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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:शांतिभक्ति - श्लोक 8

From जैनकोष



शांति शांतिजिनेंद्र शांतमनसस्त्वत्पादपद्माश्रयात्,संतप्ता: पृथ्वीतलेषु बहव: शांत्यर्थिन:प्राणिन:।कारूण्यान्ममभाक्तिकस्य च विभो दृष्टिं प्रसन्नां कुरू,त्वत्पादद्वयदैवतस्य गदत: शांत्यष्टकं भक्तित:।8।।

(100) शांतस्वरूप के उपयोग से ही शांति की संभवता-- हे शांति जिनेंद्र ! इस पृथ्वी तल पर संतप्त हुए बहुत से प्राणी जो कि शांति चाह रखने वाले हैं वे शांत मन वाले राग-द्वेष रहित आपके चरणकमल के आश्रय से शांति को प्राप्त होते हैं। उद्विग्न मन वाले पुरूष कहाँ जायें, कहाँ बैठें , किसकी सुनें कि उनका उद्वेग दूर हो जाय? ऐसा स्थान कहीं न मिलेगा सिवाय एक प्रभुचरण के । किसी को इष्टवियोग हो गया तो उस इष्ट वियोग में रहता हुआ प्राणी जहाँ भी जाये, जहाँ भी बैठे वहीं लोग किसी न किसी ढंग से याद दिला-दिलाकर दु:खी करने के कारण होते हैं। जैसे भाई वह बड़ा अच्छा था, सबकी बड़ी सम्हाल रखता था। वह सबकी सेवा के पीछे अपने खाने पीने की भी सुध न रखता था, वह सबका बड़ा उपकारी था, यों उसके गुणगान करना, कुछ न कुछ याद दिलाना, यह सब क्या है? यह तो उस दु:खी के दु:ख को और भी बढ़ावा देना है। अरे उस दु:खी के दु:ख मेटने का साधन तो यह था कि जिस किसी प्रकार हो, उसका उपयोग बदल दिया जाय। इन रागी द्वेषी मोही पुरूषों का संग उसकी शांति का कारण नहीं हो सकता । हे प्रभों ! आपके चरणयुगल का स्तवन करे, आपके अपने उपयोग में बैठाल ले तो उसको शांति हो सकती है।(101) प्रभुचरणस्तवन से शांति प्राप्त होने का कारण - प्रभु के चरणस्तवन से शांति इस कारण हो जाती है कि किसी को अशांति तो है नहीं, दु:ख तो है नहीं, कोई बात नहीं है, किंतु भ्रम लगा रखा है, और वहाँ जाकर भ्रम का उपयोग बदल जाता, शांति अपने आप मिल जाती। पदार्थ सब अपने अपने स्वरूप से है, एक का दूसरे के साथ कोई संबंध है नहीं। अच्छा बताओ- आप जिस हवेली में रहते हैं उस हवेली से आपके जीव का कोई नाता है क्या? जो जीव आपके घर में आये हैं उन जीवों से आपके आत्मा का क्या संबंध है? रही यह बात कि कोई कहे कि वाह, हमारे ही तो बच्चे हैं, हमारे ही निमित्त से तो पैदा हुए हैं, तो भाई यह तो जगजाल है। कीड़ा ,मकोड़ा, मच्छर, घास, फूस ये मिट्टी के निमित्त से पैदा होते हैं, तो यह तो निमित्त की बात है, उससे क्या ताल्लुक ? जिस निमित्त से ( रजवीर्य से ) ये बच्चे पैदा हुए वह तो तुम नहीं हो। तुम तो अमूर्त ज्ञानमात्र हो, तुमसे क्या ताल्लुक है? धन वैभव से संबंध कुछ नहीं। और जो बात बिल्कुल नहीं है, उसको माने, संबंध करे, उसका क्लेश इतना बड़ा होता हे कि