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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 113

From जैनकोष



अथ महामदनिर्भरमंथरं समररंगपरागतमास्रवम् ।

अयमुदारगभीरमहोदयो जयति दुर्जयबोधधनुर्धर: ॥113॥

946- आस्रव विधान-

   समयसार में पहले अधिकारों में यह बताया गया था कि आत्मकल्याण चाहो तो अपने निरपेक्ष सहज स्वरूप को जानो। वह सहज स्वरूप क्या है? दर्शन-ज्ञानस्वरूपी आनंदमय, समस्त परद्रव्यों से निराला, अपने आपमें सहज है, उसमें जो विभाव जग रहे हैं वे विभाव मेरे स्वरूप नहीं हैं, वे पुण्य पाप कर्म के विपाक हैं। उनकी छाया माया प्रतिफलन है, और इस तरह जो नहीं जानता है उसको कर्मबंधन की परंपरा चलती है, आस्रव होता है और जिसके फल में संसार में जन्म मरण करना पड़ता है। तो अब जब अनादि से यह ही नाटक चला आया है कि ये कर्म, ये विभाव ये मनमाना अपना ऊधम मचा रहे हैं सब पर, फिर भी अपनी वृत्ति पर जरा भी अफसोस नहीं कर रहा यह प्राणी और उमंग मचा रहा है परवस्तु के लाभ के लिए, आस्रव चल रहे हैं, कर्म बँध रहे हैं तो ये आस्रवभाव मानो आत्मा में कोई ऐसी त्रुटि, ऐसा छिद्र है कि जहाँ जिस कारण से कर्मों का आस्रव होता रहता है। आस्रव का अर्थ मोटे रूप में तो है आना और सही अर्थ किया है चारों तरफ से चूना। जैसे कोई ऐसा साधन हो कि वहाँ से पानी का धार तो नहीं गिरता किंतु वह प्रदेश, पत्थर बूँद-बूँद से चारों ओर से गीला हो जाता है, थोड़ा ही झरता है। तो जैसे उस पर्वत के एक भाग में सब ओर से पानी चुवा है ऐसे ही आत्मा में चारों तरफ से कर्मत्व चुवा है, याने वे कार्माण वर्गणायें बाहर से नहीं आती किंतु अपने आपमें बसी हुई जो विस्रसोपचय हैं बस वे ही कर्मरूप बन जाती हैं, ऐसा इनका चूना है। भले ही कुछ थोड़ी दूर की कार्माण वर्गणाओं का भी आस्रव हो, किंतु उसकी मुख्यता नहीं, वे भी तो विस्रसोपचय बनकर तुरंत कर्मरूप हो जाते हैं। तो आत्मा ने कोई गलती की, खोटा परिणाम किया तो तुरंत ही यही बसी हुई कार्माण वर्गणायें कर्मरूप बन जाती हैं। इस विपत्ति को यह प्राणी नहीं तक पा रहा, जिसको विषयों के साधनों में मोह लगा है, इस तरह यहाँ आस्रव आता है।

947- महामदनिर्भरमंथर आस्रव पर ज्ञानज्योति का विजय-

    अनादि से आस्रव का इस जगत पर राज्य सा चल रहा है, और इसको महान मद आया, विकल्प आया, जिससे भरा हुआ यह आस्रव मंथर बनेगा। जैसे यहाँ किसी ने शराब पी हो, अहंकार बसा हो तो जैसे उसकी एक मदायली धीमी प्रवृत्ति होती है ऐसे ही उसकी गति मंथर हो गई मायने कर्म आते कहाँ से? यहीं से, कोई लंबी जगह से नहीं। आत्मा के प्रदेश में ही कर्म बसे हैं जिसमें कर्मपना आया है तो ऐसी महान निधि से भरे होने के कारण यह मंथरगति वाला होता है अर्थात् अहंकार के वश होकर उसकी मदायली जैसी प्रवृत्ति हो जाती है, ऐसे ही यह आस्रव अनादि से इस जीव पर हुकुम करता लदा हुआ चला आ रहा है, लेकिन अनादिकाल बीत गया इसी पद में, अब कुछ ज्ञानज्योति प्रकट हुई तो अब इनका युद्ध चलने लगा। जैसे कभी कोई कहता है कि ऐसा मालूम होता है कि हममें कोई दो चीजें बसी हैं याने कहो मन और प्रभु मन तो खोटे काम के लिए उमंग लाता है, पाप करने के लिए, व्यसन प्रकृति के लिए यह मन एक उत्साह दिलाता है, उमंग दिलाता है, प्रवृत्ति कराता है और प्रभु उसे रोकता है। कभी दो मन जैसे हुआ करते तो वे दो मन नहीं हैं। मन तो वहाँ एक ही है पर वह कुछ ध्यान में वासित है, कुछ कषाय से वासित है, तो ऐसे प्रदेश में उसकी ये दो धारायें चलने लगती हैं। अब आ गया ज्ञान समररंग में, युद्धस्थल में तो यहाँ अब दो का युद्ध है- आस्रव और भेदविज्ञान ज्योति, यह ज्ञान धनुर्धारी, जिसका जीतना बड़ा कठिन है। असली और नकली जब इन दो की मुठभेड़ होती है तो नकली का क्या वश चलेगा? देखिये परभाव और स्वभावज्योति जब इन दो का मुकाबला होगा तो परभाव का विलय होगा। तो यहाँ सम्यग्ज्ञान रूप धनुर्धारी अब वहाँ विजय पाता है आस्रव पर। कैसी है यह ज्ञानज्योति जो आस्रव पर विजय पा रहा? सो सुनिये।

