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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 125

From जैनकोष



आसंसार-विरोधि-संवर-जयैकांतावलिप्तास्रव-

न्यक्कारात्प्रतिलब्धनित्यविजयं संपादयत्संवरं । व्यावृत्तं पररूपतो नियमितं सम्यक्स्वरूपेस्फुर- ज्ज्योतिश्चिन्मयमुज्ज्वलं निजरसप्राग्भारमुज्जृंभते ॥125॥

999- उपयोगमंच पर आये हुए जीव अजीव पुण्यपाप आस्रव का भेद ज्ञात होने पर निष्क्रमण- उपयोगभूमि पर याने एक जानकारी के प्रसंग में पहले जीव और अजीव ये दोनों भेष बनाकर आये थे। उनकी जानकारी हुई। पुण्य पापरूप में भेष बनाकर आये थे, उनकी सही जानकारी हुई। उस सही जानकारी के होते ही भेष बनाने वाले में कांति नहीं रहती। जैसे कोई बहुरूपिया आपके घर पर आये तो उसके आते ही तो एकदम प्रभाव सा बैठता है, कि इन्स्पेक्टर या कोई आफीसर सा बनकर आ गया तो उसे देखकर एक बार तो दिल दहल जाता कि क्या मामला हो गया, और थोड़ी ही देर में जब आप खुद पहिचान गए कि यह तो फलाना व्यक्ति है, भेष धरकर आया है, या उससे ही कुछ मुस्कराने जैसी बात बन जाय जिससे पहिचान में आ जाय कि यह तो बहुरूपिया है। सही पहचान हो जाने पर फिर उसके भय नहीं रहता और साथ ही वह बहुरूपिया वहाँ से आगे बढ़ जाता, वहाँ ठहर नहीं सकता। उसके ठहरने का संकल्प तो तब तक मजबूत था जब तक कि वह बहुरूपियापन जिसका भेष धरा वह सही उतरता और प्रभावित होता। जब उसका मूल स्वरूप जाना कि वह फिर ठहरता नहीं, इसी प्रकार, पुण्य, पापकर्म का मूलस्वरूप जानें तो वे ठहरेंगे नहीं। आस्रव भी आया था अपना नाटक दिखाने को। वहाँ पर भी इस दर्शक ने, मननशील इस अंतरात्मा ने समझा, आस्रव का भी भेद और जाना तो आस्रव भी निष्कांत हो गया। यह सब नाटक भेष के रूप में इन 7 तत्त्वों का परिचय कराया जा रहा है। 1000- आस्रवनिष्क्रांति का उपायभूत आस्रवतथ्य का परिचय- आस्रव की क्या पहिचान किया था मूल में कि जिससे आस्रव टिक न सका।मायने हमारे ज्ञान में जो आस्रव की उमंग रहती है बस वही तो एक भेष, नाटक चल रहा है, और जहाँ यह जाना कि आस्रव नाम है किसका, कोई मौलिक पदार्थ तो नहीं, सत्तावान तो चीज है नहीं, मूल में तो दो ही चीजें हैं यहाँ चेतन और जड़कर्म, बना कैसे यह आस्रव? यह आस्रव मायने आना, कार्माणवर्गणाओं में कर्मत्व परिणति हो गई, यह ही तो आस्रव है, कैसे आ गई? विषम विकार, परिणाम किसी परनिमित्त के सन्निधान बिना हो ही नहीं सकता। अन्यथा वह स्वभाव बन बैठेगा। तो पुद्गल कार्माणवर्गणाओं में जो कर्मत्व आया है उसका निमित्त कारण क्या है? तो उदय में आया हुआ पुदगल कर्म, यह है उसका निमित्त कारण। अच्छा तो उदयागत द्रव्यप्रत्यय नवीन कर्म के आस्रव का निमित्त बने, यह बल कैसे मिला? कोरे द्रव्य प्रत्यय में नवीन कर्म के आस्रव का निमित्तपना हो नहीं पाता। यहाँ निमित्तपना आया कैसे? तो उस द्रव्यप्रत्यय के उदय के निमित्त से जो जीव में रागद्वेष भाव हुए हैं उस विकार का सन्निधान पाकर इन उदयागत द्रव्य प्रत्ययों में नवीन कर्मों के आस्रवपने का निमित्तपन आया। जैसे कमरे में रोशनी आयी जहाँ अँधेरा था, जहाँ सूर्य की रोशनी कभी न पहुँची थी, मगर किसी बच्चे ने कहीं धूप में बाहर खड़े होकर ऐसा दर्पण किया घर के सम्मुख और सूर्य के सामने कि वह सूर्य का प्रकाश घर में पहुंच गया। घर में जो प्रकाश हुआ, पदार्थप्रकाश पहुँचा, उसका निमित्त क्या है? वह दर्पण उस परिस्थिति में रहने वाला दर्पण और दर्पण में ऐसा निमित्तपन आया उसका निमित्त क्या है? वह दर्पण, उस परिस्थिति में रहने वाला दर्पण और दर्पण में ऐसा निमित्तपन आया उसका निमित्त क्या है? सूर्य। तो मूल में तो सूर्य ही रहा। सूर्य न हो तो वह दर्पण उस घर में पहुँचे हुए प्रकाश का निमित्त नहीं बन सकता। तो इसी तरह उदय में आये हुए द्रव्यप्रत्यय में जब निमित्तपना नहीं आता तब कर्मास्रव नहीं होता। उसके निमित्तत्व को स्फुरित करने में निमित्त हुए रागद्वेष विकार। तो उदय में आये हुए द्रव्यकर्म की दो क्रियायें हुई एक प्रकार से। है वह नैमित्तिक कार्य कि एक तो रागविकार उत्पन्न करना और एकनवीन कर्मों का आस्रव करना। जैसे कबड्डी खेलने वाले लड़के दोनों तरफ से सावधान रहते हैं ऐसे ही मैदान में आये हुए विपाक द्रव्यकर्म, इनका दोनों तरफ प्रभाव चलता है। जहाँ रागविकार हुआ वहाँ कर्माश्रव है। हैं दोनों नैमित्तिक। यद्यपि प्रत्येक पदार्थ का परिणमन अपने में है, दूसरे में नहीं। फिर भी अगर विकाररूप कोई उपादान परिणमे तो उसमें ऐसी ही कला है कि उस अनुकूल निमित्त सन्निधान में वह विकाररूप परिणमता है। आस्रव की पोल जानें, भेष जानें, मूल चीज जानें। आस्रव भी निकलकर भागेंगे। 1001- चिन्मय उज्ज्वल ज्ञानज्योतिर्मय संवरतत्त्व का प्रवेश-