उसकी कोई मिसाल नहीं हे। सर्व अशांति का मूल भ्रम है। वह भ्रम प्रभुस्वरूप विनयन से समूल नष्ट हो जाता है तब शांति मिलेगी ही। (102) भ्रम के क्लेश का एक दृष्टांत―एक कथानक है कि 10 जुलाहे हाट के दिन किसी गाँव से किसी शहर गए। गाँव और शहर के बीच एक नदी पड़ती थी। तो मानो शनिवार के दिन का हाट था। हाट करके वे जुलाहे 4 बजे शाम को अपने गाँव के लिए लौट पड़े। नदी भी पार कर ली। जब नदी के दूसरी पार आएगए तो उन सब में किसी एक जुलाहे ने कहा कि अपन लोग गिन ले कि अपने सभी मित्र हैं कि नहीं। गिना तो 9 ही निकले। वे गए तो थे 10 मित्र, पर सभी ने गिना तो सबने 9 ही मित्र पाये। सोचा- ओह! हमार एक मित्र गायब हो गया। उन सबमें परस्पर में बड़ा प्रेम था, सो वे अपने एक मित्र के गुम जाने पर बड़े दु:खी हुए-हाय ! गये तो थे तीन-चार रुपये के मुनाफे के लिए और अपने एक मित्र को ही खो दिया। पता नहीं वह मित्र नदी में डूब गया या अन्यत्र कहीं खो गया। यों वे सभी अपने एक मित्र के न मिलने पर इतने दु:खी हुए कि सभी जुलाहों ने रो-रोकर अपने सिर भी फोड़ लिए। भैया ! भ्रम का बड़ा कठिन दु:ख होता है। जब एक सूझता पुरूष आया और उसने रोने का कारण पूछा तो उन जुलाहों ने बताया कि हम आये तो थे 10 मित्र, पर हममें से एक मित्र न जाने कहाँ गायब हो गया? पता नहीं नी में डूब गया या कही मर गया। उनकी बात सुनकर उस सूझते पुरूष ने एक सरसरी निगाह में ही देख लिया कि हैं तो ये दसों के दसों और ये क्या कह रहे हैं? सो वह सूझता पुरूष बोला – अगर हम तुम्हारा 10 वां मित्र बता दें तो क्या दोगे ? वे जुलाहे बड़े खुश हुए और बोले – हाँ हाँ भैया बता दो, तुम जो कहोगे सो देंगे। अच्छा तुम सब लोग खड़े हो जावो एक लाइन में। खड़े हो गए और एक बेंत से धीरे-धीरे मारकर कहे देखो-1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9 और जरा जोर से मारकर कहे यह 10। यों सभी जुलाहों के क्रम क्रम से बेंत मारकर सभी को उनका 10 वां मित्र बता दिया। वे सब जुलाहे अपने 10 वें मित्र को पाकर बड़े खुश हुए । तो भैया ! भ्रम का दु:ख इतना कठिन होता है?

(103) भ्रम से हटकर निर्मोह हुए बिना धर्मपालन की असंभवता – अब समझिये कि जहाँ यह भ्रम लगा है कि मेरा पुत्र है, यह मेरी स्त्री है, यह मेरा वैभव है वहाँ ये ऊपरी-ऊपरी धर्म करने से क्या फल मिल जायगा? धर्म तो निर्मोहता में है। अगर ऊपरी-ऊपरी भगवान की बड़ी भक्ति हो, भगवान की मूर्ति की बहुत-बहुत सफाई की जाय तो इससे कुछ फायदा तो न पहुंचेगा । फायदा तो निर्मोह होने में पहुंचेगा। रह-रहे हैं घर में तो ठीक है, मगर यह बात तो यथार्थ जाने कि मेरा आत्मा मेरे प्रदेश में है, इससे बाहर मेरी कुछ भी चीज नहीं, यह श्रद्धान में, यह ज्ञान में, यह