948- बोधधनुर्धर वीर ज्ञानतत्त्व की उदारता व गंभीरता-

    यह उदार है क्योंकि इष्ट विषय से प्रीति नहीं, अनिष्ट विषय में द्वेष नहीं, किसी पर पक्षपात नहीं, समता की गली से चलने वाला है, जो सही ज्ञान है वह उदार हुआ करता है, साथ ही गंभीर बन गया याने अब उसमें तरंग नहीं उठ रही, लहर नहीं उठती। जैसे कभी हवा न हो तो समुद्र अपनी शांत मुद्रा में रहता है, तरंग उठी तो उसमें खलबल हलचल हुई। ज्ञान के ऊपर रागद्वेष की तरंग चली तो खलबल हलचल होती, पर सम्यग्ज्ञान ने अपने ज्ञानस्वभाव को उपयोग में लिया है तो वहाँ तरंग नहीं, इसलिए वह गंभीर है। ऐसे महान अभ्युदय के लिए जिसका अभी तक विकास न था, ऐसा ज्ञान होता है और आस्रव पर विजय प्राप्त करता है, आस्रव चीज क्या हैं? अकर्मरूप पुद्गल में कार्माण वर्गणा एक जाति होती है पुद्गल की जिसका नाम कार्माण वर्गणा है वह कर्मरूप बन जाता है। कैसे बन जाता कर्मरूप, जो पहले बाँधे हुए कर्म हैं उनका उदय आया, उसका निमित्त पाकर नवीन कर्म आ जाते हैं, और उन उदय वाले कर्मों में निमित्तपने की बात आ रही है जीव के राग-द्वेष-मोहभाव का निमित्त पाकर। यह अज्ञानभाव है, जिसको करते हुए यह जीव अपने आप चतुराई समझता है। किसी को अगर ठग लिया तो उसमें बड़ी चतुराई समझता है, देखो मैंने उसे कैसा उल्लू बनाया, ठग लिया। अरे यह नहीं जानता कि खुद को ही ठगा है, दूसरे को नहीं, मेरा तो सब कुछ मेरे पुण्य पाप के अनुसार होगा, मगर खोटे परिणाम हुए तो खुद को ही ठग लिया। तो देखो खुद को कितना ठग रहे लोग। रात दिन राग करके द्वेष करके अज्ञान बताकर खुद को कितना ठग रहे, लुट रहे, यह लुटावा इस जीव का तब तक चलता ही रहेगा जब तक अज्ञानभाव है।

949- ज्ञानज्योति के प्रकट होने पर अज्ञानभाव का प्रलय-

   ज्ञानज्योति जहाँ प्रकट हो रही वहाँ अब अज्ञान का आविर्भाव नहीं होता। आत्मा तो एक है, उपयोग भी एक है। जब उपयोग में ज्ञानज्योति आयी तो अज्ञान के भाव दूर हो जाते हैं और आस्रव भी दूर हो गया, क्योंकि आस्रव तो इस जीव के रागद्वेष मोह के बल पर हुआ करते थे। याने चीज तो वह एक ज्ञान है मगर वहाँ रागद्वेष मोह का संबंध है तो वहाँ अज्ञान का वातावरण बन गया। और, वहाँ कर्म का ग्रहण हो गया। यदि रागद्वेष मोह का संपर्क छोड़ दें तो कर्म का आस्रव भी दूर हो जायगा। जैसे लोहे के पास चुंबक रख दो तो लोहा खिंच आयगा और चुंबक को दूर धर दो तो क्यों खिंचेगा? ऐसे ही रागद्वेष मोहभाव बसेंगे तो कर्म का परिणमन होगा, रागद्वेष मोहभाव न रहे तो कर्म का आस्रव कैसे रहेगा? देखो एक तो होती है घटना की बात और एक होती है उपयोग में श्रद्धा में रहने की बात। जैसे सम्यग्दृष्टि अपने उपयोग में ज्ञान में अविकार चैतन्यस्वरूप को ही समाये हैं, उसके बुद्धिपूर्वक आस्रव होते ही नहीं, और घटना देखो तो जब तक कमजोरी है, भीतर वासना है, रागद्वेष के साधनभूत कर्म का विपाक है तो अबुद्धिपूर्वक चल रहा है आस्रव, पर जो ज्ञानी निमित्तनैमित्तिक भाव का तथ्य जान गया वह जानता है कि वे जीवभाव नहीं हैं। ये राग-द्वेष जो परिणाम हैं वे मेरे भाव नहीं हैं। मैं तो चैतन्यस्वरूप हूँ । सो जहाँ यह तोड कर दी तो जैसे कोई फल टूट जाय डंठल से तो वह डंठल में कैसे जुड़ेगा फल? ऐसे ही मेरे ज्ञान में सही बात समा गई और रागद्वेष मोह को अलग कर लिया तो ये रागद्वेष मोह अब जीव के साथ एकत्व को कैसे प्राप्त हो सकते? यही तो एक अपनी विजय है। भीतर में ही ज्ञान सम्हालना है, फिर अपनी पूरी विजय है। राग-द्वेष-मोह ये ही कर्मों के आस्रव के जनक हैं, इन्हें दूर करें फिर अपनी विजय ही विजय है।


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