    देखो, उपयोग तोचल ही रहा है।उपयोग में सम्वर का प्रवेश हुआ।सम्वरतत्त्व आया, वह सम्वर क्या चीज है? यह कोई स्वतंत्र पदार्थ तो नहीं है। बताओ संवर उत्पाद व्यय और ध्रौव्यरूप है क्या? गुणपर्यायवान् है क्या? सम्वर तो एक परिणमन है। वह क्या चीज है? वह चैतन्यस्वरूप। यही स्वयं सम्वर स्वरूप है, तो जो चिन्मय स्फुरायमान ज्योति है, यही है सम्वर, सो यह ज्योति, यह संवर तत्त्व अब यहाँ बड़े वेग से प्रकट होता है। तो यह चिन्मात्र चिन्मय, स्फुरायमान उज्ज्वल ज्योति जो प्रकट हुई है तो वह अपने ही रसभार से भरा हुआ है- उसका श्रृंगार,उसका तेज, उसका बल, उसकी कला। जैसे कोई मंच पर अपना पार्ट खेलने आया हो तो उसमें सभी चीजें होती ना? वहअपनेआप में बलिष्ट, तेजस्वी कहने का ढंग, बोलने की बात, पूरी शक्ति प्रयुक्त होना याने एक वह मनस्वी एक ढंग से ही तो पार्ट में आता है, अन्यथा उससे कुछ बनेगा ही नहीं, काँप करके गिर जायगा या शर्मिंदा होकर भाग जायगा। तो ऐसे ही यह सम्वर जो आज अपने उपयोग मंच पर आया है जिस प्रसंग में हम सब केवल जानकारी निरीक्षण कर रहे हैं वह अपने आपमें बड़ा बलिष्ट है, वैभवशील है और अपने निजरस से भरा हुआ है। यह सम्वर अब यहाँ उदित होता है। क्या करता हुआ उदित हो रहा? इस आस्रव पर विजय प्राप्त करता हुआ उदित हो रहा। आस्रव कैसा है आस्रव ने तो इन समस्त संसारी जीवों पर अनादि से ही एक ऐसी छाप दी है कि प्राणी इस आश्रवों से अपना स्वरूप मान मानकर ऐसे विह्वल हुए हैं जिससे कि आस्रव को एक बड़ा घमंड आ गया कि मैं ही तो इस जगत का बादशाह हूँ। लेकिन, उसका भी तिरस्कार कर दिया इस सम्वर ने।

