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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 127

From जैनकोष



यदि कथमपि धारावाहिना बोधनेन

ध्रुवमुपलभमान: शुद्धमात्मानमास्ते । तदय-मुदय-दात्माराममात्मानमात्मा परपरिणतिरोधाच्छुद्धमेवाभ्युपैति ॥127॥

1017- सहजज्ञानानुभूति में प्राप्त सहज आनंद के अनुभव के क्षण को धन्यवाद-

   उसे ही नया वर्ष कहो, उसे ही नया दिन कहो, उसे ही नई घड़ी कहो जिस काल में यह जीव अपने सहज चैतन्य स्वरूप में यह मैं हूँ ऐसा अनुभव करके निर्विकल्प होवे, आत्मीय आनंद का अनुभव करे। ऐसा ज्ञानी पुरुष प्रशंसनीय है, धन्यवादमय है- आदर्श है और अपने लिए तो वह स्वयं कल्याणमय है। कैसे प्राप्त हो यह स्वभाव की अनुभूति? सीधे-सीधे उपाय हैं। मोक्ष का मार्ग स्वभाव के आलंबन से ही मिलेगा। स्वभाव का आलंबन स्वभाव के परिचय बिना कैसे किया जायगा, स्वभाव का परिचय विभाव से हटे बिना कैसे बन पायगा? जो जीव अपने ज्ञान को कर्मस्वभावरूप से हुआते रहते हैं उनको स्वभावदृष्टि का अमृत कैसे प्राप्त हो सकता है? तो विभावों से उपेक्षा करना यह सबसे पहला काम है। और, विभावों से उपेक्षा करने में बस यह निमित्तनैमित्तिकभाव के परिचय की बात बहुत साधक है, पर इसके ठीक सदुपयोग से इसका काम लेना, यदि परस्पर कर्ताकर्मबुद्धि हो गई तो बात न बनेगी। एक द्रव्य दूसरे द्रव्य का कर्ता कभी होता ही नहीं अर्थात्  एक पदार्थ किसी दूसरे पदार्थरूप परिणम जाय तो बताओ वह रहा कि यह रहा? कुछ भी न रहेगा, सो ऐसा हो ही नहीं सकता। प्रत्येक पदार्थ अपने आपमें उत्पाद व्यय ध्रौव्य स्वरूप है, पर जिसे विकार कहा गया वह हुआ कैसे? सो सुनिये।

1018- विकारघटना का विचरण-

    भैया। घटना से देखोगे तो समझ बनेगी कि विकार यों हो गया कि पूर्वबद्ध कर्म का उदय आया, उस काल में तत्काल प्रतिफलन हुआ और वहाँ यह उपयोग अबुद्धिपूर्वक कर्मविपाकाकार हुआ, मानों वह प्रतिफलन एक आक्रमण है जैसा कि समयसार आत्मख्याति में कहा गया, कर्मविपाकाक्रमण, उस काल में यह जीव अपने शुद्धस्वभाव से च्युत होकर, उसके अनुरूप विकल्परूप परिणमने लगा, विकार के समय हुआ क्या? एक आत्मा की दृष्टि से देखें, तो हुआ क्या? एक पर दृष्टि देकर निर्णय करें, निश्चय से क्या हुआ? तो हुआ यह कि यह आत्मा कर्मस्वभावरूप से परिणम गया, कर्म के स्वभाव से नहीं। जो बाह्य में पुद्गल द्रव्य है, उसके स्वभाव से नहीं, पर भीतर में ही जो एक प्रतिफलन है, जो एक परतत्त्व है उसकी ओर अबुद्धिपूर्वक इसका जुटाव बना। देखिये यह जुटाव कैसे बनता? जैसे दर्पण में चीजों का फोटो आया, हाथ का आया, मुख का आया, और भी अन्य चीज का आया। अच्छा बताओ दर्पण में अंधेरे का फोटो आता कि नहीं? अच्छा रात के समय दर्पण रखा है तो बताओ उसमें कोई फोटो आ रहा कि नहीं? आ रहा। किसका?...अंधेरे का। वहाँ कुछ पता भी पड रहा क्या? पता कुछ नहीं पड रहा। तो यहाँ जो बाहरी ये विषय प्रसंग हैं इनका जानना तो पता वाला जानना है। हम जानते हैं, इसको जाना, उसको जाना। अगर यहाँ कर्मविपाक का प्रतिफलन हो गया, हुआ तो वह ज्ञान में विकल्प, मगर जानकारी में कुछ नहीं आ पाता कि यह ज्ञेय बनता। और, नटखट सब हो जाते हैं। जैसे दर्पण में फोटो का प्रतिबिंब हुआ ऐसे ही इस उपयोग में, स्वच्छभूमि में कर्मविपाक का प्रतिफलन हुआ, अब आत्मा यह अपने स्वभाव से च्युत हुआ अपनी स्वच्छता के तिरोभाव में कर्मरूप से परिणमने लगा।

