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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:शीलपाहुड - गाथा 15

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रूवसिरिगव्विदाणं जुव्वणलावण्णकंतिकलिदाणं ।

सीलगुणवज्जिदाणं णिरत्थयं माणुसं जम्म ।।15।।

(28) रूपश्रीगर्वित शीलगुणव्रतरहित पुरुषों के मनुष्यजन्म की निरर्थकता―जो पुरुष रूप और लक्ष्मी का गर्व करते हैं, जवानी है, रूप सुंदर है, उसके घमंड में हैं, कोई पुण्ययोग से धन (लक्ष्मी) प्राप्त हुआ है उसका घमंड करते हैं, तो जो पुरुष ऐसी सुंदरता से सहित हैं कि जो बहुतों को प्रिय लगें, यौवन अवस्थासहित ही हों और कांति प्रभाकर मंडित हों और साथ ही लक्ष्मी भी प्राप्त हो, उस लक्ष्मी में मदोन्मत्त ही वे पुरुष शील से रहित है, गुणों से रहित हैं, उनका मनुष्यजन्म निरर्थक है । शांति का आधार है अपने आत्मा का ज्ञान । दूसरा कोई आधार नहीं । दुनिया में जो बड़े कहलाते, सुखी कहलाते, देखने मात्र में, जगत में कोई सुखी नहीं । कोई करोड़पति है तो वह गरीबों से भी अधिक दु:खी रह सकता है । उसे उलझन, न जाने कहाँ-कहा के ख्याल, न जाने क्या-क्या विकल्प, वे सब परेशान करते हैं । कोई देश का राजा है, नेता है, जैसे प्रजातंत्र में कोई लोग बन गए बड़ी सभा में मेंबर, तो कैसे ही ऊँचे पद पर कोई आ जाये, चाहे मिनिस्टर बने, पर उसके आत्मा को चैन नहीं है । हो ही नहीं सकती चैन । जो परपदार्थ पर दृष्टि रखेगा उसको चैन कभी नहीं मिल सकती । सो चैन तो नहीं है, पर रूप मिला, लक्ष्मी मिली, उसका घमंड भी किया, अब जिसे घमंड आता है वह शील से भी रहित है और गुण से भी रहित है, और उसका जन्म निरर्थक है । यह मनुष्यजन्म बड़ी कठिनाई से मिलता है । जगत के अन्य जीवों पर दृष्टि डाल कर देखो―घोड़ा, भैंस, गधा, बैल, कुत्ता आदिक ये भी तो जीव है । जैसे जीव हम हैं वैसे ही वे जीव हैं और हम आप क्या उन जैसे जीव कभी हुए न होंगे? अरे उन जैसे भी हुए, यहाँ तक कि एकेंद्रिय जीव तो थे ही थे, उसमें तो कोई संदेह नहीं । तो ऐसे अनंतानंत जीव बसे हैं संसार में, उनके मुकाबले में देखो तो सही, यह मनुष्यभव कितना श्रेष्ठ भव है, पर इस भव में भी यह जीव शांत नहीं रहना चाहता और सोचो तो सही कि अगर हम मनुष्य न होते आज, और कोई कैसे ही कुत्ता, बिल्ली, गधा, भैंसा, सूकर आदि होते तो क्या उन जैसा जीवन न व्यतीत करते? आज हम आपकी स्थिति उन सब जीवों से अच्छी है । मान लो आज हम मनुष्य न होते, अन्य किसी भव में होते तो यहाँ का क्या था मेरा? कुछ भी तो न था, फिर यहाँ तृष्णा क्यों जगती है इन बाह्य पदार्थों के प्रति? उनके प्रति इतना अधिक लगाव क्यों बन रहा? बस यह लगाव ही इस संसार का मूल है । जो पुरुष मनुष्यजन्म पाकर भी शील से रहित हैं, विषयों में आसक्त हैं, सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र गुण से रहित हैं, रूप से गर्वित है, मदोन्मत्त रहते हैं, उनका मनुष्य जन्म बिल्कुल व्यर्थ है । आगे मनुष्य होने लायक कोई कर्तव्य नहीं है, खोटे भवों में गमन होगा । सो जो रूपादिक का मद करे सो मिथ्यात्व का चिह्न है, जो अपने शरीर को निरखकर एक गौरव माने, मैं बड़ा सुंदर हूँ मैं बड़ा हूँ मैं इन लोगों में प्रमुख हूँ आदि किसी भी प्रकार से शरीर का संबंध करके गर्व करे तो उसके मिथ्यात्व है, सम्यक्त्व नहीं है । यह देह महा अपवित्र है, खून, मांस, मज्जा, मल-मूत्र आदिक का पिंड है, इससे कोई ममता रखे तो यह उसका मिथ्यात्व है । वह कुछ भी करे धर्म के नाम पर उपवास पूजा आदि परंतु देह में यदि ममत्वबुद्धि लगी है तो वे सब धार्मिक क्रियाकांड करना बेकार है । सो जिनको देह में आसक्ति हैं, विषयों से प्रीति हैं वे पुरुष रत्नत्रय से रहित हैं, उनके न शील है, न गुण है ।


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