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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 118

From जैनकोष



विजहति न हि सत्तं प्रत्यया: पूर्वबद्धा:

समयमनुसरंतो यद्यपि द्रव्यरूपा: । तदपि सकलरागद्वेषमोहव्युदासा- दवतरति न जातु ज्ञानिन: कर्मबंध: ॥118॥

974- बुद्धिपूर्वक रागद्वेषमोह का अभाव होने से ज्ञानी के निरास्रवत्व का प्रतिपादन- यद्यपि पहले के बाँधे हुए कर्म अपनी सत्ता को नहीं छोड़ रहे हैं, उनकी सत्ता बनी हुई है और जब-जब उनका समय आता है तो वे कर्म अपने समय में अपना विपाक भी उगलते हैं तो भी समस्त रागद्वेष मोह का अभाव होने से ज्ञानी जीव के कभी कर्मबंध नहीं होता। देखना, थोड़े पढ़े लिखे लोगों को यह ही संदेह होता और एकांत हो जाता है, किंतु इस ग्रंथ में लिखा यह है कि इच्छापूर्वक रागद्वेष नहीं है, सो इच्छापूर्वक जो आस्रव होता वह नहीं है। कर्मोदय की चेष्टा चल रही है। रागद्वेष को यह ज्ञानी सम्यग्दृष्टि भी कर रहा है सो उसके क्या आस्रव न होगा? क्या बंध न होगा? आस्रव है, बंध है, पर चूँकि उससे विरक्त है, उस ओर इच्छा नहीं है इस कारण से उसके अधिक आस्रव या अधिक बंध (तीव्र) नहीं है। याने बुद्धिपूर्वक आस्रव से जैसा बंध होता सो नहीं है। यह बात सर्वत्र लगाना। तो अन्य ग्रंथों में विरोध न आयगा, अन्यथा यह शंका रहेगी कि धवल में, कर्मकांड में, महाधवल में तो 10 वें गुणस्थान तक सांपारायिक आस्रव कहा, बंध कहा और अरहंत भगवान तक के भी आस्रव कहा, बंध तो नहीं है, वहाँ ईर्यापथाश्रव है और यहाँ कह रहे कि जहाँ सम्यग्दर्शन हो, ज्ञानी हो मायने चौथे गुणस्थान से लगा लो- वहाँ से वह निराश्रव है, निर्बंध है, तो उसका अर्थ है कि अबुद्धिपूर्वक तो आस्रव हो रहा है मगर इच्छा करके, लगन करके उसके आस्रव बंध नहीं है। 975- कर्म परतत्त्व का परिचय- अच्छा अब थोड़ायह ध्यान में लायें कि ये कर्म क्या चीज है? कैसे उदय में आते हैं और क्यों फल इनका मिलता है? तो देखो कर्म की बात तो सभी लोग कहते, तकदीर, देव, भाग्य, रेखा, कर्म, और-और भी बातें करते हैं कि कर्मरेखा नहीं मिटती, भाग्य बड़ा प्रबल है..सारी बातें करते हैं, पर ऐसी बात करने वाले को अनेक पुरुष कहने लगते हैं, इसका स्पष्ट बोध नहीं होता कि कर्म भी कोई वस्तु हुआ करती है। उसके बारे में अंदाज है- ईश्वर ने भाग्य बना दिया, अब कई लोग मुर्दा को खोपड़ी को भी निरखते कि इसमें कैसी रेखायें पड़ी हैं तो उससे जीव का अंदाज लगाते। अरे, इन हड्डी की रेखाओं का नाम कर्म नहीं है, कोई सोचना मात्र ही कर्म नहीं, हौवा मात्र नहीं। जैसे अन्य पदार्थ है वैसे ही वास्तव में कर्म भी पदार्थ है। यह जो परमाणुओं का समूह है ईंट भींट पत्थर आदिक ये जो हैं सो हैं, तो जैसे ये पौद्गलिक हैं ऐसे ही कर्म भी पौद्गलिक होते। फर्क इतना है कि इनमें रूप, रस, गंध, स्पर्श व्यक्त है, इन्हें हम लोग इंद्रिय के माध्यम से जान जाते हैं और कर्म का रूप, रस, गंध, स्पर्श अव्यक्त है। हम इसे नहीं जान पाते, केवल ज्ञानी जाने, सर्वावधि परमावधि ज्ञानी जाने, और के वश की साक्षात् जानकारी नहीं, पर हैं वे कर्म, और जहाँ इस जीव ने कषायभाव किया, यही पड़ी हुई कार्माण वर्गणायें कर्मरूप बन गई। कर्मरूप हो गई याने उनमें फलदान शक्ति आ गई। अब वे सत्ता में पड़े हैं, उससे जीव का कोई नुकसान नहीं, मगर नुकसान करने वाले कर्म पड़े तो है और सत्ता में और उससे पहले के उदय में आ रहे तो उदय में जब आते हैं तो यों समझिये कि जैसे दर्पण के सामने कपकपाता हुआ हाथ आया तो दर्पण की फोटो भी कपकपाती हुई बनती है, तो ऐसे ही वे कर्म अपना अनुभाग विपाक लिए हुए उदय में आये मायने निकलते समय उनमें एक अपनी तडफन हुई। इतना काम कर्म में हुआ मगर चूँकि