ध्यान में रहना चाहिए, फिर तो जिंदगी सफल है। अगर एक इतना ही ध्यान आ गया कि मेरा आत्मा मेरे प्रदेशों में ही है, मेरे से बाहर मेरा आत्मा नहीं है। यदि यह ध्यान में आ गया तो समझ लीजिए कि जिंदगी सफल है। सदा के लिए उसके संकट टलेंगे। और बात कितनी सी है ? जो चीजें अभी थोड़े दिन के बाद में अपने पास नहीं रहनी हैं उन्हें अभी से मान लो किये चीजें मेरी नहीं हैं। इतनी भर बात मानने में कुछ कठिनाई नहीं है, मगर वस्तु का वह स्वरूप ज्ञात हुए बिना कैसे मान ले ? उस पर अधिक दृष्टि जाय कि प्रत्येक पदार्थ अपने ही स्वरूप में रहता है, उससे बाहर नहीं। इससे बाहर मेरा कुछ नहीं। जीव का कल्याण करने के लिए अनेक दार्शनिकों ने अनेक तरह की कुंजियाँ बतायीं, मगर इस कुंजी को तो देखो-जरा से इस नुक्ते को तो देखो-कितनी जल्दी बेड़ा पार हो जायगा। प्रत्येक वस्तु को इतने ही स्वरूप में देखो, इससे बाहर इसका कुछ नहीं है।(104) अपने अपराध की परख के लिये पैनी दृष्टि की आवश्यकता―अच्छा, दूसरे की बात तो झट समझ में आती थोड़ी-थोड़ी। इसका मकान कुछ नहीं, मकान न्यारा है, यह भाई न्यारे हैं, यह बात तो झट समझ में आती है और मैं इस मकान से न्यारा हूँ अथवा यह मकान मेरे से न्यारा है, इतनी बात खुद के विषय में समझने में मुसीबत पड़ती है। तो वस्तु के स्वरूप का जैनशासन में कहे हुए ढंग से ज्ञान न करे तो उसका मोह नहीं मिटता। कितने ही उपाय रच लो, खूब मान लो कि यह सब भगवान का बगीचा है, मेरा कुछ नहीं, तो बस वह बात की ही बात है, माया की ही गप्प रहेगी, भीतर में तथ्य ठोस नहीं आ सकता है जिससे कि मोह हटे । अच्छा ओर कुछ उपाय मोह हटाने का जिसने जो समझा हो जो सुना हो सो बताओ। एक इस वस्तु स्वरूप के ज्ञान के अलावा ओर कोई उपाय सुना हो, समझा हो तो बताओ ऐसा कि मोह जड़ से हट जाय।

(105) निष्पक्ष हितमार्ग वस्तुस्वरूप का यथार्थ ज्ञान ― देखिये-इस वस्तुस्वरूप के ज्ञानरूप संकटमुक्त्युपाप में किसी प्रकार के दोष का भय नहीं। जैसे कि अनेक मजहब कहा करते है कि देखो-दूसरे के भगवान को मानोगे तो तुम काफिर हो जावोगे, मिथ्यादृष्टि हो जावोगे, बेहोश हो जावोगे, ऐसे ही दूसरे के गुरूवों को व दूसरे के शास्त्रों को मानोगे तो तुम संसार में रूलोगे। तो यहाँ हम कहते हैं कि तुम किसी के भी, न अपने न दूसरे के देव, शास्त्र तथा गुरु को मानो, लेकिन इतना तो जान जावो कि प्रत्येक वस्तु अपने-अपने स्वरूप में है। अपने से बाहर कोई वस्तु नहीं है। इतना जानकर फिर उसके आधार पर चिंतन करने लगें। जो सही बात होगी वह ही तुम्हारे चित्त में आयगी। जैसे यह घड़ी है तो घड़ी का द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव सब कुछ घड़ी में ही है, घड़ी से बाहर नहीं है। ऐसा जान लेने में कोई मजहब का दोष लगता है क्या ?