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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:शीलपाहुड - गाथा 32

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जाए विसयविरतो सो गमयदि णरयपेयणा पउरा ।

ता लेहदि अरुहपयं भणियं जिणवड᳭ढमाणेण ।।32।।

(64) विषयविरक्त शीलरुचिक ज्ञानी का प्रताप―आत्मा का शरण आत्मा का शील है । शील अर्थात् स्वभाव । आत्मा का अपने आप अपनी सत्ता के कारण जो स्वरूप पाया जाता है वह आत्मा का शील है, वह क्या है? प्रतिभास । चेतना, चैतन्य, इस शील की जो दृष्टि रखता है, इस शील की जो रुचि रखता है वह पुरुष ही निर्वाण पा सकेगा । शील से रहित पुरुष निर्वाण न पा सकेगा । इस गाथा में शील की महिमा बतायी जा रही है । कौन सा शील? परमार्थशील । यद्यपि लोकरूढ़ि में शील ब्रह्मचर्य का नाम है और वह भी कुशीलसेवन न करना, विषयप्रसंग न करना, इसमें रूढ़ है कि वह सहयोगी है । यदि कोई व्यवहारशील ही नहीं रखता और कामविकार के वश होकर परस्त्री, वेश्या आदि के विकल्प बनाये रहता है उस पुरुष को तो निर्वाण के रास्ते का भी अधिकार नहीं । सो व्यवहारशील तो होना ही चाहिए, पर इतने मात्र से निर्वाण नहीं मिलता, किंतु जो परमार्थशील है, आत्मा का ज्ञानस्वरूप है उसे अपने आपको यह मैं ज्ञानमात्र हूँ इस प्रकार का अवलोकन करना, अपने को अनुभवना यह है शील का पालन । उस इस शील का ऐसा माहात्म्य है कि जो भी विषयविरक्त शीलधारी पुरुष कदाचित् पहले आयुबंध के कारण नरक में गया हो तो नरक में भी इस शील की दृष्टि के कारण दुःख कम हो जाते हैं । जैसे यहाँ ही अनेक लोग हैं एकसा बुखार है, एकसा कोई रोग है, फिर भी कोई मनुष्य तो बड़ी बुरी तरह से तड़पते हैं और कोई शांति से पड़े रहते हैं, किसी में धीरता नहीं है किसी में धीरता है । तो यहाँ कारण क्या रहा ? ज्ञान का विकास । जिसने अपने ज्ञान का उपयोग नहीं किया, घबड़ाया, रागद्वेष मोहभाव में बढ़ा वह अधीर हुआ, तो यहाँ भी तो अंतर पाये जाते हैं । तो कोई ज्ञानी जीव पूर्वकृत कर्म के उदय से, नरक में गया हो तो शील के प्रताप से, उस ज्ञानस्वभाव की दृष्टि के प्रताप से वहाँ भी दुःख कम हो जाता है । दुख का संबंध मान्यता से अधिक है, बाहरी बातों से नहीं है । बाहरी बात एकसी बीत रही है, फिर भी कोई दुःख अधिक मानता है कोई कम । तो मानने का दु:ख होता है । उन नरकों में कोई ज्ञानी जीव है शीलरुचिक है नारकी तो वह अपने ज्ञानबल के कारण उसकी मान्यता कम रखता है, ज्ञाताद्रष्टा रहता है, जानता है कि यह कर्मों का उदय है, ऐसा हो रहा है इस ज्ञानबल से उसका दु:ख कम हो जाता है ।