1019- विभावों की असारता जानने पर विभावों से हटने का उद्यम- तो ये मूल में विकार की बातें जिनको विदित हों वे विभाव से हट जाते हैं। क्या सार है इन विभावों में? ये जब स्वभाव से उदित नहीं हुए, ये औपाधिक हैं, नैमित्तिक हैं, तो जीव के लिए तो ये आपत्तिरूप हैं, दु:खरूप हैं, क्योंकि ये सब आगंतुक हैं। ऐसा बोध करके यह अपने स्वभाव के उन्मुख होता है। हाँ अब चलो अंदर जब स्वभाव की ओरअभिमुख हुए तो एक आत्मतत्त्व का पूरा ध्यान बनावें। क्या है यह स्वभाव? अनादि अनंत अहेतुक परमात्मतत्त्व है जिसका कि जाननस्वरूप है, प्रतिसमय जानता रहता है। जानना ऐसा स्वतंत्र है कि यह किसी के अधीन नहीं है, जानने में विषय, होते हैं इसलिए कहा जाता कि ज्ञेय का आलंबन कर इसने ज्ञान परिणति की, पर ऐसा नहीं है। यह ज्ञेय का आलंबन करके परिणति नहीं करता, ज्ञेय से ज्ञान की उत्पत्ति नहीं होती, ज्ञेय से ज्ञान का तादात्म्य नहीं होता, यह तो क्षणिकवादियों का कथन है कि ज्ञान की उत्पत्ति बाहरी पदार्थ से होती है। ज्ञान बाहरी पदार्थ हुआ करता है यह भी क्षणिकवादियों का सिद्धांत है। ज्ञान तो अपने आत्मद्रव्यत्व स्वभाव के कारण ज्ञान को विषय करता हुआ सदा परिणमता रहता है। अब ये स्थितियाँ एक बंधनदशा की हैं कि यहाँ हम इन इंद्रियों का आलंबन लेकर कुछ जान पाते हैं कि इतने-इतने परिग्रह हैं, अन्य साधन हैं, इन सबके प्रसंग में हम इसे निरख पाते हैं। यह स्थिति आ गई लेकिन यहाँ भी ज्ञान जो जान रहा है वह अपने ही सामर्थ्य से जान रहा है अन्य पदार्थ की सामर्थ्य से नहीं जानता, तो यह तो ज्ञानरूप हुआ। मैं ज्ञानस्वभावी हूँ और ज्ञान-ज्ञानरूप परिणमता रहता हूँ, ऐसा अपने आपको यहाँ स्वभाव से देखो, और जहाँ यह परिचय पाया स्वभाव में कि यह मैं हूँ तो वह अब अज्ञानरूप कहाँ बनेगा? 1020- ज्ञानस्वभाव का अनुभव होने पर उसकी प्रतीति की निरंतरता-