जो वस्तु है सामने उसे जान रहे हैं। अब आत्मा को जानो, मैं आत्मा जो अहं प्रत्यय के द्वारा वेद्य है, मैं मैं इस बुद्धि के द्वारा जो समझ में आ रहा है उसका अनुभव जितने में हो रहा है उसकी शक्ति ,उसकी पर्याय, उसका गुण उतने में है। इसका परिणमन, इसका भाव, इसकी करतूत, इसका अनुभव जो कुछ है इसका इसमें ही है, इससे बाहर नहीं है। मेरा सर्वस्व मेरे में है। मेरे से बाहर नहीं है कि मैं किसी का कुछ कर दूं, मैं किसी का कुछ अनुभव लूं, किसी का कुछ कर लूं, ऐसा तो नहीं है। देख लो-सभी जगह। झट समझ में आ जायगा स्वरूप, मोह मिट पायगा। और मोह मिटने से खुद ही में खुद का विकास हो होकर तुम्हारी वह सब बात सही बन जायगी कि असल में देव, शास्त्र, गुरु ये कौन होते हैं? दिल साफ कर के वस्तुस्वरूप को सही बैठाल लें, उसे विदित होगा कि सच्चा देव किसे कहते हैं? यह मैं आत्मा जैसे अपने स्वरूप से सहज हूँ ऐसे ही कोई बन जाय प्रकट, इससे बाहर की उपाधि न लगे, जिससे कि मैं खुद दु:खी रह रहा । जो बाहरी मेल है, बाहरी उपाधि है वह न रहे, ऐसा स्वच्छ केवल आत्मा ही आत्मा रह जाय वह है देव, क्योंकि उसका चमत्त्कार विचित्र है। समस्त लोक त्रिकालवर्ती समस्त ज्ञेय पदार्थ उसके ज्ञान में झलकते रहते हैं । वह कृतकृत्य हो गया, आनंदधाम है, किसी प्रकार का क्लेश नहीं, वह होता है देव, और ऐसा ही बनने के लिए जो यत्न करें वे कहलाते हैं गुरू, और ऐसा ही होने का जहाँ उपदेश है वे कहलाते हैं शास्त्र।(106) आत्महित के दृढ़निर्णय के संकल्प की आवश्यकता-भैया! अपना पहिले यह पक्का निर्णय बना लीजिए कि मुझे तो आत्महित करना है, मेरा और कुछ मतलब ही नहीं । थोड़े दिनों का जीवन है। इसमें हमें क्या विवाद करना?

क्या लड़ाई झगड़ा करना ?क्या पक्षपात करना ? हम तो खुद दु:खी हैं, अशरण हैं, बेचारे हैं, कोई ठीक ठिकाना नहीं है। पहिले अपने को तो सम्हाल लें। वाद-विवाद में क्या रखा है? यों वस्तुस्वरूप का निर्णय करके जो यहाँ अपना निर्णय बनाता है वह नियम से पार होगा। हे प्रभो ! आपके चरणद्वय को ही मैं देव मानता हूँ। व्यवहारभक्ति में चरणों को भी देवता कहते हैं। इनके चरण ही हमारे देवता हैं, इन्हें छू लेने दो और परमार्थ प्रभु के दो चरण हैं-दर्शन और ज्ञान। वे देवता हैं। ज्ञान का यथार्थ स्वरूप याने सामान्य प्रतिभास वाली शक्ति और विशेष प्रतिभास वाली शक्ति, ये दो हमारे देवता हैं। तो हे प्रभो! इस चरणद्वय को मैं देवता मानता हूँ और उस देवता का स्तवन कर रहा हूँ। शांति–अष्टक रूप से पाठ कर रहा हूँ।