(65) आत्मशील की महिमा―और भी शील की महिमा देखो―किसी पुरुष ने पहले तो नरकायु बांध ली हो, बाद में सम्यग्दर्शन हो और तीर्थंकर प्रकृति का भी बंध कर लेवे तो ऐसा पुरुष जब मरणकाल आयेगा तो उसके यदि क्षायिकसम्यक्त्व नहीं है तो सम्यक्त्व मिटेगा, नरक जायेगा और वहाँ फिर तुरंत ही सम्यक्त्व हो जायेगा और अगर क्षायिक सम्यक्त्व है तो सम्यक्त्व न छूटेगा और सम्यक्त्व साथ लेकर नरक जायेगा । नरकायु व्यतीत करनी पड़ेगी । देखो नारकी है वह जीव, पर सम्यग्दृष्टि है, तीर्थंकर प्रकृति का बंध वहाँ भी चल रहा है । तीर्थंकर प्रकृति का बंध वहाँ भी चल रहा है । तीर्थंकर प्रकृति का बंध मनुष्यगति को छोड़कर अन्य गतियों में प्रारंभ नहीं हो पाता । प्रारंभ मनुष्य ही करते हैं, पर अन्य गतियों में प्रारंभ किए हुए तीर्थंकर प्रकृति का बंध नवीन-नवीन चलता ही रहता है । वह नरक में है, तीर्थंकर प्रकृति के परमाणु भी, वर्गणायें भी बंध रही हैं, अपने ज्ञानबल को सम्हाले हुए है जिससे दु:ख कम है, मगर कुटना पिटना वहाँ भी जारी है । वह तो नरकभूमि का रिवाज है ऐसा, किंतु अंत में जब 6 महीने बाकी रह जाते उस नरक आयु के, तब से यहाँ तो जिस नगरी में उत्पन्न होना है वहाँ रत्नवर्षा होने लगती है और नरकों में देवता लोग पहुंचते हैं सो वहाँ एक कोट रचते हैं जिसमें वह नारकी आराम से रहता है, उसे कोई सता नहीं सकता, और वह नरकायु पूर्ण करके यहाँ तीर्थंकर भव में आता है । मनुष्य हुआ तीर्थंकर प्रकृति वाला और उसके गर्भकल्याणक, जन्मकल्याणक ये सब मनाये जाते हैं, तो यह सब किसकी महिमा है? शील की ।

(66) आत्मशील की ही सर्वोत्कृष्ट तत्त्वरूपता―अच्छा, जरा अपने आपमें सोचकर जरा विचार तो करो कि दुनिया में ऐसा कौनसा पदार्थ है कि जिस पदार्थ को हम ध्यान में रखे रहें तो हमको निराकुलता मिलती रहेगी? आप नाम ले लेकर सोच लो, क्या घर ऐसी चीज है कि जिसको आप दिल में बसाये रहेंगे तो आपको शांति मिलती रहेगी? नहीं है ऐसा । घर में रहकर भी आप गुस्सा करते हैं, व्यग्र होते हैं, झुंझलाते हैं, बिना खाये चले जाते हैं, वहाँ पर भी कोई आकुलता व्यग्रता है ना? कौनसी वस्तु है ऐसी जगत में जिसका ध्यान रखे तो निराकुलता हो । स्त्री, पुत्र, परिजन, भाई, बंधु आदिक कोई नहीं है ऐसे कि जिनको ध्यान में रखे रहें तो निराकुलता हो? ये बातें सब जानते हैं । अधिक बताने की जरूरत नहीं है, क्योंकि आप सब लोग उनके भोग रहे हैं । तो कौनसा पदार्थ ऐसा है कि जिसका ध्यान रखें कि निराकुलता हो? कोई पदार्थ न मिलेगा । एक आत्मा का शील, आत्मा का स्वभाव, आत्मस्वरूप ही एक ऐसा सार तत्त्व है कि जिसको ध्यान में लें तो निराकुलता बनी रहे और इसके बाद फिर अरहंत सिद्ध का स्वरूप उसको ध्यान में लें । तो देखिये परमार्थत: जब भक्ति हो रही तब पूर्ण निर्दोषता या पूर्ण वीतरागता नहीं जग रही, मगर प्रभु की भक्ति इसलिए धन्य है कि उनके गुणों का स्मरण करने के प्रभाव में हम अपने आपके आत्मा के शील तक पहुंच जाते हैं । सर्वोत्कृष्ट तत्त्व है तो आत्मा का शीलस्वभाव ज्ञानस्वरूप । इसकी दृष्टि बनाने की सोचिये । इस आत्मस्वभाव में रमने का प्रोग्राम बनावें, बाकी तो यह सब झमेला है और बेकार है । ज्यों-ज्यों दिन बीतते जाते हैं त्यों-त्यों कुछ से कुछ बदलकर खटपट चलते रहते हैं । कोई सार नहीं है लगाव में । इस जीवन का लक्ष्य बनावें कि हम अपने आपके शीलस्वभाव में रमते रहें । बाहर में कुछ भी पदार्थ रम्य नहीं है, इसलिए इन सबसे हटकर आत्मा में ध्रुव सदा रहने वाले एकस्वरूप स्वभावत: जिसमें प्रतिभास प्रतिभास ही परिणाम चलता है उस स्वभाव को अपना मानो कि यह मैं हूँ और इस स्वभावमात्र आत्मा का जगत में है क्या, ऐसा जानें और इस शील के प्रति रुचि जगे । इस ही की यह महिमा है कि तीर्थंकर होकर मोक्ष गए । तीर्थंकर भी अरहंत हैं, पर वे विशेष हैं तीर्थ करने वाले, पर अंतिम मंजिल है सिद्धगति याने गतिरहित आत्मपद की प्राप्ति । यह शुद्धता शीलस्वभाव की दृष्टि से होती है ।


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