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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:शीलपाहुड - गाथा 2

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सीलस्स य णाणस्स य णत्थि विरोहो बुधेहिं णिद्दिट्ठो ।

णवरि य सीलेण विणा विसया णाणं विणासंति ।।2।।

(3) ज्ञान और शील में विरोधाभाव व एकत्र अवस्थान―इस गाथा में यह कह रहे हैं कि शील और ज्ञान इन दोनों में विरोध नहीं है, ऐसा ज्ञानीजनों ने बताया है । वहाँ शील हो वहाँ ज्ञान न हो, जहाँ ज्ञान हो वहाँ शील न हो ऐसा नहीं है । ज्ञान और शील एक जगह रहते हैं । शील के बिना विषय कषाय आदिक के परिणाम ज्ञान को नष्ट करते हैं अर्थात् ज्ञान को मिथ्यात्व रागद्वेषमय बनाते हैं । यहाँ शील का अर्थ है प्रकृति, स्वभाव, आदत और ज्ञान का अर्थ है जानना । ज्ञान सब जीवों में पाया जाता है और शील शक्ति से सबमें पाया जाता है और व्यक्ति की अपेक्षा याने प्रकटपने की अपेक्षा यदि रागद्वेषमय ज्ञान है तो वहाँ भी शील है, मगर वह शील कुशील है । जहाँ रागद्वेष अज्ञानभाव नहीं है वहाँ शील है, वह सुशील है । तो सामान्य रूप से देखें तो ज्ञान भी सदा रहता है और शील भी सदा रहता है । भले ही वह शील एक कुशील के रूप में प्रकट है, पर ज्ञान भी वहाँ है और कुशील भी है, यों भी वहाँ अज्ञानदशा में शील का और ज्ञान का विरोध नहीं रहा । जब ज्ञानदशा रही, रागद्वेष से रहित परिणाम हुए वहां ज्ञान है, शील है, इसमें तो किसी को संदेह भी नहीं हो सकता । सो जब अज्ञान मिथ्यात्व रागद्वेष का संबंध है और उस समय में कुज्ञान ज्ञान की जो स्थिति है तब उसके साथ शील आदत कुशील के रूप में चल रही है और जब निरुपाधि हो जाता है ज्ञान, तब वहाँ यह शील पूर्ण शील स्वभाव के रूप में प्रकट होता है । यों ज्ञानस्वभाव में अनादि कर्म के संयोग के कारण जो मिथ्यात्व रागद्वेषरूप परिणाम है सो यह ज्ञान की प्रकृति बन गई कुशीलरूप और जब भेदविज्ञान के प्रताप से सर्व पदार्थों को सही भिन्न-भिन्न रूप जाना तो वह सुशीलरूप में प्रकट है । कुशील का नाम है संसारप्रकृति । अज्ञानअवस्था में यह ज्ञान संसारप्रकृति के रूप में चलता है । और ज्ञान हो जाने पर यह ज्ञान मोक्षमार्ग की प्रकृतिरूप से चलता है, फिर भी कुशील की मुख्यता कहीं नहीं की जाती । ध्यान के लिए, प्रयोग के लिए, मनन के लिए शील का मायने स्वभाव सुशील का ही आदर होता है । तो यहाँ अध्यात्मदृष्टि से, मोक्षमार्ग को दृष्टि से शील नाम है आत्मा के स्वभाव का ।

(4) आत्मा को ज्ञानमात्र निरखकर परखने में ज्ञानशीलता का दर्शन―आत्मा का स्वभाव है ज्ञानमात्र । ज्ञानमात्र स्वरूप में ज्ञान का ही काम चलते रहना, ज्ञानमात्र ज्ञातादृष्टा रहे, यही है शील का पालन । तो आत्मा के इस शील का याने स्वभाव का इसमें वर्णन होगा और शील के प्रति बुद्धि रखने से जो गुण जगते हैं, कार्य होते हैं, परिणाम होते हैं वे कहलाते हैं गुण । तो शील का और गुणों का इस ग्रंथ में वर्णन किया जायेगा । इस आत्मा को ज्ञानमात्र रूप में लखना है, चाहे कुछ भी अवस्था हो, संसार में भी ज्ञानमात्र के रूप से आत्मा को देखिये, ज्ञान की स्थिति में भी आत्मा को ज्ञानरूप से देखें, तो जो गड़बड़ी है, रागद्वेषादि विकार हैं वे सब कुछ अलग नहीं जंचे, किंतु ज्ञान की ही ऐसी संसारप्रकृति हुई है । तो यही संसारप्रकृति कुशील कहलाती है । तो हर स्थितियों में आत्मा ज्ञानमात्र है, ज्ञान ही जिस तरह का उपयोग बनाता है, उस प्रकार के ज्ञान परिणाम में परिणमता है, सो अज्ञान अवस्था में यह ज्ञान ही क्रोध, मान, माया, लोभ, मिथ्यात्व, रागद्वेष, ये सारी बातें ज्ञान में पर्याय में पड़ी हुई है और जब यह उपाधि नहीं रहती, केवल आत्मा ज्ञान-ज्ञानमात्र रहता है तो यह ज्ञान फिर अपने सही शील से, सही प्रकृति से चलने लगता है । सो ऐसा शील और गुण ये दोनों साथ-साथ हर एक में पाये जाते हैं । यहाँ साधु के शील और गुण का वर्णन किया जा रहा । सो इस ग्रंथ में उन शील और गुणों का वर्णन चलेगा । यह अष्टपाहुड नाम से प्रसिद्ध है, छोटे-छोटे पाहुड होने से एक जगह उनका वर्णन किया गया है । उन 8 पाहुडों में से यह शीलपाहुड अंतिम पाहुड है । जैसे समयसार में 7 तत्त्वों का वर्णन करने के बाद सर्वविशुद्ध ज्ञानाधिकार को आत्मा के स्वभाव पर, एकत्व पर दृष्टि करायी गई, क्योंकि जो प्रयोजन होता है सो उस प्रयोजन के बारे में बहुत कुछ वर्णन बीच में किया जाता है, पर उस विशाल वर्णन के बाद फिर प्रयोजन की बात थोड़े शब्दों में कहीं जाती है । तो ऐसे ही मोक्षमार्ग के प्रसंग में बहुत कुछ वर्णन के बाद अंत में आत्मा के शील स्वभाव का वर्णन किया गया है । अब इस शील और गुणों के विषय में आगे विशेष विवरण चलेगा ।


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