अवस्था में, उस समय उनकी सुंदरता और भी बढ़ती जाती थी। तो किसी महिला ने रस्सी से घड़े को बाँधने के बजाय पास में खड़े हुए बच्चे के गले में उस रस्सी को बाँध दिया, इतना वह बेसुध सी हो गई थी। यद्यपि बात ज्यादा आगे नहीं बिगड़ी, पर उस दृश्य को देखकर श्रीराम के दिल पर एक बड़ा भारी धक्का पहुँचा – सोचा ओह ! देखो मेरी ही वजह से इस महिला ने घड़े में रस्से का फंदा डालने के बजाय इस बच्चे के गले में डाला, मेरी वजह से लोग परेशान होते है, विह्वल होते हैं, ऐसा सोचकर श्रीराम ने प्रतिज्ञा की कि अब हमें आहार लेने के लिए शहर में नहीं जाना है, हमें तो अब जंगल में ही रहना है। जंगल में ही सुगमता से आहार मिल जायगा तो ले लेंगे, नहीं तो न सही। तो जो पुण्यवान पुरूष होते हैं उनकी सेवा में देव रहते हैं, मनुष्य रहते हैं, उन्हें कष्ट काहे का ? गुरु अवस्था में देव अगर आहार दें तो गुरु आहार नहीं लेते। मनुष्य ही यदि आहार दें तो लेंगे। तो वहाँ जंगल में भी उनके जोग जुड़ते रहे। श्रीराम जब गृहस्थावस्था में थे तब भी देव उनके मित्र थे। उनके पुण्य का कौन वर्णन करें ? तो कामदेव न होकर भी जब कोर्इ कोर्इ लोग इतने सुंदर होते है कि जिनको देखकर नर –नारी विह्लल हो जायें तो फिर जो कामदेव की पदवी के धारी हैं उनकी सुंदरता का तो कहना ही क्या है?

(87) शांतिप्रभु का भामंड़ल – शांतिनाथ प्रभु तीर्थंकर पुण्य प्रकृति वाले थे, साथ ही वे शांतिनाथ चक्रवर्ती भी थे। जहाँ राज्य चक्रवर्तित्व भी हो वहाँ रूपादिक गुणों का कई गुना महत्व बढ़ जाता है। फिर इसके साथ-साथ तीर्थंकर जो कि समस्त पुण्यप्रकृतियो से उच्च प्रकृति है। तो ये शांतिनाथ भगवान दिव्यस्त्रीनयनाभिराम थे। हे प्रभो ! आप महान् श्री लक्ष्मी शोभा हैं याने अंतिम अलंकार है। आपका भामंडल समस्त प्राणियों को प्रिय हैं। जो भामंडल बालसूर्य की द्युति को भी हरने वाला है। जिस समय सूर्य का उदय होता है उस समय के उदीयमान सूर्य को बालसूर्य कहते हैं। और जब दोपहर का समय होता है उस समय के सूर्य को तरूणसूर्य कहते हैं। तो बालसूर्य की जो कांति होती है, दोपहर के सूर्य को अच्छी प्रकार से नहीं देख पाते। उस समय नेत्रों को कष्ट होता हे। और उगता हुआ सूर्य सुहावना लगता है। देख लो रंग भी कितना प्रिय है ? तो जो बालसूर्य में रंग है वही रंग शांतिनाथ भगवान के शरीर का था। तब उनका भामंडल भी उसी प्रकार का था, ऐसे हे शांतिप्रभु और उस परमौदारिक दिव्य शरीर अंदर विराजमान ज्ञानमूर्ति अनंत आनंद के धाम हे परमात्मतत्व ! आपके चरणारविंदुयुगल की स्तुति से अव्याबाध, सार, अतुल, शाश्वत सुख प्राप्त होता है।