वे एक क्षेत्रावगाह में हैं, इनके बंधन में हैं याने परस्पर निमित्त नैमित्तिक बंधन है, सो वे दर्पण में अंधकार की तरह भीतर ज्ञेय बन गए, प्रतिफलन हुआ, छाया हुई, फोटो आयी, किन्हीं शब्दों में कहो, वहाँ वे कर्मविपाक ऐसा जानने में आये कि यह जान नहीं पाता और जान गया। कैसा विचित्र जानना है कि इसकी बुद्धि में नहीं आ पाता, ज्ञान में नहीं समा पाता कि ये कर्म है और कर्मरस है, मगर उस कर्मरसरूप अपने को मानने लगा तो यह जानने में ही तो उसका एकरस बना। यह ऐसा विचित्र ज्ञेय होता कि जिसकी कोई उपमा नहीं। यह कर्म यह प्रतिफलन बाहर नहीं। पदार्थ ज्ञेय होता है तो बाहरी पदार्थ का तो परिचय हो जाता है यह है पत्थर, यह है ईंट, आदि लेकिन चीज की फोटो आयी और रात के समय में खूब अंधेरी रात में उस दर्पण में कोई फोटो है या नहीं सो बताओ। अब उस अंधेरे की फोटो की उस दर्पण में कुछ मालूम पड़ता है क्या? नहीं। उसकी सत्ता ही नहीं ज्ञात होती कि जैसे दिन होने पर दर्पण में इन चीजों की फोटो सुविदित होती है। तो अंधकार का प्रतिफलन होना, फोटो आना ऐसा विचित्र है कि उसमें दर्पण तक का भी पता नहीं रहता, और का तो पता क्या पड़े, क्या है। तो ऐसे ही कर्मविपाक एक अंधकाररूप से ज्ञात होता है कि उसमें यह लिप्त हो जाय, उस अनुरूप प्रवृत्ति बन जाय फिर भी यह ज्ञान नहीं हो पाता कि ये कर्म आये हैं, ये आये हैं, जैसे कि ये बाहर की चीजें जानने में आती। 976- परभावों से स्वभाव का पार्थक्यपरिचय- ये कर्म व कर्मविपाक अन्य हैं और अपने में इसका कर्मरूप प्रतिफलन बनता है यह परभाव है। बस यही दो टूक करना है, ज्ञान से यही भेद करना है। ज्ञान से भेद करो कि जो यह प्रतिफलन, यह फोटो, यह कर्मरस, यह कर्मलीला, यह कर्मछाया है यह मैं नहीं हूँ। मेरे में हुए तो हैं सो यह मेरी स्वच्छता की प्रशंसा है। जो कर्मविपाक का प्रतिफलन मेरे में हुआ है सो यह तो स्वच्छता की प्रशंसा है। यह मैं नहीं हूँ। जैसे कभी किसी कमरे में बल्ब जल रहा और बाहर बैठे हुए को उस कमरे की खिड़की में से कुर्सी टेबल सब नजर आ रहे, बल्ब नजर नहीं आ रहा, दीपक नजर नहीं आ रहा, पर उस खिड़की में से अनेक चीजें प्रकाशित नजर में आ रहीं। तो उन प्रकाशित चीजों को परखकर आप तुरंत यह ज्ञान नहीं करते, क्या, कि बल्ब जल रहा है? होता ना ज्ञान। दीपक जल रहा, तो ऐसे ही इसमें रागादिक आये, विकार बने, उनको निरखकर हम यहज्ञान करें कि यह स्वच्छता का अभ्युदय है याने आत्मा में ज्ञान की स्वच्छता का विलास है, प्रशंसा है कि यह राग यहाँ उदित होता है, ऐसी स्वच्छता की ओर जोर दिया जाय। ज्ञान की ओर मोड़ कीजिये, विकार की ओर मोड़ न कीजिए, यहाँ ऐसा भेद करना है, ऐसा छेदन हो जावे तो समझ लीजिए कि हमारा जीवन सार्थक है, आगे हमारा भविष्य उज्ज्वल है और अंत तक विभावों में ही रम गया, उस तृष्णा में, कषाय में, माया में, इनमें ही रम गया और इसी रूप हो रहे तो यह ही तो अनादि से किया है। किसी भी भव में पहुंच गए, दूसरा कोई उस भव में साथ नहीं गया। किसी भी भव का प्रसंग आपको मददगार उस समय भी नहीं होता, आगे भी न होगा तो यहाँ विरमना क्या, यहाँ लगना क्या? यह अपने आपके स्वभाव में लगता है। बहुत गंभीरता से विचार करें। बड़ा होना हो तो अपने स्वयं सहज बड़प्पन की बात करें। पौद्गलिक वैभव की तृष्णा में, ममता में बड़प्पन न बनेगा। आपका बड़प्पन आप में है आप स्वयं बड़े हैं, स्वरूप से बड़े हैं। तो अपने स्वरूप की सुध लें, ज्ञान की सुध लें तो वह है आपका सच्चा बड़प्पन। उसमें एक सहज आनंद है, परमतृप्ति है, और उसके अतिरिक्त अन्य विभावों में तो सारी उलझन, फंसाव, बंध, आस्रव ये सभी बातें आ जाती हैं। 977- भेदविज्ञानी के ज्ञान व वैराग्य के कारण कर्मबंधन का अभाव-