    आपने किसी चीज को जान लिया कि यह फला चीज है, अब कितने ही लोग बहकायें तो भी आप बहकते तो नहीं। वह ज्ञान बदलता नहीं, ऐसे ही यह अंतरात्मा अपने आपके सहज ज्ञानस्वभाव को पहचान ले, अब उसकी यह पहिचान बदलती नहीं। फिर भी स्थितियाँ बड़ी विचित्र है। कहीं उपशम हुआ, फिर मिथ्यात्व उदय में आया और वहाँ उस रूप भाव बने तो वह ज्ञान मिट भी जायगा। अज्ञानरूप परिणम जायगा। वहाँ पर भी यह ज्ञान अपने आपमें किसी कल्मषता को लेकर अज्ञानरूप परिणमा, परिणमे, पर ऐसा हम ध्यान क्यों रखें कि यह अज्ञानरूप परिणमेगा। जब उसने अंतस्तत्त्व को निरखा, उसका सारपना जाना कि यह ही एक सारभूत पदार्थहै तो जो दिल में बसे, जो सारभूत हो, हितरूप हो, शरण हो, सर्वस्व हो वह दिल में से निकल सकता क्या ज्ञानकाल में? तो ऐसे इस ज्ञान में जब यह अंतस्तत्त्व आया, यह स्वभाव मेरा स्वरूप जब यह परिचय में आया भली प्रकार तो यह निकल सकता क्या? अब काम क्या करना? काम यह करना कि अनवरत धारा से उसही में इसका प्रयोग किए रहें, बस यही हमें करना, आपको करना, कर नहीं पाते, सबकी आवाज ऐसी ही आयगी, करते हैं, कर नहीं पाते, अरे नहीं कर पाते तो भी करने का ही लक्ष्य रखना है, यह भी तो ध्यान है ना या नहीं करना है ऐसा ध्यान है। क्या ऐसा परिणाम जगता है? स्वभाव को निरखना, उसमें मग्न होना चाहते हैं, उसी का निरंतर ध्यान रखना चाहते हैं। नहीं रख पाते हैं तो भी वह लक्ष्य तो नहीं छूटना चाहिये। करना तो यह ही है। तो ध्यान से, प्रतीति से, प्रयोग से, पौरुष से, सर्व प्रकार से अपना बल प्रयोग करके (कौनसा बल, ज्ञानबल) यदि किसी प्रकार से इस ही निरंतर धारा में होकर कुछ स्वभाव का ही उपयोग बना रहे और वह इस शुद्ध परिणाम को प्राप्त करे, शुद्ध आत्मारूप अपना उपयोग बनाये तो यह पर परिणति का निरोध करके सिद्धि को प्राप्त कर सकता है।

1021- शुद्धात्मा का अर्थ-

    यहाँ एक बात खास जानना कि शुद्धात्मा शुद्धात्मा के बराबर प्रयोग होते और उसके बाबत लोग विवाद करने लगते तो उस शुद्ध आत्मा का अर्थ क्या है, देखिये शुद्धात्मा का प्रयोग दो जगह मिलता है, एक तो जिसकी परिणति, अवस्था निर्मल होती है उसे कहते हैं शुद्ध तो ऐसा शुद्धात्मा कौन हैं? अरहंत और सिद्ध, जिसकी परिणति शुद्ध हुई है, निर्मल हुई है सो शुद्ध आत्मा हुए। मगर शुद्धात्मा का एक अर्थ और है, जो शुद्धात्मा का मुख्य अर्थ शुद्धपरिणति वाला ज्ञात होने से, उसे शुद्धात्मा बोलने में कुछ खटक सी लगती, मगर जब शुद्धत्व का अर्थ ज्ञात हो जायगा तो खटक न रहेगी। शुद्ध के मायने है केवल प्योर। वैसे नाम शुद्ध रख दिया, पवित्र, पर शुद्ध का शुद्ध अर्थ है जो हो सो है, पर प्योर का, केवल का खालिस का अर्थ उस पर्यायनिर्मलता पर दृष्टि रख कर नहीं है, किंतु वह वह ही है, उसके साथ दूसरा कुछ नहीं होता, न कोई द्रव्य का संबंध होगा, न कोई द्रव्यांतर का प्रभाव, वहाँ पर का कुछ मतलब नहीं, प्रभाव नहीं, कुछ बात ही नहीं, केवल वह ही वह हो उसे शुद्ध कहते हैं। यहाँ द्रव्य शुद्धि के भाव को समझने में पर्यायनिर्मलता की बात बिल्कुल ध्यान में न देना, अनिर्मलता की बात भी ध्यान में न देना, केवल एक सत्त्व को दृष्टि में लें। वह एक पदार्थ है, सत्त्व है, उस ही को ध्यान में लें, वही एक शुद्धत्व है, उसको ध्यान में लेकर यह जानें कि यहाँ शुद्धात्मा मायने है ज्ञान के द्वारा अपने आत्मा के अंदर परखा गया केवल, खालिस एकमात्र जानन प्रतिभास स्वरूप यह परमात्मतत्त्व। केवल आत्मा के सहज सत्त्व कला पर दृष्टि देकर जहाँ ध्यान में लिया, बस पर से विवक्त अपने आपके स्वरूप में एकत्व ऐसा जो तत्त्व है उसे कहते हैं शुद्ध। देखिये जान रहे हैं ऐसा शुद्ध, फिर भी जो राग परिणमन चल रहा है निरंतर अबुद्धिपूर्वक सो चल ही रहा क्योंकि उपयोग तो लिए हुए है हम इस शुद्धात्मा की ओर, तो उपयोग में कैसे आयेंगे? उपयोग रहेगा हमारी जानकारी में कि जैसा है यह सब कुछ जान रहे हो।सो बुद्धि में विकार आयगा तो नहीं, मगर उदय है, प्रतिफलन है और उस प्रकार का वहाँ उपयोग है, चल रहा है, पर्याय में देखें तो अभी वह अशुद्ध है, कौन? जो शुद्ध आत्मतत्त्व के ध्यान में लगा हुआ है, मग्न है, अथवा यों कहो कि स्वानुभव में वह है और एक अलौकिक आत्मीय आनंद ले रहा है, मगर हम उस अशुद्धता को देखते भी नहीं, हमारा वहाँ कुछ प्रयोजन ही नहीं। अशुद्धता को देखने में विकल्प है, अशुद्ध होकर भी अशुद्धपने को देखने में हमारी प्रगति नहीं है, हमारी प्रगति है इस केवल शुद्ध तत्त्व को निरखने में।