(88) प्रभुभक्ति का अतुल वैभव – प्रभुभक्ति समान इस जीव का और क्या वैभव हो सकता है ? प्रभुभक्ति भव-भव के पापों का हरण करने वाली है, इसमें रंच भी संदेह नहीं, क्योंकि प्रभु क्या हैं ? निर्दोष, पूर्ण विकास वाला अंतस्तत्व । उसके स्वरूप पर जब दृष्टि जाती है तो यहाँ के सारे भार, विकल्प, चिंता, शोक आदि सब समाप्त हो जाते है। आनंद और क्लेश दोनों से उठने वाले आँसू प्राप्त हो सकने की अगर कोई जगह है तो वह है प्रभुभक्ति । जब प्रभुस्वरूप को निहार कर उसमें अनुराग पहुँचता है तो आनंद होता है, इसमें आप शक समझ ही नहीं रहे, लेकिन संदेह यह हो सकता होगा कि प्रभुभक्ति जैसे आनंद वाले कार्य में विषाद के आँसू कैसे आ सकते हैं? वहाँ यह समझिये कि जब प्रभुस्वरूप का स्तवन गुणगान करते-करते अपने आपकी वर्तमान स्थिति पर दृष्टि पहुँचती है तो विषाद नहीं होता है क्या ? हे प्रभो ! कहाँ तो मेरा स्वरूप है आपके समान और कहां ये रागद्वेष विषयकषाय आदिक के विकार में कीचड़ में मैं पड़ा हुआ हूँ। तो जब प्रभुभक्ति की तीव्रता होती है और उस समय अपनी वर्तमान स्थिति पर दृष्टि होती है तब विषाद के अश्रु भी उस आनंद के अश्रु के साथ-साथ मिल जाते हैं। और उस गदगद् वाणी में जब वह भक्त कुछ बोलना चाहता है तो उसके मुख से स्पष्ट शब्द नहीं निकलते। उसके शब्दों में अस्पष्टता आने लगती है।

(89) प्रभुभक्ति का उचित अवसर―अनुकूल प्रभुभक्ति का मौका किसी को एकांत में ही प्राप्त हो सकता है, भीड़-भड़क्का में ऐसा मौका नहीं प्राप्त हो सकता। जहाँ बहुत से लोग दर्शन कर रहे हैं, देख रहे हैं वहाँ प्रभुभक्ति का इतना अतुल वेग न आ सकेगा। लेकिन क्या करें लोग, समय एक है, सब लोगों को फुरसत सुबह के समय मिलती है। सभी लोग एकत्रित होकर आते हैं और राग वश एकत्रित होकर पूजन स्तवन आदि करने में लोगों का दिल भी भरता है तो वह भक्ति कुछ न कुछ तो ठीक है ही, पर भक्ति का असली रूप तो एकांत में प्रकट हो सकता है। बेखटके नि:शंक होकर जहाँ कोई देखने सुनने वाला नहीं, उस समय केवल आप हैं और प्रभुमूर्ति है। कुछ निर्विकल्पता हो, कुछ आत्महित की धुन हो, प्रभुस्वरूप का ज्ञान हो, इन सब बातों के संमिश्रण में जो प्रभुभक्ति होती है उसमें भव-भव के कितने ही पाप क्षीण हो जाते हैं। सो प्रभुभक्ति में हमारी वृद्धि हो जिस किसी भी प्रकार ऐसा हम आपका यत्न होना चाहिए। और प्रभुभक्ति ही एक पूजा थी। जो शांतिभक्ति पढ़ रहे हैं, ऐसी-ऐसी जो भक्तियाँ हैं 10-12 इन भक्तियों के रूप में प्रभु के गुणगान की पूजा थी। गाते जावो गद्यों में पद्यों में बोल-बोलकर । प्रभु के गुणस्मरण का नाम है प्रभुपूजा। प्रभुभक्ति में ऐसा प्रताप है कि बाधा रहित स्वाधीन शाश्वत सुख प्राप्त कर लिया जाता है। जीव को शांति ही तो चाहिये, शांति मिलेगी प्रभुभक्ति और आत्मध्यान से । स्वाध्याय आत्मध्यान का पूरक है। स्वाध्याय के लिए स्वाध्याय नहीं किया जाता किंतु आत्मध्यान, आत्ममनन के लिए स्वाध्याय होता है । तो इस भक्ति में भक्त कह रहा है कि हे प्रभो ! आपके स्वरूप के स्मरण से ही शाश्वत स्वाधीन शांति सुख प्राप्त हो सकता है।


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