(107) शांत्यष्टक की समाप्ति में दृष्टि को प्रसन्नता की अभ्यर्थना- यह 8 वाँ छंद है और यहां तक शांति-अष्टक के समाप्त होने का संकेत है। सो मुझ भक्त पर दया करके मेरी दृष्टि को प्रसन्न कीजिए। हे प्रभो! मैं और कुछ नहीं चाहता। बस यही चाहता हूँ कि मेरी दृष्टि निर्मल हो जाय। किंवदंती ऐसी है कि शांतिभक्ति बनाने वाले आचार्य की नेत्र ज्योति बहुत कम थी और शांतिअष्टक पढ़ने के बाद कहा-हे प्रभो ! मेरी दृष्टि निर्मल कीजिए, तो उनके नेत्र ज्योति वाले अर्थात निर्मल हो गए। यह बात इसमें तो नहीं लिखी है, लेकिन इसका सीधा अर्थ यही है कि मेरी दृष्टि, मेरा उपयोग, मेरे जानने देखने की पद्धति प्रसन्न हों अर्थात निर्मल हों। हे नाथ ! मैं और कुछ नहीं चाहता। किसी बड़े से माँगों तो कोई अनर्घ्य बात मांगो । छोटी मोटी बातें तो अपने आप सिद्ध हो जाती हैं। तो चैतन्य प्रभु से मांगो कि हे प्रभो ! मुझे ऐसी चीज दीजिए कि मेरी दृष्टि निर्मल हो जाय। लो एक इस ही बात के पा लेने से समस्त दु:ख खतम। कल्पनायें करके अनेक दु:ख हम आपने लगा रखे हैं- वह हवेली गिर गई, वह लड़का बीमार है, वह बहू मर गयी, वह अमुक मर गया, यों पचासों दु:ख लगे हैं। उन सारे दु:खों के मिटाने को एक दवा है- क्या कि स्वरूप को निरख लो, मुझ अमूर्त आत्मा का इस दुनिया में कही कुछ नहीं है। इस आंकिचन्य भाव के आते ही सारे दु:ख एक साथ समाप्त हो जाते हैं। और यह कोई बहकाने की बात नहीं कह रहे-बात ऐसी ही है। ऐसा मान लेने पर आत्मा के दु:ख मिटते हैं, और सही बात पर अपने आप उपयोग पहुंचता हैं।

(108) मोहियों की दयनीय दशा-अहा मोही प्राणियों की तो यह अवस्था है कि जैसे कोई एक बूढ़े बाबाजी अपने दरवाजे पर बैठे थे और उनके नाती पोते सब उन्हें हैरान कर रहे हैं। कोई सिर पर बैठता, कोई बाल नोचता, कोई कान नोचता, कोई मूँछ पटाता आदि । इन सब बातों से हैरान होकर वह बूढ़ा रोने भी लगा। इतने में एक सन्यासी निकला। पूछा-‘बाबाजी तुम क्यों दु:खी हो रहे हो? तो बूढ़े बाबा ने सारी बात बता दी। तो सन्यासी ने फिर कहा-अच्छा कहो हम तुम्हारे इस दु:ख को मेट दें ? तो बूढ़ा बोला-हाँ महाराज ! हमारा यह दु:ख मेट दो। वह बूढ़ा तो सोचता था कि सन्यासी महाराज कोई ऐसा मंत्र फूंक देंगे कि ये नाती पोते सब हमारे पैर पड़ेगे। तो सन्यासी बोला-देखो तुम्हारा यहाँ कुछ भी नहीं है। ये नाती-पोते तुम्हारे कुछ भी नहीं हैं। इनसे तुम्हारा कुछ भी संबंध नहीं है। तुम तो इन सबको छोड़ो और हमारे साथ चलो। तो वह बूढ़ा बोला-महाराज ये नाती पोते चाहे कितना ही हमें सताये, ये तो हमारे नाती-पोते ही रहेंगे और हम इनके बाबा ही कहलायेंगे, तुम बीच में ऐसे कौन से दलाल आ गए जो हमारा उनका संबंध मिटाने की बात कह रहे? तो भाई ये मोही प्राणी पिटते भी जाते, दु:खी भी होते जाते, फिर भी उन्हें अपनाते जाते, उनमें ममता करते। तो इसके फल में वे दु:खी न हो तो और हों क्या ?