1022- दृष्टांतपूर्वक शुद्धात्मा के अर्थ का विवरण-

    एक दृष्टांत ले लो दृष्टांत कई बार लेते हैं दूध का, शुद्ध दूध का। देखो- शुद्ध दूध का अर्थ क्या है ! एक तोयह अर्थ है कि ऐसा दूध जो व्रती लोग खा सकें: हाथ पैर धोकर लाये और अंतर्मुहूर्त में उसे छान ले, फिर चाहे उसमें अठपहरा पानी कितना ही मिला देवे, पर वह शुद्ध माना जाता है पर एक शुद्ध दूध की बात दूसरी ओरसे देखो। चाहे कैसे ही दुहे, कोई भी दुहे, जुता पहनकर दुहे या बिना हाथ पैर धोये दुहे, पर उस दूध में न तो जरा भी पानी डाले, न उसमें से जरा भी क्रीम निकाले, केवल दूध ही दूध रहे तो वहाँ पदार्थ की ओरसे देखो तो वह शुद्ध दूध है, वह खालिस दूध है।खालिस के मायने क्या ! जिसमें कोर्इ दूसरी चीज न लगायी जाय और भीतर का कुछ निराला न जाय उसे कहते हैं पदार्थ की ओरसे शुद्ध। तो ऐसे ही शुद्धात्मा के मायने क्या है? जिसका कि ध्यान करने से हमको मोक्षमार्ग मिलता। कहते हैं ना शुद्धात्मा का ध्यान रखें तो मोक्षमार्ग मिल जायगा। तो अब वहाँ ध्येय शुद्ध आत्मा कौन? कह सकते हैं अरहंत सिद्ध, मगर वे परपदार्थ हैं। उनका ध्यान हमारे शुभोपयोग को तो बना लेगा, मगर परपदार्थ का लक्ष्य होने पर वह हमारे शुद्धोपयोग की रचना न करेगा, जरूरत उसकी भी है इसलिए वह बात चलती है और एक तुरंत तुरंत बात होने से पता नहीं पड़ता कि यह शुद्धोपयोग स्वावलंब से हुआ है या भक्ति से हुआ है। 100 पान हैं और सुई यदि तेजी से चुभो दी जाय तो वहाँ ऐसा लगता है कि वे सभी पान एक साथ छिद गए, पर ऐसी बात नहीं है, एक के बाद एक पान क्रम क्रम से छिदा मगर त्वरित काम होने से पता नहीं पड़ता।