1002- ज्ञानरुचि का प्रभाव- लोग तो सोचते हैं कि यह मोह बड़ी प्रबल चीज है, मोह के आगे किसी की बात नहीं चलती है मगर स्वरूप देखो, सच्चाई देखो तो मोह और ज्ञान इन दोनों में तुलना करें तो मोह बलिष्ट है कि ज्ञान? अनादिकाल से इस मोह ने इस जगत के प्राणियों पर अपना एक साम्राज्य बना रखा है। जो ऐसे बलिष्ट मोह को भी पछाड़ दे वह ज्ञान बड़ा पूजनीय है। अच्छा इसके विपरीत भी तो बोल सकते हैं कि जो ज्ञान एक स्वभावत: बलिष्ट है वह सब कुछ है, लेकिन इस ज्ञान को अनादिकाल से अब तक इस मोह ने पछाड़ रखा। बल सबका मालूम पड़ेगा मगर जिस पहलवान की ओर रुचि होती है उस पहलवान की विजय पर दर्शकों को खुशी होती है और उसके लिए एक दाद दी जाती है, ऐसे ही मोह भी बलिष्ट, ज्ञान भी बलिष्ट, अगर मोहबल कुछ न कहलाये तो फिर अब तक क्यों रुलते आये हैं, क्यों नहीं इससे पहले मुक्ति प्राप्त कर ली? मोह का भी अतुल बल समझो। ज्ञान का भी एक अलौकिक बल है, मगर जिसको ज्ञान पहलवान से रुचि लगी है उसकी मुद्रा जानकर, उसकी कोई बात परखकर ही तो उसकी रुचि बनती है। प्रभावित पहलवान के प्रति दार्शनिकों के मन में जरूर छाँट हो जाती है कि यह तो हमारा पहलवान है। क्यों छाँट हो जाती है? कोई बात तो नजर आयी ना। कोई मुस्कराता पहलवान है कोई बड़ा अच्छा ढंग है, कोई बात है तब ही तो दो पहलवानों में तुलना करके कोई न कोई रुच जाता है। यद्यपि वहाँ बेकार बात है, क्यों रुचे पहलवान? वह तो एक बेकार सी बात है। ऐसे ही मोह और ज्ञान में ज्ञान रुचना चाहिए, मोह नहीं। अब, जब ज्ञान की रुचि है तो हमें ज्ञान की बलिष्ठता दिखेगी। ज्ञान विजय प्राप्त कर रहा है, और यद्यपि अनादि से सम्वर तत्त्व पर ही विजय प्राप्त कर रहा यह आस्रव, इस ज्ञान ज्योति पर विजय प्राप्त कर रहे ये आस्रव और कर्म, लेकिन तब तो बेसुधी थी। अब कुछ थोड़ी स्व की परख आयी, थोड़ी ज्ञान की मुद्रा ज्ञान का रूप, ज्ञान के गुण रुचने लगे। हाँ बस रुचने लगे, इतना ही भर तो चाहिए। इस ज्ञानी के इतना ही तो दाद चाहिए था, दर्शक के और मालिक के थोड़ा इस ज्ञान की ओरदृष्टि तो आये, फिर अपने ज्ञान में इतना बल है कि वह प्रकट हो जायगा। ज्ञान की उपेक्षा करेंगे तो ज्ञान क्या करे? थोड़ा ज्ञान रुचे, ज्ञान की दृष्टि जाय फिर ज्ञान का प्रताप और ज्ञान का उमंग जो स्फुटित होता है वह एक अपने वेग के साथ होता है। यह आत्मा, यह उपयोग यह ज्ञानमात्र है। है एक ही चीज।थोड़ा ज्ञान से तो रुचि कर लें फिर यह बड़े वेगपूर्वक होता है तो ऐसा यह अपने निज रस से प्रागभावरूप बोझल एक अपने आपमें कुछ महत्त्व मानता हुआ यह ज्ञान प्रकट होता है। यह सम्वर, सम्वर कहो, ज्ञान कहो, निधि कहो, निज की एक बात है, वह कैसे प्रकट होता? यह आस्रव का तिरस्कार करने से प्रकट होता, जो अनादि से सम्वर पर विजय प्राप्त करके एक मदैला बन रहा था। 