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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:शीलपाहुड - गाथा 17

From जैनकोष



सीलगुणमंडिदाणं देवा भवियाण वल्लहा होंति ।

सुदपारयपउरा णं दुस्सीला अप्पिला लोए ।।17।।

(30) शीलगुणमंडित भव्यों का देवों द्वारा सत्कार और दु:शीलों की निकृष्टता―जो पुरुष शील और गुण से मंडित हैं, शील मायने स्वभावदृष्टि रखने वाले हैं और उसी आधार पर रत्नत्रय भी शुद्ध है तो ऐसा मनुष्य तो देवों को भी प्रिय है । जो आत्मा अपने आपको अकेला नहीं समझ सकता वह धर्म नहीं कर सकता । जो मानता है कि मैं इतने कुटुंब वाला हूँ ऐसे समागम वाला हूँ ऐसी इज्जत वाला हूँ वह धर्म का पालनहार नहीं है । सर्वप्रथम यह श्रद्धा होनी चाहिए कि मैं आत्मा समस्त परद्रव्यों से निराला हूँ । यह बात जब चित्त में हो तब तो वह धर्म का पात्र है और जब तक अपने एकत्वस्वरूप पर दृष्टि न हो कि मैं आत्मा सर्व पर से विविक्त ज्ञान मात्र हूँ तब तक वह धर्म का आराधक नहीं हो सकता और जो शीलगुण से मंडित हैं, रत्नत्रय से पवित्र चित्त हैं, सच्ची श्रद्धा है, सही ज्ञान है आत्मा में ही रमने का जिनका भाव है और रमते हैं वे शील और गुणों से मंडित है, ऐसे पुरुष बड़े-बड़े पुरुषों के भी आराधनीय हैं और जो बड़े ज्ञान के पार को पा चुके हैं, 11 अंग तक भी पढ़ चुके हैं, पर कोई जो शीलगुण से शोभित नहीं हैं, आत्मस्वभाव की जिन्हें दृष्टि नहीं है तो ऐसे पुरुष कुशील हैं । वे विषयकषायों में आसक्त हैं तो वे लोक में बहुत ही न्यून हैं अर्थात् छोटे हैं, वे मनुष्यलोक में भी किसी को प्रिय नहीं हैं तो फिर अन्य देव आदिक के प्रिय तो हो ही कहाँ से सकते है? मुख्य बात यह है कि अपने आपकी शांति के लिए मुझे कुछ करना है । वास्तविक शांति तो मेरे स्वरूप में होती । उसी स्वरूप का विकास करना है । यह बात जब तक चित्त में न हो तब तक वह सुशील नही बल्कि कुशील है ।


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