1023- स्वावलंबन से सम्यक्त्व का उद्भव- सम्यग्दर्शन का उद्भव स्वावलंबन से है, मगर स्वावलंबन से होने वाला सम्यग्दर्शन अशुभोपयोग के बाद होगा या शुभोपयोग के बाद? शुभोपयोग के बाद ही होगा, अशुभोपयोग के बाद रत्नत्रय नहीं होता, शुद्धोपयोग नहीं होता। शुभोपयोग के बाद ही सम्यक्त्व होता है। तो उस सम्यग्दर्शन की उद्भूति से पहले जो शुभोपयोग हुआ, अनंतर पहले उस शुभोपयोग में जिनबिंबदर्शन, वेदना, ऋद्धिदर्शन, उपदेश सुनना, चर्चा आदिक सब बातें आयी ना? और, उस आशय से इसका वह शुभोपयोग हुआ। जिस शुभोपयोग के बाद उसका स्वावलंब बनता और सम्यक्त्व की उत्पत्ति होती। तो तीर्थप्रवृत्ति में तो कहा ही जायगा यह कि सम्यग्दर्शन के निमित्त हैं। क्या-क्या? जिनबिंबदर्शन, ऋद्धिदर्शन था और-और, ये सब सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति के निमित्त हैं, और, इसी कारण धवला में, चूलिका में, छटी पुस्तक में अंत में एक अधिकार ही दिया है कि किस गति के जीव कौन-कौन सा निमित्त पाकर सम्यग्दर्शन करते हैं। कहीं चार निमित्त हैं, कहीं तीन, कहीं, कहीं दो। वह उसमें वर्णन है, पर सबका तथ्य तो जानना। 1024- शुद्धात्मोपलंभ का पौरुष- मूल में क्या करना कि धारावाही ज्ञान से एक अपने आपके इस शुद्ध आत्मा को निरखना। क्या? वही वही केवल, एकत्व, विभक्त, विभक्त के मायने पर से निराला एकत्व मायने अपने स्वरूपमात्र में तन्मय, ऐसा यह अपने आपमें निरखो तो जब निरखने आप चलेंगे, प्रयोग करने चलेंगे, कोई बात सोचेंगे तो आप उसमें पुरुषार्थ लगायेंगे कि नहीं। तो क्या पुरुषार्थ लगता है कि जिससे हमको इस अंतस्तत्त्व का अनुभव बनता है।पुरुषार्थ सीधा है अपने को ज्ञानमात्र निरखना जाननमात्र, इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं बन पायगा और उसके जानने में इष्ट अनिष्ट रागद्वेष विकार रूप नहीं है। किसी अग्नि में लोभान गंधक डाल दिया और उसकी ज्वाला कुछ रंगीली, कुछ और तरह, कुछ ढंग से उठे, उठ गई, उसमें ज्ञानबल से भेद कर सकते ना कि अग्नि का शुद्धस्वरूप यह, और यह है परप्रसंग की बात। बल्ब पर नीचे हरा कागज लगा दिया वही रोशनी हो गई।आप उस रोशनी में यह भेद डाल सकते ना कि जो हरापन है वह रोशनी नहीं, जो रोशनी है वह अपने में एक प्रकाशमात्र है। अब वह प्रकाश कहीं सफेद मिलता, कहीं हरा मिलता, कहीं लाल मिलता, कहीं और तरह का मिलता, जिस पर भी प्रकाश का स्वरूप तो प्रकाश ही है, हरा, पीला, नीला आदिक नहीं है, ऐसे ही अपने आपके आत्मा में, अपने आपके केवल उस ज्ञान प्रतिभास को निरखिये जाननमात्र, यही यही बार बार निरखिये, करने का काम यही है, बाकी तो जब एक यह काम नहीं करते हैं तो उस समय की बातें है। क्या पदार्थ है, क्यों है, कहाँ है, क्या घटना, क्या प्रसंग, जब बाहर-बाहर डोल रहे हैं, तो बाहर बाहर की बातें इससे संबंधित चल रही हैं। मगर जहाँ केवल अपने आपके इस अंतस्तत्त्व का ही संबंध रखा वहाँ बाहर की बातों का काम क्या? केवल एक ज्ञानप्रकाशमात्र अपने आपको निरखना। यह बात कुछ देर तक चलती तो रहे। यह आत्मा अपने इस विशुद्ध स्वरूप को ज्ञान में प्राप्त कर लेता है, वहाँ हो ही गया पर परिणति का निरोध। 1025- ज्ञानपरिणाम की दो विधियों के दो प्रभाव- देखो ज्ञान है ना?उस ज्ञान के परिणमन की दो विधियाँ हैं। यह ज्ञान ज्ञानस्वभाव से परिणम ले या यह ज्ञान कर्मस्वभाव से परिणम ले। दो ही तो उसकी बातें हैं।कर्मस्वभाव से परिणमे उसका फल है संसार, जन्ममरण, चारों गतियों के दु:ख और ज्ञानस्वभाव से परिणमे, उसका फल है मोक्षमार्ग, मोक्ष की प्राप्ति। अपने आपको कैसा अनुभव करना, बस ज्ञानमय भाव। और, अज्ञानमय भाव का अर्थ क्या है? कर्मस्वभाव से परिणमते हुए अपने को अपना स्वरूप समझना। इसे कहते हैं अज्ञानमयभाव, और ज्ञानस्वभाव से परिणमते हुए की उस स्थिति में अपने स्वरूप का परिचय करना कि मैं यह हूँ, ऐसी बात जहाँ पड़ी है वह ज्ञानमय भाव है। ज्ञानमय भाव होने पर ज्ञानमय बात ही चलती है, अज्ञानमय भाव होने पर अज्ञानमय बात चलेगी।


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