1003- ज्ञानस्वरूप में ज्ञान की नियमितता- जो यह सम्वर बना, क्या स्थिति हुई इसकी? यह कहाँ है ज्ञानज्योति। अपने आपके स्वरूप में तो नियत है और समस्त परपदार्थों से निराला है। ज्ञान कहाँ रखा है? ज्ञान में ज्ञान रखा है। ज्ञानस्वरूप में ज्ञान मिल रहा, बाहर कहीं नहीं मिल रहा, किंतु ज्ञानस्वरूप में ही यह ज्ञानतत्त्व, यह सम्वर यह नियतहै नियमित है ऐसा है यह तत्त्व। आकाश कहाँ है? आकाश आकाश में है, अन्य जगह नहीं रह रहा, और चीजों की पूछो कि घडा कहाँ है, चौकी कहाँ है? तो कदाचित् कहा जा सकता कि घर में रखी, इस जगह पड़ी। यद्यपि वहाँ भी स्वरूप दृष्टि से अपने आपमें वे सब हैं? जीव कहाँ? जीव में। संसारी जीव कहाँ रहते? अपने प्रदेशों में, अरे आकाश में ही तो दिख रहे अवगाही से, मगर क्या कह सकते? आकाश कहाँ है? आकाश आकाश में है। आकाश तो सर्वत्र व्यापक है, अनंत है। केवल आकाश को ही देखो, इसी तरह ज्ञानमात्र आत्मतत्त्व को देखो, इसका यह सहज स्वरूप, यह ज्ञानस्वरूप यह कहा है? यह ज्ञान में है अपने स्वरूप में है, अपने स्वरूप से बाहर नहीं है? यद्यपि ज्ञान आत्मप्रदेश में हैं तो भी इस प्रकरण में ऐसा देखना नहीं। है, ऐसा रहो क्यों द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव इन चारों से पहिचान तो होती है वस्तु की। तो भी बाह्यवस्तु की पहिचान में ये चारों ही मुख्य हैं, वहाँ अपना कुछ प्रयोजन नहीं। मगर आत्मतत्त्व की पहिचान में भावदृष्टि मुख्य है। पिंड, क्षेत्र, परिणाम ये मुख्य नहीं बनते। हैं तो प्रयोजक सब दृष्टियाँ मगर स्वानुभूति का प्रयोजक पिंडदृष्टि का निर्णय नहीं है यद्यपि यह भी निर्णय अवश्य प्रयोजक है मगर साक्षात् प्रयोजक नहीं। क्षेत्रदृष्टि से भी सब कुछ पहिचानें, आत्मा इतने विस्तार वाला, असंख्यात प्रदेश वाला....वर्तमान में तोकोई 5 फिट वाला मनुष्य है उतने प्रमाण आत्मा है। तो 5 फिट वाला भले ही निर्णय तो हुआ, और यह निर्णय काम का तो है मगर स्वानुभव के लिए साक्षात् प्रयोजक नहीं। याने जिस मन के बाद स्वानुभव हो सकता है वह क्या क्षेत्र पिंड वाला प्रदेश है? यह भी साक्षात् प्रयोजक नहीं। है यह सब, किंतु भावस्वरूप में जानने के लिए प्रयोजक है। किसी भी तरह पहिचानें, मगर भावदृष्टि से और उसमें भी अभेदभावदृष्टि से पहिचानें, तो आनंदधाम का अनुभव होता है।हमें जो बात चाहिए उसको ही तो निरखना है, तो यह ज्ञान कहाँ मौजूद है? यह अपने स्वरूप में ही सम्यक् प्रकार से निहित है, ऐसा वह संवर स्वरूपज्ञान तत्त्व अब यहाँ प्रकट होता है।


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