(109) स्पष्ट सुगम शांतिवृत्त- एक सीधी सी बात यह मान लो कि ये जो चीजें अभी थोड़े ही दिनों के बाद में आपसे छूट जायेंगी, उन्हें अभी से छूटा हुआ मान लो। बस इतनी सी बात है। इतनी सी बात कर लेने से शांति का मार्ग प्राप्त हो जायगा। सो हे प्रभो ! आपके स्तवन के प्रसाद से मैं यह चाहता हूँ कि मेरी दृष्टि प्रसन्न हो जाय। यहाँ प्रसन्न का अर्थ है निर्मल। जैसे कहते है ना कि शरद ऋतु में छोटे-मोटे सभी पोखरे प्रसन्न हो जाते हैं अर्थात उनके जल में गंदगी नहीं रहती, सारी गंदगी नीचे बैठ जाती है और बिल्कुल स्वच्छ पानी हो जाता है। मैं प्रसन्न हूँ, इसका अर्थ है कि मैं निर्मल हूँ। यहाँ तो लोग पूछते है कि भाई आजकल आप कैसे हैं? तो लोग कह देते हैं कि हम तो आजकल बहुत प्रसन्न हैं, हमारे बाल-बच्चे सब अच्छी तरह हैं। सब लोग बड़े खुश हैं, बड़े मौज में रहते है आदि। तो प्रसन्न का अर्थ है निर्मल। निर्मलता का अर्थ है यथावत् ज्ञान होना। जो बात जैसी है वैसी ज्ञान में आना सो निर्मलता है। जीव-जीव में स्वरूप दृष्टि से कोई अंतर नहीं हैं। सब जीव एक समान हैं। उसमें कोई रंचमात्र भी तो अंतर बता दे कि मेरे घर में रहने वाले जीवों में अन्य समस्त जीवों की अपेक्षा यह खासियत है। अरे जीव का स्वरूप देखो, सहज अस्तित्व को निरखो तो सर्व जीव एक समान हैं। जीव जीव में कोई अंतर नहीं।(110) निगोद में जाने का अभ्यास व्यामोह- जीवों में कोई ऐसी मिथ्या श्रद्धा करके मान ले कि ये मेरे घर के लोग ही मेरे सब कुछ हैं, इनसे ही मेरा जीवन है, इनके ही सुखी रहने में हम सुखी हैं और इनके दु:खी रहने में हम दु:खी हैं आदि तो देखो-वह यहाँ कर क्या रहा है ? अरे वह तो निगोद के जीवों की जो हालत है-जैसे एक साथ जन्म, एक साथ मरण, फिर एक साथ जन्म एक साथ मरण, जिस श्वास में जन्म लिया उसी श्वास में जन्म हुआ आदि, तो इसी प्रकार ऐसी मिथ्या श्रद्धा करने वाला व्यक्ति कि इनके सुखी रहने में हम सुखी हैं इनके दु:खी रहने में हम दु:खी हैं वह अपने परभव में (नरक निगोद आदि की गतियों में) किये जाने वाले कार्यो का अभी से अभ्यास कर रहा है। एकेंद्रिय में जैसे आलू आदिक कंद की चीजों में अनंत निगोदिया जीव रहते हैं तो वे एक साथ मरते, एक साथ जन्मते, एक साथ श्वास है तो ये दु:ख की बातें उसे जो परभव में करनी पड़ेगी, मानो उनका वह अभ्यास अभी से कर रहा है कि मैं इस कार्य को करने में अभी से कुशल हो जाऊँ। तो ऐसी हालत है इन संसारी मोही प्राणियों की।(111) वास्तविक प्रसन्नता―जिसकी दृष्टि निर्मल होगी, जिसका उपयोग अपने आपके आत्मस्वरूप में होगा बस वही प्रसन्न है, वही निर्मल है, वही सुखी है। वही सर्व प्रकार के संकटो से पार होगा। और जिसका उपयोग गंदा है, जिसके उपयोग में कषायें भरी हैं, जो विषयों में लीन है, उसके पास यदि धन-वैभव आदिक सब कुछ खूब भरें हों तो भी वे सब बेकार है। मिथ्यात्व से बढ़कर अन्य कोई पाप नहीं। सम्यक्त्व ही इस जीव का उद्धार कर देगा। यदि पाप रूक गए तो फिर जगत की और विभूति से हमें क्या प्रयोजन ? यदि मिथ्यात्व न रहा तो समझो कि सबसे बड़ा वैभव हमने पा ही लिया। यदि मिथ्यात्व न रूका, मिथ्यात्व रोग बराबर पड़ा है तो फिर इस जगत की विभूति से लाभ क्या ? यह विभूति मेरा क्या काम सरा देगी ? इससे अपने आप की सुध लो, अपनी दृष्टि निर्मल हो, अपने आपमें समाकर के शांत होने का अनुभव और अभ्यास कीजिए। इतना ही तो सार है इस नर जीवन में, बाकी तो सब असार है।


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