इस कलश में यह कह रहे हैं कि अज्ञान अवस्था में जो पहिले कर्म बाँध रखा था वे कर्म अपनी सत्ता नहीं छोड़ रहे और जब उनका उदयकाल आता है तो वे अपना विपाक दिखाते हैं। बात यद्यपि ऐसी है तो ज्ञानी ने अपने सहज स्वरूप को पहिचाना, अनुभवा जिस कारण से इसको अब बाहरी प्रसंगों में इच्छा नहीं रही। और देखो- इच्छा बिना कोई रोटी खायगा क्या? मुनि आहर को निकलें आहार ग्रहण करें और कहो कि उनके इच्छा नहीं है तो यह बात कोई मान लेगा क्या? मानेगा तो नहीं, मगर इच्छा-इच्छा का भेद है। एक तो बाह्य चीज को अपना सर्वस्व जानकर चाहना और एक परिस्थिति, प्रसंग ऐसा बन गया कि गुजारा के लिये चाहना। इन दो चाहों में अंतर होता है। जैसे कैदी को चक्की पीसनी पड़ती तो वह इच्छा बिना पीस सकता क्या? अरे, वह इस इच्छा को मन में रखकर चक्की पीसता कि कहीं सिपाही लोग हंटर से पीट न बैठें। तो बिना इच्छा के पीस तो नहीं सकता और ये घर के अंदर चक्की पीसने वाली बुढ़ियाँ जो गा-गाकर पीसती हैं, बड़ी उमंग के साथ, तो बताओ उनके चक्की पीसने में और कैदी के चक्की पीसने में अंतर है ना? है अंतर। यहाँ आसक्तिसहित इच्छा है और वहाँ विरक्तिसहित इच्छा है, मामूली इच्छा है। उस इच्छा को यहाँ इच्छा नहीं कहा है। यहाँ इच्छा कह रहे हैं उसी को जो मोह वाली इच्छा है। सो ऐसी इच्छापूर्वक बुद्धिपूर्वक विकार नहीं है। रागद्वेष नहीं है ज्ञानी के इसलिए कर्मबंध नहीं होता। शास्त्र का स्वाध्याय तो है मगर तत्त्वरहस्यमयी विद्या गुरुगम बिना नहीं आती मौलिक ढंग से याने केवल पढ़ लेने से या थोड़ा सुन लेने से उसका मर्म पूरा हो जाय सो बात बन नहीं पाती। कोई विषय होते हैं ऐसे कि बाँचने से भी सही-सही समझ में नहीं आते। उनमें नासमझी से एकांत या अनर्थ की बात भी कर सकते। इस कलश में सीधा लिखा है, बुद्धिपूर्वक, अबुद्धिपूर्वक की कोई बात नहीं लिखी है, मगर जिसने चारों वेदों का अध्ययन किया- प्रथमानुयोग, द्रव्यानुयोग, करणानुयोग, ऐसा जो चतुर्वेदी विद्वान है वह उससे सही तथ्य निकालेगा और निकालकर चूँकि एक अध्यात्मप्रगति करना हैं अतएव वह विवादों को हटायेगा, बस जान लेगा और जान करके, उपेक्षा करके एक स्वभाव भाव में ही लगेगा ऐसे ज्ञानी पुरुष के कर्मबंध नहीं होता। इसी बात के समर्थन में अब एक श्लोक कह रहे हैं।


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